महान सैनिकों की दिलेरी का दास्तान है पुस्तक 'शूरवीर: परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां'

लेखिका रचना बिष्ट रावत ने अपनी पुस्तक 'शूरवीर: परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां' में युद्धकाल में वीरता के लिए दिए जानेवाले देश के सबसे बड़े सैन्य सम्मान परमवीर चक्र पाने वाले 21 जांबाज फौजियों की शौर्य गाथा का वर्णन किया है.

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जवाहर लाल नेहरू नई दिल्ली, 12 September 2019
महान सैनिकों की दिलेरी का दास्तान है पुस्तक 'शूरवीर: परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां' पुस्तक 'शूरवीर: परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां' का कवर [सौजन्यः प्रभात प्रकाशन]

हम जब सैनिकों के जांबाज़ी की किस्से सुनते हैं तो स्वदेश प्रेम के रंग में रंग जाते हैं. दिल में देशभक्ति की भावना हिलोरें मारने लगती है और रगो में उबाल आ जाता है. रचना बिष्ट रावत की पुस्तक ‘शूरवीर: परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां’ पढ़ने के बाद पाठक उन परमवीर चक्र विजेताओं को करीब से जान पाते हैं, जिनके बारे में एक साथ इतनी जानकारी इकट्ठा कहीं नहीं पा सकते. यह पुस्तक लेखिका रचना बिष्ट रावत की अंग्रेजी में लिखी चर्चित पुस्तक 'द ब्रेव: परमवीर चक्र स्टोरीज' का हिंदी अनुवाद है, जिसे राजेन्द्र सिंह नेगी ने किया है. इस किताब में वीरता के लिए दिए जानेवाले देश के सबसे बड़ा सैन्य सम्मान परमवीर चक्र हासिल करने वाले 21 जांबाज फौजियों की शौर्य गाथा का वर्णन किया गया है.

जिन परमवीर चक्र विजेताओं का इस पुस्तक में वर्णन है, उनमें मेजर सोमनाथ शर्मा, लांस नायक करम सिंह, मेजर रामा राघोबा राणे, नायक जदुनाथ सिंह, मेजर पीरु सिंह शेखावत, कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया, मेजर धन सिंह थापा, सूबेदार जोगिन्दर सिंह, मेजर शैतान सिंह, हवलदार अब्दुल हमीद, लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोर्जी तारापोर, लांस नायक एल्बर्ट एक्का, फ्लाइंग अफसर निर्मल जीत सिंह सेखों, सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, मेजर होशियार सिंह, सूबेदार मेजर (मानद कैप्टन) बाना सिंह, मेजर रामास्वामी परमेस्वरन, कैप्टन मनोज कुमार पाण्डेय, ग्रेनेडियर योगेंदर सिंह यादव, हवलदार संजय कुमार और कैप्टन विक्रम बत्रा तक के नाम शामिल हैं.

अलग-अलग समय में भारत के खिलाफ थोपे गए युद्ध में इन सभी ने भारतीय सेना की ओर से हिस्सा लिया था और अपनी बहादुरी, साहस, शौर्य व हैरतअंगेज कारनामों से दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए. इस किताब में भारत-पाक युद्ध (1947-48), कांगो (1961), भारत-चीन युद्ध (1962), दूसरा कश्मीर युद्ध (1965), भारत-पाक युद्ध (1971), सियाचिन (1987), ऑपरेशन पवन (1987-90) और कारगिल युद्ध (1999) के जांबाजों की वह हैरतअंगेज कहानियां शामिल हैं, जिसने उन्हें युद्ध काल में देश का सर्वोच्च सम्मान 'परमवीर चक्र' विजेता बना दिया.

रचना बिष्ट रावत हैरी ब्रिटेन की फेलो रही हैं. उन्होंने द स्टेट्समैन, डेक्कन हेरॉल्ड, और इंडियन एक्सप्रेस में बतौर पत्रकार काम किया है और उनकी दो नॉन फिक्शन किताबें ‘द ब्रेव: परमवीर च्रक स्टोरीज’ और ‘1965: स्टोरीज फ्रॉम द सेकंद इंडो-पाक वॉर' इससे पहले प्रकाशित हो चुकी हैं. हाल ही में उनकी एक और पुस्तक 'करगिल: अनटोल्ड स्टोरीज फ्रॉम द वॉर' नाम से आई है.

पुस्तक शूरवीर के शोध के सिलसिले में लेखिका देश के अलग-अलग इलाके में गईं और शहीद सैनिकों के परिजनों, उनके साथियों और ग्रामीणों के साथ मुलाकात कर उस दौर में युद्ध के माहौल का गांवों में असर एवं सैनिकों के कारनामों को जाना. इन लोगों ने लेखिका को जो हाल सुनाया, वही इस किताब में ज्यों का त्यों उतारा गया है. रचना बिष्ट खुद लेफ्टिनेंट कर्नल मनोज रावत की पत्नी हैं. इस कारण युद्ध का विवरण बिल्कुल जीवंत लगता है. लेखिका ने तत्कालीन परिस्थितियों एवं युद्ध के कारणों को भी संक्षेप में बताया है.

