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जानें- कौन हैं अफलातून देसाई, क्या है BHU और बसंत पंचमी के बीच का ये खास रिश्ता?

वसंतोत्सव यहां नामालूम तरीके से नहीं आता. 1916 में वसंत पंचमी को इस विश्वविद्यालय का स्थापना हुई थी. इस तरह वसंतोत्सव यहां का स्थापना दिवस है.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 09 February 2019
जानें- कौन हैं अफलातून देसाई, क्या है BHU और बसंत पंचमी के बीच का ये खास रिश्ता? हिंदू विश्वविद्यालय

अफलातून काशी हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र नेता रहे हैं और समाजवाद, मानवाधिकार और छात्र राजनीति पर उनकी अपनी सोच है. वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की डायरी लिखने वाले उनके निजी सचिव महादेव देसाई के पौत्र हैं. महादेव देसाई को महात्मा गांधी पुत्रवत मानते थे और उनका निधन भी महात्मा की आंखों के सामने 15 अगस्त 1942 को आगा खान पैलस में हुआ था. यह राजमहल नहीं वह अस्थाई जेल थी, जहां वह बापू के साथ बंद थे. बापू से उनकी आत्मीयता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि महादेव देसाई के निधन के बाद उनकी समाधि बापू की इच्छा पर उसी जगह बनाई गई. साल भर बाद जब बा यानी कस्तूरबा का निधन हुआ, तो उनकी समाधि भी महादेव देसाई की समाधि के बगल में बनाई गई.

महादेव देसाई के बेटे और अफलातून के पिता नारायण देसाई का बचपन भी बापू के साथ ही बीता. वह साबरमति आश्रम में पले- बढ़े. वह खुद भी एक जाने-माने गांधीवादी रहे. गुजरात विद्यापीठ के कुलाधिपति के अलावा उन्होंने कई शिक्षण संस्थाओं के खुलवाने में मदद की थी. उन्होंने एक विद्यालय भी स्थापित किया था. इसके अलावा नारायण देसाई साल 2004 में 'गांधी कथा' का गान शुरू करने के लिए भी दुनिया भर में चर्चित हुए. वह विनोबा भावे के 'भूदान आंदोलन' और जयप्रकाश नारायण के 'संपूर्ण क्रांति' से भी जुड़े थे. अफलातून उनके छोटे बेटे हैं. वह अपने नाम के साथ देसाई नहीं लगाते और उन्हें यह पसंद नहीं कि उन्हें उनके परिवार के चलते जाना जाए. बावजूद इसके कि उनके पास बड़ी नौकरी के तमाम मौके थे, वह भी काशी में रहकर समाज उत्थान के लिए समर्पित अपने परिवार की परंपरा का निर्वाह कर रहे. वसंत पंचमी को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस के मौके पर लिखी गई उनकी यह पोस्ट 'यही है वह जगह' नामक उनके ब्लॉग ली गई है.

***

काशी विश्वविद्यालय

यही है वह जगह

जहां नामालूम तरीके से नहीं आता है वसंतोत्सव

हमउमर की तरह आता है

आंखों में आंखे मिलाते हुए

मगर चला जाता है चुपचाप

जैसे बाज़ार से गुज़र जाता है बेरोजगार

एक दुकानदार की तरह

मुस्कराता रह जाता है

फूलों लदा सिंहद्वार

इस बार वसंत आए तो जरा रोकना उसे

मुझे उसे सौंपने हैं

लाल फीते का बढ़ता कारोबार

नीले फीते का नशा

काले फीते का अम्बार

कुछ लोगों के सुभीते के लिए

डाली गई दरार

दरार में फंसी हमारी जीत - हार

किताबों की अनिश्चितकालीन बन्दियां

कलेजे पर कवायद करतीं भारी बूटों की आवाजें

भविष्य के फटे हुए पन्ने

इस बार वसंत आए तो जरा रोकना उसे

बेतरह गिरते पत्तों की तरह

ये सब भी तो उसे देने हैं .

