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उदय प्रकाश- जन्मदिन विशेषः एक स्मृतिपरक आख्यान है 'अंबर में अबाबील'

कवि उदय प्रकाश के कविता संग्रह 'अंबर में अबाबील' का लोकार्पण साहित्य आजतक के मंच पर हुआ था. उनके 68 वें जन्मदिन पर कवि आलोचक डॉ ओम निश्चल द्वारा की गई समीक्षा

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aajtak.in
ओम निश्चल नई दिल्ली, 01 January 2020
उदय प्रकाश- जन्मदिन विशेषः एक स्मृतिपरक आख्यान है 'अंबर में अबाबील' साहित्य आजतक के मंच पर अंबर में अबाबील के लोकार्पण के बाद कविताएं पढ़ते कवि उदय प्रकाश

उदय प्रकाश का पहला संग्रह '80 में आया था. तब से हुए बदलावों पर निगाह डालते हुए अपने नए संग्रह अंबर में अबाबील में वे कहते हैं, ''लगभग चार दशकों की लम्बी अवधि के दौरान बहुत या कहें सब कुछ बदल चुका है. सदी ही नहीं हजार वर्षों की काल रेखा खींचने वाली पूरी सहस्राब्दी बदल चुकी है.. दिक और काल, समय और यथार्थ बदल गया. उसका बाहरी रूप या हुलिया ही नहीं, उसका आन्तरिक आयतन और क्रियात्मक चरित्र बदल गया. समाजों का ताना-बाना बदल गया, मानवीय सम्बन्ध, परम्पराएँ और जीवन-मूल्य बदल गये. और पिछली 20वीं सदी के अन्तिम दशक तक पहुंचते पहुंचते सभ्यता ने ऐसी तकनीकी छलाँग ली कि अतीत की कई जानी-पहचानी दुनिया का नक्शा ही बदल गया. बहुत सारे राष्ट, देश, समुदाय, भाषाएँ विलुप्त हो गयीं. अपना अतीत अन-पहचाना हो गया.''

''एक बौद्धिक मनुष्य के रूप में इन चार दशकों में उदय प्रकाश ने इन बदलावों को शिद्दत से महसूस ही नहीं किया अनेक से वे एक मानवीय पदार्थ के रूप में गुजरे हैं. उसकी सूक्ष्म खरोंचें भी सही हैं, सोन नदी के रेत माफिया चरित्रों को भी देखा है. बौद्धिकों के पतनोन्मुमख चरित्र की वेदना को भी गहरे महसूस किया है. अंबर में अबाबील इस वेदना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है.
 
'अंबर में अबाबील' संग्रह के पीछे अबाबीलों का भी एक स्मृतिपरक आख्यान कवि के मन में कहीं दुबका रहा है. बचपन में देखी गयी अबाबीलें, आकाश मे मंडराती हुई अबाबीलें, अपने अलग से घोंसले में रहने वाली अबाबीलें जो अपने ही घरौंदे की एक नवेली वास्तुकार हुआ करती थीं, कवि की स्मृति में घर बनाती हैं. पर वे जैसे गांव में लौटती हैं एलियन की तरह, अपने-अपने अजनबी की तरह. विंध्य की पहाड़ियों के निकट चार दशकों बाद अपने घर पहुंचते हुए कवि को भी जैसे अपने किसी एलियन होने का-सा आभास होता है. कितना दारुण है अपने ही इलाके में अपनी पहचान पर किसी और की पहचान को निर्मित होते देखना. माफियाओं के फैलते जाल और सत्तात के साथ उसके गठजोड़ को बनते व फूलते-फलते देखना जहां किसी की पुश्तैनी मिल्कियत कोई मायने नहीं रखती. अपने ही घर-गांव में किसी और ग्रह के अप्रवासी परिंदे-सा अहसास होना कवि को हिला देता है. जंगल की बहुतेरी प्राकृतिक वनस्पतियों के बीच कवि का गांव आज सोन नदी के रेत माफिया की गिरफ्त में है. सोन नदी इस रेत खनन से जैसे मर रही है. कवि इसी मरती हुई सभ्यता और संस्कृति का शोकगीत लिखने के लिए बाध्य है. कवि की कल्पना में अबाबीलों द्वारा बनाए गए अनूठे घोंसले की तरह ही एक अपना घर बनाने की इच्छा भी रही है. कहीं न कहीं अबाबीलों के जरिए बचपन, गांव और उसकी आंतरिक गृह सज्जा ने कवि को कुछ नास्टैल्जिक होने की हद तक आक्रांत भी किया है. ये समस्त कविताएं ऐसी ही वेदना और आंतरिकता का प्रतिफल हैं. वह विस्थापित अबाबीलों के रूपक में विस्थापित तिब्बत, फिलिस्तीन और विस्थापित कश्मीर की वेदना को महसूस करता है तथा चाहता है कि इन विस्थापित सभ्यताओं को कहीं तो सुकून की ठौर मिले, जहां वे अपना घोंसला बना सकें और निजता व मानवीय स्वकतंत्रता के साथ रह सकें.
 
उदय प्रकाश एक जीनियस पोएट हैं. इस धरती पर शायद जीनियस के लिए जगह नहीं है. इसलिए उसके विरुद्ध सारी दुरभिसंधियां रची जाती हैं कि वह एक मनुष्य के तौर पर परास्त हो जाए. कैलाश वाजपेयी ने लिखा ही है- परास्त बुद्धिजीवी का गीत. मुझे किसी भी व्यवस्था में डाल दो...जी जाएंगे- ऐसी ही समझौतापरस्त जिंदगी होती जा रही है बुद्धिजीवियों की. अपने अपार लेखकीय सामर्थ्य के बावजूद वे हाशिए पर फेंके जाते रहे. वे याद करते हैं कि जैसे अबाबीलों को कोई घर नसीब नहीं होता, उनकी कविताओं को कागज़ पर जगह नहीं मिली. उन्हीं के शब्दों में, ''इस संग्रह की कविताएँ उन अबाबीलों की तरह हैं, जो तरह-तरह की माफियाओं की विकास परियोजनाओं में जलती और नष्ट होती वह धरती, जो हर रोज़ ‘अन्यों और 'परायों'  की लाशों से पटती जा रही है, उस धरती से दूर और ऊपर, आकाश में अपना ठिकाना खोज रही है. इन कविताओं की उड़ान में अब थकान है. पंख टूटते और हवाओं में गिर कर किसी भी दिशा की ओर तिर रहे हैं. दिशाहीन. इस संग्रह की कविताएँ साइबरस्पेस में अपना घर और अपने घोंसले की खोज में उड़ान भरती विस्थापित कविताएँ हैं. ब्लाग, फेसबुक, वर्चुअल नोट्स, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप के आभासी अम्बर में अपने होने को प्रमाणित करती कविताएँ.'' हालांकि यह बोध 'रात में हारमोनियम' से ही प्रबल होता दिखता है,  'एक भाषा हुआ करती है' में परवान चढ़ता है  और 'अंबर में अबाबील' तक आकर एक नैराश्य में बदल जाता है. जाने अजाने उदय प्रकाश की कविताओं के तल में यह एक प्रवृत्ति की तरह मौजूद रही है.
 
अबाबील केवल अबाबील ही नहीं, खुद कवि का भी रूपक है. अबाबील की नियति को कवि अपनी नियति से सहबद्ध कर देखता है. उसे लगता है यह लिंचिंग शिकारी समय अबाबीलों के लिए बहुत बुरा समय है. यह अबाबीलों के विस्थापन का समय है. अच्छे और सुघर मूल्यों के विस्थापन का समय है. आपातकाल बेशक 75 में आया था, पर वह कवि के लेखे आज भी है, दो शताब्दियों के बीच पसरा हुआ आपातकाल, जिसमें वह आज भी रह रहा है, रच रहा है. उसकी कविताओं का घर जैसे अबाबीलों के घोंसलों की तरह आज तक ठीक से नहीं बन सका. उदय प्रकाश की अपनी दुश्चिंताएं भी हैं, जो देश की तमाम दुश्चिंताओं की तरह ही कवि के भीतर जड़ीभूत हैं. यह कवि की 'छोटी सी निज जिंदगी में जी ली हैं जिंदगियां अनगिन' का भी जैसे पर्याय हैं.
 
विष्णु की खोज में गरुड़, सिद्धार्थ! कहीं और चले जाओ,  अरुन्धति, किसी पथ्य या दवा जैसी हँसी, क एवं तिब्बत जैसे खंडों में विभाजित इस संग्रह  में इस सदी की सताई हुई अनुगूंजें व्याप्त हैं. संग्रह के शुरु में ही जलावतनी जैसी कविता से साक्षात्कार होता है, जहां चकाचक बल्ब से फैली रोशनी के बावजूद 'कितना अंधेरा है यहां' कहने पर शहर से बेदखली हो जाती है;  सचमुच, यह कितना दारुण समय है जहां अहसमति के लिए कोई जगह नहीं बची.
 
