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कौन हैं भगत सिंह कोश्यारी, जिनके हाथ है महाराष्ट्र की सियासी किस्मत का फैसला

महाराष्ट्र के बदलते राजनीतिक समीकरण में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के हाथों से ही प्रदेश की सत्ता के भाग्य के फैसला होना है. बीजेपी और शिवसेना के बाद उन्होंने एनसीपी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया है. ऐसे में अगर महाराष्ट्र में कोई भी दल बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा पाते हैं तो राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार उनके हाथों में होगा. 

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aajtak.in
कुबूल अहमद नई दिल्ली, 12 November 2019
कौन हैं भगत सिंह कोश्यारी, जिनके हाथ है महाराष्ट्र की सियासी किस्मत का फैसला महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी

  • महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी
  • कोश्यारी उत्तराखंड के दूसरे सीएम रहे
  • कोश्यारी बचपन से आरएसएस से जुड़ गए

महाराष्ट्र के बदलते राजनीतिक समीकरण में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के हाथ में प्रदेश की सत्ता का फैसला है. महाराष्ट्र में सरकार गठन के लिए राज्यपाल कोश्यारी के निमंत्रण देने के बावजूद बीजेपी ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं. जबकि, शिवसेना तय समय सीमा में 145 विधायकों का समर्थन पत्र राज्यपाल को नहीं दे पाई. इसके चलते गवर्नर ने महाराष्ट्र की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी एनसीपी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया है. ऐसे में एनसीपी भी बहुमत का दावा पेश करने में सफल नहीं होती है तो महाराष्ट्र का सियासी संकट सुलझाने के लिए कदम उठाने की जिम्मेदारी कोश्यारी पर ही होगी.

भगत सिंह कोश्यारी का उत्तराखंड कनेक्शन

भगत सिंह कोश्यारी का जन्म 17 जून 1942 को उत्तराखंड के बागेश्वर जिले स्थित नामती चेताबागड़ गांव में हुआ था. महाराष्ट्र के राज्यपाल की जिम्मेदारी संभाल रहे कोश्यारी बीजेपी को उत्तराखंड में स्थापित करने वाले उन नेताओं में शुमार किया जाता है. उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और बीजेपी को समर्पित किया है. उन्होंने अपनी प्रराम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में पूरी की और उसके पश्चात उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में पढ़ाई की है. कोश्यारी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव रहने के अलावा उत्तराखंड भाजपा के पहले अध्यक्ष भी रहे.

छात्र जीवन में ही राजनीति में कदम रखा

भगत सिंह कोश्यारी ने छात्र जीवन से राजनीति में कदम रख दिया था. 1961 में कोश्यारी अल्मोड़ा कॉलेज में छात्रसंघ के महासचिव चुने गए. इंदिरा गांधी के द्वारा देश में 1975 में लगाए गए आपातकाल का कोश्यारी ने विरोध किया, जिसके चलते उन्हें करीब पौने दो साल तक जेल में रहना पड़ा. 23 मार्च 1977 को रिहा हुए, जिससे उन्हें राजनीतिक पहचान मिली. 

2001 में उत्तराखंड के सीएम बने

कोश्यारी 1979 से 1985 और फिर 1988 से 1991 तक कुमाऊं विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल में प्रतिनिधित्व किया. उत्तराखंड बनने से पहले 1997 में कोश्यारी उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य चुने गए. उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद नित्यानंद स्वामी मुख्यमंत्री बने तो कोश्यारी उत्तराखंड की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने. इसके बाद उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से करीब छह महीने पहले उत्तराखंड के सत्ता की कोश्यारी को सौंप दी गई और वो 30 अक्टूबर 2001 से लेकर एक मार्च 2002 तक मुख्यमंत्री रहे.

राज्यसभा सांसद से गवर्वर तक का सफर

उत्तराखंड के 2002 में विधानसभा चुनाव में बीजेपी के हार जाने के बाद कोश्यारी ने 2002 से 2007 तक विधानसभा में नेता विपक्ष की जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद उन्होंने 2007 से 2009 तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली, इसी दौरान 2007 में बीजेपी की उत्तराखंड की सत्ता में वापसी हुई. लेकिन पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया. इसके बाद पार्टी वह 2008 से 2014 तक उत्तराखंड से राज्यसभा के सदस्य चुने गए थे. 2014 में बीजेपी ने नैनीताल सीट संसदीय सीट से उन्हें मैदान में उतारा और वह जीतकर पहली बार लोकसभा सदस्य चुने गए, लेकिन 2019 में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. आरएसएस से भगत सिंह कोश्यारी की काफी नजदीकी होने के चलते मोदी सरकार ने उन्हें महाराष्ट्र के राज्यपाल की जिम्मेदारी सौंपी है.

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