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सलाखों के पीछे बीत रही जिंदगी की शाम

उन लोगों का अतीत आपराधिक रहा है. लेकिन अब वे बूढ़े हो चुके हैं. उनमें से कुछ इतने कमजोर हैं कि बगैर सहायता के चल भी नहीं सकते, फिर भी राजस्थान की जेलों में बंद अशक्त बूढ़े कैदियों को राज्‍य सरकार समाज के लिए खतरा मानती है और उन्हें जेलों में ही रखने पर जोर देती है.

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रोहित परिहारजयपुर, 12 February 2012
सलाखों के पीछे बीत रही जिंदगी की शाम

उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर के किसान उमर मोहम्मद को डकैती की कोशिश के एक मामले में 1985 में दोषी पाया गया. यह डकैती राजस्थान के टोंक जिले के एक गांव में 1984 में डाली गई थी. उमर 20 महीने जेल में बिताने के बाद जमानत पर बाहर आया और फरार हो गया. दिसंबर 2010 में उसे फिर से जेल में डाल दिया गया. 90 साल के इस सबसे बूढ़े कैदी को राजस्थान की टोंक जेल में रखा गया है. वह कहता है, 'केवल एक बार मेरा बेटा मुझे देखने आया था.' उसे रिहाई के लिए मई, 2014 का इंतजार है.

झुंझुनूं जिले का किसान बदरु राम 85 साल का है. वह 1999 से जयपुर की सेंट्रल जेल में बंद है. उसे और उसके तीन बेटों को स्थानीय थानेदार समेत दो लोगों की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा मिली थी. झगड़ा पशुओं के पानी को लेकर हुआ था. उसके एक बेटे शिव लाल की जेल में मौत हो गई. वह एक कम उम्र के कैदी के सहारे चलते हुए आहें भरते कहता है, 'अब यहां क्या रखा है?'

जयपुर की ही केंद्रीय जेल में 80 साल का जीवन राम है जो जयपुर जिले का है. उसने जमीन के विवाद में अपने पड़ोसी की हत्या कर दी थी. वह 2001 में दोषी ठहराए जाने से पहले तक जमानत पर था लेकिन उसे उसके 13 दूसरे रिश्तेदारों के साथ उम्र कैद की सजा सुनाई गई. वह कहता है, 'यह उम्र जेल में रहने की नहीं बल्कि पोते के साथ होने की है.' जीवन का साथी कैदी 70 साल का दाना राम लगभग उतना ही बहरा है जितना 80 साल का असा राम. वह कहता है, 'मैं अपनी टांगों पर कपड़े की पट्टी बांध लेता हूं जिससे दर्द न हो और मुझे नींद आ जाए.'

नाथू राम की आयु 75 साल है और उसने बिस्तर पकड़ रखा है. उसे जेल के भीतर इधर-उधर आने-जाने के लिए मदद की जरूरत होती है.

राजस्थान की जेलों में 70 साल से अधिक उम्र के 141 से ज्‍यादा कैदी सजा काट रहे हैं. उनमें से 40 इतने कमजोर हैं कि वे जेल की कठोर जिंदगी सहन नहीं कर सकते. 60 से 70 साल की आयु के दरम्यान के 278 कैदी हैं जिनमें 34 का हाल बुरा है. झुंझुनूं जिले के मोटर मैकेनिक 68 वर्षीय बृजमोहन को मधुमेह है. उसकी एक आंख बेकार हो गई है और वह हकलाकर बोलता है. वह बताता है कि कैसे एक मामूली झगड़े में उसने एक आदमी को पत्थर दे मारा जिससे वह मर गया. 2003 में दोषी करार दिए जाने से पहले बृजमोहन 21 महीने तक जमानत पर जेल से बाहर था. 76 वर्षीय राम कुमार सैनी 12 साल से जयपुर जेल में था. सरकार ने छह महीने तक उसकी दया याचिका पर फैसला नहीं किया. आखिरकार 2009 में कैंसर ने उसकी जान ले ली.

राजस्थान के कारागार महानिदेशक (डीजीपी) ओमेंद्र भारद्वाज कहते हैं, 'क्या बुजुर्ग अशक्त कैदियों को जेल में रखने से कोई मकसद हल होता है?'' वे बूढ़े कैदियों की सूची पर नजर दौड़ाते हैं और दूसरे नंबर पर रुक जाते हैं: 87 वर्षीय बदलू राम अलवर जेल में 2004 से उम्र कैद की सजा काट रहा है. उसे चलने के लिए सहारे की जरूरत है और उसका पैरोल का अनुरोध ठुकरा दिया गया. जेल अधीक्षक राकेश मोहन ने हाल में उसके दो बेटों को आदेश दिया कि वे उसकी देखभाल करें. उसके दोनों बेटों पर भी 2003 में अलवर जिले में सिंचाई के पानी के लिए हुए झगड़े में एक आदमी को लाठियों से पीट-पीटकर मार डालने का आरोप है. डीजीपी कहते हैं, 'जब कभी मैं किसी जेल के दौरे पर जाता हूं तो पुराने बंदी दया के आधार पर रिहाई के लिए लाइन लगा देते हैं.'

2006 के बाद से ही राज्‍य सरकार ने उम्र कैदियों के लिए कम-से-कम 18 साल की सजा तय करते हुए राष्ट्रीय अवकाश के मौकों पर कैदियों को आम माफी या या स्थायी पैरोल या जल्द रिहाई के लिए अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल बंद कर दिया. बूढ़े कैदियों के लिए कोई नीति न होने से जेल अधिकारियों को ऐसे बंदियों की देखभाल में काफी मशक्कत करनी पड़ती है जिन्हें खुद शौचालय जाने, पानी ले जाने, कपड़े धोने और रोटी खाने में भी दिक्कत होती है.

