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पुस्तक समीक्षाः शहंशाह आलम का संकलन 'थिरक रहा देह का पानी'; जहां कवि होंगे बच नहीं पाएंगे हत्यारे

प्लेटो ने कहा था इतिहास की बनिस्पत कविता सत्य के ज्यादा करीब होती है. शहंशाह आलम इसी सच को दर्ज करने वाले आज के दौर के महत्वपूर्ण कवि हैं. उनकी कविताएं झूठ का डंका पीटने वालों से डरती नहीं, बल्कि उनकी आंखों में आंखें डालकर खड़ी हो जाती हैं.

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव नई दिल्ली, 12 September 2019
पुस्तक समीक्षाः शहंशाह आलम का संकलन 'थिरक रहा देह का पानी'; जहां कवि होंगे बच नहीं पाएंगे हत्यारे काव्य संकलन 'थिरक रहा देह का पानी' का कवर

आम आदमी की ज़िन्दगी में कविता की अहमियत क्या है? क्या जीने के लिए उसे कविता की जरूरत है? रोटी, कपड़ा, मकान और अब इंटरनेट के अलावा क्या आम आदमी की बुनियादी जरूरत में कविता को भी शुमार किया जाना चाहिए? इस सवाल का जवाब जाहिर तौर पर अलग-अलग संदर्भ में अलग-अलग ही होगा. अगर कोई मुझसे यह सवाल पूछे तो मेरा जवाब होगा ‘हां, ज़िन्दगी के लिए कविता उतनी ही जरूरी है, जितना ऑक्सीजन. जब तक ऑक्सीजन है, ज़िन्दगी है और जब तक ज़िन्दगी है, तब तक कविता है.

आदमी को एहसास हो या ना हो, कविता परछाई की तरह उसके साथ चलती है. अगर कोई विशुद्ध साहित्य नहीं भी पढ़ता है तो भी उसके जीवन में कविता है. वो फिल्मी गाने गाता है. भारतीय परंपरा में तो जन्म से लेकर शादी तक के रीति-रिवाज गीतों के बिना अधूरे हैं. सच्चाई यह है कि कविता समकालीन ज़िन्दगी, उसकी सभ्यता, उसके सत्य को दर्ज करती चलती है. अपने समय के सत्य को समझने में इतिहास चूक भी जाय तो कविता नहीं चूकती. प्लेटो जैसा कविता विरोधी दार्शनिक भी शायद इसीलिए यह कहने को मज़बूर हुआ होगा कि इतिहास की बनिस्पत कविता सत्य के ज्यादा करीब होती है. शहंशाह आलम इसी सच को दर्ज करने वाले आज के दौर के महत्वपूर्ण कवि हैं. उनकी कविताएं झूठ का डंका पीटने वालों से डरती नहीं, बल्कि उनकी आंखों में आंखें डालकर खड़ी हो जाती हैं. झूठ सकपकाता है, सरेंडर कर देता है. उनके कविता संग्रह ‘थिरक रह है देह का पानी’  इसका सबूत है. इन पंक्तियों को पढ़िए,

जहां कवि होंगे
हत्यारे किसी की हत्या करके बच नहीं पाएंगे
(कविता : बढ़ई की बेटी से मिलते हुए, पृष्ठ : 35)

यह चेतावनी भी है, निगहबानी भी. ऐसा एलान वह कवि ही कर सकता है, जो अपने समय और समाज के प्रति ईमानदार, सचेतन और संवेदनशील हो. उनकी खुशी में खुश होता हो, उनके दुख में केवल दुखी भर नहीं होता बल्कि मुठ्ठी बांध प्रतिकार के लिए खड़ा हो जाता हो. इसलिए वह इस कटु सत्य को अपनी कविता में दर्ज करने में सक्षम हैं कि कारखाने बंदीगृह में तब्दील होते जा रहे हैं. बंदीगृह में क़ैदी रहते हैं लेकिन क़ैदी और मज़दूर के फ़र्क को कवि समझता है. उसे भरोसा है कि मज़दूर के साथ कैदी जैसा बर्ताव करने वाली ताक़तों का एक दिन विनाश होगा क्योंकि उसे मज़दूरों की ताक़त और हथौड़े की चोट पर पूरा यकीन है.