दूसरी तरफ यह एक ऐसे बेफिक्र कवि का भी संग्रह है जो औलिया से महज लोरियां सुनने की चाहत रखता है-
 
जहाँ चुप रहना था, मैं बोला जहाँ ज़रूरी था बोलना, मैं चुप रहा आया
जब जलते हुए पेड़ से उड़ रहे थे सारे परिन्दे, मैं उसी डाल पर बैठा रहा
जब सब जा रहे थे बाज़ार
खोल रहे थे अपनी-अपनी दुकानें
मैं अपने चूल्हे में उसी पुरानी कड़ाही में पका रहा था कुम्हड़ा (दुआ)
असहमति और अवज्ञा कभी राजदंड हुआ करती थी पर आज के युग में भी जब देश में लोकतंत्र है, कितने बौद्धिकों की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गयी या उनकी जुबानें बंद कर दी गयीं कि वे राजसत्ता का विरोध करते थे, वे सत्ता से सवाल करते थे. ऐसी असहमतियों के लिए लोगों को कितनी कीमत चुकानी पड़ती है, इसका साक्ष्य है यह कविता:
उन्होंने कहा हम न्याय करेंगे
हम न्याय के लिए जाँच करेंगे
मैं जानता था
वे क्या करेंगे
तो मैं हँसा
हँसना ऐसी अँधेरी रात में
अपराध है
मैं गिरफ़्तार कर लिया गया (न्याय)
 
कुछ छोटी छोटी कविताओं की श्रृंखला 'बेटी' शीर्षक से यहां है जिसमें कवि अपने हालात का तज्किरा इन शब्दों में करता है-
किसी कमरे से नहीं आती
न छत न सीढ़ियों से
किसी भी कोयल की आवाज़
**
यह जीवन है
शोर चीख़ गूँगेपन से भरा...बहरा
आँख कहाँ है
खोये हुए चश्मे के पास हो शायद
शायद...
 
सप्तक में से एक सबसे महीन स्वर
अनुपस्थित है
 
इस संग्रह की कुछ और कविताएं भी बहुत अच्छी' और मार्मिक हैं. उदाहरणत: नक्षत्र, दुख और एक ठगे गए मृतक का बयान. पर बुद्ध को आधार बना कर लिखी सिद्धार्थ, कहीं और चले जाओ अलग से उल्लेखनीय है.
 
सिद्धार्थ,
मत जाना इस बार कुशीनगर
मत जाना सारनाथ
वहाँ राख हो चुकी है प्राकृत
पालि मिटा दी गयी है
सुनो,
श्रावस्ती से होकर कहीं और चले जाओ
अब जो भाषा वहाँ चल रही है
उस भाषा में जितनी हिंसा और आग है
नहीं बचेगा उसमें
यह तुम्हारा जर्जर बूढ़ा शरीर (सिद्धार्थ, कहीं और चले जाओ, अंबर में अबाबील)
 
कवि का अपना कार्यभार होता है. कवि किसके लिए लिखता है? क्या  सत्ता के लिए, क्या खुद के लिए? क्या इस तंत्र के लिए? क्या पीड़ित मनुष्यता के लिए? हां वह जानता है कि उसका लेखन सत्ता-व्यवस्था के विरोध में है लेकिन उसकी कविताएं व्यवस्था के लिए नहीं हैं, वे मनुष्यों द्वारा पढ़े जाने के लिए हैं. यह कविता कवि की इसी आशा का प्रतिफलन है --
जहाँ भी कोई गिरा
ज़रा भी डगमगाया
वह चाहता था कि कानून उस पर कार्रवाई करे
 