अरे, लो

वसंत आया

ठिठका

चला गया

और पथराव में उलझ गए हमारे हाथ

फिर उनहत्तरवीं बार!

किसने सोचा था

कि हमारे फेंके गये पत्थरों से

देखते - देखते

खड़ी हो जाएगी एक दीवार

और फिर

मंच की तरह चौड़ी .

इस पर खड़े लोग

मुंह फेर कर इधर भी हो सकते हैं

और पीठ फेर कर उधर भी

इस दीवार का ढहना

उतना ही जरूरी है

जितना कि एक बेहद तंग सुरंग से निकलना

जिसमें फंस कर एक जमात

दिन - रात बौनी हो रही है .

किताबों के अंधेरे में

लालीपॉप चूसने में मगन

हमें यह बौनापन

दिखाई नहीं देगा.

मगर एक अविराम चुनौती की तरह

एक पीछा करती हुई पुकार की तरह

हमारी उम्र का स्वर

बार-बार सुनाई यही देगा

कि इस अंधेरे से लड़ो

इस सुरंग से निकलो

इस दीवार को तोड़ो

इस दरार को पाटो.

और इसके लिए

फिलहाल सबसे ज्यादा मुनासिब

यही है वह जगह.

           - राजेन्द्र राजन

वसंतोत्सव यहां नामालूम तरीके से नहीं आता. 1916 में वसंत पंचमी को इस विश्वविद्यालय का स्थापना हुई थी. इस तरह वसंतोत्सव यहां का स्थापना दिवस है. स्थापना दिवस के दिन छात्र-छात्राएं अलग-अलग विषय चुन कर जुलूस की शक्ल में झांकियां निकालते थे. पर अब ऐसा नहीं है. क्यों? साल 1986 की बात है. हुआ यह था कि उस साल स्थापना दिवस की झांकी में सामाजिक विज्ञान संकाय के स्नातक छात्रों के लिए तय आचार्य नरेन्द्रदेव छात्रावास के बच्चों ने स्नातक प्रवेश के लिए परीक्षा को ही झांकी का विषय चुना था.

इस झांकी में एक ट्रक पर विश्वविद्यालय का सिंहद्वार बना. द्वार के दो हिस्से थे. ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों को भगा दिया जा रहा था और शहरी पृष्ठभूमि के कोचिंग, क्विज़ के अभ्यस्त बच्चों का स्वागत किया जा रहा था. यह एक तथ्य है कि सचमुच केन्द्रीय बोर्ड के पाठ्यक्रम पर आधारित प्रवेश परीक्षा के जरिए दाखिले शुरू होने के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के अपने-अपने बोर्ड की परीक्षा में अच्छा करने वाले छात्र भी छंटने लगे और औद्योगिक शहरों के केन्द्रीय बोर्ड के पाठ्यक्रम पढ़े बच्चे बढ़ गये. पर स्थापना दिवस की झांकी पर उस वर्ष बर्बर पुलिस दमन हुआ... अब झांकियां नहीं निकलतीं स्थापना दिवस पर.

चाहे जो कहें सबसे यादगार और ऐतिहासिक स्थापना दिवस तो पहला ही रहा होगा. विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पं मदन मोहन मालवीय ने वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग और अंग्रेज अधिकारियों के अलावा महात्मा गांधी, चंद्रशेखर रमण जैसे महानुभावों को भी बुलाया था. गांधी जी का ऐतिहासिक वक्तव्य हिन्दी में हुआ. महामना को विश्वविद्यालय के लिए दान देने वाले कई राजे-महाराजे आभूषणों से लदेफदे विराजमान थे. गांधी ने उन पर बेबाक टिप्पणी की. उस भाषण को सुन कर विनोबा भावे ने कहा था कि ‘इस आदमी के विचारों में हिमालय की शान्ति और बंगाल की क्रान्ति का समन्वय है’. लोहिया ने भी उस भाषण का आगे चल कर अपनी किताब में जिक्र किया. तब से अब तक न जाने कितनी जगह, कितनी बार, कितनी किताबों में, कितनी भाषाओं में गांधी जी के उस भाषण का जिक्र हुआ है.