पीड़ा से भरा पीड़ा से ही सृजित गीत
जो गाया जा रहा है उस कारखाने में
जो कि अब बंदीगृह भर बनकर रह गया है
कारखाने में काम कर रहे मज़दूरों के लिए
उस गीत में अब भी बची रह गई है
मज़दूरों के लाखों हथौड़े की वह मारक गूंज
जो मालिकों को सोने नहीं देगी गहरी नींद

शहर के दमघोंटू औद्योगिक अंचल में मज़दूर तो गांव में किसान किस जूझ रहा है. शहंशाह की नज़र में किसान का दर्द भी है. किस तरह सूदखोर किसानों को मरने के लिए मज़बूर कर रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. सरकारें भी यह खूब जानती हैं लेकिन करती कुछ नहीं. वोट के लिए कर्ज़ माफी का नाटक जरूर खेल जाता है. नेता कुर्सी पर बैठ जाते हैं और किसान फंदे पर लटकने के लिए अभिशप्त हो जाता है. ‘चैत के दिन’ कविता में शहंशाह ने अभिशप्त किसानों के दर्द को बखूबी बयान किया है-

मैं था कि चैत की फ़सलों को इकट्ठा करने में
लगा था पसीने से तर
ताकि किसी सूदखोर की नज़र न पड़े
इन पुष्ट हुए दानों पर
इसलिए कि एक दिन फ़सलें
ले उड़ने की फिराक़ में होंगे सारे सूदखोर.
(कविता: चैत के दिन, पृष्ठ : 30)

शहंशाह मेहनतकश लोगों के कवि है. अपने पसीने से विकास को मूर्त रूप देने वाले गरीब-गुरबा ही उनकी कविताओं के नायक हैं. वह उनके साथ-साथ चलता है. उनका हौसला बढ़ाता है, उनके लिए लड़ाई का एलान करता है. उनकी कविताओं में इसकी झलक साफ-साफ मिलती है.  

वह जो अपने जीवन को पीठ पर लादे
दिन की कड़ी धूप में दिखाई दे रहा है
उसके धूप समय में बची है सर्वहारा की लड़ाई
जो लड़ी जानी बाक़ी रह गई है अब भी
(कविता : बहुत कुछ बचा है, पृष्ठ : 72)

शहंशाह जितने विद्रोह के कवि हैं, उतने ही प्रेम के भी. उनका प्रेम नफ़रत के हर उस जाले को काट डालना चाहता है, जिससे धरती के लाल होने का खतरा है. धर्म और जाति के नाम पर नफ़रत की बेलों को सींचने में वो हाथ ही जुटे हुए हैं, जिन पर इन्हें काटने की जिम्मेदारी थी,  ऐसे में शहंशाह जैसा कवि भला चुप कैसे रह सकता है?

हर घास वाला पृथ्वी पर ढूंढ रहा है    
घास उपजाने के लिए जगह जहां पर खून के छींटे नहीं हों
जिस तरह मैं ढूंढ रहा हूं प्रेम के लिए कोई जगह
और संविधान मौन है देश भर में रेगिस्तान के पसरने पर
जैसे देश के महामात्य मौन रहते हैं संसद में
(कविता : घास काटने वाले के बारे में, पृष्ठ : 52)

हर सजग आदमी को यह सवाल पूछना ही चाहिए कि आखिर क्या वजह है कि आज़ादी के 72 साल बाद भी हम उन बुनियादी समस्याओं से ही जूझ रहे हैं, जिनसे कब का मुक्त हो जाना चाहिए. आखिर क्या वजह है कि जब सारे पेट भरे होने चाहिए थे, हर तन ढंका होना चाहिए था, हर सिर पर छत होनी चाहिए थी और शरीर सेहतमन्द, तब लोग बूंद बूंद पानी को तरस रहे हैं. इलाज नहीं मिलने से छोटे-छोटे बच्चे मर रहे हैं. ऐसा इसलिए है कि हमने सवाल पूछना छोड़ दिया. जिन्होंने अपनी जीभ गिरवी रख दी, वो सारे सुख भोग रहे हैं, जो प्रतिरोध कर सकते हैं---वो नमक-रोटी-बीमारी से लड़ रहे हैं. कवि ऐसे लोगों से सीधे सवाल करते हैं

इतने बड़े इस शहर में
आप कैसे बिना बोले रह लेते हैं
इतने बड़े इस शहर में
आप कैसे बिना गूंजे सह लेते हैं
(कविता : ताल बचा रहेगा, पृष्ठ : 73)

कायर होते जा रहे समाज पर भी शहंशाह तीखा वार करते हैं

मैं अपने अंदर
समेट लेना चाहता हूं थोड़ी आग
आने वाले कठिन दिनों के अंधेरों के लिए
मैं बचा लेना चाहता हूं थोड़ी ताप
कायर होती जा रही पीढ़ी के लिए

