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कितना सेहतमंद है आपका बच्‍चा?

सात राज्‍यों के 40,000 स्‍कूली बच्‍चों पर किए गए एक सर्वेक्षण से मिले चौंकाने वाले नतीजे बताते हैं कि हमारे बच्‍चे कितने अस्‍वस्‍थ हैं और जिसके चलते सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य का संकट खड़ा हो रहा है.
कितना सेहतमंद है आपका बच्‍चा?
दमयंती दत्तानई दिल्‍ली, 28 October 2009

" "कहा जाता है कि पेट भावनाओं का दर्पण है. दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) में एक लड़की पेट की बीमारी से परेशान है. डॉक्टर के बुलावे के इंतजार में रोगियों से ठसाठस भरे ओपीडी में बैठा हर कोई जहां एक-दूसरे का हमदर्द बन जाता है, वह लड़की एकदम सुस्त बैठी है. उसकी आंखें जैसे जमीन पर गड़ गई हैं. उसके माता-पिता नहीं जानते कि उसके  पेट में क्यों असहनीय दर्द उठता है. उसकी शुरुआत तब होती है जब वह स्कूल जाने को होती है और दर्द इतना बढ़ जाता है कि अक्सर उसे वापस घर भेज दिया जाता है. डॉक्टर उसके पेट की जांच आला लगाकर करते हैं, गोलियां खाने को देते हैं, तरह-तरह की जांच करवाते हैं और जब मर्ज पकड़ में नहीं आता तो दर्द को लाइलाज बता देते हैं. इस रहस्यमय दर्द के कारण उस लड़की को पिछले महीने स्कूल से नाम कटवाना पड़ा. लेकिन आज उसे एक अच्छा डॉक्टर मिल गया है. गलियारे में थोड़ा-सा आगे चिकित्सकीय मनोविज्ञान की प्रोफेसर डॉ. मंजू मेहता और उनके छात्र इस विचित्र बीमारी-रिकरेंट एबडॉमिनल पेन्स (आरएपी)-के बारे में अध्ययन कर रहे हैं, जो अक्सर देश भर के बच्चों में देखी जा रही है.

बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य में आया है भारी बदलाव
" "यहां कुछ ऐसी खबरें हैं जो माता-पिता की रातों की नींद खराब करने की पर्याप्त वजह बन सकती हैं. देश के समृद्ध परिवारों के बच्चों के पास आज वे सारी सुख-सुविधाएं-कपड़े, खिलौने, खेलकूद के सामान और इलेक्ट्रॉनिक के उपकरण-हैं, जो उनके माता-पिता को शायद ही हासिल रहे होंगे. लेकिन हाल के वर्षों में आर्थिक प्रगति के साथ, जब पैसा आने से नए तरह के खानपान की भरमार हो गई है, देश के बच्चों के स्वास्थ्य में भारी बदलाव आया है. अपोलो अस्पताल के 'वेलनेस आर ऐंड डी' विभाग के एक अध्ययन के मुताबिक, शहरी भारतीय बच्चे स्वस्थ नहीं हैं. पिछले एक साल में अपोलो ने हैदराबाद से इलाहाबाद, बंगलुरू से लखनऊ, चेन्नै से मुंबई और पुणे से लेकर कोच्चि तक 50 स्कूलों में छठी कक्षा से बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर कई सर्वेक्षण किए. और हर पैमाने से रिपोर्ट यही बताती है कि करीब 34 प्रतिशत शहरी स्कूली बच्चे अस्वस्थ हैं.

