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Exclusive: राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से खास बातचीत

जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू की तरफ से 2014 में राज्यसभा पहुंचे हरिवंश चार साल बाद यानी 2018 में इसके उपसभापति चुन लिए गए. हिंदी पट्टी में हरिवंश को उनकी पत्रकारिता और आसानी से मिलने-बतियाने वाले संपादक के तौर पर जाना जाता है. 1956 में जन्मे हरिवंश को जेपी आंदोलन ने काफी प्रभावित किया.

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aajtak.in
विकास कुमार नई दिल्ली, 01 October 2018
Exclusive: राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से खास बातचीत फाइल फोटो/Getty Images

जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू की तरफ से 2014 में राज्यसभा पहुंचे हरिवंश चार साल बाद यानी 2018 में इसके उपसभापति चुन लिए गए. हिंदी पट्टी में हरिवंश को उनकी पत्रकारिता और आसानी से मिलने-बतियाने वाले संपादक के तौर पर जाना जाता है. 1956 में जन्मे हरिवंश को जेपी आंदोलन ने काफी प्रभावित किया. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए और पत्रकारिता में डिप्लोमा करने वाले हरिवंश ने अपने करियर की शुरुआत टाइम्स समूह से की थी. वो अक्सर कहते हैं कि उन्होंने पत्रकारिता को चुना ही इसलिए था क्योंकि वो राजनीति से गहरा जुड़ाव महसूस करते थे. हरिवंश ने रविवार और धर्मयुग जैसी कई प्रसिद्ध पत्रिकाओं में काम किया. aajtak.in ने उनसे तमाम मुद्दों पर विस्तार से बात की.

चंद्रशेखर हिम्मत न दिखाते तो कंगाल हो गए होते हम

 व्यक्ति केंद्रित और लोकलुभावन घोषणाओं वाली राजनीति को हरिवंश ने देश के लिए नुकसानदेह बताया. उन्होंने कहा कि इसकी एक झलक हम देख चुके हैं. जब चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने तो उनके वित्त सचिव ने उनसे कहा कि हमारे पास मात्र 21 दिन का विदेशी मुद्रा भंडार है. ऐसे में काम कैसे चलेगा? ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि पहले की सरकारों ने केवल खर्चा किया और देश के सामने जो मुश्किल सवाल थे, उनसे बचती रहीं. तब चंद्रशेखर ने हिम्मत दिखाई और देश का सोना गिरवी रखकर देश की साख बचाई. अगर उन्होंने तब वो कदम नहीं उठाया होता तो आज हम यहां खड़े नहीं होते. दुनिया के कई देशों की तरह कंगाल हो गए होते. हरिवंश कहते हैं कि देश की संसद को मुश्किल और जरूरी सवालों पर सार्थक बहस करनी होगी. नेताओं को उन सवालों के जवाब खोजने होंगे जो देश के सामने हैं या आने वाले समय में आने वाले हैं.

 सांसदों की सैलरी-सुविधाएं बेवजह बदनाम हैं

मेरा मानना है कि सांसदों को अपना काम करने के लिए जरूरी सुविधाएं मिलनी चाहिए. जब मैं बाहर था तो मुझे भी लगता था कि जो सुविधाएं मिलती हैं वो बहुत हैं. जितनी सैलरी सांसद पाते हैं वो ज्यादा है लेकिन यहां आकर पता चल रहा है कि स्थिति वैसी है नहीं. सांसदों को एक अच्छे सहायक की जरूरत है जो उनके लिए विभिन्न मुद्दों पर रिसर्च कर सके. एक सांसद के यहां सुबह से शाम तक कितने लोग आते हैं उसका अंदाजा बाहर बैठकर लगाना मुश्किल है. अगर हर मेहमान को एक कप चाय भी पिलाई जाए तो अच्छा-खासा पैसा खर्च होता है. मैं यह भी मानता हूं कि सांसदों को जरूरत से ज्यादा नहीं मिलना चाहिए. उनकी सैलरी भी बाकी विभागों की तरह एक कमेटी के माध्यम से तय होनी चाहिए लेकिन बाहर रहते हुए जो दिखता है वो पूरा सच नहीं है.

संसद और कोर्ट एक-दूसरे की हद का सम्मान करें

संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के कामों में साफ-साफ बंटवारा किया है. कोई घालमेल है ही नहीं. तीनों संस्थाओं के अपने दायरे हैं, सबका अपना महत्व है और यह सबका दायित्व है कि वो एक-दूसरे के महत्व का ख्याल रखें. मैं संसद में हूं तो मेरा ये दायित्व है कि मैं न्यायपालिका के सम्मान का ख्याल रखूं. इसी तरह से न्यायपालिका का दयित्व है कि वो देश की संसद की गरिमा का ख्याल रखे. ये तीनों संस्थाएं देश चलाती हैं. अगर इनके रिश्ते नाजुक होंगे तो देश की सेहत पर इसका सही असर नहीं पड़ेगा.

गांधी की तरफ लौटना विकल्प नहीं, मजबूरी है

 देश ने समाजवादी आर्थिक मॉडल को आजमाया. फिर हमने खुले बाजार के मॉडल को अपनाया. हमने अभी तक गांधी के आर्थिक मॉडल को नहीं आजमाया है. मेरा व्यक्तिगत मत है कि गांधी का मॉडल ही इस देश के लिए सही है. जब देश आजाद हुआ तो पत्रकारों ने गांधी से पूछा कि क्या आप भारत को ब्रिटेन जैसा बनाना चाहेंगे तो उन्होंने कहा था-ब्रिटेन भोग भूमि है. भारत कर्म भूमि है. ब्रिटेन ने अपने भोग के लिए दुनिया के कई देशों को अपना गुलाम बनाया. हम ऐसा कतई नहीं करेंगे.

विचारक केवल समस्याएं नहीं, समाधान भी बताएं

जब भी अभिव्यक्ति पर खतरे की बात आती है तो मुझे इमरजेंसी का ही ख्याल आता है. आज के वक्त में जो लोग ऐसी बात करते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि आज की स्थिति बदल चुकी है. समस्या दूसरी है. विचारकों को चाहिए कि वो केवल समस्याएं न बताएं, समाधान भी बताएं. केवल समस्याओं के बारे में बात करने से कोई हल नहीं निकलने वाला.

यहां देखें पूरी बातचीत

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