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जन्मदिन विशेषः मंजूर एहतेशाम; वक़्त की उधेड़बुन में रोशनी की किरचें पकड़ता 'मदरसा' उपन्यास-अंश

मंजूर एहतेशाम हमारे समय के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार हैं. उनका जन्म 3 अप्रैल, 1948 को भोपाल में हुआ था. आज उन के जन्मदिन पर साहित्य आजतक आपको उनकी औपन्यासिक कृति 'मदरसा' का अंश  पढ़ा रहा.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 03 April 2019
जन्मदिन विशेषः मंजूर एहतेशाम; वक़्त की उधेड़बुन में रोशनी की किरचें पकड़ता 'मदरसा' उपन्यास-अंश मंजूर एहतेशाम के उपन्यास 'मदरसा' का कवर [ सौजन्यः राजकमल प्रकाशन ]

मंजूर एहतेशाम हमारे समय के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार हैं. उनका जन्म 3 अप्रैल, 1948 को भोपाल में हुआ था. घरवाले चाहते थे कि वे इंजीनियर बनें, पर उन्हें बनना था लेखक. सो इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी छूट गई. पहले दवा बेचने का काम किया और फिर फ़र्नीचर बेचने लगे. बाद में इंटीरियर डेकोर का भी काम करने लगे. पर लेखन हर दौर में जारी रहा.

पहली कहानी 'रमज़ान में मौत' साल 1973 में छपी, तो पहला उपन्यास 'कुछ दिन और' साल 1976 में प्रकाशित हुआ. लेखन के चलते वह वागीश्वरी पुरस्कार, पहल सम्मान और पद्मश्री से अलंकृत हो चुके हैं. उनकी खासियत यह है कि उनकी रचनाएं किसी चमत्कार के लिए व्यग्र नहीं दिखतीं, बल्कि वे अनेक अन्तर्विरोधों और त्रासदियों के बावजूद 'चमत्कार की तरह बचे जीवन' का आख्यान रचती हैं. मंजूर एहतेशाम मध्यवर्गीय भारतीय समाज के द्वन्द्वात्मक यथार्थ को उल्लेखनीय शिल्प में अभिव्यक्त करने वाले कथाकार हैं.

परिचित यथार्थ के अदेखे कोनों-अंतरों को अपनी रचनाशीलता से अदूभुत कहानी में बदल देते हैं. मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज मंजूर एहतेशाम की कहानियों में अपनी समूची चिंता, चेतना और प्रमाणिकता के साथ प्रकट होता रहा है. स्थानीयता उनके कथानक का स्वभाव है और व्यापक मनुष्यता उनका निष्कर्ष है. यही वजह है कि ‘दास्तान-ए-लापता’, 'कुछ दिन और', 'सूखा बरगद', 'बशारत मंजिल', 'पहर ढलते' जैसे चर्चित उपन्यासों और कथा संकलन 'तसबीह', 'तमाशा तथा अन्य कहानियां' से वह हमारे समाज का बेहतर चित्र खींचते हैं.

आज मंज़ूर एहतेशाम के जन्मदिन पर साहित्य आजतक उनकी औपन्यासिक कृति 'मदरसा' का अंश आपको पढ़ा रहा. 'मदरसा' समकालीन हिंदी उपन्यास के लय-ताल रहित परिदृश्य में एक सुखद हस्तक्षेप है. यह उपन्यास यह स्थापित करता है कि सिर्फ कहानी बता देना और प्रचलित विमर्शों की जुमलेबाजी का बघार डालते हुए 'पोलिटिकली करेक्ट' मोर्चे पर सीना तान कर खड़े हो जाना ही अच्छे उपन्यास की गारंटी नहीं है. हर उपन्यास को अपनी भाषा और संरचना में अपनी ही एक लय का आविष्कार करना पड़ता है, और यही वह चीज है जो उसे दशकों और सदियों तक पढ़नेवाले के दिलो-दिमाग़ का हिस्सा बनाती है.

उपन्यास 'मदरसा' सफलतापूर्वक इस जिम्मेदारी को अंजाम देता है. देश और काल के विभिन्न चरणों में आवाजाही करता हुआ यह उपन्यास स्मृतियों की पगडंडियों पर जैसे चहलकदमी करते हुए, अपने पात्रों के भीतरी और बाहरी बदलावों की प्रक्रिया से गुजरता है; उन सवालों से रूबरू होता है जो समय हमारे भीतर रोपता रहता है और उन यंत्रणाओं से भी जिनकी जिम्मेदारी तय करना कभी आसान नहीं होता.

किसी भी उम्दा रचना को लेकर यह कहना कभी संभव नहीं होता कि इसका उद्देश्य अमुक है, अथवा इससे हमें अमुक संदेश प्राप्त होता है.वह हमारे ही जीवन का एक ज्यादा उजले प्रकाश में बुना गया चित्र होता है जिससे हम जाने कितनी दिशाओं से रोशनी पाते हैं, और एक ज्यादा खुली और रौशन जगह में अपना नया ठिकाना बनाते हैं. ठिकानों और वक़्त की उधेड़बुन में रोशनी की किरचें पकड़ता हुआ यह उपन्यास पाठकों को निश्चय ही अनुभूति का एक नया धरातल देगा.

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एक बदलाव, एक गंभीर विमर्श

पिंकी ने एक दिन यह हैरान करनेवाली सूचना सुनाई थी कि उसकी शादी तो कहीं पहले से तय थी, और वह घड़ी आ पहुँची थी, जिसका डर था: होनेवाला दूल्हा अमरीका में रहता था, और जल्द ही शादी के लिए वहाँ से आनेवाला था.

वह ख़ुद जो हाथ-पैरों पर था, और उन हालात में गृहस्थी की कल्पना भी नहीं कर सकता था, इस सन्दर्भ में पिंकी की क्या मदद कर सकता था, उसने निराशा, कड़वाहट और व्यंग्य से सवाल किया था.

कुछ भी हो जाए, पिंकी ने दृढ़ निश्चय से कहा था, जीते-जी वह किसी मर्द की होगी, तो साबिर की! दुनिया की कोई ताक़त उसके फ़ैसले को बदल नहीं सकती, और आसमानी भी, चाहे तो कोशिश करके देख ले!

वह साबिर की हमेशा की ख़ुशी थी! वह डर गया था.इस कल्पना से कि इस बार साम्प्रदायिक दंगों का कारण वे दोनों बनेंगे! यह उसे गवारा नहीं था. किसी क़ीमत पर नहीं. अगर उसे पिंकी के रिश्ते की ख़बर होती तो आपसी अपनापे को बढ़ने ही न देता! न इस उलझावे में आगे वह उससे सहयोग की उम्मीद रखता.

क़तई नहीं!

- पहले से रिश्ता न होता, तो क्या कम्यूनल राइट्स का ख़तरा न पैदा होता?

पिंकी के इस असुविधाजनक प्रश्न के लिए उसके पास कोई उत्तर नहीं था. वह सोचता रहा था, क्योंकि अकेले रहकर भी, ऐसा सुविधापूर्वक, किया जा सकता था; न दंगे का ख़तरा, न फ़साद का डर!

उसे यह सोच मूर्खतापूर्ण लगती थी कि शादी करने या एक-साथ रह सकने के लिए, औरत और मर्द का धर्म एक ही होना चाहिए. क्या कोई सितारवादक, किसी वॉयलिन बजानेवाले, या ऐसे व्यक्ति के साथ नहीं रह सकता, जिसकी संगीत में रुचि न हो? यह कल्पनाशीलता की कमी, अर्थात् मूर्खता थी.

एक असलियत का, विभिन्न भूगौलिक क्षेत्रों, और अलग-अलग काल-खंडों से जुड़कर, एक से अधिक नाम हो गया, जो धर्म या मज़हब के नाम से जाना जाता है. आवरण के अलावा कुछ भी तो भिन्न नहीं, सबकी जड़ो-बुनियाद में.

यह फ़र्क़ बनाया है, अलग-अलग क्षेत्रों के राजनीतिक इतिहास की आपसी टकराहट ने, जो वास्तव में सतही है. उसी की एक छद्म-उत्पत्ति, संस्कृति है!

पुरानी यादों का गौरव-गान!

यह धर्म नहीं, सीधा राजनीति से जुड़ता है!

