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समलैंगिकों पर पड़ गई कानून की मार

भारत में समलैंगिक होना अब समाज ही नहीं बल्कि कानून की नजर में भी हो गया कलंकित. धारा 377 को जायज ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समलैंगिक निराश.
समलैंगिकों पर पड़ गई कानून की मार
गायत्री जयरामननई दिल्ली, 30 December 2013

भारतीय दंड संहिता (आइपीसी), 1860 की धारा 377 को जायज ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ मुंबई के माहेश्वरी उद्यान में 'ग्लोबल डे ऑफ रेज’ प्रदर्शन में पुलिस उत्तेजक नारेबाजी और हिंसा के अंदेशे से लाठी-डंडे और अतिरिक्त वाहन लेकर पहुंची थी.

लेकिन वहां उसने पाए रंगे-पुते चेहरे, तरह-तरह के मुखौटे, 'प्यार के दुश्मन हाय हाय’ के पोस्टर, बगीचे में ट्रेन डांस, हंसी-ठट्ठा वगैरह. ढोल-नगाड़े पर हेयरस्टाइलिस्ट सपना भवनाणी को डांस करता देख एक तमाशबीन हंसकर कह रहा था, ''ये क्या चाहते हैं? यह विरोध प्रदर्शन भी समलैंगिकों की तरह का है!” प्रदर्शनकारी नारे लगा रहे थे, 'लव’, 'पीस’.

एनजीओ नाज फाउंडेशन की जनहित याचिका पर दिल्ली हाइकोर्ट ने 2 जुलाई, 2009 को धारा 377 को निरस्त करने का फैसला सुनाया था. समलैंगिकों के अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने उसे ऐतिहासिक बताया था. धारा 377 सहमति से समलैंगिक सेक्स और अप्राकृतिक यौनाचार को अपराध बताती है.

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि धारा 377 व्यक्ति की निजता, गरिमापूर्ण स्वतंत्र जीवन के अधिकार, सेक्स की अभिव्यक्ति और सेक्स संबंधी पसंद-नापसंद के अधिकार, किसी का साथ हासिल करने के अधिकार और स्वतंत्र आवाजाही के अधिकार का उल्लंघन करती है. कोर्ट ने फैसले में कहा था, ''संविधान की अवधारणा का मूल तत्व अगर कुछ कहा जा सकता है तो वह है 'समग्रता.”

केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं की लेकिन दिल्ली बाल अधिकार सुरक्षा आयोग, ऑल इंडिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड और एपोस्टोलिक चर्चेज एलायंस ने फैसले को चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जी.एस. सिंघवी और जस्टिस एस.जे. मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने 11 दिसंबर को हाइकोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए समलैंगिक सेक्स को 'अप्राकृतिक’ और 'नामामूली-से समूह’ में ही प्रचलित बताया.

भारत में एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर) समूह के बारे में सरकारी सर्वेक्षण के आंकड़ों में कोई जिक्र नहीं है लेकिन अधिकार संगठनों के मुताबिक, आधिकारिक अमेरिकी आंकड़ों (अमेरिकी सिविल लिबर्टीज यूनियन के मुताबिक 80 लाख वयस्क) का मामूली अंश भी भारत के संदर्भ में विशेष महत्व का है.

हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बीच के दौर में यह समुदाय आजादी का स्वाद चख चुका है. सो, अब वापसी का कोई उपाय नहीं है. मुंबई का मस्ती भरा प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि इस समुदाय को किस कदर सामाजिक स्वीकृतिमिल चुकी है और कानून कितना पीछे चल रहा है.

प्रदर्शन स्थल माहेश्वरी उद्यान 1980 के दशक में समलैंगिक प्रेमियों के छिपकर मिलने की जगह हुआ करता था. यह एलजीबीटी समूह के मिलन स्थलों में से एक था. शहर में और भी जगहें हैं: माहिम में पैराडाइज सिनेमा, आजाद मैदान, कांदा बटाटा मार्केट, टर्भे; चौपाटी, सांताक्रूज और दादर रेलवे स्टेशन; लिबर्टी गार्डन मलाड़, गेट वे ऑफ इंडिया.

नितिन करणी 43 वर्ष के हैं और 2009 से ही 30 वर्षीय थॉमस जोसफ के साथ उनके रिश्ते हैं. करणी बैंकर हैं और हमसफर ट्रस्ट के ट्रस्टी हैं जबकि जोसफ बिजनेस एनालिस्ट हैं. करणी 1980 के दशक के बाद के लोगों के खुलकर सामने आने की मुहिम के अगुआ रहे हैं. उन्हें उन वर्षों में शॄमदगी और अपराधबोध की दास्तान याद है.