खानपान हुआ अनियमित
सर्वेक्षण में शामिल 62 फीसदी बच्चों का खानपान अनियमित पाया गया. वे असमय भोजन करते हैं और दिन भर पिज्‍जा, बर्गर, चॉकलेट वगैरह खाते रहते हैं. करीब इतने ही प्रतिशत बच्चों में शारीरिक दमखम की कमी है, और तमाम दूसरी बातों के अलावा सीढ़ियां चढ़ने पर उनकी सांस फूलने लगती है. डॉक्टरों ने बताया 65 प्रतिशत बच्चों (वयस्कों में सिर्फ 15 फीसदी) को हर रोज असाध्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करता है. अपोलो लाइफटाइम वेलनेस आरएक्स इंटरनेशनल लिमिटेड के  प्रमुख प्रो. एड्रियन केनेडी कहते हैं, ''अगर कुछ बदलाव नहीं किए गए तो देश के मौजूदा वयस्कों के मुकाबले अस्वस्थ बच्चों की तादाद बढ़ेगी.''सर्वेक्षण ने दिखाया कि दवा लेने वाले बच्चों की संख्या (34 फीसदी) वयस्क लोगों (31 फीसदी) से ज्‍यादा है. चौंक गए? बंगलुरू के  राजरत्नम परिवार से पूछिए. तीसेक साल के इंजीनियर दंपती की पूरी कोशिश होती है कि उनका सात वर्षीय बेटा राकेश एकदम स्वस्थ रहे, भले ही उसे हर रोज गोलियां खानी पड़े. इसलिए राकेश सुबह होते ही उठ जाता है, फिर केरल के कोट्टक्कल से मंगवाया गया दो चम्मच च्यवनप्राश खाता है क्योंकि उसकी ''प्रतिरोधक शक्ति''  कम है. इसके बाद वह क्रिकेट की कोचिंग के लिए जाता है. उसकी चिंतित मां अनिला कहती हैं, ''उसे कैल्सियम की गोलियां लेनी पड़ती हैं क्योंकि उसकी हड्डियां कमजोर हैं.'' राकेश सुबह के समय विटामिन सी की गोलियां भी लेता है क्योंकि उसे हमेशा सर्दी और खांसी की शिकायत रहती है. इसके लिए शहर का मौसम और प्रदूषण भी किसी हद तक जिम्मेदार है. राकेश के लिए एंटी एलर्जी की दवाएं, सीरप और पारासिटामॉल भी अजूबी चीजें नहीं हैं. इनके अलावा साधारण जुकाम से लेकर रक्त की सफाई के लिए तरह-तरह की टॉनिक लेना भी उसके लिए आम बात है.

व्‍यस्‍कों के मुकाबले बच्‍चे ज्‍यादा बीमार
" "आंकड़ों को देखें तो बच्चे बड़ी संख्या में अस्वस्थ हो रहे हैं. वयस्कों (3 फीसदी) के  मुकाबले ज्‍यादा बच्चे (12 फीसदी) अस्पतालों में भर्ती होते हैं. सर्वेक्षण में शामिल 45 प्रतिशत वयस्क अगर नजर का चश्मा पहनते हैं तो इस धारण करने वाले बच्चों की संख्या 33 प्रतिशत है. केनेडी कहते हैं, ''कल्पना कीजिए तब यह आंकड़ा क्या होगा जब वे बड़े होंगे.'' करीब 22 प्रतिशत वयस्कों को दांत की समस्या है, जबकि 30 प्रतिशत बच्चे दांत की बीमारी से परेशान हैं. यह चिंतित करने वाला आंकड़ा है क्योंकि सर्वेक्षण में शामिल किए गए ज्‍यादातर बच्चे दूध के दांत के चरण से काफी आगे आ चुके थे. जब हृदय रोग, कैंसर, उच्च रक्तचाप, और मधुमेह के मामले में परिवार के इतिहास पर सर्वे किया गया तो बच्चों की संख्या वयस्कों से ज्‍यादा (57:45 फीसदी) थी. दूसरे शब्दों में कहें तो एक पीढ़ी के भीतर जीवनशैली की बीमारियों का खतरा 22 प्रतिशत बढ़ गया है.