इनसानों को जोड़ता नहीं, बाँटता है।

दो अलग-अलग मज़हबों को माननेवाले, अपने-अपने धर्म के साथ, पति-पत्नी क्यों नहीं हो सकते?

क्योंकि बड़ी टुकड़ियों में बँटा इनसान, शासन करनेवालों का काम आसान कर देता है!

कहा जाएगा, लड़कों के लिए ऐसी बहादुरी का सोच आसान है, लेकिन इस सन्दर्भ में बहादुरी और कायरता जैसे विशेषण का प्रयोग ही बेईमानी है.

अगर अभी तक इस खुले सोच का रवैया नहीं अपनाया जा सका, तो अब अपनाया जाना चाहिए था.

इनसान की अनेक समस्याओं का समाधान शायद इसी में हो.

एक तरफ़ उसकी ख्श्वाहिश थी, दूसरी ओर, उसके विरुद्ध, ख़ुद उसका आज तक का इतिहास-पाठ.

अलीगढ़ मामू टॉयनबी का नाम बहुत मुहब्बत से लेते हैं, और टॉयनबी का काम उसे उस मुहब्बत का पात्र भी बनाता है; ख़ुद टॉयनबी की दृष्टि में धर्मों के टकराव का इतिहास लगभग इतिहास जितना ही पुराना था.

अपनी ख्श्वाहिश की ख़ातिर, वह उस प्रकार के किसी टकराव का कारण नहीं बनना चाहता था. (ख़ासकर, सन् 1947 को याद करते हुए, जिसके नतीजे उसे यतीमी का ताज मिला था, या अभी मुक्त हुए बँगलादेश को देखते, जिसके कारण अनेक अप्रिय तमाशे देखने को मिले थे!)

उसकी ख़ुद की, मज़हब की अवधारणा में, वह लाख कच्ची सही, और दुनिया उसे जिस अर्थ में लेती थी, बड़ा भेद था. अफ़सोस, उस भेद की व्याख्या कर सकने जितना ज्ञान और योग्यता भी उसमें नहीं थे.

आगे ख़तरे पेश आए थे, और काश! उसने उनका सामना उसी ईमानदारी से किया होता, जिससे अकेले में, अमूर्त तथ्यों का विश्लेषण करता रहा था.

व्यवहार की ईमानदारी के लिए नेक-दिली और अच्छा सोच काफ़ी नहीं होता, यह कड़वा सच, उसे किस्तों में, अपने ही जीवन के सन्दर्भ में जानना और समझना था.

पिंकी ने दर्शन और सुषमा से कुछ कहा होगा, जिसके नतीजे उनके साबिर के प्रति व्यवहार में साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकनेवाला अन्तर आया था.

कुछ समय बाद पिंकी के घर से निकलने पर पाबन्दी लगा दी गई थी और दर्शन उसे ‘पिंकी के हमदर्द-दवाखाने साहब’, ‘आस्तीन के साँप’ और ‘भेड़ की खाल में भेड़िए’ जैसी उपमाओं से खुलकर नवाज़ने लगा था.

‘वीर जी!’ ‘वीर जी!’ कहते इसकी ज़बान सूख गई, पर दर्शन पर कोई असर नहीं हुआ था. इनसानियत (और यतीमी!) जहाँ उसे पिंकी से जोड़ते थे, वहीं मज़हब उन्हें एक-दूसरे से काटता था.

और इनसानियत (शायरी की तरह!) एक कोरा भावुक कल्पनावाद था, जिसका न तो कोई अपना घर था, न मुल्क, झंडा और फ़ौज-फ़ाटा, जबकि मज़हब घर-घर में मोर्चाबन्द था. न तो घोषणा करके आप इनसानियत के पैरो ठहराए जा सकते थे, न अपने मज़हब के प्रति उदासीनता, अन्य धर्मों के ‘ईमानदारों’ की नज़र में आपको उन जैसा कर सकती थी.

यह बाद की समस्या थी.

उस पल की ज़मीनी असलियत यह थी कि वह चाहता तो भी किसी जोखिम में पड़ने की हैसियत में नहीं था. न वह दर्शन-सुषमा को परेशानी में डालना चाहता था.

पिंकी के शादी करने और साथ रहने के प्रस्ताव का, वह सख्ती से खंडन और विरोध कर चुका था.