1990 में डेबोनियर के एक अंक में अशोक राव कवि ने बॉम्बे दोस्त शुरू करने की घोषणा की थी. उनका कहना था कि समलैंगिक लोगों के लिए निकली उस मैग्जीन ने मेरी जिंदगी बदल दी. वे कहते हैं, ''तब तक आप नहीं जान पाते थे कि दूसरे लोग भी आपके जैसे हैं.” करणी ने 25 साल की उम्र में अपने मां-बाप के सामने मुंह खोला.
समलैंगिक देबिका और श्रुति
( 39 वर्षीय देबिका और 33 वर्षीय श्रुति, दाएं)

वे लोग जो एक पीढ़ी आगे के थे, उनके लिए समलैंगिक होने का मतलब था हर वक्त शर्मिंदगी का एहसास अपनी पीठ पर लादे फिरना. करणी के पार्टनर, केरल के कैथोलिक ईसाई जोसफ जानते थे कि उनका परिवार उन्हें स्वीकार नहीं करेगा, इसलिए उन्होंने भावनात्मक और वित्तीय आत्मनिर्भरता की तलाश की.

''जब मेरे पादरी ने मुझे समझाया कि मुझे स्त्री-पुरुष सेक्स वाली पोर्न फिल्में देखनी चाहिए ताकि मेरा रुझान बदल सके, तो मेरी समझ में आ गया कि मुझे कोई एक राह चुननी होगी. अंतत: मैंने अपनी आस्था का दामन छोड़ दिया.” अब पोप फ्रांसिस के ऐलान से एलजीबीटी समूह को नया जीवन मिला है.

पारंपरिक ढांचे को तोडऩे वाले युवाओं को अप्रत्याशित ढंग से स्वीकृति मिल रही है. डॉग व्हिस्परर (कुत्तों को प्रशिक्षित करने वाली) 39 वर्षीया देबिका की शादी को दस साल हो चुके थे, उन्हें उस बंधन से मुक्त होने में मदद उनके पति ने ही की, जो अब उनके सबसे अच्छे दोस्त हैं. उनकी पार्टनर 33 वर्षीया श्रुति महाराष्ट्र के टियर-2 शहर से आईं एक काउंसलर हैं. श्रुति को लेस्बियन होने की वजह से घर से निकाल दिया गया था और अब वे मुंबई में अपनी प्रैक्टिस करती हैं.

देबिका का मम्मी-पापा से रिश्ता आज भी कायम नहीं हो पाया है. श्रुति के मुताबिक, 2009 का हाइकोर्ट का फैसला उनके जैसे लोगों को वास्तविकता को स्वीकार करने में मददगार बना. इसी तरह, मुंबई के 42 वर्षीय जयेश देसाई और 43 वर्षीय राधे खत्री 2006 में इवेंट में मिले थे. देसाई कुछ दिन पहले ही एक अखबार के मुख पृष्ठ की तस्वीर में प्रदर्शन में हिस्सा लेते दिखे थे.

उपनगर उल्हासनगर के इस निवासी के लिए यह राहत लेकर आया. वे कहते हैं, ''अब मैं किसी की परवाह नहीं करता. मैं छिपते-छिपते थक गया था.” कोलकाता में, अधिकार कार्यकर्ता तथा डॉक्टर तीर्थंकर गुहा ठाकुरता कहते हैं, ''युवाओं को एहसास होने लगा है कि सामाजिक वर्जना का माहौल अब छंटने लगा है.”

अब शहरों में रोजमर्रा की व्यावहारिकता पर ज्यादा जोर है. मसलन, बैंक में साझ खाता कैसे खुले, कैसे बीमा और होम लोन पाया जाए या किसी मेडिकल आपात स्थिति में वारिस की तरह कैसे दस्तखत किए जाएं, मकान मालिक को बिना डर के कैसे किराया थमाया जाए, वगैरह. विरासत का मामला काफी विवादास्पद है.

कोलकाता के संगठन सैफो फॉर इक्वेलिटी की पौशाली बसाक कहती हैं, ''विरासत, संपत्ति का हक छीन लेने या परिवार के सदस्यों से मेल-मुलाकात से इनकार की घटनाएं कम नहीं हैं इसलिए हम हर किसी से अपनी पहचान जाहिर करने से पहले आर्थिक आजादी हासिल करने की बात करते हैं.” शहरों में तो लोगों को एनजीओ, संगठनों और इंटरनेट का सहारा है लेकिन गांवों में गरीब लोगों का शोषण बेइंतिहा है और धारा 377 के निरस्त होने का महत्व सर्वाधिक उन्हीं के लिए है.