जेल में कैद की घड़ियां गिनने के दौरान ही कइयों के नाते-रिश्तेदार चल बसे. सीकर जिले का 75 वर्षीय गोपी राम करीब 18 साल तक जमानत पर बाहर था और उसके बाद वह 11 वर्ष जयपुर जेल में रहा. मामला 1982 में जमीन के एक झगड़े में दो लोगों की हत्या का था जिसके नौ आरोपियों में उसके तीन भाई भी थे और उनकी जेल में ही मौत हो गई. उसकी पत्नी का देहांत 2009 में घर में हुआ. नागौर जिले की 73 वर्षीया अनोप सिंह राजपूत अपनी बहू की हत्या के जुर्म में 2001 से जयपुर की महिला जेल में बंद है. हाल में उसके पति का देहांत हो गया. उसे 2022 तक सजा काटनी है.

जमानत अकसर काम आती है. तीन जंग लड़ने वाले 76 साल के रिटायर लांस नायक हरमिंद राम को 1995 में अपने भाई की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था पर वह 2001 से 2008 तक जमानत पर रहा. उसने जयपुर जेल लौटने से पहले अपने बेटे और बेटी के हाथ पीले कर दिए. अभी अलवर जेल में बंद 81 वर्षीय सुरेन सिंह ने 1973 में तीन लोगों की हत्या के मामले में जमानत तोड़ दी और उसे 2008 में पंजाब में फिरोजपुर से फिर से गिरफ्तार कर लिया गया. वह कहता है, 'मैंने अपने सभी पांच बच्चों की शादी करा दी. आखिरी शादी मेरी गिरफ्तारी से ठीक पहले हुई.'

महिला कैदियों की हालत ज्‍यादा बदतर है. जयपुर में महिला जेल की उप अधीक्षक मोनिका अग्रवाल कहती हैं, 'पुरुष कैदियों की तुलना में महिलाओं से मिलने कम ही लोग आते हैं और कम ही महिलाएं पुरुषों की तुलना में पैरोल मांगती हैं या उन्हें इसकी अनुमति मिलती भी कम है.' पैरोल के लिए पात्र महिला कैदियों के पास अकसर कोई जमानतदार नहीं होता. चित्तौड़गढ़ के गोरवां की 77 वर्षीया गंगा बाई को अपनी बहू नारु को जलाकर मार डालने के जुर्म में 1999 में गिरफ्तार किया गया था. जयपुर की महिला जेल में पिछले 12 वर्षों में सिर्फ एक बार एक व्यक्ति उससे मिलने आया. उसके पास कोई जमानती भी नहीं है कि वह पैरोल पर बाहर आ सके. अलवर की 75 वर्ष की शरबती मीणा अपनी बहू को जलाकर मारने के जुर्म में जेल में है. लेकिन 2004 में जब से वह जयपुर की महिला जेल लाई गई है, उसने अपने बेटे को नहीं देखा है. 77 साल की द्रौपदी भी 2004 से इसी जेल में बंद है और उससे भी मिलने कोई नहीं आता. द्रौपदी ने 2004 में भीलवाड़ा में एक शादी में तीन व्यक्तियों की हत्या कर दी थी. उसकी सजा 2027 तक चलेगी.

देश की जेलों में बंद पुराने कैदियों की हालत पर जून में तब नजर पड़ी जब उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जेल के अधिकारियों ने भारत के सबसे बुजुर्ग कैदी 108 साल के बृजबिहारी पांडेय को जमानत पर रिहा किया. 1987 में प्रतिद्वंद्वी मुख्य पुजारी की हत्या के मामले में पांडेय को 2009 में दोषी ठहराया गया और जेल भेज दिया गया. उसी महीने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्‍यपाल शिवराज पाटील से अजमेर जेल में बंद पाकिस्तानी प्रोफेसर, 79 वर्षीय खलील चिश्ती की सजा माफ करने का अनुरोध किया. चिश्ती को 1992 में अजमेर में एक व्यक्ति की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था लेकिन इसके तुरंत बाद वह जमानत पर छूट गया. जनवरी 2011 में उसे दोषी पाया गया और जेल भेज दिया गया. अभी तक गहलोत की सिफारिश स्वीकार नहीं की गई है. बदलू राम पूछता है, 'अगर मुख्यमंत्री चिश्ती के लिए माफी की बात कर सकते हैं तो मेरे लिए क्यों नहीं?'

जब चिश्ती की रिहाई के लिए गहलोत के अनुरोध पर हंगामा हुआ तो गृह विभाग ने शीघ्र रिहाई के लिए बूढ़े कैदियों के हर मामले की जांच करने का सुझाव दिया.

डीजीपी भारद्वाज कारावास नियमों में संशोधन किए जाने और स्वैच्छिक संगठनों को बूढ़े कैदियों की देखभाल की इजाजत दिए जाने के पक्ष में हैं. जेल मैनुअल में ऐसे कैदियों को खुली जेलों में भेजने पर प्रतिबंध है. इस वर्ष भारद्वाज को दो महिलाओं सहित छह बूढ़े कैदियों को सांगानेर की खुली जेल भेजने के लिए अदालत की मंजूरी मिल गई है जहां उनकी देखभाल उनसे कम उम्र के उनके सजायाफ्ता रिश्तेदार करेंगे. अगर यह प्रावधान जेल मैनुअल का हिस्सा बन जाता है, तो अधिकारियों को अलग-अलग मामलों के लिए अदालत नहीं जाना पड़ेगा. यह अधिक मानवीय, दयालु समाज की दिशा में छोटी-सी शुरुआत हो सकती है.

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