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शिवसेना का तंज- EVM साथ हो तो अमेरिका में भी खिल सकता है कमल

शिवसेना ने किसान, राम मंदिर, फसलों के उचित दाम, रोजगार और गठबंधन को लेकर एक साथ कई निशाना साधा है. संपादकीय में बीजेपी को नसीहत दी गई है कि सत्ता में बैठे लोगों को संयमित भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए. 

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सौरभ वक्तानिया [Edited by: रविकांत सिंह ]मुंबई, 11 February 2019
शिवसेना का तंज- EVM साथ हो तो अमेरिका में भी खिल सकता है कमल शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की फाइल फोटो (PTI)

शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उनकी पार्टी बीजेपी पर जमकर निशाना साधा गया है. सोमवार को छपे लेख में महाराष्ट्र की राजनीति से लेकर केंद्र की राजनीति तक पर फोकस किया गया है. शिवसेना ने सरकार 'गिराने' वाली संस्कृति पर भी हमला किया है और पूछा है कि बीजेपी की यह भाषा और कब तक चलेगी. संपादकीय की शुरुआत देवेंद्र फडणवीस और उनके उस दावे से की गई है जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र की कुल 48 में 43 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं.

संपादकीय में कहा गया है कि 'महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आत्मबल की जितनी प्रशंसा की जाए वो कम ही है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की उपस्थिति में पुणे में फडणवीस ने नारा दिया है कि ‘पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र में हमने 42 सीटें जीती थीं. इस बार हम किसी भी हालत में 43 सीटें जीतेंगे.’ फडणवीस का ऐसा भी दावा है कि इस बार हम बारामती में पवार का भी पराभव करेंगे. इस पर पवार ने अपने स्वभावानुसार भाजपा को शुभकामनाएं दी हैं. सच तो यह है कि महाराष्ट्र की कुल सीटों में से मतलब 48 सीटें ये लोग आसानी से जीत सकते हैं और देश में तो अपने बलबूते 548 सीटें तो कहीं नहीं गई हैं.

बीजेपी को संभल कर बोलने की नसीहत

शिवसेना ने संपादकीय में ईवीएम और राम मंदिर का मुद्दा भी उठाया है. आगे बीजेपी को सलाह दी गई है कि सत्तावान पार्टी की भाषा संयमित होनी चाहिए और कोई बात बेलगाम होकर नहीं बोली जानी चाहिए. संपादकीय में लिखा गया है कि ‘ईवीएम’ और इस तरह झागवाला आत्मविश्वास साथ में हो तो लंदन और अमेरिका में  ‘कमल’ खिल सकता है लेकिन उससे पहले अयोध्या में राम मंदिर का कमल क्यों नहीं खिला? इसका जवाब दो. ऐसे कई सवालों का जवाब उनके पास नहीं लेकिन ‘इसे गिराएंगे, उसे गिराएंगे, उसे गाड़ेंगे’ इस तरह की भाषा इन दिनों दिल्ली से लेकर गली तक जारी है. गिराने की भाषा इनके मुंह में इतनी बस गई है कि किसी दिन ‘स्लिप ऑफ टंग’ होकर खुद के ही अमुक-तमुक लोगों को गिराएंगे, ऐसा बयान उनके मुंह से न निकल जाए. सत्ताधारी दल में जो संयम और विनम्रता का भाव होना चाहिए वो हाल के दिनों में खत्म हो चुका है. एक तरह की राजनीतिक बधिरता का निर्माण हुआ है. यह मान्य है कि विरोधी दल बेलगाम होकर बोलता है, इसलिए सत्ताधारी दल भी इसी तरह बेलगाम होकर न बोले.

किसानों के बहाने निशाना

संपादकीय में कहा गया है कि 'महाराष्ट्र में शीत लहर के कारण फसलों पर बर्फ जम गई है. कई भागों में ओस की बूंदें जम गई हैं. उसी तरह सत्ताधारियों की बुद्धि भी ठंडी से जम गई है और राजनीति बिगड़ गई है, ऐसा कुछ हुआ है क्या? किसान आज संकट में है. सूखाग्रस्त महाराष्ट्र को केंद्र ने भी नजरअंदाज कर दिया. उन पर जोर से चिल्लाने की बजाय ‘इसे गिराओ, उसे गाड़ो’ ऐसा ही बयानबाजी हो रही है.