दर्शन सिंह बेदी एक भोले और ईमानदार व्यक्ति थे, जिनके स्वभाव में एक आश्चर्यजनक इकहरापन था; न वह ख़ुद किसी से दोग़ला व्यवहार कर सकते थे, न किसी और के द्वारा उन्हें ऐसा स्वीकार्य था.

इसी कारण, साबिर उन्हें किसी प्रकार विश्वास नहीं दिला पाया था कि उसे पिंकी से इश्क़ नहीं, उस प्रकार का लगाव था जिसे हमदर्दी कहा जाना ज़्यादा उचित था.

उन्होंने अम्मा से शिकायत की थी जिसे बुजु़र्गाना सहानुभूति से सुनने के बाद बात साफ़ करने की मंशा से, अम्मा ने साबिर को तलब किया था. उस पल, शायद ज़िन्दगी में पहली बार उसने ऐसे स्वर में बात की थी, जिससे वयस्कता और मानसिक परिपक्वता की बू-बास आती थी.

- अगर मुझे इस लड़की से शादी करनी होगी, उसने कहा था- तो न तो मुझे दर्शन सिंह बेदी, जिन्हें बड़ा भाई समझकर मैं वीर जी कहता रहा हूँ, रोक पाएँगे और न कोई और! इनसे कहिए, या तो उस पर यक़ीन कर लें जो मैं कह चुका हूँ, या फिर जो इनके बस में हो, वह कर लें!

बाद में दर्शन सिंह याद करते हुए कहते थे- क्या डायलॉग मारा था, मियाँ तूने! यह फ़िल्मवाले लगते कहाँ हैं! क्या ज़ंजीर, क्या दीवार, क्या बच्चन, और सलीम-जावेद! वह था ओरिजिनल ऐंग्री यंगमेन! ठीक है, मियाँ, बड़े बच्चों की देखभाल का फ़र्ज़ निभाने की कोशिश करते हैं, कोई दुश्मनी तो नहीं. हमने भी वही करना चाहा. पिंकी हमारी तो है, तुम्हारी भी बनी रहे; रब से दुआ करते हैं. मगर मियाँ, ख़याल रहे! बहुत नाज़ों से पली है पिंकी, उसकी नाज़बर्दारी में कोताही न हो. कोई चीज़, हद की हमारी मुहब्बत तक, बिना मर्ज़ी के बाँध नहीं पाई उसे! अपनी शर्तों पर जीने की हिम्मत है उसमें.

यह बाद की बात है, मामला जब शान्त हो चुका था, और दर्शन सिंह बेदी दोबारा साबिर के लिए वीर जी बन चुके थे; जो कुछ साल पहले सपरिवार अमरीका में सेटल हो चुके थे, और जिनसे फ़ोन पर जब-तब बात होती रहती थी.

जिन्हें नहीं मालूम था, साबिर और मरियम, अलग-अलग रह रहे थे.

उसे अन्दाज़ा था, उस दिन अम्मा को उसकी बात और कहने का अन्दाज़ दोनों पसन्द आए थे.

दर्शन को रुखसत करने के बाद, उसे शाबाशी देती नज़रों से देखते, उन्होंने कहा था- माशाअल्लाह, तुम बड़े हो गए! बहरहाल, एहतियात ज़रूरी है. अजनबियों में क्यों इतना घुलो-मिलो, कि ग़लतफ़हमी की नौबत आए. अच्छी लड़की है पिंकी, हमें ख़ुद पसन्द है. दर्शन, सुषमा या उनके दिल्लीवाले भाई भी बुरे नहीं. तुम्हारे अब्बा दिल्लीवाले भाई को खुशख़बरी दे चुके हैं, कि अल्लाह मियाँ ने जन्नत में नेक गै़र-मुस्लिमों का कोटा भी रखा है. ऐसे लोग जो नाम नहीं किरदार के मुसलमान हों! यानी वह फ़िक्र न करें. उनकी मुहब्बत का अन्दाज़ तुम जानते हो, लेकिन लोग अलग-अलग बनाए गए हैं. इसमें ख़ुद उनका कोई हाथ नहीं. दुनियादारी हो या दीनदारी, अपने-अपने क़ानून के बिना मुमकिन नहीं. इश्क़ भी ऐसा हो जो परवान चढ़ सके, यह लैला-मजनू, शीरीं-फ़रहाद के ज़माने नहीं.

