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नक्सल प्रभावित गांवों में बाइक एंबुलेंस बनी लाइफ लाइन

नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में ऐसे न जाने कितने इलाके हैं, कितने गांव हैं जहां अभी भी नक्सलियों के डर की वजह से सड़कें बेहतर स्थिति में नहीं बन पा रही हैं. ऐसे में छत्तीसगढ़ में मोटरसाइकिल एंबुलेंस लोगों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं है.

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आशुतोष मिश्रा [Edited by: मलाइका इमाम]नई दिल्ली, 15 April 2019
नक्सल प्रभावित गांवों में बाइक एंबुलेंस बनी लाइफ लाइन नक्सल प्रभावित गांवों में मोटरसाइकिल एंबुलेंस

नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में ऐसे न जाने कितने इलाके हैं, कितने गांव हैं जहां अभी भी नक्सलियों के डर की वजह से सड़कें बेहतर स्थिति में नहीं बन पा रही हैं. कई जगहों पर नक्सलियों द्वारा सड़क बनाने और विकास काम के लिए आए कॉन्ट्रैक्ट पर गोलीबारी के किस्से सुनाई पड़े हैं. दूरदराज के ग्रामीण इलाकों और जंगल में रहने वाले आदिवासी गांवों में विकास तो छोड़िए बुनियादी जरूरतों के लिए सुविधाएं भी नक्सलियों की वजह से नहीं पहुंच पा रही हैं.

इन जंगलों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को सबसे ज्यादा दिक्कत स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं को लेकर है, जहां आए दिन मलेरिया से लेकर दूसरी बीमारियां लोगों को अपनी चपेट में ले लेती हैं. गर्भवती महिलाओं के लिए भी इन इलाकों से निकल कर अस्पताल के लिए शहर तक आना बेहद कठिन काम होता है. इसे देखते हुए छत्तीसगढ़ में बाइक एंबुलेंस लोगों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं है.

कवर्धा से लेकर नारायणपुर तक ऐसे न जाने कितने इलाके हैं जहां बाइक एंबुलेंस अलग-अलग सामाजिक संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं, जो लोगों के लिए वरदान बन गए हैं. जिन गांवों तक या जंगलों के अंदर बसे लोगों तक पहुंचने के लिए सड़कें नहीं होतीं अथवा चार पहिया वाहन नहीं जा सकते वहां यह बाइक एंबुलेंस आसानी से पहुंच जाती है और लोगों को नजदीकी अस्पताल तक पहुंचाने का काम करती है. मनकू सोरी ऐसी ही एक संस्था के लिए बाइक एंबुलेंस चलाते हैं. मनकू का कहना है, "जिन इलाकों में एंबुलेंस नहीं पहुंच पाते हम कोशिश करते हैं कि उन इलाकों में जाएं और वहां बीमार लोगों को या गर्भवती महिलाओं को बाइक एंबुलेंस में बैठाकर शहर के अस्पतालों तक पहुंचाया जाएं."

कई बार स्थिति इतनी गंभीर होती है कि मरीज अस्पताल पहुंचने के पहले ही दम तोड़ देता है. जितेंद्र कुमार जैसे बाइक एंबुलेंस चलाने वाले लोग ऐसी स्थिति में खुद को उस दुख से अलग नहीं कर पाते. जितेंद्र का कहना है, "हम कोशिश करते हैं कि गर्भवती महिलाएं या मरीज को सही समय पर अस्पताल पहुंचा सकें, लेकिन कई बार आकस्मिक घटना हो जाती है तब हमें बहुत दुख होता है."

सुरेश कुमार कवर्धा में बाइक एंबुलेंस चलाकर लोगों की मदद करते हैं. सुरेश कहते हैं,  "यह ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में नक्सलियों का प्रभाव होता है लेकिन हमें उन से डर नहीं लगता, क्योंकि हम कोशिश करते हैं कि बीमार लोगों को जल्द-से-जल्द इलाज मुहैया कराने के लिए अस्पताल ले जाएं और हम अपना काम पूरी मेहनत और निष्ठा से करते हैं."

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