शिवसेना-बीजेपी युति का मामला अटका

संपादकीय में लिखा गया है कि 'महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा युति का मामला अधर में अटका है. लेकिन ये स्थिति हमने नहीं पैदा की. बल्कि 2014 में इस पाप का बीजारोपण भाजपा ने ही किया था. सत्ता आती है और चली जाती है. लहर आती है और लहर खत्म हो जाती है. लोकतंत्र में दुर्घटनाएं होती रहती हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में दुर्घटना से राह निकालने का काम जनता को ही करना पड़ता है. पिछले 70 वर्षों में जनता ने यह कार्य बखूबी किया है. किसी दुर्घटना में मजबूत, कर्ता-धर्ता इंसान की स्मृति चली जाती है. उसी तरह किसी दुर्घटना में ‘झटका’ लगने के बाद उसकी स्मृति लौट आती है, ऐसा विज्ञान कहता है. सत्ता किसे नहीं चाहिए? राजनीति करनेवाले सभी लोगों को वह चाहिए लेकिन चौबीस घंटे उसी नशे में रहकर झूमना और नशे में डूबकर बोलना यह उचित नहीं.'

महाराष्ट्र के गंभीर सवालों का क्या?

संपादकीय के मुताबिक, चुनाव लड़ने के लिए ही जैसे हमारा जन्म हुआ है और दूसरे किसी की चुनाव में उतरने की योग्यता भी नहीं है, ऐसे अहंकारी फुफकार से महाराष्ट्र का सामाजिक मन मटमैला किया जा रहा है. राज्य में ढेर सारे सवाल हैं. मुख्यमंत्री इन सवालों को छोड़कर चुनाव लड़ने-जीतने का जाल बुनते बैठे हैं. एक तरफ 48 में से 43 सीटें जीतने की गर्जना करना और दूसरी तरफ शिवसेना के साथ हिंदुत्व के मुद्दे पर ‘युति’ होनी ही चाहिए, ऐसा कहना. एक बार निश्चित क्या करना है इसे तय कर लो. कुछ भी अनाप-शनाप बोलते रहने से लोगों में बची-खुची प्रतिष्ठा भी खत्म हो जाएगी. जो जीतना है, उसे जीतो लेकिन महाराष्ट्र के गंभीर सवालों का क्या?

किसान, प्याज, शिक्षकों का मुद्दा

नगर जिले के पुणतांबे में किसानों की बेटियों ने आंदोलन शुरू किया है. ये बेटियां अनशन पर बैठी हैं. उस आंदोलन को कुचलने के लिए जो सरकार पुलिस बल का इस्तेमाल करती है उनके मुंह जीतने की भाषा शोभा नहीं देती. किसानों की बेटियों-बहुओं को गाड़ो, यही संदेश सरकार दे रही है. प्याज को सिर्फ साढ़े सात पैसे का भाव मिल रहा है. दूध पर लगनेवाली जीएसटी ने किसानों को परेशान कर रखा है. अनाथ आश्रम के दत्तक केंद्रों में पिछले 4 वर्षों में एक हजार से अधिक बच्चों की मौत हुई है. राज्य में शिक्षकों की 24 हजार सीटें खाली पड़ी हैं. उसे भरा जाए इसलिए शिक्षक अनशन पर बैठा है. इनमें से एक भी समस्या पर सरकार के पास कोई उपाय नहीं है. लेकिन महाराष्ट्र में 48 में से 43 सीटें जीतने का ‘उपाय’ उनके पास है.

बीजेपी के बुद्धि-मन पर हमला

जनता को मरने दो, राज्य खाक होने दो, लेकिन राजनीति टिकनी चाहिए. इसे गिराएंगे, उसे गिराएंगे, ऐसा इन दिनों जारी है. इसी नशे में कल वे खुद धराशायी हो जाएंगे, फिर भी इनका गिरे तो भी टांग ऊपर, इस तरीके से कामकाज जारी है. ठंडी से ओस की बूंदें जम रही हैं. उसी तरह राजनीतिक अतिसार से सत्ताधारियों की बुद्धि और मन भी जम गया है.

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