अम्मा एक दुनिया देखी औरत का सच कह रही थीं, एक उम्र में जो ख़ुद उन्होंने किया, उसे भुलाकर, उस अनुभव से जो जीवन में सीख ली थी, उसे परिभाषित करते हुए.

आपबीती को पीछे ठेल, वह आनेवाली दुनिया और ज़िन्दगी में अधिक दिलचस्पी रखती थीं.

(ऐसा क्यों था? क्या मरनेवाले के साथ, उसके संग बँटी ज़िन्दगी भी समाप्त हो जाती है? यह उसी से मिलता-जुलता था, जो अभी, कुछ समय पूर्व, अलीगढ़ मामू ने कहा था: ‘हर चीज़ की परछाईं होती है जो उसी के साथ दफ़न हो जाती है!’ अलीगढ़ मामू ने किसी सच्चाई पर पर्दा डालने की मंशा से कुछ नहीं कहा था, वह उसे एक दोस्ताना मशवरा दे रहे थे. वह चाहते थे, साबिर अपना अस्तित्व किसी परछाईं से जोड़ने के बजाय, ज़िन्दगी का महत्त्व समझे. वह एक ज़िन्दा वजूद है, नहीं तो कभी का दफ़न किया जा चुका होता! अम्मा असलियत और परछाईं को इस प्रकार गड़बड़ा देती थीं, कि न तो वह असलियत समझ पाता था, न कोई सवाल कर पाता था. ऐसा बहुत बाद तक रहा था!)

फिर उड़ती-सी ख़बर कानों में पड़ी थी, कि पिंकी बम्बई छोड़कर चली गई.

ख़ुद गई अथवा ले जाई गई, और कहाँ, साफ़ नहीं हुआ था.

यह पता चला था कि दर्शन के घर दिल्ली और अन्य जगहों से आए रिश्तेदारों- बड़े भाई, बहन-बहनोई का पड़ाव रहा था, और उन्हीं के साथ पिंकी भी घर से ग़ायब हो गई थी.

कुछ क्षण कड़वी निराशा का अनुभव हुआ था, जिसमें उसने सोचा था कि बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय, वह चाहती तो कोई सम्पर्क का सूत्र खोज सकती थी! कुछ नहीं तो कुछ अलविदाई वाक्य बोलने, या उस जगह का नाम बताने, जहाँ वह जा/ले जाई जा रही थी.

या और कुछ कहने को!

फिर यह सोचकर हँसी आई थी कि उस स्थिति में पिंकी को भी वह, अलका की ही तरह, बुजुर्गों की बात मानने के मशवरे और अपना घर बसाने की ताक़ीद के सिवा क्या कर पाता!

अन्ततः इसने समाज की जहालत, मज़हबों के बीच बढ़ती दूरी-दुश्मनी और बड़ों का छोटों को अपने फ़ैसले करने देने के बजाय, हर मामले में टाँग अड़ाने, और अपनी नाक कटने के भय की प्रवृत्ति को, अकेले में, और फिर संजय के सामने कोसा-पीटा था, और दिल में ‘औरत और बेवफ़ाई- एक सिक्के के दो रुख़!’ तय करने के बाद, ‘वह सुबह कभी तो आएगी!’ (साहिर लुधियानवी!) गुनगुनाता, उन क़ीमती कपड़ों को पहनता, खुशबुओं को लगाता, जो पिंकी उस बीच न्योछावर करती रही थी, जीवन के उस अध्याय को समाप्त मानकर, दोबारा रैनबो आर्ट्स की व्यस्तताओं में पूरे जोश से लग गया था: दिन-ब-दिन फैलकर बड़े होते, दानवाकार महानगर की अधिकतर नई और कुछ पुरानी बिल्डिंगों को ठेके पर पुतवाता, उनका नया रंग-रोगन करवाता.

फिर जब उसे सचमुच होश आया था, तो वह भोपाल पहुँच चुका था! मरियम के साथ!

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पुस्तकः मदरसा

विधाः उपन्यास

लेखकः मंजूर एहतेशाम

प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन

मूल्यः  550 रुपए, हार्ड बाउंड

पृष्ठ संख्याः 295

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