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आवरण कथाः खुशियों का नया दर्शन और विज्ञान

दार्शनिकों और आध्यात्मिक गुरुओं की हंसी-खुशी की सदियों पुरानी खोज अब नई सरहद—यानी विज्ञान की प्रयोगशाला—को ललकार रही है तो अपने दिमाग में नए सिरे से इस सबसे मायावी जज्बे की ताकत फूंकने के लिए तैयार हो जाइए

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aajtak.in
दमयंती दत्तानई दिल्ली, 09 January 2018
आवरण कथाः खुशियों का नया दर्शन और विज्ञान तलाश खुशी की

चारों तरफ पश्चिमी घाट से घिरा, यूकेलिप्टस के जंगल और कॉफी के बागानों को निहारता एक छोटा-सा शहर है बाइलाकुप्पे. कर्नाटक के कुर्र्ग जिले में तिब्बती बौद्धों की कम जानी जाने वाली बस्ती. यहां एक साइनबोर्ड पर लिखा है सेरा जे मोनेस्टिक यूनिवर्सिटी. भीतर भिक्षुओं के मंत्र, पाठ और ध्यान के साथ प्रार्थना के लाल-बैंगनी झंडे फडफ़ड़ाते हैं. मगर कैंपस के भीतर एक छोटी-सी प्रयोगशाला में जो कुछ चल रहा है, वह लीक से हटकर नजारा पेश करता है.

यहां भिक्षुओं को इलेक्ट्रॉड सेंसरों से बांध दिया गया है और वैज्ञानिक इलेक्ट्रोएनसिफैलोग्राम, यानी ईईजी मशीनों पर उनके मस्तिष्क में सकारात्मक भावना की ऊपर उठती कुंडलियों को माप रहे हैं. इसे आप 'हैप्पीनेस प्रोजेक्ट' कह सकते हैं जिसमें विज्ञान और आध्यात्मिकता का मेल हो रहा है.

मुरब्बे (या टोफू, या टूथपेस्ट) के 100 अरब छोटे-छोटे रेशों की कल्पना कीजिए. यही आपका मस्तिष्क है. यह अपने आप से श्बात्य कर सकता है—अणुओं, न्यूरॉन, नाडिय़ों के जाल के जरिए—फॉर्मूला वन कार से भी तेज. यह मुहब्बत में पड़ सकता है, पेचीदा गणित हल कर सकता है, जिंदगी और ईश्वर के मायनों पर चिंतन कर सकता है. यह अकेलेपन और अवसाद से बुरी तरह मिसमार हो सकता है. और यह आपको हिलोरें मारती खुशी और आनंद से विभोर कर सकता है. खुशी सदियों से दार्शनिकों और आध्यात्मिक गुरुओं का अधिकार क्षेत्र रही है

इसे अब एक नया हमबिस्तर यार मिल गया है—और यह है विज्ञान. तंत्रिका या स्नायु वैज्ञानिक भिक्षुओं को ईईजी और एमआरआइ मशीनों से बांध रहे हैं; जेनेटिक वैज्ञानिक खुशी से जुड़े जींस की तलाश कर रहे हैं; मनोवैज्ञानिक विकारों पर ध्यान देने की लीक से हटकर इस पर रोशनी डाल रहे हैं कि अच्छे और सकारात्मक विचार किस तरह लोगों की मदद कर सकते हैं; अर्थशास्त्री भी इस हुजूम में शामिल हो गए हैं और पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि लोगों के लिए असली मोल किस चीज का है. आला दिमागों के बीच पढ़ी जाने वाली अकादेमिक पत्रिकाएं खुशी पर शोध पत्र छाप रही हैं, अनुसंधान करने वाले नोबेल पुरस्कार पा रहे हैं (2015 में अर्थशास्त्री सर अंगस स्टेवार्ट डेटन) और 'खुशी का विज्ञान' आज का सरगर्म विषय बन गया है.