मैं थोड़ी नमी बचाए रखना चाहता हूं
मेघों के लिए
खेतों के लिए
आंखों के लिए

जब  कहीं से कोई सवाल नहीं है तो फिर यह जिम्मेदारी रचनाकार को ही उठानी पड़ेगी. जो सवाल पूछेगा, विरोध का स्वर बुलंद करेगा, उसे हाशिये पर धकेला जा सकता है. इसकी साज़िश अनवरत चलती रहती है लेकिन शहंशाह इसकी परवाह नहीं करते. वह सवाल पूछते हैं. विरोध की आग को जलाए रखते हैं.

वह लाल सुर्ख़ रंग भी छिपा रखा है आप ही के वास्ते
जिससे दुनिया का हर राजा डरता है
राजा अपना प्रासाद ढहने से डरता रहता है जैसे अक्सर
और राजा आपसे डरे न डरे
मेरे भीतर के कवि से
ज़रूर डरता है कोई भी चालाकी दिखाने से पहले
(कविता: मेरे भीतर बहुत कुछ छिपकर बैठा है, पृष्ठ: 81)

राजतंत्र के डर में ही आम आदमी का उत्थान निहित है.

और मेरा बचपन कहता है कि किसी भी राजतंत्र का डरना
और किसी भी हत्यारे का खौफ़ज़दा होना
बच्चे के हक़ में अच्छा है, जिसमें कि वह बड़ा हो रहा है
जिसमें कि वह राजदंड के खिलाफ़ खड़ा हो रहा है
(कविता: मेरे भीतर बहुत कुछ छिपकर बैठा है, पृष्ठ: 81)

आखिर राजतंत्र है क्या? आम जनता को उसके हक़ से वंचित करने वाला तंत्र. यह तंत्र यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरा पड़ा है. हमारे आपके के अंदर भी. सबसे लड़ने की जरूरत है. यह लड़ाई हर वक्त जारी रखनी है. ‘जाल से बाहर’ कविता में शहंशाह ने बड़े ही प्रभावी ढंग से ऐसे तंत्र के चेहरे से नक़ाब नोंच लिया है.

वे मेरी मुहब्बत को जाल में
पकड़ना चाहते हैं शिकारी बनकर
जब मैं अपनी मुहब्बत के साथ
खूबसूरत चांद देख रहा होता हूं
घने जंगल के घने पेड़ पर चढ़कर

उन्हें लगता है मैं घबरा जाऊंगा
उनके बिछाए गए जाल के आगे

यह एक मौसम है जिसमें ठेकेदार
मेरे घर की मिट्टी काट ले जाना चाहता है

यह एक ऐसी रात है, जिसमें लकड़ी चोर
मेरे घर के दरवाजे चुरा ले जाना चाहता है

यह एक ऐसा दिन है जिसमें शातिर चिड़ीमार
मेरे घर के कबूतर उड़ा ले जाना चाहता है

उन्हें लगता है उनके ऐसा करने से
मैं हार जाऊंगा अपना जिस्म अपनी जान
सबसे तेज़ बारिश से घबराई इन रातों में
उन्हें मालूम नहीं उस औरत ने
ऐसी दुआ मांग रखी है मेरे लिए
कि मैं हर जाल से बाहर निकल जाया करूंगा
शिकारियों की हर चाल को पलटते हुए.
(कविता: जाल से बाहर, पृष्ठ: 33 )

सामाजिक-राजनीतिक चेतना से लैस इस कविता में षडयंत्र है, चालाकी है लेकिन पूरी कविता में आप प्रेम को शिद्दत से महसूस करेंगे. यह कविता जितनी विद्रोह की है, उतनी ही प्रेम की भी. प्रेम में षड्यंत्र को नाकाम करने की ताक़त है. इस कविता में जिस औरत की बात हो रही है, वह औरत कौन है? वह मां है, बहन है, प्रेमिका है. वह कोई भी हो सकती है लेकिन है वह औरत. यह औरत बड़े रही भव्य रूप में पूरी गरिमा के साथ इस संग्रह की कविताओं में मौजूद है.

एक स्त्री के पास प्राचीन क्या है
वह बुहारती है घर अंतरिक्ष जानकर

वह पृथ्वी तल में बीज डालती है
कि उगेंगे रहस्यों से भरे अन्न
सुग्गों को नहलाती है ओस की बूंदों से
हरी पत्तियों में से चुन-चानकर

जल में उझलती है अपने इकट्ठे किए आंसू
जो हथियार बनेंगे कठिनाई में घिसकर
संहारने आदिम दैत्यों को एक न एक दिन

यह सच है एक स्त्री के पास उसके लिए
समय का सबसे पुराना वह कोना होता है
जिसमें गाती है अपने समय का अनूठा कोरस
जो बारिश लाता है वृक्षों-वनस्पतियों के लिए

इस तरह एक स्त्री इस ग्रह  की आयु
बढ़ाती जाती है अपने लिए प्रेम को बचाते.
(कविता : एक स्त्री के पास, पृष्ठ : 21)

कवि की नायिका प्रेम करते वक्त भी कहीं हल्की नहीं दिखती, वह संघर्ष को ऊंचाई देती है, वह पुरुष को बेड़ियों से मुक्त करती है.

मैं उससे मिला बेहिसाब मिला
और अपने पांवों की सारी बेड़ियों को
काट डाला उसी के प्रेम में पड़कर.
(कविता : मैं उससे मिला, पृष्ठ : 43)

यहां औरत देह नहीं है. पुरुष काम पिपासु जानवर नहीं है. यह प्रेम उम्मीद जगाता है. यह प्रेम भय से मुक्त करता है.

थिरक रहा यह पानी आ उतरे
इस रेतीले बेहद रेतीले दिन में
वह गाछ हो जाए फिर से हरा
जिसके पत्ते सूख चुके भय से
(कविता : लय, पृष्ठ : 11)

जो स्त्री अपने प्रेम से भय मुक्त करेगी, वही कायरों में जोश का संचार करेगी, आसुरी शक्तियों का विनाश करेगी.

जल में उझलती है अपने इकट्ठे किए आंसू
जो हथियार बनेंगे कठिनाई में घिसकर
संहारने आदिम दैत्यों को एक न एक दिन
(कविता : एक स्त्री के पास, पृष्ठ : 21)

प्रेम की कविताओं में भी स्त्री का ऐसा उदात्त रूप शहंशाह जैसा कवि ही गढ़ सकता है. ऐसा करने के लिए जो नज़र और ताक़त चाहिए, उसे वह खुद अपने अंदर गहरे उतर कर हासिल करते हैं.

जल को जपता हूं
जब-जब तपता हूं
समुद्र को मथता हूं
जब उपेक्षित महसूस करता हूं
गहरे तल में बैठ
सचमुच-सचमुच
गहरी शक्ति पाता हूं
(कविता : जल को जपता हूं, पृष्ठ : 14)

वह स्त्री को धरती का दर्जा देकर उसकी महानता को रेखांकित करता है.

उस स्त्री के प्यार में पड़कर
मैंने यह भी जाना
यह पृथ्वी भी तो
एक भरी-पूरी स्त्री ही है.

इसलिए वह उस स्त्री के लिए रोशनी बचा कर रखना चाहते हैं.

आपके पास कितना कुछ बचा है
अब भी जीने के लिए कई सदियां

मेरे पास एक तीली बची है माचिस की
आपके अंधेरे कोने को रौशन करने के लिए

यह तीली बचाए रखना चाहूंगा
उसके प्रेम के बचे रहने तक.
(कविता: तीली, पृष्ठ: 71)

जिस स्त्री ने उन्हें टूटकर मुहब्बत की और जिसकी मुहब्बत ने कवि को इंसान बनाया, बेड़ियों से आज़ाद किया, उस स्त्री के लिए वह किसी भी विषम परिस्थिति में भी अच्छी रातें बचाने का संकल्प लेते हैं.

यह कोई विडंबना नहीं है न कोई आश्चर्य
जो मैंने जीवन की सारी लड़ाइयां
संघर्ष के सारे पक्ष-विपक्ष सारे झंझावत
अपने लिए बचाए रखा है पूरी तन्मयता से
और तुम्हें देने के लिए अच्छी रातें बचा रखी हैं
(कविता : मैंने तुम्हारे लिए तितलियां चुराईं, पृष्ठ : 108 )

इस बेहतरीन कविता संग्रह के लिए शहंशाह आलम बधाई के पात्र हैं. यह संग्रह हर कविता प्रेमी को पढ़ना चाहिए.

****
पुस्तकः थिरक रहा देह का पानी
रचनाकारः शहंशाह आलम
विधा: कविता
प्रकाशनः बोधि प्रकाशन, जयपुर
कीमतः रुपए 150/-
पृष्ठ संख्या: 124

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