वह व्यवस्था का पक्षधर था
मनुष्य के गिरने के विरुद्ध
 
व्यक्ति की हर कमज़ोरी के खि़लाफ
वह कानून का
तरफदार था
लेकिन वह चाहता था
उसकी कविताएँ
व्यवस्था द्वारा नहीं
मनुष्य द्वारा पढ़ी जायें।(कवि, अंबर में अबाबील)
वे और नहीं होंगे जो मारे जाएंगे- कभी रघुवीर सहाय ने यह बात कही थी जो आगे के कवियों के लिए एक नसीहत भी बनती गयी. राजेश जोशी ने इसे ही आधार बनाकर एक बहुत ही पापुलर कविता लिखी थी:  मारे जाएंगे. उदयप्रकाश इसी नक्शे कदम पर चलते हुए आज के भयावह परिदृश्य का तर्जुमा करते हैं --
जो माँगेगा दुआ
दिया जायेगा उसे शाप
सबसे मीठे शब्दों को मिलेंगी
सबसे असभ्य गालियाँ
जो करना चाहेगा प्यार
दी जायेंगी उसे नींद की गोलियाँ
जो बोलेगा सच
अफवाहों से घेर दिया जायेगा उसे
जो होगा सबसे कमज़ोर और वध्य
उसे बना दिया जायेगा सन्दिग्ध और डरावना (सत्ता, अंबर में अबाबील)
 
कविता क्या है, इसे हर कवि अपनी तरह परिभाषित करता है. इसका खाका हर कवि के मन में होता है. होना चाहिए. तथापि, कविता के सारे लक्षण अंतत: किसी कवि के लिए अधूरे हैं क्योंकि हर आने वाला कवि अपना काव्यशास्त्र लेकर पैदा होता है. वह इस अर्थ में विलक्षण होता है कि वह किसी की कार्बन कापी नहीं बनना चाहता. इसलिए शास्त्र कविता को लेकर जो भी परिभाषाएं गढें, कवियों ने कविता के लिए हर बार नए अर्थ खोजे हैं, नए प्रयोजन खोजे हैं, अभीष्ट सिद्धियां खोजी हैं. उदय प्रकाश भी कविता को अपने तरीके से ग्रहण करते हैं-
 
''हर अच्छी कविता चिड़ियों के रैनबसेरे की मूल भाषा में होती है. हवा उसका अनुवाद कायनात के लिए करती है/ कुदरत उस रोज़नामचे को बाँचता है/ और यह कि कविता का शब्दकोश किसी भी बैंक के अकाउंट में नहीं होता इसीलिए नकदी की भाषा से निर्वासित/एक कवि अकेले में कहता है/ ‘जिस रोज़ से एटीएम की मशीनें/अपने जबड़ों से नगदी नहीं, कविताएँ उगलने लगेंगी/ उस रोज़ से चिड़ियों, धरती और कविता का/ नया इतिहास लिखा जायेगा.’' (कविता का बजट सत्र)।
 
'अरुंधति' नक्षत्र पर एक कविता सीरीज के बहाने उदयप्रकाश उसके लगातार अदृश्य होते चले जाने के प्रति विषादग्रस्त दिखते हैं. पूरी कविता श्रृंखला जैसे एक नक्षत्र के दुर्लक्ष्य होने के परिप्रेक्ष्य में मूल्यों के दुर्लक्ष्य होते जाने का विषाद हो. इस कविता की आखिरी कड़ी का आखिरी हिस्सा पढ़ते हुए कवि के सुदूर आशयों को पहचाना जा सकता है-
ठीक इन्हीं पलों में आकाश के सुदूर उत्तर-पूरब से अरुन्धति की
टिमटिमाती मद्धिम अकेली रोशनी
राजधानी में किसी निर्वासित कवि को अन्तरिक्ष के परदे पर
कविता लिखते देख रही थी
उसी राजधानी में जहाँ कम्पनियाँ मुनाफे, अख़बार झूठ, बैंकें सूद,
लुटेरे अँधेरा
और तमाम चैनल अफीम और विज्ञापन बना रहे थे
जहाँ सरकार लगातार बन्दूकें बना रही थी
यह वह पल था जब संसार की सभी अनगिन शताब्दियों के मुहानों पर
किसी पहाड़ की तलहटी पर बैठे सारे प्राचीन गड़रिये
पृथ्वी और भेड़ों के लिए विलुप्त भाषाओं में प्रार्थनाएँ कर रहे थे
और अरुन्धति किसी कठफोड़वा की मदद से उन्हें यहाँ-वहाँ बिखरे
पत्थरों पर अज्ञात कूट लिपि में लिख रही थी
लोकतंत्र के बाहर छूट गये उस जंगल में
यहाँ-वहाँ बिखरे तमाम पत्थर बुद्ध के असंख्य सिर बना रहे थे
जिनमें से कुछ में कभी-कभी आश्चर्य और उम्मीद बनाती हुई
अपने आप दाढ़ियाँ और मुस्कानें आ जाती थी (अरुंधति-5, अंबर में अबाबील)

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