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लोढ़ा समिति की सिफारिश का पालन, अध्यक्ष पद से हटे शरद पवार

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित लोढ़ा समिति की सिफारिश का पालन करते हुए वरिष्ठ राजनेता शरद पवार ने शनिवार को मुंबई क्रिकेट संघ (एमसीए) अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.

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aajtak.in
अमित रायकवार मुंबई, 18 December 2016
लोढ़ा समिति की सिफारिश का पालन, अध्यक्ष पद से हटे शरद पवार शरद पवार

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित लोढ़ा समिति की सिफारिश का पालन करते हुए वरिष्ठ राजनेता शरद पवार ने शनिवार को मुंबई क्रिकेट संघ (एमसीए) अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. लोढ़ा समिति ने किसी भी क्रिकेट संघ में अधिकारी पद के लिए अधिकतम 70 वर्ष की आयुसीमा निर्धारित की है. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष रह चुके पवार ने कहा कि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए इस्तीफा दिया.

शरद पवार ने दिया इस्तीफा
वह तीसरी बार एमसीए के अध्यक्ष चुने गए थे. इससे पहले वह 2001-02 और 2010-11 में एमसीए के अध्यक्ष रह चुके थे. पवार ने एमसीए की प्रबंध समिति की आपात बैठक के दौरान अपनी इस्तीफा-पत्र सौंपा. पवार ने अपने इस्तीफा-पत्र में लिखा है, 'सर्वोच्च अदालत ने फैसला लिया है कि किसी भी क्रिकेट संघ में 70 वर्ष से अधिक का अधिकारी नहीं होगा. यह निर्णय मुझ पर भी लागू होता है. इसीलिए मैं एमसीए के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूं और एमसीए के सचिव से मेरा इस्तीफा स्वीकार करने का निवेदन करता हूं.'

लोढ़ा समिति की सिफारिश का असर
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के मुखिया पवार ने हालांकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन पदों के लिए 'लाभ का पद' शब्द इस्तेमाल करने पर नाखुशी भी जाहिर की. पवार ने कहा, 'क्रिकेट के संबंध में फैसला लेते समय शीर्ष अदालत ने कहा था कि अधिकारियों को 70 वर्ष से अधिक आयु का नहीं होना चाहिए और उन्होंने इन पदों को 'लाभ का पद' करार दिया था, जिसने मुझे दुखी किया और इसीलिए अब मेरी इच्छा इस पद पर और बने रहने की नहीं है.'

'मैनें कोई वित्तीय लाभ नहीं लिया'
उन्होंने कहा, 'एमसीए का अध्यक्ष रहते हुए मैंने कभी कोई भत्ता या वित्तीय लाभ नहीं लिया. मैंने और मेरे सहकर्मियों ने अपना पूरा समय दिया और संघ में हुए सभी कार्यो की जिम्मेदारी ली. नवीन सुविधाओं का निर्माण करते हुए हमने हमेशा इस बात का खयाल रखा कि एमसीए का नाम सम्मान से लिया जाए. सर्वोच्च न्यायालय को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था.'

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