नाखुश मुल्क

आखिर वह क्या हो सकता है जो किसी शख्स को खुश करता है? यह वह सवाल है जिससे हर हिंदुस्तानी को जूझना चाहिए. महज यही नहीं कि हिंदुस्तान दुनिया के सबसे नाखुश मुल्कों में से एक है, यह भी कि हिंदुस्तानी पीछा न छोडऩे वाले दुख और उदासी की गिरफ्त में बुरी तरह जकड़े हुए हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन अपनी नई वैश्विक स्वास्थ्य रिपोर्ट में बताता है कि 5 करोड़ से ज्यादा हिंदुस्तानी डिप्रेशन यानी अवसाद के और अन्य 3 करोड़ से ज्यादा दुश्चिंता के शिकार हैं. हिंदुस्तान दुनिया के सबसे अवसादग्रस्त मुल्कों में एक है, जहां जिंदगी के ज्यादातर साल अवसाद और दुश्चिंता की भेंट चढ़ जाते हैं. इसके बाद चीन और अमेरिका आते हैं. हिंदुस्तान संयुक्त राष्ट्र की विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2017 में 155 देशों में 122वीं पायदान पर आ गया—2012 के मुकाबले 10 पायदान नीचे फिसलकर. यह रिपोर्ट प्रति व्यक्ति जीडीपी, सामाजिक सहारों, सेहतमंद जीवन प्रत्याशा, जिंदगी में विकल्पों की आजादी और भरोसे सरीखे मानदंड़ों पर तैयार की जाती है.

फोर्टिस हॉस्पिटल में मेंटल हेल्थ और बिहैविअरल साइसेंज के डायरेक्टर डॉ. समीर पारिख कहते हैं, ''बहुत ढूंढने पर भी मुश्किल से ही कोई ऐसा शख्स मिलेगा जो कहेगा कि 'मैं अपनी जिंदगी से बहुत खुश हूं.''' वे आगे कहते हैं, ''हमारे चारों तरफ तनाव, हताशा, गुस्से, असंतोष और चिड़चिड़ाहट का ऊंचा स्तर है.'' वजह कुछ भी हो सकती है—गलाकाट प्रतिस्पर्धा से लेकर सामाजिक-आर्थिक असमानता तक, शहरीकरण से लेकर छोटे-छोटे परिवारों तक, नौकरी के दबाव से लेकर वक्त की कमी तक, ट्रैफिक जाम में फंसने से लेकर अपनी मौजूदा कार से कहीं बहुत महंगी कार की इच्छा पालने तक.

आज जब रोड रेज, घरेलू गाली-गलौज, बदमिजाजी और नखरे, आक्रामकता का धमाकेदार विस्फोट, और नियंत्रण खोना रोजमर्रा की बात हो गई है, ऐसे में खुशी पर चर्चा की अहमियत और भी बढ़ गई है. डॉ. पारिख बताते हैं, श्श्ज्यादातर हिंदुस्तानी जिंदगी के ऐसे सिलसिले में कैद मालूम देते हैं, जिसमें तनाव के लोचे और खराब लक्वहे अच्छे लक्वहों से कहीं ज्यादा बढ़ गए हैं. हमें खराब लक्वहों से अच्छे लक्वहों की तादाद बढ़ाना सीखना ही होगा, क्योंकि अच्छे लम्हों पर तो हमारा काबू है, पर बुरे लम्हों पर नहीं है. हम अपने को प्रसन्न और खुश करने के लिए कम कुछ करते हैं.''

खुशी से अचानक मुलाकात

नेशनल सेंटर फॉर बॉयोलोजिकल साइसेंज, बेंगलूरू के सेंटर फॉर ब्रेन डेवलपमेंट ऐंड रिपेयर के डायरेक्टर न्यूरोबॉयोलॉजिस्ट सुमंत्र चटर्जी बताते हैं, ''पॉजिटिव इमोशन हमारी सेहत और कुशलता में बेहद अहम रोल निभाते हैं, यह विचार नया नहीं है, पर एक परिघटना के तौर पर खुशी पर वैज्ञानिकों ने अब तक बहुत कम ही ध्यान दिया है.'' वे कहते हैं, इसकी कुछ वजह तो यह है कि तंत्रिका विज्ञान दिमाग के काम करने के तरीके और गड़बडिय़ों को समझने के लिए चूहा और मूषक मॉडल पर बहुत ज्यादा निर्भर रहा है, ''क्या चूहे आनंद महसूस कर सकते हैं? यह बता पाना मुश्किल है.'' पिछले 20 साल एक नए क्षेत्र कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस या संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान के उभार के भी हैं. इसमें दो अलग-अलग पारंपरिक अनुशासनों—संज्ञानात्मक मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान—को जोड़ा गया है ताकि मानव मस्तिष्क के तंत्रिका संबंधी आधार को समझा जा सके.

