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बिहार में इंसेफ्लाइटिस का कहर, अब तक 36 बच्चों की मौत

2 जून के बाद से इंसेफ्लाइटिस के 86 मामले सामने आए हैं. इनमें 31 बच्चों की मौत हो गई. जबकि जनवरी से लेकर 2 जून तक 13 मामले सामने आए थे, जिसमें 3 की मौत हो गई थी.

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रोहित कुमार सिंह [Edited by: विशाल/रविकांत]पटना, 12 June 2019
बिहार में इंसेफ्लाइटिस का कहर, अब तक 36 बच्चों की मौत इंसेफ्लाइटिस से ग्रसित मरीज (फाइल फोटो-रॉयटर्स)

बिहार के मुजफ्फरपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में इंसेफ्लाइटिस से बच्चों की मौत का आंकड़ा 36 पहुंच गया है. अस्पताल में फिलहाल 117 मासूम बच्चे भर्ती हैं जिनका लगातार इलाज चल रहा है.

अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ सुनील कुमार शाही ने आजतक से बातचीत करते हुए बताया कि 2 दिन पहले अचानक से 25 मासूम बच्चे जिनकी उम्र 1 साल से लेकर 10 साल के बीच थी इस अस्पताल में भर्ती हुए. डॉ. शाही ने ने बताया कि अब तक 117 मासूम इस अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं जिनमें से 36 की अब तक मौत हो गई है.

डॉक्टरों का मानना है कि चमकी बुखार अत्यधिक गर्मी के बढ़ने और हवा में नमी 50 फ़ीसदी से ज्यादा होने की वजह से होती है. जानकार का मानना है कि इस साल प्रदेश में अब तक बारिश नहीं हुई है जिसकी वजह से मासूम बच्चों के बीमार होने की संख्या लगातार बढ़ रही है.

15 वर्ष तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं. इस कारण मरने वालों में अधिकांश की आयु एक से सात वर्ष के बीच है. इस बीमारी का शिकार आमतौर पर गरीब परिवार के बच्चे होते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, इस बीमारी का मुख्य लक्षण तेज बुखार, उल्टी-दस्त, बेहोशी और शरीर के अंगों में रह-रहकर कंपन (चमकी) होना है.

पिछले डेढ़ दशक से इस बात को लेकर भी काफी शोध हुआ है क्योंकि मुजफ्फरपुर में लीची की उपज काफी होती है, इस वजह से तो बच्चों में एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम की शिकायत तो नहीं हो रही है. श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के शिशु विभाग के एचडी डॉ. गोपाल शंकर साहनी का कहना है कि खुद इस विषय को लेकर काफी शोध किया है और पाया है कि इस बीमारी का लीची से कोई लेना देना नहीं है.

bihar_061219023331.jpgइंसेफ्लाइटिस (चमकी बुखार) से परेशान लोग (फोटो-रोहित कुमार)

हालांकि, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. सुनील कुमार शाही का कहना है कि इस बात को लेकर और शोध होना चाहिए कि कहीं लीची के वजह से तो बच्चों में यह बीमारी नहीं सालाना देखी जा रही है.

गौरतलब है कि हर साल इस मौसम में मुजफ्फरपुर क्षेत्र में इस बीमारी का कहर देखने को मिलता है. पिछले साल गर्मी कम रहने के कारण इस बीमारी का प्रभाव कम देखा गया था. इस बीमारी की जांच के लिए दिल्ली से आई नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की टीम और पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) की टीम भी मुजफ्फरपुर का दौरा कर चुकी है.

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