सही भोजन का निर्णय लेना आसान नहीं
संख्या तो कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है. ऐसी दुनिया में जब तरह-तरह के खाद्य पदार्थों की भरमार है, सही भोजन का निर्णय लेना आसान नहीं है. बच्चों के जीवन की कथा आहार की इसी समस्या को प्रतिबिंबित करती है. लखनऊ का अंकित पाराशर भले ही 12 वर्ष का है लेकिन वह पहले ही ऑपरेशन थिएटर में जा चुका है और वह भी ऐसी बीमारी के लिए जो बड़ों को होती है-पित्ताशय की पथरी. डॉक्टरों का निदान? बहुत ज्‍यादा जंक फूड. बैंक में काम करने वाली उसकी मां बताती हैं, ''ताजा टिफिन तैयार करने की जगह मैं उसे कैंटीन से खाने की चीजें खरीदने के लिए पैसे दिया करती थी.'' दिल्ली की काउंसेलर गीतांजलि कुमार कहती हैं, ''वैश्वीकरण के  बाद बदले परिवार के स्वरूप-कामकाजी मांओं की संख्या में वृद्धि और माता-पिता का दफ्तर में ज्‍यादा समय बिताना-के कारण बच्चों की देखभाल के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता.'' जीवन में व्यस्तता बढ़ जाने से पोषक भोजन तैयार करने के लिए समय का अभाव रहता है. अब ज्‍यादा लोग रेस्तरांओं में खाना खाते हैं, और अक्सर अधपका भोजन लाकर फटाफट उसे पका लेते हैं.अंकित सर्वेक्षण में शामिल ऐसे बच्चों में शुमार है, जिसे खाने से संबंधित वस्तुओं के बारे में जानकारी का सबसे अधिक स्कोर (81 प्रतिशत) हासिल हुआ. इसके बावजूद वह असंतुलित भोजन (29 प्रतिशत) लेता है. केनेडी कहते हैं, ''सिर्फ ज्‍यादा वजन के मामले, जिसमें वयस्कों की संख्या बच्चों के मुकाबले ज्‍यादा है (वयस्क 61 प्रतिशत हैं तो बच्चे 39 प्रतिशत), को छोड़ दें तो पोषण के हर मामले में बच्चों की स्थिति वयस्कों के मुकाबले कहीं ज्‍यादा खराब है.'' जरा आहार पर नजर डालें- 31 प्रतिशत बच्चे हर रोज दो कप से कम दूध पीते हैं; 37 प्रतिशत बच्चे रोजाना खाने के साथ मीठी चीजें खाते हैं; 43 प्रतिशत बच्चे फल और सब्जियां खाने से मना करते हैं, 32 प्रतिशत हफ्ते में कम-से-कम तीन बार पिज्‍जा और बर्गर खाते हैं; 35 प्रतिशत बच्चे हफ्ते में दो बार फास्ट फूड की दुकानों पर होते हैं.

बच्‍चों के औसतन वजन में हुआ इजाफा
" "एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. निखिल टंडन ने जब 2006 में दिल्ली में 5-18 वर्ष के 21,485 स्कूली बच्चों का अध्ययन किया तो उनमें से 18 प्रतिशत बच्चों में ज्‍यादा वजन और 6 प्रतिशत बच्चों में मोटापा देखकर वे चकित रह गए. एम्स में एंडोक्रिनोलॉजी और मेटाबोलिज्‍म विभाग में प्रोफेसर टंडन कहते हैं, ''पिछले दो दशकों में बच्चों के वजन में औसतन 5-15 किलो का इजाफा हुआ है. उनके लक्षण बताते हैं कि उनमें जल्दी ही मधुमेह, तनाव, हृदय रोग और और दूसरी बीमारियां होने का खतरा है.'' ऐसा सिर्फ संपन्न परिवारों के बच्चों के साथ नहीं है. फोर्टिस अस्पताल के एक चालू अध्ययन, जिसमें दिल्ली के अलावा आगरा, जयपुर, इलाहाबाद और पुणे जैसे शहरों को भी शामिल किया गया है, में पाया गया है कि चार स्कूली बच्चों में से एक बच्चे में पेट की चर्बी, इंसुलिन प्रतिरोधकता और हाइपरटेंशन की समस्या 20 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते विस्फोटक रूप ले सकती है.

