एडवांस्ड सर्च

BLOG: दारागंज में निराला

सर्दी की सुबह थी. मैं दारागंज मुहल्ले के एक भीड़ भरे तिराहे पर खड़ा था. निराला भी वहीं खड़े थे, मूर्तिवत. मूर्ति के नीचे संगमरमर पर कुछ पंक्तियां उभरी हुई थीं, दुख ही जीवन की कथा रही. सुमन भर न लिए, सखि वसंत गया. न जाने क्यों, अभीप्सित क्षण को छू लेने के अनुभव से मचल रहे मन के एक कोने में हर्ष का हरण करने वाले हृदय का संसार भी था.

Advertisement
aajtak.in
देवांशु कुमार झानई दिल्ली, 03 October 2014
BLOG: दारागंज में निराला

सर्दी की सुबह थी. मैं दारागंज मुहल्ले के एक भीड़ भरे तिराहे पर खड़ा था. निराला भी वहीं खड़े थे, मूर्तिवत. मूर्ति के नीचे संगमरमर पर कुछ पंक्तियां उभरी हुई थीं, दुख ही जीवन की कथा रही. सुमन भर न लिए, सखि वसंत गया. न जाने क्यों, अभीप्सित क्षण को छू लेने के अनुभव से मचल रहे मन के एक कोने में हर्ष का हरण करने वाले हृदय का संसार भी था. जैसे, कुछ दुखद दीखने वाला हो. कुछ देर खामोश खड़े रहने और इधर-उधर निहारने के बाद, मैं कुहासे की काया को चीरता हुआ आगे बढ़ा. घर और दुकानों के साहचर्य में पान की एक दुकान नजर आई, जिस पर लिखा था, 'निराला पान भंडार'.

गली में आगे एक अट्टालिका खड़ी थी, गुरु हथौड़ा के प्रहार से खंडित पत्थरों से सज्जित. जिसकी दीवारों के वैभव को साष्टांग करती संकरी गली थी और गली के किनारे बह रहे नाले में कीड़े बिलबिला रहे थे, ऊपर सुअरों का समूह था. शुरू में ही बता दिए गए रास्ते पर कुछ दूर चलने के बाद मैं बाएं मुड़ा. सामने एक सज्जन खड़े थे. मैंने पूछा, निराला किस घर में रहते थे. उन्होंने करीब 20 फुट दूर दाहिनी दिशा में खड़े दो तल्ले मकान की ओर इशारा किया. घर की देहरी के पास पहुंच कर मैंने देखा कि नीचे का हिस्सा एक दीवार से घिरा था. मकान के कुछ हिस्से अपने स्वरूप में अब भी छायावादी नजर आ रहे थे. ऊपर जरा संवार दिया गया था. अंदर दाखिल हुआ तो एक ओर की छत गायब मिली.

बाईं ओर एक छोटा सा कमरा था, चूने से पुता हुआ. रसोई गिर चुकी थी. वही रसोई जहां अपने लिए बनाई कटहल की पकौड़ियां अतिथियों को परोसने के बाद निराला पानी पीकर रह जाते थे. मकान मालिक ने रहने वालों और आगंतुकों को यह आभास कराने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी कि समय निरर्थक है. तब भी था, अब भी है. कमरे में दो तख्त बिछी थी. अलगनी नहीं थी. बीचोंबीच भूमध्यरेखा सी एक रस्सी टंगी थी, जिस पर दो चड्ढियां चुपचाप झूल रही थीं और चड्ढियों को अधोवस्त्र समझने की पूर्णता के साथ दो विद्यार्थी भी खड़े थे. उनमें से एक अचानक बोल उठा, निराला यहीं रहते थे. मन में आया, कह दूं, क्या आपकी पहनी हुई और उतार कर टांगी गई चड्ढियां देखने आया हूं.

एक-एक कोना, छत, दीवारें देर तक देखता रहा. देखते हुए, निराला के दर्जनों गीतों की पंक्तियां चुपचाप याद आती गईं. ये दुख के दिन काटे हैं जिसने....दुखता रहता है अब जीवन..बांधो न नाव इस ठांव बंधु. स्नेह निर्झर बह गया है. मैंने उन विद्यार्थियों से पूछा कि कमरे के बाहर दीवार क्यों खड़ी है. पता चला, निराला के देहांत के बाद साहित्यकारों ने घर के उस कमरे को स्मारक बनाने की मांग की थी. मकान मालिक ने मुकदमा ठोंक दिया.

मुकदमा जीतने के बाद उसने आधुनिक हिन्दी के यशस्वी कवि के कमरे पर अपने आधिपत्य की पथरीली पताका गाड़ी. हिन्दी वाले मुंह ताकते रह गए. तब से अब तक वो दीवार निराला के अंतिम 12 वर्षों के निवास से परिचय कराने से पहले, इस बात का प्रमाण देती है कि हिन्दी का समाज दरिद्रता में अमीर है. वह उस कवि के लिए भी उतना ही दरिद्र है, जिसने घोर विपन्नता में भी लिखा. "मैं लख न सका वे दृग विपन्न". निराला के ही दूसरे शब्दों में 'खड़ी है दीवार जड़ की घेर कर, बोलते हैं लोग ज्यों मुंह फेर कर'.

बिना कुछ कहे मैं चुपचाप बाहर निकला. पलट कर उस कमरे को ध्यान से देखने के बाद अपने कदम आगे बढ़ाए. गली वापस निराला पान भंडार के पास ले आई. मैंने सोचा जैसे पान का रस लेने के बाद उसे थूक दिया जाता है. वैसे ही निराला, पान की तरह हमारे हिन्दी समाज में चबाए गए हैं. रस भी लिया गया है लेकिन सुस्वादु भोजन की तरह अंदर नहीं लिया गया, जिसका स्वाद जमाने तक याद रहता है. मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, पीछे कोई अदृश्य गा रहा था, मधुर स्वर तुमने बुलाया, छद्म से जो मरण आया, बो गई विष वायु पच्छिम, मेघ के मद हुई रिमझिम, रागिनी में मृत्यु द्रिम-द्रिम, तान में अवसान आया..

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay