Why I Am A Liberal: आधुनिक भारतीय समाज को आईना दिखाती है सागरिका घोष की यह किताब

पत्रकार रही लेखिका सागरिका घोष ने अपने संदर्भों, व्याख्याओं, इतिहास के तत्वों, वर्तमान की परिस्थितियों और भविष्य की आहटों के बीच अपनी किताब Why I Am A Liberal: A Manifesto For Indians Who Believe in Individual Freedom को पांच अध्यायों में बांटा है.

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राठौर विचित्रमणि सिंह नई दिल्ली, 12 September 2019
Why I Am A Liberal: आधुनिक भारतीय समाज को आईना दिखाती है सागरिका घोष की यह किताब कवर Why I Am a Liberal: A Manifesto for Indians Who Believe in Individual Freedom [पेंग्विन विकिंग]

राष्ट्रवाद! नहीं उग्र राष्ट्रवाद! आज आपकी भारतीयता की असली पहचान कहीं यही उग्र राष्ट्रवाद तो नहीं हो गया है? कहीं उदारपंथी होना नए जमाने के राष्ट्रवाद के विरुद्ध छेड़ा गया सबसे बड़ा युद्ध तो नहीं है? कहीं आपकी अभिव्यक्ति की आजादी ही आपके देशद्रोही होने का कारण तो नहीं बन रहा है? कहीं कट्टरता का विरोध और सर्वसमावेशी समाज की कल्पना करना आज की सत्ता निर्मित भारतीयता का विरोध तो नहीं है? क्या आजादी के 72 साल बाद वे सारे मूल्य और मान्यताएं आज बेमानी हो गई हैं जिनके सहारे स्वतंत्रता की दीर्घगामी लड़ाई लड़ी गई थी? क्या मीडिया को अघोषित आपातकाल के साए में रखना ही नई भारतीयता की पहचान है? और सबसे बढ़कर प्रश्न यह है कि आजादी के नायकों- महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल- की सोच, विचार और मानस क्या आज के भारत में संदर्भहीन हो गए हैं? इन सवालों से टकराती है वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष की नई किताब- Why I Am A Liberal: A Manifesto For Indians Who Believe in Individual Freedom.

Individual Freedom यानी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से याद आया कि भारतीय परंपरा में निजी स्वतंत्रता के मूल्य निहित हैं और संविधान भी निजता का अधिकार देता है. उन अधिकारों की बात लेखिका ने अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में ही की है. यह किताब, जैसा कि इसके नाम से ही विदित है, इस सवाल पर जितना जोर देता है कि कोई व्यक्ति क्यों उदारपंथी हो सकता है, उतना ही जोर इस बात पर भी देता है कि किसी उदारपंथी की जरूरत क्यों है? जब सामाजिक मानस के कुएं में ही भंग पड़ी हो तब समझ बूझ की बात करना बेमानी हो जाता है, लेकिन इस किताब में उस भंग को हटाने और हिंदुस्तान के असली रंग-ढंग को परखने की कोशिश हुई है. लेखिका ने इस बात पर बल दिया है कि अगर हिंदुस्तान की सबसे बडी पहचान महात्मा गांधी हैं तो उस गांधी की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह सबसे बड़े उदारपंथी नेता थे. इस उदारता को गांधी ने भारतीय परंपरा से निकाला और गुलामी के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई की परंपरा का हिस्सा बना दिया. धार्मिक उदारता उसकी पहली बुनियाद बनी जिसपर आर्थिक और सामाजिक उदारता की भव्य इमारत तैयार हुई. उस गांधी का राजनीतिक चिंतन यह जानता था कि राज्य यानी स्टेट का बड़ा होना खतरा है और बड़ा राज्य और बड़े खतरे का वाहक बनता है।

महान समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने लिखा है कि महात्मा गांधी सिर्फ भारत के ही राष्ट्रपिता नहीं थे बल्कि भारतीय उदारवादी व्यवस्था के भी पिता थे. तो फिर इस गांधी को किसी राजनीतिक हिंदू ने मारा या फिर ब्राह्मवादी हिंदू ने? हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद के बेहद बारीक घालमेल को बगैर नाम लिए सागरिका घोष ने समझाने का प्रयास किया है. आखिर उदारता की खिलाफत, सबसे बड़ी खिलाफत, धर्म का कर्मकांड करता है और किसी भी धर्म के कर्मकांड पर चोट करो तो उसको चलाने वाले ही बिलबिलाते हैं. गांधी को दुनिया सबसे बड़े हिंदू के रूप में जानती है. तो क्या गांधी के व्यक्तित्व की खुशबू को खुद में समाहित करने वाले हिंदू धर्म की पहचान से कट्टरता से पोषित हिंदुत्व डर गया था और उसी डर ने महात्मा की जान ले ली? नहीं तो ऐसा क्यों होता कि भारत आज भी दुनिया के सामने एक पितृहंता राष्ट्र के रूप में खड़ा होता? यह हमारी धार्मिक चेतना पर बड़ा प्रश्न चिह्न है और इस प्रश्न चिह्न को सागरिका ने रेखांकित किया है.

आज जिस तरह हिंदुत्व पर आधारित राष्ट्रवाद की जंजीरों में यह देश जकड़ा हुआ है, उसमें तार्किकता की बात बेमानी हो जाती है. उन्माद की सबसे बड़ी खासियत यही होती है कि वह हमारी तर्क शक्ति को खत्म कर देता है. फिर हम इंसान को इंसान के रूप में नहीं, भगवान या शैतान के रूप में देखते हैं. जब इंसान की अपनी पहचान देवत्व या दानवता की भट्ठी में गलने लगती है तो उसे अपने तमाम सवालों के जवाब के लिए और अपनी तमाम समस्याओं के समाधान के लिए एक अदद राष्ट्र नायक की जरूरत पड़ जाती है. फिर राष्ट्र में निहित सारे तत्व एक व्यक्ति के व्यक्तित्व के इर्द गिर्द घूमने लगते हैं. राष्ट्र आहिस्ता-आहिस्ता गौण हो जाता है और नायक सर्वस्व. इस खतरे को संविधान का निर्माण करते समय ही डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने भांप लिया था. इसीलिए सरदार वल्लभ भाई पटेल को उन्होंने लिखा था कि देश सबसे बड़े आदमी से भी बड़ा होता है. कालांतर में इसी बात को प्रखर नेता मीनू मसाने ने मर्दाना राष्ट्रवाद के उदय और खतरे के रूप में चिह्नित किया था.
 
इस मर्दाना राष्ट्रवाद की पहली शर्त समाज को दो भागों में बांटना और उसमें बहुसंख्यक का हामी बनना हो जाती है. इसकी दूसरी शर्त है समाज में नफरत भर देना. वह नफरत ही है जिसमें हम इतिहास से भी कोई सबक लेना नहीं चाहते. महात्मा गांधी से लेकर नेहरू और पटेल तक किसी भी राष्ट्रीय आंदोलन के नेता ने अंग्रेजों से नफरत वाली राजनीति नहीं की बल्कि जरूरत पड़ने पर उनसे भी सीखा. लेकिन आज सत्ता से हर सवाल पुरानी सत्ता की नाकामियों पर बड़े सवालिया निशान को ही अपना जवाब मानता है. इसकी तीसरी शर्त यह है कि प्रतीकों में राष्ट्रीयता के तत्व ढूंढ़े जाएं. सागरिका लिखती हैं कि 2014 में जब स्मृति इरानी मानव संसाधन विकास मंत्री बन गईं तो उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों में तिरंगा फहराने का आदेश दिया. तिरंगा हर भारतीय के गौरव का प्रतीक है लेकिन जब उस गौरव को आप पर जबरन थोपा जाने लगे तो समाज रौरव नरक में बदलने लगता है. फिर सबके अपने अपने उन्माद पैदा होते हैं जिनमें बहुसंख्यकों का उन्माद ही राष्ट्रवाद बन जाता है. मर्दाना राष्ट्रवाद.
 
पत्रकार रही लेखिका सागरिका घोष ने अपने संदर्भों, व्याख्याओं, इतिहास के तत्वों, वर्तमान की परिस्थितियों और भविष्य की आहटों के बीच अपनी किताब को पांच अध्यायों में बांटा है. चूंकि आज देश में सवाल उठाने वाले हर शख्स की देशभक्ति पर सबसे पहले सवाल उठता है. शायद उसी सवाल से टकराने के लिए अपने पहले अध्याय का नाम रखा है The Liberal Patriot यानी उदारपंथी देशभक्त. वह उदारपंथी देशभक्त हर सवाल को क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखता है. तभी तो संसद पर आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु के बेटे गालिब गुरु के प्रति वह उदार दिखता है. उसकी उदारता उन सेकुलर मूल्यों के लिए भी छलकती है जिसको नव राष्ट्रवाद के प्रणेता सिकुलर कहते हैं. इस अध्याय में हमारी राजनीतिक सामाजिक दृष्टि खुलती है तो कश्मीर से लेकर दूसरे कई बुनियादी सवाल भी अपना जवाब ढूंढ़ते हैं.

दूसरा अध्याय है The Liberal Hindu यानी उदारपंथी हिंदू. हिंदुत्व आत्मा को पहचानने की बात करता है. आत्मा की सबसे बड़ी व्याख्या गीता में होती है और गीता को नए दौर के संदर्भ में पेश किया महात्मा गांधी ने. आज गोरक्षा के नाम पर जिस तरह दलितों और मुसलमानों की मॉब लिंचिंग हो जाती है, उसमें गांधी का संदर्भ समझने लायक है. गांधी गोहत्या के पक्षधर नहीं थे लेकिन वे यह भी कहते थे कि उनका धर्म गाय को मारने वालों को मारने की इजाजत नहीं देता. फिर उसी हिंदुत्व की एक व्याख्या इतनी हिंसक क्यों हो जाती है? सागरिका घोष इस अध्याय में बीजेपी के नए विकास मॉडल और उसमें धर्म और नफरत के घालमेल पर बेहद सूक्ष्म दृष्टि डालती हैं. कितने विरोधाभासों में जीता है हमारा समाज और जीते हैं हमारे धर्म कर्म और समाज के ठेकेदार जो सुविधाजन्य चिंतन के आधार पर नेहरू को खलनायक बनाते हैं और भगत सिंह को नायक. जबकि भगत सिंह ने धर्म की राजनीति और कारोबार चलाने वालों को करारा जवाब अपने ऐतिहासिक लेख से दे दिया था जिसका नाम था कि मैं नास्तिक क्यों हूं. उदारपंथी हिंदू की बात जब सागरिका उठाती हैं तो जिस तुर्सी से वह बीजेपी की कट्टरपंथी राजनीति पर सवाल उठाती हैं, उसी शिद्दत से कांग्रेस की उस तुष्टीकरण की राजनीति पर भी जिसमें शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में शक्ति के दम पर बदल दिया गया था.
 
तीसरे अध्याय में सागरिका उदारपंथी विचारकों की बात करती हैं जिसका नाम दिया है The Liberal Thinker. इसमें वह विचार की बात करती हैं, विचारधारा की नहीं, क्योंकि आज विचारधारा पर एक खास तरह के सोचने वाले लोगों ने अपना पेटेंट समझ रखा है. सागरिका गांधी से लेकर मीनू मसानी और अमेरिकी विचारक थोरो से लेकर औरंगजेब और इंदिरा गांधी से लेकर नीत्शे तक सबकी बात करती हैं. जैसा कि मीनू मसानी ने कहा था कि लिबरल शब्द लिबर्टी से निकला है. लिबर्टी यानी आजादी. तो साफ है कि आजादी की रक्षा के लिए जरुरी है कि सोच में उदारता का पुट हो. कनाडा पार्टी के नेता मौंक को किताब में उद्धृत किया गया है कि उदारपंथी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने की तुलना में चुनाव जीतना कम महत्वपूर्ण होता है. लेकिन जब चुनाव जीतना ही आखिरी सत्य बन जाए बल्कि यह कहिए कि सत्ता में बने रहने की कोशिश या येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना ही आखिरी मंजिल बन जाए तो उस समाज में उदारपंथी लोकतांत्रिक व्यवस्था को दम तोड़ना ही पड़ता है. आज कर्नाटक से लेकर गोवा तक में जैसा खेल चल रहा है, उसमें विधायक तक कमोडिटी में बदल चुके हैं, जो कभी कानून बनाने वाले होते थे. तो यह क्यों नहीं माना जाए कि लोकतांत्रिक मूल्यों के पैमाने बदल गए हैं. अब हकीकत की खुरदुरी दुनिया में नहीं, आपको अफसानों में सरकार ले जाएगी. बाद में पोल खुलेगी लेकिन इस वक्त तो आप यही गाते हुए घूमेंगे कि आओ हुजूर, तुमको सितारों में ले चलूं।

एक रिसर्च सर्वे के जरिये से सागरिका बताती हैं कि उन्माद और अंधभक्ति के सितारों में जाने की हवस ऐसी है कि भारत में 53 फीसदी लोग सैनिक शासन को ज्यादा बेहतर समझते हैं. काश, वो पड़ोस में पाकिस्तान के 1947 के बाद का इतिहास पढ़ लेते, तब समझ में आता कि सैनिक तानाशाही कितनी निर्मम और एक जिंदा समाज के लिए कितनी खतरनाक होती है! वास्तव में राजनीतिक दलों में खत्म हुई लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी बताती है कि हम बुनियादी सवालों पर उंगली नहीं उठाते. आज देश में कौन सी पार्टी है जो कह सके कि उसने आंतरिक लोकतंत्र को जिंदा रखा है? जिस आम आदमी पार्टी से लोगों ने बड़ी आशाएं लगा रखी थी, वह पार्टी भी एक अरविंद केजरीवाल की जुबान की गुलाम बनकर रख गई है. उदारता का खात्मा वह भी करते हैं जो उदारपंथी राजनीति के हामी बनते हैं. नहीं तो क्यों जाधवपुर यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर को ममता बनर्जी का कार्टून बनाने पर जेल की हवा खानी पड़ती? इस अध्याय में सागरिका गुजरात मॉडल की कई कड़वी हकीकतों को बेपरदा करती हैं जिनको जानकर आप दंग रह जाएंगे.

चौथे अध्याय में सागरिका उदारपंथी मतविरोधियों की बात करती हैं जिसका नाम दिया है The Liberal Dissenter. इसमें वह उन तमाम सवालों को उठाती हैं जिनमें किसी पनसारे, किसी डाभोलकर को इसलिए मार दिया जाता है कि वो कर्मकांड के ठेकेदारों की असलियत लोगों के सामने रख देते हैं. सागरिका ने स्वामी विवेकानंद के संदर्भों की व्याख्या करके भी बताया है कि कैसे उनके मूल्यों को समझे बगैर उनको हिंदुत्व का ब्रांड अंबेसडर बना दिया गया है. वह लिखती हैं कि दक्षिणपंथियों के लिए स्वामी विवेकानंद राष्ट्रवादी थे लेकिन वामपंथों के लिए सुधारवादी. मतभेद की इस कड़ी को वह मौजूदा सरकार तक ले आती हैं जहां मीडिया को सबसे बड़ा नेता बाजारू कहता है तो एक मंत्री प्रेस्टिट्यूट. तुकबंदी अच्छी लगती होगी लेकिन यह सिर्फ मीडिया की मर्यादा का ही सवाल नहीं है बल्कि महिलाओं की मर्यादा भी मंत्री जी की सोच से बंधी है. जिस नेहरू को गांधी ने अपना उत्तराधिकारी बनाया, उस नेहरू से भी गांधी के कई मसलों पर गंभीर मतभेद थे लेकिन मतभेद कभी मनभेद की मर्यादा का अतिक्रमण नहीं कर पाया. भारत की मतविरोध की पहचान अगर मिटती है तो हम एक लोकतांत्रिक राज्य के रूप में क्षरण की दिशा में बढ़ते हुए नजर आएंगे.
 
सागरिका ने पांचवें अध्याय का नाम रखा है The Liberal Woman यानी उदार महिला. देखा जाए तो महिलाएं पुरुषों का आखिरी उपनिवेश हैं. किसी भी धार्मिक समाज में कट्टरता की चोट सबसे ज्यादा किसी पर पडती है तो वे महिलाएं ही होती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देते हैं तो अच्छा लगता है लेकिन बेटियों को बचाने और पढ़ाने के बारे में हमारी उदारता कैसे शून्य में विलीन हो जाती है, यह एक बडा प्रश्नचिह्न हमारे समाज के माथे पर टंगा है. अब बरेली के बीजेपी वाले विधायक राजेश मिश्रा को ही ले लीजिए. उनकी बेटी ने एक दलित लड़के संग शादी कर ली. उस लड़की ने एक अनजान जगह से एक वीडियो पोस्ट डाला कि उसको अपने विधायक पिता से जान का खतरा है. हम जिस सामाजिक परिवेश में जीते हैं, वहां वोट की राजनीति हिंदू बनाम मुसलमान में समाज को बांट देती है. उसमें मुसलमानों के बरक्श सभी हिंदू एक बताए जाते हैं लेकिन जैसे ही किसी ब्राह्मण की लड़की किसी दलित के लड़के से प्यार कर बैठे या शादी कर ले तो हिंदुत्व की सारी मर्यादाएं और एकता छिन्न भिन्न हो जाती है. यहां ध्यान देना होगा कि लड़की यानी स्त्री को कैसे हमने इज्जत के सवाल से गुंथ दिया है. सागरिका ने किताब में फिल्म पद्मावत पर मचे बवाल से लेकर महाभारत के दौर तक की घटनाओं का जिक्र किया है.
 
महान राजनीतिक दार्शनिक वाल्तेयर ने कहा था कि हो सकता है कि हम आपके विचारों से सहमत ना हों फिर भी आपके बोलने की आजादी की हम रक्षा करेंगे. वाल्तेयर का यह कथन ही एक उदारपंथी समाज की दिशा में मानवता का बढ़ा कदम हो सकता है. लेकिन हिंदुस्तान की त्रासदी यही रही कि यहां सत्ता में आए बहुत कम लोगों ने उदारपंथी सोच को विकसित होने दिया. सागरिका की यह किताब भारत को आधुनिक संदर्भ में समझने के लिए एक नई दृष्टि दी है. लेकिन इस किताब को और ज्यादा कसी हुई बनाई जा सकता था. उदाहरणों और संदर्भों का बोझ कुछ ज्यादा हो गया है. इस दृष्टिकोण से यह किताब आम पाठक से ज्यादा रिसर्च स्कॉलरों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है. किताब अंग्रेजी में है लेकिन आम आदमी तक पहुंचने के लिए इसका हिंदी में अनुवादित होकर आना जरूरी है.
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पुस्तक: Why I Am A Liberal: A Manifesto For Indians Who Believe in Individual Freedom
लेखकः सागरिका घोष
विधा: विचार
भाषाः अंग्रेजी
प्रकाशनः पेंग्विन विकिंग
मूल्य: 599/ रुपए
पृष्ठ संख्या: 480

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