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देश के लिए मिसाल है यह महिला, गुजरात के गांव में तालाब बनाकर दिलाई सूखे से निजात

गुजरात के सूखाग्रस्त जिलों में पानी सहेजने का काम कर रही मित्तल पटेल का एक ही मकसद है- हर गांव में तालाब बनवाना. जो वो 2017 से, यानी दो साल से लगातार कर रही हैं. यह कहानी लगभग ढाई साल पहले गुजरात के बनासकांठा से शरू हुई थी.

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aajtak.in
गोपी घांघर सूरत, 11 July 2019
देश के लिए मिसाल है यह महिला, गुजरात के गांव में तालाब बनाकर दिलाई सूखे से निजात मित्तल पटेल

गुजरात के कई गांवों में दो साल तक 'पानी है तो जीवन है, पानी बचाओ जीवन बचाओ' की गूंज को गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रयास करती एक महिला को कई लोगों ने देखा है. उसका उद्देश्य था कि अगर हमारे पुरखों ने तालाब बनाए थे उसका राज यही था कि तालाब के संग्रहित जल से जलस्तर नीचा नहीं जाएगा और जमीन के नीचे बहते पानी को हम आनेवाली पीढ़ी के लिए बचा सकें.

आधुनिक बोरवेल के जरिए स्विच को ऑन करके खेतों में पानी देने वाले किसान कुछ समझ पाते उससे पहले ही नारी शक्ति का परिचय देती इस महिला ने महज दो सालों में 87 गुजरात के बनासकाठा में तालाब बना के दिखाए तब लोग देखते ही रह गए.

गुजरात के सूखाग्रस्त जिलों में पानी सहेजने का काम कर रही मित्तल पटेल का एक ही मकसद है- हर गांव में तालाब बनवाना. जो वो 2017 से, यानी दो साल से लगातार कर रही हैं. यह कहानी लगभग ढाई साल पहले गुजरात के बनासकांठा से शरू हुई थी. मित्तल जल बचाने के अभियान से जुड़कर  एक गांव पहुंचीं. मित्तल के मुताबिक, वो जब वहां पहुचीं तो चारों और सूखा पड़ा था, लेकिन खेतों में भरपूर पानी था. हर किसान ने अपना-अपना बोरवेल किया हुआ था. जितने पैसे, जमीन में उतना ही गहरा बोरवेल. एक किसान ने 13 सौ फीट नीचे पाइप डलवा रखा था.

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मित्तल ने बताया कि मैंने समझाना चाहा कि बोरवेल हमेशा का हल नहीं. ऐसे तो जमीन का पानी एक रोज खत्म हो जाएगा. सुनने वालों पर कोई असर नहीं हुआ. फिर मैंने आने वाली पीढ़ियों का हवाला दिया कि सारा पानी हम इस्तेमाल कर लेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियां क्या करेंगी?

इसका थोड़ा असर होता देख मैंने कहा- क्यों न हम आपके गांव में तालाब खुदवा दें. शुरुआत में तमाम गांव के लोग हंसने लगे और लोग उल्टा मुझे समझाने लगे कि आज के जमाने में तालाब कौन करता है. मैंने हिम्मत नहीं हारी मेरे प्रयास से कुछ दिन बाद गांव के लोग तालाब खुदवाने को तैयार हो गए, लेकिन परेशानी मित्तल के पीछे लगी थी क्योंकि यहां दुविधा यह भी थी कि तालाब खुदवाना और उसे ‘मेंटेन’ रखना सरकारी काम है. वे किसी भी तरह से तालाब में योगदान देने को तैयार नहीं थे. गांववालों ने पैसे लगाने से साफ इनकार कर दिया.

मित्तल ने यहां भी लोगों को समझाया कि हमारे पास सीमित संसाधन हैं हम जेसीबी लगाएंगे. मिट्टी निकालेंगे लेकिन मिट्टी हटाने के लिए ट्रक आपको देना होगा, लेकिन वे एक रुपया लगाने को तैयार नहीं थे. फिर हमने कहा- ट्रैक्टर भी हम लगा देंगे. आपको बस इतना करना है कि काम करने वालों के लिए खाने का इंतजाम करना होगा.

जबकि मित्तल ने 2017 से ही जल बचाने की अपनी मुहिम छेड़ रखी है, जिन गांवों में तालाब खुदाई चलती है, वहां मित्तल पूरे मिशन तक हाजिरी देती थीं. पहले जेसीबी से मिट्टी निकाली जाती है, ट्रैक्टर से हटाई जाती है. मित्तल ने बोरवेल और तालाब रक्षित पानी का भेद समझाया उन्हें यह भी बताया कि आपके बच्चों के पास ये भी नहीं होगा. पैसों से जमीन के भीतर का खत्म पानी लौटाया नहीं जा सकता. मित्तल मानती हैं कि हमारे पुरखे लंबा सोचते थे.

2_071119111108.jpgतालाब बनाने का काम शुरू

बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए गांव-गांव में तालाब हुआ करते थे. वे एक-दूसरे से जुड़े हुए थे. एक तालाब का पानी ओवरफ्लो हो जाए तो दूसरे से तीसरे में पहुंच जाया करता. अब के लोग सोचते हैं- पानी कम हो रहा है तो जमीन कुछ फीट और गहरी खोद देते हैं. यही वजह है कि पहले 40 फीट खोदने पर पानी मिल जाता था, वहीं अब डेढ़ सौ फीट गहरे जाने पर भी सूखा मिलता है.

मित्तल की यह मेहनत रंग लाई, अब जाकर लोग पानी को लेकर चिंतित हुए हैं जहां-जहां तालाब खुदवाए गए हैं, गांववाले उसे भरने की कोशिश कर रहे हैं. कई गांवों में पंच-सरपंचों ने खुद पहल की और नर्मदा पाइपलाइन के जरिए तालाब भरवाए. बहुत सी जगहों पर तालाब बन तो चुके हैं, लेकिन बारिश का इंतजार कर रहे हैं. मित्तल के पास अब तालाब  बनाना चाह रहे हो वैसे  गांवों की लंबी लिस्ट है, जो अपने यहां तालाब खुदवाना चाहते हैं. गांव के सरपंच अब तालाब खुदवाने आगे आए हैं और मित्तल के इस कार्य के प्रशंसक बने हैं.

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