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भारतीय पत्रकारिता का पिंड है राष्ट्रवाद, फिर इससे गुरेज क्यों?

सौरभ मालवीय ने कहा अटल बिहारी वाजपेयी जन्मजात वक्ता थे, जन्मजात कवि हृदय थे, पत्रकार थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे. उनके बारे में कहा जाता था कि यदि वह पाकिस्तान से चुनाव लड़ते तो वहां से भी जीत जाते और पाकिस्तान का नेता कहे जाते.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 10 January 2019
भारतीय पत्रकारिता का पिंड है राष्ट्रवाद, फिर इससे गुरेज क्यों? सईद अंसारी और डॉ. सौरभ मालवीय (फोटो: आजतक)

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सहयोग से प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेला 2019 में लेखक मंच पर 'साहित्य आजतक' का अगला सत्र था डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष- अटल बिहारी वाजपेयी' पर चर्चा का. जहां सईद अंसारी से बातचीत के लिए मौजूद रहे पं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और इस किताब के लेखक डॉ. सौरभ मालवीय. सत्र के शुरू में सईद ने मालवीय की राजनीतिक और सामाजिक समझ की तारीफ करते हुए पूछा कि किस तरह वह अटल बिहारी वाजपेयी को एक पत्रकार और वह भी एक राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में देखते हैं.

डॉ. सौरभ मालवीय ने 'साहित्य आजतक' का आभार जताते हुए, 'तेरा तुझको अर्पण' की बात कही और कहा कि देश और समाज ने हमको जो दिया हमने उसे वही लौटाया. अटल बिहारी वाजपेयी इस सोच के महान नायक थे. मेरा मानना है कि राजनीति एक ऐसी विधा है, एक ऐसा क्षेत्र है, जो किसी भी समाज के विकास की प्रक्रिया के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है. परंतु दुर्भाग्य यह है कि आजादी के बाद राजनीति को देखने की दृष्टि संकुचित कर दी गई. राजनीति में काम करने वाला व्यक्ति, नेता बनने वाला व्यक्ति समाज में उस तरह से नहीं स्वीकार किया गया, जैसे कि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ कर डॉक्टर बने, वकील बने, इंजीनियर बने पर कोई व्यक्ति यह नहीं कहना चाहता कि मैं राजनेता हूं. ऐसे सवालों के जवाब में जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी उम्र दी उस व्यक्ति का नाम अटल बिहारी वाजपेयी था.

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अटल बिहारी वाजपेयी जन्मजात वक्ता थे, जन्मजात कवि हृदय थे, पत्रकार थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे. उनके बारे में कहा जाता था कि यदि वह पाकिस्तान से चुनाव लड़ते तो वहां से भी जीत जाते और पाकिस्तान का नेता कहे जाते. राजनीति को जब प्रश्नों के दायरे में खड़ा किया जा रहा है तब अटल जी की स्वीकार्यता जन-जन में थी. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, नंबूदरीपाद, अटल बिहारी वाजपेयी, दीन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं जवाहरलाल नेहरू तमाम ऐसे नेता थे, जिन्होंने पहले यह तय किया कि हमें आजादी, राष्ट्र का विकास चाहिए. इन सबने राष्ट्र को सर्वोपरि रखा.

राष्ट्रवादी पत्रकारिता की व्याख्या करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि इसका अर्थ है समाज के सभी वर्गों को, समाज में निचले स्तर पर जीने वाले हर व्यक्ति को सभी संसाधन उपलब्ध कराने में अपना सर्वस्व जीवन निछावर कर देना. अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना जीवन इसीलिए निछावर कर दिया. इसीलिए इस किताब को लिखने की जरूरत पड़ी. अटल बिहारी वाजपेयी केवल नेता भर नहीं थे. उनकी सभाएं देश भर में होती थीं, तो दूसरे दलों के नेता भी उनका भाषण एक नेता के तौर पर सुनने जाते थे, किसी दल के नेता विशेष के तौर पर नहीं.

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अटल बिहारी वाजपेयी की पत्रकारिता की उम्र बहुत कम थी. वह आज की पत्रकारिता से अलग थी. उस समय के समाचारपत्रों में वैचारिक पत्रकारिता होती थी. अटल जी जितने भी पत्रपत्रिकाओं से जुड़े रहे उन्होंने अपने छोटे वैचारिक लेखों, संपादकीय से भी अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी. उन्हें पढ़ने के बाद मन झंकृत हो जाता है. मेला, राष्ट्रीय एकता, भाषा, हिंदी भाषा पर उनके अद्भुत लेख हैं.

आज के दौर की पत्रकारिता पर डॉ. सौरभ मालवीय का कहना था कि पहले की पत्रकारिता में राष्ट्र सर्वोपरि है. गुलामी से आजादी पाने के बाद कोई भी देश टूटा हुआ ही होता है. भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं थी. पर आज की पत्रकारिता जनोन्मुख है. आज की पत्रकारिता जनजागृति की पत्रकारिता है. अब आप चीजों को छुपा नहीं सकते. आज एक चीज बड़े संकट में है कि पत्रकार पक्षकार बन गया है. और जब पत्रकार पक्षकार बनेगा तो देश और मीडिया के सामने चुनौतियां रहेंगी ही. इसका समाधान जनता और मीडिया को खुद करना होगा. अटल बिहारी वाजपेयी ने वैचारिक प्रतिबद्धता होते हुए भी उसे अपनी पत्रकारिता पर हावी नहीं होने दिया. हर मीडिया घराने में न सही पर हर पत्रकार अपने विंडो टाइम में कहीं न कहीं अपने विचारों को ले ही आता है.

लोहिया, गांधी, नेहरू और अटल का जिक्र करते हुए उन्होंने प्राइम टाइम पत्रकारों पर आरोप लगाया कि वे पक्षकार हो गए हैं. इसीलिए पत्रकारिता को राष्ट्रवाद से जोड़ने की बात इस किताब में की गई. जिन्हें राष्ट्रवाद शब्द से दिक्कत है उन्हें पत्रकार कैसे कह सकते हैं, जबकि सच्चाई यही है कि जब कहीं किसी की बात नहीं सुनी जाती तो वह मीडिया के दरवाजे पर आता है. आपको कहीं न्याय न मिल रहा हो तो आप पत्रकार के पास जाइए वहां न्याय मिलेगा, क्योंकि पत्रकार दर्द से जीता है, लेकिन दूसरे के दर्द को पीता है. पत्रकार की जिंदगी मोमबत्ती के समान है, तिल तिल जलना और दूसरों को रोशनी देना. जहां यह मनोभाव है वहां, राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादिता से विरोध क्यों. बाल गंगाधर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी को देखिए. हमारी पत्रकारिता का पिंड है राष्ट्रवाद.

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