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समय के सवाल- पुस्तक समीक्षा: एक निरापद दुनिया बनाने के विमर्श का आमंत्रण

‘समय के सवाल’ में कुल 53 आलेख संग्रहित हैं, जो अलग-अलग समय पर समसामयिक मुद्दों पर लिखे गए हैं. इन लेखों को पर्यावरण, धरती, शहरीकरण, खेती, जंगल, जल है तो कल है, नामक 6 अध्यायों के तहत संकलित किया गया है.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 25 February 2019
समय के सवाल- पुस्तक समीक्षा: एक निरापद दुनिया बनाने के विमर्श का आमंत्रण पंकज चतुर्वेदी की पुस्तकः समय के सवाल

मध्य प्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी ने पंकज चतुर्वेदी की एक किताब ‘समय के सवाल’ नाम से छापी है. पंकज चतुर्वेदी जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दों पर खोजी लेखन करते हैं और इन विषयों पर एक स्तंभकार के रूप में स्थापित हो चुके हैं. वे विज्ञान के छात्र रहे हैं और शिक्षा अभियान से जुड़े हुए हैं. बुंदेलखण्ड की मिट्टी से जुड़े होने के चलते प्रकृति से जुड़े समसामयिक विषयों पर गहरी समझ रखते हैं. उनके लेख शोध आधारित व भाषा आम आदमी की समझ में आने वाली है.

‘समय के सवाल’ में कुल 53 आलेख संग्रहित हैं, जो अलग-अलग समय पर समसामयिक मुद्दों पर लिखे गए हैं. इन लेखों को पर्यावरण, धरती, शहरीकरण, खेती, जंगल, जल है तो कल है, नामक 6 अध्यायों के तहत संकलित किया गया है. पहला आलेख ‘कई फुकुशिमा पनप रहे हैं भारत में’ है. यह लेख जापान में आई सुनामी के बाद फुकुशिमा परमाणु विद्युत संयंत्र से हुए नाभिकीय विकरण रिसाव के बाद भारतीय संदर्भो में लिखा गया है. लेख में आंकड़े देकर पंकज उर्जा के लिए परमाणु बिजलीघरों पर हमारी निर्भरता के बारे में चेतावनी देते हैं.

परमाणु शक्ति को बिजली में बदलना शेर पर सवारी की तरह है. ‘यूरेनियम कारपोरेशन आफ इंडिया’ के झारखण्ड से यूरेनियम के अयस्क खनन तथा उसके परिशोधन के बाद बचे आणविक कचरे का निस्तारण जादूगोड़ा में आदिवासी गांवों के बीच किया जाता है. लेखक आंकड़ों सहित उल्लेख करते हैं कि इस प्रक्रिया में लगे कितने लोग कैंसर आदि बीमारियों से मरे. उन्होंने पोखरण के 1974 के पहले परमाणु विस्फोट के बाद उस क्षेत्र के गांवो में कैंसर के रोगियों की बढ़ी संख्या का उल्लेख भी किया है. लेख के अंत में उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि हमारे देश के बाशिंदे बीमार, कुपोषित और कमजोर होंगे, तो लाख एटमी बिजलीघर भी हमें सर्वशक्तिमान नहीं बना सकते.

आखिर कहां जाता है परमाणु बिजली घरों का कचरा? नामक लेख में बुंदेलखण्ड में किये जा रहे आणविक कचरे के निस्तारण पर चिंता जताई गई है. पेड़-पौधे भी हैं तस्करों के निशाने पर, जरूरत है पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की, गर्म होती धरती, कहीं घर में ही तो नहीं घुटता है दम, पत्तियों को नहीं तकदीर को जलाता है समाज, खोदते-खोदते खो रहे हैं पहाड़, पालिथिन पर पाबंदी के लिये चाहिये वैकल्पिक व्यवस्था जैसे भाग एक के लेख अपने शीर्षक से ही अपने विषय की जानकारी दे देते हैं. पत्तियों को नहीं तकदीर को जलाता है समाज लेख में पंकज ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का संदर्भ देकर प्रभावी तरीके से खेत के अवशेष प्रबंधन पर कलम चलाई है.

‘समय के सवाल’ के दूसरे भाग ‘धरती’ के अंतर्गत कुल चार लेख हैं. दुनिया में बढ़ते मरुस्थल, ग्लेशियर प्राधिकरण की आवश्यकता, बंजर जमीन की समस्या को रेखांकित करती उनकी कलम आह्वान करते हुए कहती है कि जमीन के संरक्षण की जवाबदारी केवल सरकारों पर है, जबकि समाज का हर तबका जमीन का हर संभव दोहन करने में व्यस्त है, जो कि चिंता का विषय है.

हमारा देश गांवों का देश कहा जरूर जाता है पर गांव से शहर की ओर अंधाधुंध पलायन हो रहा है,  इसके चलते शहरों का अनियंत्रित विस्तार होता जा रहा है. शहरीकरण की अपनी अलग समस्यायें हैं. इन विषयों पर लेखक ने मौलिक चिंता और अपनी समझ के साथ बेहतरी का सुझाव देते हुए लेख लिखे हैं. उनका तर्क है कि प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान सहज ही सबका ध्यान खींच रहा है, किंतु विडम्बना यह है कि हमारी मशीनरी पाश्चात्य माडल का सदैव अंधानुकरण करती है. हास्यास्पद है कि हम डालर में मंहगा डीजल खरीदते हैं,  फिर हर गांव, कस्बे, शहर में कचरा वाहन प्रदूषण फैलाते हुये घर-घर से कचरा इकट्ठा करते हैं, और वह सारा कचरा किसी खुले मैदान पर डम्प कर दिया जाता है. इस तरह सफाई अभियान के नाम पर विदेशी मुद्रा का अपव्यय, वायु प्रदूषण को बढ़ावा, जमीन का दुरुपयोग हो रहा है. बेहतर होता कि हम साइकिल रिक्शा वाले कचरा वाहन उपयोग करते जिससे कुछ रोजगार बढ़ता, डीजल अपव्यय न होता, प्रदूषण भी रुकता...