बच्‍चों के दिनचर्या से माता पिता दु:खी
प्रीतीश दाउदखाने अभी सिर्फ 11 साल का है लेकिन उसकी दिनचर्या उसके माता-पिता से भी व्यस्त है. और उसकी मां परुमिता, जो नवी मुंबई में कोचिंग चलाती हैं, बेहद चिंतित हैं. प्रीतीश शाम होते-होते थककर चूर हो जाता है. वसंत विहार हाइस्कूल का यह छात्र रोज सुबह 5.30 बजे स्कूल बस पकड़ने के लिए उठता है और दोपहर 2 बजे वापस आता है, फिर होमवर्क का समय होने या ट्यूशन के लिए जाने तक टीवी देखता है या कंप्यूटर गेम खेलता है. उसकी मां बताती हैं, ''वह सुबह बहुत जल्दी उठ जाता है. होमवर्क और ट्यूशन के दबाव के कारण उसमें शारीरिक दमखम या कुछ करने के लिए एकदम उत्साह नहीं होता है.'' प्रीतीश हाइस्कूल में आने के बाद से ही इस तरह की दिनचर्या में फंस गया है. वे कहती हैं, ''मैंने कभी किसी डॉक्टर से सलाह नहीं ली क्योंकि आजकल हर बच्चा इसी तरह का जीवन जी रहा है. लेकिन इससे मुझे दुख होता है.''यह सर्वेक्षण बच्चों की शारीरिक फिटनेस के लिए खतरे की घंटी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों के मुताबिक हर रोज एक घंटा साधारण शारीरिक काम करना चाहिए, इसके अलावा हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत करने और शरीर को लचीला बनाने लिए हफ्ते में कम-से-कम दो बार व्यायाम करना चाहिए. भारत के बच्चे (30 प्रतिशत से ज्‍यादा) टीवी के सामने रोजाना 4-6 घंटे बिताना पसंद करते हैं. 37 फीसदी से ज्‍यादा बच्चे शारीरिक रूप से चुस्त नहीं हैं; 30 फीसदी के पास खेलने के लिए समय नहीं है; 30 फीसदी की मांसपेशियां कमजोर हैं. और 43 प्रतिशत बच्चों के जोड़ों में लचीलापन नहीं है, दिल्ली के अपोलो इंद्रप्रस्थ अस्पताल में एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. अंबरीष मित्तल कहते हैं, ''आगे चलकर बच्चों में हड्डी के रोग होने की बड़ी संभावना है.'' दिल्ली में एम्स और इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन ऐंड एप्लाइड साइंसेज ने 2006 में करीब 90 फीसदी स्कूली बच्चों में विटामिन डी (हड्डी की मजबूती के लिए अनिवार्य) की कमी पाई है.

झगड़ालू होते जा रहे हैं बच्‍चे
" "तस्वीर चिंताजनक है. लेकिन अब और भी भयावह आंकड़ों पर नजर डालें- 65 प्रतिशत बच्चों को एक या कई समस्याओं (निजी, शैक्षिक या अन्य) का सामना करना पड़ रहा है, जिसका उनके पास कोई समाधान नहीं है, 54 प्रतिशत बच्चों के लिए स्कूल के बाद ट्यूशन जरूरी है; 36 प्रतिशत बच्चों को अपने दूसरे साथियों से बराबरी करना कठिन लगता है, न सिर्फ पढ़ाई में बल्कि दूसरी गतिविधियों में भी. इतना ही नहीं, 47 प्रतिशत बच्चे स्कूल, ट्यूशन और परिवार के कार्यों में व्यस्त होते हैं और 54 प्रतिशत बच्चों को हर रोज स्कूल आने-जाने में दो घंटे लगाने पड़ते हैं. सो, एम्स की मेहता को आश्चर्य नहीं है कि ''आजकल बच्चे अवज्ञाकारी, गुस्सैल, चिड़िचिड़े और झगड़ालू होते जा रहे हैं.''

कई बार बच्‍चों को समझने में होती है गलती
चंडीगढ़ की 13 वर्षीया लड़की के माता-पिता जब बालरोग विशेषज्ञ डॉ. आर.एस. बेदी के  पास उसे बेहोशी की हालत में लाए तो उन्हें उसके बारे में ऐसी ही शिकायत थी. रात में दो लड़कों से फोन पर बातें करने से मना किए जाने पर, घरवालों द्वारा उसकी जासूसी किए जाने, पढ़ाई में कमजोर होने पर घरवालों से डांट खाने से तंग आकर उसने नींद की ढेर सारी गोलियां खा लीं. डॉक्टर ने माता-पिता को फटकार लगाई और उन्हें किसी परामर्शदाता के पास भेज दिया. उसके बाद वे कभी बेदी के पास नहीं आए. बेदी कहते हैं, ''किशोरावस्था में हार्मोंस में बदलाव आता है. ज्‍यादातर अभिभावक इस बात से वाकिफ नहीं होते. बच्चों को घर पर रहते हुए भी बेगानापन लगता है. जब वे स्कूल से आते हैं तो घर पर माता-पिता नहीं होते. घर पर माता-पिता या तो बहुत थके होते हैं या बहुत व्यस्त होते हैं. घर आजकल हॉस्टल की तरह हो गया है.'' ताज्‍जुब नहीं कि सर्वेक्षण में शामिल 36 प्रतिशत बच्चों के लिए घर चैन पाने की जगह नहीं है, 40 प्रतिशत माता-पिता से दिल की बातें नहीं बताते, 16 प्रतिशत बच्चे दादा-दादी वगैरह के प्यार से वंचित रहते हैं और 7 प्रतिशत बच्चों के माता-पिता तलाक ले चुके हैं.अहमदाबाद के 14 वर्षीय सत्यम पटेल को खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा आठ रह जाने पर अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. ऐसा तो उसके साथ होना ही था. नौंवीं कक्षा का एकदम दुर्बल शरीर वाला सत्यम नाश्ता नहीं करता था और स्कूल में तली हुई चीजें खाता था, लंच भी फटाफट करता था, दोपहर बाद ट्यूशन के लिए भागता था और स्कूल व ट्यूशन का होमवर्क करने के लिए देर रात तक जागता था. उसके गिरते स्वास्थ्य की ओर तब तक किसी ने ध्यान नहीं दिया जब तक कि एक दिन वह बीमार नहीं पड़ गया. अहमदाबाद के मनोविज्ञानी डॉ. प्रशांत भिमानी कहते हैं, ''अच्छा नतीजा लाने के  लिए माता-पिता का दबाव रहता है, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. एक और चिंताजनक विषय यह है कि पिता अपने बच्चों से ज्‍यादा बातचीत करने के लिए समय नहीं देना चाहता.'' खैर, डॉ. भिमानी के इलाज से सत्यम की सेहत में सुधार हो रहा है.