चटर्जी कहते हैं, ''हम मस्तिष्क विज्ञान के स्वर्णिम युग में दाखिल हो रहे हैं.'' शास्त्रीय भौतिक शास्त्र का अवसान हो चुका है और ब्रह्मांड विज्ञान या स्ट्रिंग थ्योरी का नया भौतिक शास्त्र अब भी रहस्य ही है, इसलिए पिछले दो दशकों की तरक्की की सांस रोक देने वाली रफ्तार तंत्रिका विज्ञान को वैज्ञानिक कल्पना के केंद्र में ले आई है. वे कहते हैं, ''सुपरकंप्यूटिंग से लेकर न्यूरोइमेजिंग तक टेक्नोलॉजी की बदौलत मस्तिष्क के बारे में हमारी समझ ने बहुत लंबी छलांग लगाई है.'' मानव तंत्रिका विज्ञान के अनुसंधानों में हाल ही में हुई काफी कुछ बढ़ोतरी के लिए व्यावहारिक एमआरआइ जिम्मेदार है.

अब दिमाग के भीतर चल रही गतिविधियों, रक्त प्रवाह और बदलावों का ठीक उसी वक्त और बेहद सटीकता के साथ खाका बनाना और माप ले पाना मुमकिन है. यूरोपीय संघ और अमेरिका दोनों ने लंबे वक्त के कार्यक्रमों में जोरदार रकम लगाने का ऐलान किया है और मानव मस्तिष्क का खाका बनाने के काम को 'मेडिसिन का अगला मानव जेनोम प्रोजेक्ट' कहा जा रहा है. वे कहते हैं, ''खुशी का विज्ञान दिमाग के साथ इस गहन शिरकत के सहउत्पाद के तौर पर उभर रहा है.''

तो खुशी पर शोध करने वालों के हाथ अब तक क्या लगा है? यह वह अवधारणा है जिसे न्यूरोप्लास्टिसिटी कहा जाता है और यह कहती है कि आपकी पूरी जिंदगी के दौरान मानव मस्तिष्क में, शारीरिक और कामकाजी दोनों लिहाज से, खुद को नए सिरे से व्यवस्थित करने और ढालने की जबरदस्त क्षमता है. एक वक्त था जब दिमाग को बचपन के बाद पूरी तरह अटल, यानी बदलाव में अक्षम, समझा जाता था. इसलिए अगर दिमाग के जटिल परिपथों में से किसी एक को नुक्सान पहुंचता था, तो उसे हमेशा के लिए बेकार मान लिया जाता था.

फिलहाल यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो के सेंटर फॉर ब्रेन ऐंड कॉग्निशन के डायरेक्टर न्यूरोसाइंटिस्ट वी.एस. रामचंद्रन ने 1995 में सिलसिलेवार सीधे-सादे प्रयोगों के जरिए पहली बार दिखाया कि अगर मस्तिष्क के कुछ हिस्से क्षतिग्रस्त, नष्ट या गायब हो जाएं, तब भी बाकी बचे हुए हिस्सों के लिए यह सीखना मुमकिन है कि खोए हुए हिस्सों के कामों को कैसे करें.

दिमाग को अब गतिशील अंग माना जाता है. हम अब जानते हैं कि बालिग अवस्था में भी मस्तिष्क की नई कोशिकाओं (जिन्हें न्यूरॉन कहते हैं) का निर्माण मुमकिन है, यह नुक्सान या गड़बडिय़ों को उलट सकता है, इसमें प्लास्टिसिटी यानी नए सिरे से ढलने की जबरदस्त क्षमता है, खासकर तब जब इसके परिपथ बदलते रहते हैं और तमाम तंत्रिका कोशिकाएं और मस्तिष्क के हिस्से लगातार एक दूसरे से 'बातचीत करते' रहते हैं, जैसा कि रामचंद्रन मे दिखाया है.

चटर्जी यह भी कहते हैं, ''वैज्ञानिक मानव मस्तिष्क की लोच और पुनर्निर्माण की क्षमता को बहुत कम करके आंकते हैं.'' न्यूरोप्लास्टिसिटी वह प्रक्रिया है जिसके जरिए इनसान वाद्य यंत्र बजाना सीखता है, नई भाषा सीखता है, लकवे, चोट और पैदाइशी खामियों से उबरता है और ऑटिज्म या एकाग्रता और सीखने की अक्षमताओं सरीखे विकारों में सुधार लाता है. यह अवसाद, दुश्चिंता, ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर (मजबूर कर देने वाला जुनूनी विकार), नशे की लतों से बाहर निकलने और नाखुशी के पैटर्न को खुशी में उलटने का रास्ता भी है.