महानगरीय संस्कृति से पनपते अपराधों पर उनका लेख सामाजिक मनोविज्ञान की उनकी गहरी समझ प्रदर्शित करता है. इस लेख में उन्होंने देह व्यापार से जेबकतरी तक की समस्याओं पर कलम चलाई है. जाने कितने करोड़ रुपए नदियों की साफ-सफाई के नाम पर व्यय किये जाते हैं, पर एक ही बाढ़ में सारे किये कराये पर पानी फिर जाता है. मुंबई, चेन्नई, बेंगलूरू और इस साल केरल की बाढ़ प्रकृति की चेतावनी है, जिसे समझाने का तार्किक प्रयास पंकज चतुर्वेदी ने अपने लेख में किया है. जल मार्गों पर कूड़ा भरने को उन्होंने समस्या की जड़ निरूपित किया है. उनकी पैनी नजर सड़क पर जाम की समस्या से लेकर फ्लाई-ओवर तक गई है.

खेती और किसानी पर हमारे देश में हर चुनाव में राजनीति की फसल पक रही है. कर्ज माफी के चुनावी वादे वोटों में तब्दील किया जाना आम राजनीतिक शगल बन गया है. इस किताब में  पंकज चतुर्वेदी के 12 लेख फसल बीमा, रासायनिक खादों के जहरीले प्रभाव, किसानों के लिए कोल्ड स्टोरेज की जरूरत,  सूखे से मुकाबले की तैयारी,  बीटी बीजों की समस्या आदि पर लिखे हैं. ‘जब खेत नहीं होंगे’ लेख पढ़कर पाठक चौंकता है. ‘किसान भारत का स्वाभिमान हैं’ के साथ वह एक वाजिब सवाल खड़ा करते हैं, ‘हमें जमीन क्यों चाहिए अन्न उगाने को या खेत उजाड़कर कारखाने या शहर उगाने को?’

आए दिन अखबारों में शहर में घुसने वाले जंगली जानवरों की खबर छपती है. बस्ती में क्यों घुस रहा है गजराज?, शुतुरमुर्ग भी मर रहे हैं और उनके पालक भी, घुसपैठियों का शिकार हो रहे हैं गैंडे, बगैर चिड़िया का अभयारण्य जैसे लेख उनकी व्यापक दृष्टि, भारत भ्रमण, और अलग-अलग विषयों पर उनकी समान पकड़ का परिचायक है. वे प्रकृति के प्रहरी कलमकार के रूप में निखर कर सामने आते हैं.

कहा जाता है अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा. जल जीवन है, जल में जीवन है और जल से ही जीवन है. जल ने जीवन सृजित किया है. वहीं जल में विनाश की असाधारण क्षमता भी है. पानी समस्त मानवता को जोड़ता है. विभिन्न धर्मो में पानी  का प्रतीकात्मक वर्णन है. ब्रह्मांड की संरचना और जीवन का आधारभूत तत्व पानी ही है. जल भविष्य की वैश्विक चुनौती है. पिछली शताब्दी में विश्व की जनसंख्या तीन गुनी हो गई है, जबकि पानी की खपत सात गुना बढ़ चुकी है. जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि के कारण जल स्रोतों पर जल दोहन का असाधारण दबाव है. विश्व की बड़ी आबादी के लिए पेयजल की कमी  है. जलआपदा से बचने, जल उपयोग में हमें मितव्ययता बरतने की आवश्यकता है.

‘जल है तो कल है’ खंड में लेखक ने 10 आलेख प्रस्तुत किये हैं. सभी लेखों में पानी को लेकर वैश्विक चिंता में वे बराबरी से भागीदार ही नहीं,  वरन वे अपनी ओर से तालाबों के महत्त्व प्रतिपादित करते हुए समस्या का समाधान भी बताते हैं. कूड़ा ढोने का मार्ग बन गई हैं नदियां, लेख में जल संसाधन मंत्रालय के संदर्भ उद्धृत करते हुए वे विभिन्न नदियों में विभिन्न शहरों में प्रदूषण के कारण बताते हैं. दिल्ली में यमुना का प्रदूषित काला पानी जन चिंता का मुद्दा है, हिंडन जो कभी नदी थी, लेख में पंकज ने हिंडन को हिडन होने से बचाने की चेतावनी दी है.

कहते हैं लेखक अपने समय का गवाह तो होता ही है, उसकी वैचारिक क्षमता उसे भविष्य का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम बना देती हैं. पंकज चतुर्वेदी के शब्द हैं, ‘ सुख के लोभ में कहीं हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए विकल्पशून्य समाज न बना दें.’  कुल मिलाकर ‘समय के सवाल’ एक निरापद दुनिया बनाने के विमर्श का उनका खुला आमंत्रण है. पुस्तक पठनीय ही नहीं, चिंतन मनन और क्रियान्वयन का आह्वान करती एक समसामयिक कृति है.

पुस्तकः समय के सवाल

लेखकः पंकज चतुर्वेदी

प्रकाशकः मध्य प्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल

पृष्ठः 322

मूल्य: 200/ रु

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