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शहीदों की विधवाओं का कितना खयाल रख सके हम

करगिल युद्ध ने देश को य‍ह एहसास करा दिया कि हम अपने दु‍श्‍मनों को मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है. इसका एक दूसरा पहलू भी है.

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आज तक ब्यूरोनई दिल्‍ली, 24 July 2009
शहीदों की विधवाओं का कितना खयाल रख सके हम

करगिल युद्ध ने देश को य‍ह एहसास करा दिया कि हम अपने दु‍श्‍मनों को मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है. इसका एक दूसरा पहलू भी है. युद्ध ने जाने-अनजाने इस बात की भी पोल खोल दी कि हम वतन के लिए प्राण न्‍योछावर करने वाले जवानों का कितना सम्‍मान करते हैं और उनके आश्रितों का कितना खयाल रखते हैं.

सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ा हस्‍तक्षेप
करगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं को समुचित न्‍याय दिलाने के लिए दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट को सितंबर, 2004 में सरकार को नोटिस जारी करनी पड़ी थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस देकर पूछा था कि युद्ध के 5 साल बाद इन्‍हें अब तक राहत और मुआवज़ा क्यों नहीं दिया गया है.

5 साल बाद भी मुआवजा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किए थे. इस याचिका के अनुसार करगिल की विधवाओं में से 40 प्रतिशत को करगिल युद्ध के 5 साल बाद तक समुचित मुआवजा नहीं मिल पाया था, जिसकी वे हक़दार थीं. बाद में केंद्र सरकार ने आनन-फानन में कुछ कार्रवाई की, जिससे कई को मुआवजा मिल सका.

युवकों के सामने द्वंद्व की स्थिति
करगिल युद्ध ने एक ओर कई युवकों में सेना में भर्ती होकर देश के लिए मर-मिटने का उन्‍माद पैदा किया, तो दूसरी ओर मुआवजे में देरी और लापरवाही की घटना ने कई युवकों यह सोचने को मजबूर कर दिया कि वे कोई दूसरा पेशा न अपनाकर आखिरकार सेना में ही क्‍यों जाएं?

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