खुशी की क्षमता

2014 में दावोस के वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम में आए दुनिया के बड़े और रसूखदार लोगों को तिब्बती मठ के एक बौद्ध भिक्षु, ''दुनिया के सबसे खुश आदमी'' ने माइंडफुल मेडिटेशन सिखाया. 70 बरस के मैथियू रिकार्ड कभी मॉलिक्यूलर जेनेटिसिस्ट थे और अब दलाई लामा के करीबी सहयोगी हैं. उन्होंने जबसे यूनिवर्सिटी ऑफ विंस्कोसिन, अमेरिका में मस्तिष्क के 12 साल के अध्ययन में भाग लिया है, तभी से वे खुशी के अभ्यास के पोस्टर बॉय बन गए हैं. तंत्रिका वैज्ञानिकों ने उनकी खोपड़ी पर 256 सेंसर बांध दिए और पाया कि उनके मस्तिष्क ने इतने ऊंचे स्तर की गामा तरंगें—जो चेतना, एकाग्रता, सीखने और स्मृति से जुड़ी होती हैं—पैदा कीं जिनका ''न्यूरोसाइंस में पहले कभी कोई जिक्र नहीं मिलता.'' उनके स्कैन ने सुखद भावनाओं से जुड़े लेफ्ट प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स पर भी गतिविधियां प्रदर्शित कीं, जिससे प्रसन्नता की विशाल क्षमता का पता चला.

माइंडफुल मेडिटेशन ने 1990 के दशक से मनोवैज्ञानिकों का ध्यान खींचा. यही वह वक्त था जब इस विषय में आमूलचूल बदलाव की शुरुआत हुई और रोजमर्रा की जिंदगी में नकारात्मक ताकतों के बजाए इस बात की पड़ताल होने लगी कि जिंदगी को बेहतर कैसे बनाएं—सेहत और कुशलता, प्रेरणा, क्षमताएं, संभावनाएं, सामाजिक कामकाज वगैरह. बेंगलूरू के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान (निमहंस) में क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ महेंद्र पी. शर्मा कहते हैं, ''हाल के वर्षों में तनाव को संभालने के लिए माइंडफुलनेस और ध्यान की विधियों में दिलचस्पी बढ़ी है.'' माइंडफुलनेस की जड़ें भारत की प्राचीन विपासना ध्यान पद्धति तक जाती हैं और पालि भाषा में इसके मायने हैं 'सचेत अवलोकन'. शर्मा कहते हैं, ''यह वह अवस्था है जिसमें अपने भीतर जो कुछ घट रहा है उसके साथ किसी किस्म की कोई प्रतिक्रिया किए बगैर 'मौजूद' रहने की जरूरत होती है.''

आपको माइंडफुल बनाना

न्यूरोबॉयोलॉजी के नए अनुसंधानों की बदौलत मनोचिकित्सा में बेहद अहम बदलाव आए हैं. शर्मा बताते हैं कि माइंडफुलनेस पर आधारित संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा पद्धतियां (एमबीसीटी) वह तरीका है, जो अवसाद और दुश्चिंता सरीखे बड़े विकारों के इलाज के लिए माइंडफुल ध्यान सरीखी पूर्वी मनोवैज्ञानिक रणनीतियों के साथ मिलकर ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है. डॉ. शर्मा ने कहा, ''अगर तुम अपने विचारों को रोकोगे, वे तुम्हारे दिमाग में भरे रह जाएंगे और वापस आएंगे, हो सकता है, तुम्हारे सपनों में. खुद अपने में, या दूसरों में, मीनमेख न निकालें. उन्हें माफ कर दें.''