जब बर्फ से ढकी चोटियों, शून्य से कई डिग्री नीचे के तापमान और पहाड़ की चोटी पर बैठे दुश्मनों से युद्ध लड़ा जाता है, तो सेना को कई मोर्चों पर जंग करनी पड़ती है. ठंड, बर्फबारी, बारिश, कठिन चढ़ाई और ऊपर की ओर से चलाई जा रही दुश्मन की गोलियों से भी लड़ना पड़ता है. उससे भी पहले भूख, थकान, नींद और रास्ते में लगी चोटों के दर्द पर विजय प्राप्त करनी होती है. पीने के लिए पानी की जगह बर्फ को चूसना पड़ता है. बारिश से गीली हुई जुराबों को निचोड़कर पहन लिया जाता है और पीठ पर गोला, बारूद लाद कर कठिन चढ़ाई कई-कई रात चढ़ी जाती है.

लेखिका ने दिल्ली में स्वर्गीय मेजर सोमनाथ के छोटे भाई लेफ्टिनेंट जनरल सुरिंद्रनाथ शर्मा से मिलकर मेजर सोमनाथ के बारे जाना. उनके भाई ने लेखिका को बताया कि कैसे प्लास्टर वाली ज़ख़्मी बांह के बावजूद सौमी कश्मीर मोर्चे पर गए और कम संख्या और सीमित संसाधन के बावजूद शेर की तरह खुले मैदान में दुश्मनों का सामना किया. जब सौमी को ब्रिगेड मुख्यालय से पीछे हटने को कहा गया तो उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया कि, ‘दुश्मन हमसे 50 गज की दूरी पर है. हम संख्या में बहुत कम हैं. हम पर बहुत बुरी तरह से हमला हो रहा है, पर मैं एक कदम भी पीछे नहीं हटूंगा और आखिरी राउंड ख़त्म होने और आखिरी सिपाही के मारे जाने तक लडूंगा.’

इतना ही नहीं यह पुस्तक लेखिका को तवांग में सेला दर्रे के पार ले गयी, जहां सर्दियों में पूरी की पूरी झील जम जाती है. लेखिका बुमला गई, जहां सूबेदार जोगिंदर सिंह ने 1962 की लड़ाई में गोलियां खत्म होने पर संगीनों से मुकाबला किया था; जहां सिपाहियों के पास लड़ने के लिए साहस के अलावा कुछ और नहीं था. लेखिका लद्दाख के सिरिजाप भी गई जहां मेजर धान सिंह थापा ने अपनी खुखरी से दुश्मनों की गर्दनें हलाक की थीं.

मनोज ने मृत सिपाहियों की लाशें लाने के लिए अपने नाम की पेशकश की. उनका कहना था कि सैनिकों के पार्थिव शरीरों को तिरंगे में लपेट कर उनके परिवारों को लौटाया जाना चाहिए. ‘खूनी कुत्तों, मैं तुम्हे अपने देश से निकाल कर ही छोडूंगा’ मनोज ने जोर से चिल्लाकर दुश्मन से वादा किया और फिर पूरा दम लगाकर मरे हुए सिपाही को अपनी ओर खींच लिया. यह एक चमत्कारिक काम था. जिन अफसरों ने इस कारनामों को होते देखा था वे आज भी मेस में व्हिस्की का ग्लास हाथ में लिए मनोज के कमाल के काम को याद करते हैं, जिसने लगभग असंभव काम को संभव बनाया था. गिरती हुई बर्फ के बीच उबड़-खाबड़ पत्थरों पर कूदते हुए, अपने चेहरे पर मौत का वीभत्स नकाब पहने हुए वे आगे बढ़े और आक्रोश और गर्व के साथ दुश्मन पर टूट पड़े.

लेखिका हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में भी गई. कांगड़ा एयरपोर्ट से विक्रम बत्रा भवन तक सफेद खुशबूदार गुलाब पर्यटकों को खुशी से भर देते हैं. इसी बंगले में स्वर्गीय कैप्टन विक्रम बत्रा के बूढ़े मां- बाप रहते हैं. कमरे के बाहर की दीवार पर कैप्टन बत्रा का तैल चित्र टंगा है. जहां उनके पिता पश्मीना शॉल ओढ़े बैठे थे. कर्नल जोशी ने कैप्टन बत्रा से जीत का सिग्नल पूछा, तब विक्रम ने कहा था, 'ये दिल मांगे मोर!' कर्नल जोशी ने जब विक्रम से इसकी वजह पूछी तो विक्रम ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि वे एक कामयाबी पर रुकना नहीं चाहते और कब्ज़े के लिए दूसरे बंकरों की तलाश जारी रखेंगे.

किताब में शामिल सेना के कारनामों को इतनी रोचकता और दिल से लिखा गया है कि ऐसा लगता है जैसे सारी घटना हमारी आंखों के सामने घट रही हो. मुश्किल हालातों पर जीत का जज़्बा, अपनी जान की कुर्बानी देकर देश का झण्डा ऊंचा रखने की ललक और दुश्मनों को खदेड़ने, जीतने के कारनामों को लेखिका ने पूरी शिद्दत, संवेदना एवं मार्मिक तरीके से कहानी के कैनवास पर इस तरह उकेरा है कि वीर जवानों की कहानियां पाठकों के दिलों दिमाग पर छा जाती हैं और पाठक देशभक्ति की भावना से सरोबोर हो उठता है. यह किताब हमें झकझोरती है और उस साहस, हौसले, जोश, जुनून से रूबरू करवाती है जिसके बल पर सैनिक देश की रक्षा के लिए खुद को कुर्बान करने से नहीं कतराता.
***
पुस्तकः शूरवीर
लेखकः रचना बिष्ट रावत
अनुवादः राजेन्द्र सिंह नेगी
विधाः कहानी
प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
मूल्यः 500/ रुपए
पृष्ठ संख्याः 244

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