शहरी और ग्रामीण बच्‍चे खराब सेहत के मामले में एक जैसे
" "देश भर में डॉक्टर खतरे की चेतावनी दे रहे हैं. बालरोग विशेषज्ञ डॉ. परेश मजूमदार, जिनके वडोदरा में दो अस्पताल हैं, माता-पिता में जागरूकता के अभाव से चिंतित हैं. वे कहते हैं, ''11 साल का बच्चा 70 किलो का हो तभी वह अपने माता-पिता के लिए 'स्वस्थ बच्चा' होता है. इसके अलावा माता-पिता अपना तनाव और महत्वाकांक्षाएं अपने बच्चों पर थोपना चाहते हैं. वे बच्चों की सेहत से ज्‍यादा इस बात से परेशान हो जाते हैं कि उनका बच्चा एक दिन स्कूल नहीं गया.'' लखनऊ के एसजीपी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में डॉक्टर गौड़ चौधरी से पूछिए. उनकी परियोजना 'होप इनीशिएटिव' ने उत्तर प्रदेश के 10 जिलों के 22,000 बच्चों का सर्वेक्षण किया. वे कहते हैं, ''शहरी और ग्रामीण बच्चों के स्वास्थ्य में भारी अंतर है, फिर भी दोनों ही खराब सेहत के मामले में एक जैसे हैं.''

बच्‍चों को लेकर माता-पिता में जानकारी का अभाव
यह ऐसा अध्ययन है जिसके नतीजे सिर्फ चिंताजनक हैं. माता-पिता में जानकारी का अभाव है, तो बच्चे दुर्दशा के शिकार हैं. सचाई, जो भले ही कटु है, दीवार पर लिखी साफ इबारत हैः देश के भविष्य का स्वास्थ्य अंततः माता-पिता पर निर्भर है. पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के निदेशक, हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. के.एस. रेड्डी अतीत से सबक सीखने की सलाह देते हैं, ''100 साल पहले अल्पाहार जैसी कोई चीज नहीं होती थी और न ही लोग जरूरत से ज्‍यादा भोजन करते थे. लोग ढेर सारे ताजे फल और सब्जियां खाते थे. उस समय तकनीकी सुविधाएं कम होने से लोग शारीरिक मेहनत करते थे.'' तो ऐसा तरीका ढूंढ़िए कि आपका बच्चा रोज एक घंटा शारीरिक श्रम करे, उसे उछलने-कूदने के लिए प्रेरित कीजिए, और समय पर घर का बनाया खाना खाने को कहिए. स्वस्थ रहने का रास्ता आसान नहीं है. माता-पिता को खुद आदर्श उपस्थित करना होगा, अगर वे भावी पीढ़ी को स्वस्थ देखना चाहते हैं.

-साथ में निर्मला रवींद्रन बंगलुरू में, मिताली पटेल और झिलमिल मोतीहार मुंबई में, अधि वेलिअप्पन चेन्नै में; अरविंद छाबड़ा चंडीगढ़ में; उदय माहूरकर अहमदाबाद में; सुभाष मिश्र लखनऊ में; झुमरी निगम वडोदरा में और आयशा सिंह दिल्ली में

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