डॉक्टर को हरेक मरीज के साथ माइंडफुल मेडिटेशन में बहुत वक्त और ऊर्जा लगानी होती है. मगर लोगों को रोज-ब-रोज इलाज का फायदा उठाते और ज्यादा मजबूत, ज्यादा खुश होते देखने में आनंद भी आता है. जब 34 साल का एक आदमी डॉ. शर्मा के पास आया, तो वे बताते हैं, ''उसमें कमतरी का इतना तीखा एहसास और अपने भविष्य को लेकर इतनी गहरी दुश्चिंता थी कि वह घबराहट से पीड़ित रहता था.'' वह मानता था कि आठ साल पहले उसके साथ सब अच्छा-भला चल रहा था, तभी उसे ग्रेजुएशन करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए बेंगलूरू जाना पड़ा. मगर उसके पिता ने मदद करने से इनकार कर दिया और इसलिए अपनी पढ़ाई का खर्चा उठाने के लिए उसे मजबूरन नौकरी करनी पड़ी.

उसका बॉस हर छोटी से छोटी गलती पर उसे झिड़कता, जिससे उसका नाकाफी होने का एहसास भड़क उठता. वह इम्तिहान में फेल हो गया, जिससे अवसाद बढ़ा और ज्यादा कमतरी के दौरे पडऩे लगे. वह अपने दोस्तों से कतराने लगा और जल्दी-जल्दी नौकरियां बदलने लगा. शर्मा ने उसके साथ काम किया, अपने 'बेतुके विचारों और विश्वासों' को, यानी ऐसे जज्बातों को, जो नकारात्मक, पूर्वाग्रही, आत्म-निंदक, प्रतिबंधक या दूसरे तरीकों से विकृत थे, पहचानने में उसकी मदद की. उसके विचारों और विश्वासों को आंका गया और समय के साथ उन्हें ज्यादा सकारात्मक, संतुलित और व्यावहारिक विचारों और विश्वासों से बदला गया. शर्मा कहते हैं, ''मुझे यकीन है कि हर रोज पांच से 20 मिनट के माइंडफुल मेडिटेशन के साथ वह फिर से खुशहाल जिंदगी जीने लगेगा.''

खुशी का लम्हा

'खुशी का लम्हा' नया लफ्ज है. आज के वक्त की प्रचलित बोली. दुनिया भर की सरकारें नागरिकों की खुशी को मापने को उतावली हैं—भूटान, इक्वाडोर, मेक्सिको, वेनेजुएला और बोलीविया समृद्धि के साथ-साथ कुशलता को भी मापते हैं. कॉर्पोरेट जगत चीफ हैप्पीनेस ऑफीसर भर्ती कर रहा है. भावनात्मक बुद्धिमता को बढ़ावा देने के लिए गूगल में भी रेसीडेंट जॉली गुड फेलो हैं. चेतना पर भाषण देने वाले प्रवचक टीईडी से लेकर दावोस तक सार्वजनिक व्याख्यानों के हलकों में चक्कर लगा रहे हैं.

ब्रांड और कंपनियां 'जॉय मार्केटिंग' मुहिमों को बढ़ावा दे रही हैं—टी मोबाइल के फ्लैश मॉब डांस से लकर कोका-कोला के 'ओपन हैप्पीनेस' तक. डीआइवाय, हाऊ-टू और आम अक्लमंदी की किताबें—एमेजन डॉटकॉम पर ऐसी 1,82,246 किताबें हैं—हैप्पीनेस यानी खुशी के इस फिनोमिना का एक और लक्षण है. टेक्नोलॉजी की दुनिया 'जोरदार' गजट की तरफ बढ़ रही है—पहने जाने लायक सेंसरों से लेकर कार्यस्थल पर खुशी के उपायों तक, जो विशालकाय जापानी कंपनी हिताची ने किए हैं, और 'हेडोनोमीटर' यानी सुखमापक तक, जिसे वास्तविक समय पर वैश्विक खुशी को दर्ज करने के लिए ट्विटर के शब्दों के आधार पर अमेरिकी गणितज्ञों ने बनाया है.

आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू एक राजधानी का सपना देख रहे हैं—प्राचीन शहर अमरावती में कुछ नया जोड़कर, जाहिर है, खुशी के लिए. पिछले साल जुलाई में उन्होंने ऐलान किया, ''यह खुशहाल शहर होगा.'' वे टेक्नोलॉजी में निर्वाण का मंसूबा बना रहे हैं, जहां ऊर्जा दक्ष इमारतों के सामने जलाशय होंगे, स्वच्छ ऊर्जा से चलने वाली कारें सड़कों पर दौड़ेंगी, जबकि प्रदूषण, सिर पर लटके तार और मोबाइल टॉवर बीते जमाने की चीज हो जाएंगे. यहां खुश लोग हमेशा खुशहाल जिंदगी बसर करेंगे.

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