महात्मा गांधी एक वर्ष पूर्व ही दक्षिण अफ़्रीका से लौटे थे और भारत की जमीन पर पहला सत्याग्रह एक वर्ष बाद चंपारण में होना था. यह 'मालवीयजी महाराज' (गांधीजी उन्हें यही कहते थे) की दूरदृष्टि ही थी कि भविष्य के नेता को पहचान कर उन्होंने उन्हें बुलाया. गांधीजी के उस भाषण से राजे-महाराजाओं के अलावा डॉ. एनी बेसेण्ट भी नाराज हुई थीं.

महात्मा ने अपने उस भाषण में वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग के आगमन की तैयारी में शहर के चप्पे-चप्पे में खुफ़िया तंत्र के बिछाये गये जाल, विश्वनाथ मन्दिर की गली की गन्दगी आदि का भी उल्लेख किया था. लेकिन उच्च शिक्षण की बाबत उन्होंने जो बात कही थी, वह थी, "मैं आशा करता हूं कि यह विश्वविद्यालय इस बात का प्रबन्ध करेगा कि जो युवक- युवतियां यहां पढ़ने आएं, उन्हें उनकी मातृभाषाओं के जरिए शिक्षा मिले. हमारी भाषा हमारा अपना प्रतिबिम्ब होती है. और अगर आप कहें कि भाषाएं उत्तम विचारों को प्रकट करने में असमर्थ हैं, तो मैं कहूंगा कि जितनी जल्दी इस दुनिया से हमारा अस्तित्व मिट जाए उतना ही अच्छा होगा. क्या यहां एक भी ऐसा आदमी है, जो यह सपना देखता हो कि अंग्रेजी कभी हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा बन सकती है? ('कभी नहीं' की आवाजें) राष्ट्र पर यह विदेशी माध्यम का बोझ किस लिए? एक क्षण के लिए तो सोचिए कि हमारे लड़कों को हर अंग्रेज लड़के के साथ कैसी असमान दौड़ दौड़नी पड़ती है."

राजेंद्र राजन की ऊपर लिखी कविता पहले पहल तो पर्चे में छपी थी. 'किताबों की एक अनिश्चितकालीन बन्दी' के दौरान. पर्चे की सहयोग राशि थी 20 पैसे. मेरे झोले में करीब बत्तीस रुपए सिक्कों में थे, जब उस पर्चे को बेचते हुए मैं गिरफ़्तार हुआ था. चूंकि विश्वविद्यालय के तत्कालीन संकट के लिहाज से यह 'समाचार' था इसलिए समाचार पत्रिका 'माया' ने इसे एक अलग बॉक्स में, सन्दर्भ सहित छापा .'माया' में वैसे कविता नहीं छपती थी. राजन ने यह कविता समता युवजन सभा के अपने साथियों को समर्पित की थी. राजेन्द्र राजन किशन पटनायक के सम्पादकत्व मे छपने वाली 'सामयिक वार्ता' के सम्पादन से लम्बे समय तक जुड़े रहे. एक अखबार के सम्पादकीय विभाग में भी थे. ‘समकालीन भारतीय साहित्य', ‘हंस’ आदि में राजन की कवितांए छपी हैं. छात्र राजनीति से जुड़ी एक जमात ने यह कविता हाथ से बने पर्चे और पोस्टर द्वारा प्रसारित की. उस जमात का छात्र-राजनीति की मुख्यधारा से कैसा नाता होगा, इसका अंदाज लगाया जा सकता है. (यही है वह जगह नामक ब्लॉग से साभार)

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