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दिल्ली में हर पांच स्कूली बच्चे में से एक इंटरनेट की लत का शिकार

सर्वे छात्रों के इंटरनेट यूजेस पैटर्न पर आधारित था जिसमें सिकोमेट्रिक स्केल पर 15 अलग-अलग आइटम या केटेगरी में छात्रों के इंटरनेट पर बिताए गए समय और पैटर्न पर उनको रेट किया गया. अगर स्कोर 60 के ऊपर है तो छात्र पीआईयू यानी प्रोब्लेमेटिक इंटरनेट यूजर है.

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स्मिता ओझा [Edited by: सुरेंद्र कुमार वर्मा]नई दिल्ली, 13 April 2018
दिल्ली में हर पांच स्कूली बच्चे में से एक इंटरनेट की लत का शिकार सांकेतिक तस्वीर

दिल्ली पुलिस और एम्स के बिहेवियर एडिक्शन यूनिट द्वारा संयुक्त रूप से किए गए सर्वे में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. सर्वे में यह बात सामने आई है कि स्कूलों में पढ़ने वाले हर पांच छात्र में से एक छात्र प्रोब्लेमेटिक इंटरनेट यूजर यानी पीआईयू का शिकार है.

पीआईयू का अर्थ है कि हर पांच में से एक छात्र इंटरनेट की बुरी लत का शिकार है. इंटरनेट गेमिंग, सर्फिंग या सोशल नेटवर्किंग साइट्स के दीवाने इन युवाओं का इंटरनेट का क्रेज इनकी पढ़ाई, सोशल लाइफ और करियर को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. सर्वे के मुताबिक 37% छात्र अपने मिजाज और पढ़ाई के प्रेशर से ध्यान हटाने के लिए इंटरनेट का सहारा ले रहे हैं.

इस सर्वे में दिल्ली के साउथ इस्ट डिस्ट्रिक्ट के 25 नामी स्कूलों के कुल 6291 छात्रों ने हिस्सा लिया. इसमें कक्षा 6 से लेकर 12वीं तक के छात्रों को शामिल किया गया. सर्वे छात्रों के इंटरनेट यूजेस पैटर्न पर आधारित था जिसमें सिकोमेट्रिक स्केल पर 15 अलग-अलग आइटम या केटेगरी में छात्रों के इंटरनेट पर बिताए गए समय और पैटर्न पर उनको रेट किया गया. अगर स्कोर 60 के ऊपर है तो छात्र पीआईयू यानी प्रोब्लेमेटिक इंटरनेट यूजर है.

बीएलके सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट मनीष जैन का मानना है कि ऐसे बच्चों को भविष्य में भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे बच्चे सोशली एक्टिव नहीं होते, पब्लिक प्लेसेस में इनको घबराहट होती है, मेंटल ग्रोथ नहीं होती और मैं मानता हूं बच्चों से ज्यादा माता-पिता की काउंसलिंग जरूरी है क्योंकि उनको ये समझने की जरूरत है कि वो अपने बच्चे को अगर फ़ोन गिफ्ट कर रहे है तो उसके क्या क्या साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं.

सर्वे के मुताबिक 19% छात्रों के 60 के ऊपर स्कोर मिले जो कि बेहद चिंता का विषय है. जहां एक तरफ ये आंकड़े दूसरे एशियाई देशों के बराबर हैं वही उत्तरी अमेरिका और यूरोपीय देशों से कहीं ज्यादा है.

दिल्ली पुलिस और एम्स की संयुक्त टीम की अगर माने तो दिल्ली में ये आंकड़े और भी ज्यादा हो सकते हैं क्योंकि 22% छात्रों ने इंटरनेट पर बिताए गए समय की सही जानकारी नहीं दी.

 

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