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चुनावी रंग में राजे

राजसमंद में एक मुसलमान की निर्मम हत्या ने कट्टर हिंदुत्व की बढ़ती नफरत को उजागर किया.

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रोहित परिहार 19 December 2017
चुनावी रंग में राजे चुनावी रंग में राजे

राजनीति के हर मानदंड के लिहाज से यह असामान्य बात है. राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अब तक अजमेर और अलवर के दो संसदीय क्षेत्रों और मांडलगढ़ का दौरा करती रही हैं, जहां उपचुनाव होने हैं. हालांकि अभी तक चुनाव तिथि की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन अब वे राज्य के हर विधानसभा क्षेत्र का दौरा कर रही हैं. पिछले कुछ दिनों में उन्होंने उदयपुरवाटी, पिलानी, सूरजगढ़ और झुंझुनूं—यानी झुंझुनूं लोकसभा क्षेत्र के चार अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में चार रातें बिताई हैं. उन्होंने अगले साल दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए चुनाव अभियान का शुभारंभ कर दिया है.

चुनाव अभियान के दौरान की गई रैलियों और कहीं ठहरने के उलट, सभी 200 विधानसभा क्षेत्रों में से हरेक में एक रात रुकने के वसुंधरा राजे के फैसले का मुख्य कारण यह है कि वे गुजरात चुनावों के मद्देनजर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती हैं. गुजरात में परिणाम जो भी निकले, वसुंधरा के लिए चुनाव कठिन होंगे. यदि भारतीय जनता पार्टी को गुजरात में अच्छी-खासी जीत मिलती है, तो पार्टी आलाकमान विधानसभा के लिए टिकटों के वितरण सहित राज्य की राजनीति में ज्यादा हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित महसूस करेगा, क्योंकि इससे मतदाताओं का मन भाजपा के पक्ष में करने में मदद मिलेगी.

दूसरी ओर, अगर भाजपा हार जाती है तो इससे वसुंधरा राजे के मुकाबले आलाकमान कमजोर होगा, फिर भी वह यह सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा जोर देगा कि कहीं वे हार न जाएं. वसुंधरा राजे को पार्टी की ओर से सत्ता विरोधी रुझान के लिए निशाना बनाया जाएगा. पर उनकी राजनीतिक दक्षता का पता इस बात से चलता है कि उन्होंने पिछले महीने उपचुनावों के लिए अपने चुनाव अभियान के दौरान लोगों का मन भांप लिया था. उन्हें एहसास हो गया था कि सुस्त नौकरशाही और सिस्टम की वजह से उनकी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू नहीं किया जा रहा है. राजनीतिक तौर पर, पार्टी कार्यकर्ता और विधायक सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों पर पहुंच से बाहर होने का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन अब वसुंधरा राजे रोज सैकड़ों कार्यकर्ताओं से मिलकर इस शिकायत को दूर कर रही हैं. हालांकि वसुंधरा कहती हैं कि विधानसभा क्षेत्रों तक जाना उनकी रणनीति का हिस्सा लंबे समय से रहा है. उनके शब्दों में, ''हमने मंडल मुख्यालयों और जिलों में जाना सत्ता में आने के तुरंत बाद शुरू कर दिया था, इसलिए आप इसे गुजरात से नहीं जोड़ सकते.'' वे इस पर भी हैरानी जताती हैं कि कोई सत्ता विरोधी रुझान है. इस पर चर्चा करने के लिए करीबियों की एक बैठक में उन्होंने कहा, ''लोगों में कोई गुस्सा नहीं, केवल उत्साह है.''

फिर गुजरात के परिणामों का असर कांग्रेस पर भी पड़ेगा. पार्टी ने उपचुनावों के लिए अपनी रणनीति गोपनीय बना रखी है. अगर कांग्रेस गुजरात में जीतती है या बहुत अच्छी टक्कर देती है, तो वह प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट के लिए समस्याएं ही पैदा करेगी. तब गहलोत को नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाएगा. पंजाब और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने पुराने क्षत्रपों पर भरोसा किया है. लिहाजा अगर कांग्रेस हिमाचल प्रदेश में हार जाती है, तो इससे राहुल गांधी पायलट का और समर्थन करने लगेंगे, लेकिन अगर वहां जीत जाती है, तो फिर गहलोत मजबूत हो जाएंगे. राजे ने शुरुआती बढ़त हासिल कर ली है, जो गुजरात के प्रभाव को बेअसर करने में उनकी मदद करेगी, लेकिन उनका पहली बड़ी परीक्षा उपचुनाव में होगी.

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