25 वर्षीय सोनल शर्मा दिल्ली की आंबेडकर यूनिवर्सिटी में रिसर्च असिस्टेंट हैं. उनकी मम्मी घरों में काम करती हैं और पिता स्थानीय बाजार में पैसा उगाहने वाले हैं. मम्मी से अपनी सेक्स चॉयस को जाहिर करना उनके लिए आसान नहीं था. वे कहते हैं, ''मैंने अपनी मां से यह नहीं कहा कि मैं समलैंगिक हूं. वह समझ नहीं पातीं.

इसलिए मैंने कहा कि मुझे मर्दों के प्रति आकर्षण है. मैं शादी नहीं करूंगा. मैं अपने पिता से यह नहीं कह सकता.” शर्मा कहते हैं कि कानून हमें बलात्कार की शिकायत करने में भी मुश्किल पैदा करता है. वे कहते हैं, ''मुझसे बलात्कार होता है तो मैं पुलिस को नहीं बता सकता क्योंकि मुझे ही अपराधी बना दिया जाएगा.”
राधे खत्री और साथ में जयेश देसाई
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समलैंगिकों के अधिकारों के बारे में बोलने से सरकार उदारता से विचार करने को तत्पर दिखती है. कानून मंत्री कपिल सिब्बल कहते हैं कि सरकार सब कुछ करेगी, चाहे कानून ही क्यों न बदलना पड़े. हालांकि बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जायज ठहराया है.

उन्होंने कहा, ''हमारा मानना है कि समलैंगिकता अप्राकृतिक है. हम इसका समर्थन नहीं कर सकते.” बीजेपी में कई लोग उनसे सहमत नहीं हैं. एक वरिष्ठ पार्टी नेता कहते हैं, ''ऐसे दकियानूसी विचार युवाओं को पसंद नहीं आएंगे.” बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है.

आंदोलन से जुड़े लोगों को लोगों को लगता है कि अब यह आगे बढ़ चुका है और ऐसे दौर में एलजीबीटी संबंधों को अपराध बताना काफी नुक्सानदेह होगा. एलजीबीटी समूह के बारे में जागरूकता के लिए सक्रिय पुणे के समपथिक ट्रस्ट के अध्यक्ष 46 वर्षीय बिंदुमाधव खीरे कहते हैं, ''पुलिस की मदद से शोषण और ब्लैकमेलिंग काफी हद तक घटी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से अंदेशा बढ़ गया है.”

सॉफ्टवेअर इंजीनियर रहे खीरे ने समलैंगिकता पर सात किताबें लिखी हैं. वे कहते हैं, ''मेरी उम्र के कई मर्द जबरन विवाह की वजह से दोहरा जीवन जीते हैं.” खीरे को ज्यादा चिंता ग्रामीण इलाकों की है जहां समलैंगिक स्त्री और पुरुषों को उनकी इच्छा के विरुद्ध शादी करने पर मजबूर किया जाता है. वे कहते हैं, ''अगर कानून सही दिशा में हो तो समाज ऐसे लोगों को स्वीकार कर लेगा.”

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में स्कूल ऑफ मीडिया ऐंड कल्चरल स्टडीज के अध्यक्ष के.पी. जयशंकर और डीन अंजली मोंटियरो का मानना है कि धारा 377 के बचाव में दिया जाने वाला तर्क बेमानी है. समलैंगिक और बच्चों का सेक्स उत्पीडऩ करने वाले ज्यादातर विषमलिंगी (हेट्रोसेक्सुअल) होते हैं. फिर, यौन उत्पीडऩ और बलात्कार से निबटने के लिए आइपीसी में दूसरी धाराएं हैं इसलिए 377 तो वैसे भी बेमानी है. जयशंकर कहते हैं, ''कौन तय कर सकता है कि अप्राकृतिक क्या है?”

50 वर्षीय आदित्य आडवाणी के मुताबिक, सामाजिक स्वीकार्यता लोगों का भी दायित्व है. आडवाणी लैंडस्केप आर्किटेक्ट हैं और अपने पार्टनर माइकल टार के साथ दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी में रहते हैं. सरोगेसी से उनके दो जुड़वां बच्चे भी हैं. वे कहते हैं, ''फैसला सुनाने वाले जजों को समलैंगिक लोगों के बारे में जानकारी ही नहीं होगी.

यह माहौल हमारे खुलकर आने से ही बदलेगा. कुल मिलाकर समलैंगिक युगल भी दूसरों की तरह एकदम नीरस और सामान्य जीवन जीते हैं. हम प्रेम में पड़ते हैं और साथ रहने लगते हैं. फिर जीवन नीरस हो जाता है. हमारे बारे में कुछ भी अनोखा नहीं है. हम बस यही चाहते हैं कि यह नीरस जीवन चलता रहे.”

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