पुस्तक समीक्षाः महात्मा पर नई समझ बनाने वाली किताब 'गांधी और समाज'

हम गांधी को किस रूप में देखते हैं? महान आदर्श के रूप में, मानवता के महानायक के रूप में या धरती पर चलते-फिरते ईश्वर के रूप में? इन सवालों के जवाब के लिए गांधी जयंती पर पढ़ें गांधीवादी चिंतक गिरिराज किशोर की किताब 'गांधी और समाज' की समीक्षा

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राठौर विचित्रमणि सिंह नई दिल्ली, 02 October 2019
पुस्तक समीक्षाः महात्मा पर नई समझ बनाने वाली किताब 'गांधी और समाज' गांधी और समाज, एक जरूरी किताब

हम गांधी को किस रूप में देखते हैं? महान आदर्श के रूप में, स्वतंत्रता के सबसे बड़े नायक के रूप में, मानवता के महानायक के रूप में या धरती पर चलते-फिरते ईश्वर के रूप में? या फिर गांधी को उस रूप में देखते हैं जिस रूप में वो मानसिकता देखती है जिसने उनकी हत्या कर दी थी? एक पाखंडी, एक देशद्रोही, एक मुस्लिमपरस्त, एक भारत विरोधी, अंग्रेजों का पिट्ठू, पूंजीपतियों का दलाल और हिंदुओं का जन्मजात दुश्मन? आज जब देश महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है तो इन सवालों का जवाब जानना जरूरी है. और इन सारे सवालों के जवाब के लिए आप गांधीवादी चिंतक, लेखक, उपन्यासकार गिरिराज किशोर की किताब 'गांधी और समाज' पढ़ सकते हैं, जो पिछले 20-22 वर्षों में लिखे तमाम उनके अखबारी लेखों का संग्रह है. ‘पहला गिरमिटिया’ लिखकर गांधी-चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित हुए, वरिष्ठ हिंदी कथाकार गिरिराज किशोर ने इस पुस्तक में संकलित अपने आलेखों, वक्तव्यों और व्याख्यानों से गांधी को अलग-अलग कोणों से समझने और समझाने की कोशिश की है. ये सभी आलेख पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग मौकों पर लिखे गए हैं; इसलिए इनके संदर्भ नितांत समकालीन हैं; और आज की निगाह से गांधी को देखते हैं. इन आलेखों में ‘व्यक्ति गांधी’ और ‘विचार गांधी’ के विरुद्ध इधर जोर पकड़ रहे संगठित दुष्प्रचार को भी रेखांकित किया गया है; और उनके हत्यारे को पूजनेवाली मानसिकता की हिंस्र संरचना को भी चिंता व चिंतन का विषय बनाया गया है.
इनसान की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाएं जब शून्य पर पहुंचती हैं तो वह व्यक्ति सबसे ऊंचे शिखर पर जा खड़ा होता है, गांधी इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं. उन्होंने हर घड़ी खुद को नए बदलाव के लिए प्रस्तुत किया. गांधी बाजार में खड़े रहे लेकिन बाजार से दूर रहे. गांधी ने दुनिया के सामने आजादी का नया नजरिया पेश किया और आजादी पाने के लिए लड़ाई का बिल्कुल अनूठा हथियार. सत्य और अहिंसा को पुरानी किताबों के सड़े-गले पन्नों से निकालकर गांधी ने अंग्रेजों के तोप, तलवार, लाठी और बंदूकों के सामने खड़ा कर दिया. बहुतों को यह चमत्कार लगता था तो बहुतों को मूर्खता. लेकिन कहते हैं ना कि इनसान अगर अंतरात्मा की अतल गहराइयों से कुछ करने की ठान ले तो दुनिया उसके कदमों में झुक जाती है. गांधी ने यही किया. भारत की आजादी दुनिया के सामने एक नजीर बन गई. दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वे कई बातों पर गांधी से सहमत नहीं होते हैं लेकिन उनके पास गांधी के बताए रास्ते पर चलने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है.
गांधी के जीवन और विरोधाभासों को देखें तो कहा जा सकता है कि उनका व्यक्तित्व और दर्शन एक सतत बनती हुई इकाई था. एक निर्माणाधीन इमारत जिसमें हर क्षण काम चलता था. उनका जीवन भी प्रयोगशाला था, मन भी. एक अवधारणा के रूप में गांधी उसी तरह एक सूत्र के रूप में हमें मिलते हैं जिस तरह मार्क्स; यह हमारे ऊपर है कि हम अपने वर्तमान और भविष्य को उस सूत्र से कैसे समझें. यही वजह है कि गोली से मार दिए जाने, बीच-बीच में उन्हें अप्रासंगिक सिद्ध करने और जाने कितनी ऐतिहासिक गलतियों का जिम्मेदार ठहराए जाने के बावजूद वे बचे रहते हैं; और रहेंगे. उनकी हत्या करनेवाली ताकतों के वर्चस्व के बाद भी वे होंगे. वे कोई पूरी लिखी जा चुकी धर्म-पुस्तिका नहीं हैं, वे जीने की एक पद्धति हैं जिसका अन्वेषण हमेशा जारी रखे जाने की माँग करता है.
गिरिराज किशोर ने बीसवीं सदी के गुजरते अंधकार और 21वीं सदी में उसकी आपत्तिजनक छाया के बीच महात्मा गांधी पर उठते सवालों का अपनी तरह से जवाब दिया है. उन्होंने कहीं गांधी का बचाव नहीं किया है. वैसे भी गांधी ना किसी के बचाए बच सकते हैं ना किसी के डुबाए डूब सकते हैं. गांधी तो सतत यात्रा का नाम हैं. जिस राही को गांधी में भरोसा हो, वह साथ चल दे. जिसको नहीं है, वह भी देर-सबेर गांधी के रास्ते पर आने को मजबूर हुआ. आखिर आरएसएस और बीजेपी में गांधी के लिए आदरणीय आज बन गए हैं तो इसके पीछे गांधी का वह मर्म है जिसको समझने में कइयों को बहुत लंबा वक्त लग जाता है.
महात्मा गांधी ने 40 साल की उम्र में लिखी थी हिंद स्वराज. वह किताब सस्टेनेबल डवलपमेंट यानी टिकाऊ विकास का मूल मंत्र है. गिरिराज किशोर ने अगर हिंद स्वराज की प्रासंगिकता को आधुनिक सभ्यता की कसौटी पर कसने का प्रयास किया है तो गांधी के नाम पर हो रहे असत्य के प्रयोग को भी पेश किया है. राजकमल से प्रकाशित इस किताब को आप एक बार जरूर पढ़ सकते हैं. गांधी को उनके 150वें वर्ष में अतीत की तरफ नहीं, भविष्य की तरफ देखने के लिए.
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पुस्तकः गांधी और समाज
लेखक: गिरिराज किशोर
विधाः गांधी विमर्श
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन
मूल्यः हार्डबाउंड 595/- रुपए
पृष्ठ संख्याः 167

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