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पुस्तक समीक्षाः बिहार के लोकजीवन की बानगी है उषाकिरण खान का उपन्यास 'गई झुलनी टूट'

प्रख्यात लेखिका और पद्मश्री से सम्मानित डॉ उषाकिरण खान का नया उपन्यास 'गई झुलनी टूट' किताबघर प्रकाशन ने छापा है. इस उपन्यास में न केवल हाशिये पर पड़ी स्त्री जाति की जीवंत तस्वीर को कहानी के कैनवास पर उकेरा गया है, अपितु ग्राम पंचायत और विधान सभा चुनावों के समय की जाने वाली सियासी जोड़-तोड़ की जमीनी हक़ीक़त को भी बखूबी प्रस्तुत किया गया है.

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जवाहर लाल नेहरूनई दिल्ली, 25 April 2019
पुस्तक समीक्षाः बिहार के लोकजीवन की बानगी है उषाकिरण खान का उपन्यास 'गई झुलनी टूट' उषाकिरण खान का उपन्यास 'गई झुलनी टूट' का कवर

प्रख्यात लेखिका और पद्मश्री से सम्मानित डॉ उषाकिरण खान का नया उपन्यास 'गई झुलनी टूट' किताबघर प्रकाशन ने छापा है. इस उपन्यास में न केवल हाशिये पर पड़ी स्त्री जाति की जीवंत तस्वीर को कहानी के कैनवास पर उकेरा गया है, अपितु ग्राम पंचायत और विधान सभा चुनावों के समय की जाने वाली सियासी जोड़-तोड़ की जमीनी हक़ीक़त को भी बखूबी प्रस्तुत किया गया है. इससे पहले उषा जी 'भामती', 'अगन हिंडोला' और 'सिरजनहार’ जैसे ऐतिहासिक उपन्यासों से लोकप्रियता के कई मुकाम हासिल कर चुकीं है. 'गई झुलनी टूट' उषाकिरण की प्रसिद्धि को एक कदम और आगे लेकर जाता है.

'गई झुलनी टूट' अपने कलात्मक आवरण तथा शीर्षक के कारण पाठकों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींचता है. इसका आवरण चित्र मधुबनी पेंटिंग है. महालक्ष्मी मधुबनी को किताब में इसकी क्रेडिट भी दी गई है. 'गई झुलनी टूट' किसी ऐतिहासिक चरित्र या घटना पर केंद्रित न होकर गांव-देहात के परिवेश पर बुनी गयी रचना है. लोक जुड़ाव लेखिका की शक्ति है. यह दरअसल हाशिये पर अपना जीवन जीते हुए कमलमुखी, घांटो, देवकी और जगत जैसे चरित्रों के उम्र भर के जीवन संघर्ष की गाथा है.

उपन्यास की शुरुआत एक छोटी मासूम बच्ची कमलमुखी से होती है. वह गांव में स्थित कमलदह की ओर मोहित होकर सुबह-सबेरे वहां पहुंच जाती है. कमल की पंखुड़ियों में छुपे भंवरे को देखने के ललक में वह मां के गुस्से का भी सामना करती. लेकिन उसके मन में हसरत ही रह जाती कि कमल का पूरा खिला हुआ फूल देख पाए. वह जन्म लेने से पहले ही अपने पिता को खो चुकी थी. उसकी मां देवकी अपने पति की मौत के बाद गर्भावस्था के दौरान ही अपनी बहन के यहां चली आती है. ऐसे में कमलमुखी का जन्म अपनी मौसी के यहां होता है. देवकी की बहन के देवर जगत मरड़ का विवाह घांटो नाम की एक सांवली किन्तु आकर्षक महिला से हो चुका था, मगर उनके कोई संतान नहीं थे.         

इसी बीच घांटो की मां बीमार पड़ती है और जगत उसे मां की देखभाल के लिए मायके भेज देता है. इधर अपनी बड़ी बहन की शह पर देवकी जगत को रिझाने में लग जाती है. परिजन तथा कुछ अन्य लोगों के उकसाने और देवकी के आकर्षण को देखकर जगत का दिल भी उससे लग जाता है. हित-परिजनों को राजी-साक्षी कर जगत उसे रख लेता है. उधर घांटो को जब इस बात का पता लगता है तो वह खुद आने से इनकार कर देती है. संकोच के कारण जगत भी उसे वापस लेने नहीं जाता. ऐसी परिस्थिति में कितना इंतज़ार सम्भव था. कुछ दिनों बाद घांटो का विवाह एक दुहाजू जोखिम मरड़ से हो जाता है.

इसके बाद समय की घड़ी कुछ यूं घूमती है कि जगत की पहली पत्नी घांटो के दूसरे पति जोखन मरड़ के पहली पत्नी से जन्मे बेटे रंजन कुमार से कमलमुखी की शादी हो जाती है. घांटो को जैसे हीं पता चलता है कि ये उसकी सौत की बेटी है, उसी दिन से वह कमलमुखी को प्रताड़ित करना शुरू कर देती है. इस प्रताड़ना से तंग आकर कुछ समय के लिए वह अपने पति रंजन के पास जाकर कलकत्ता में भी रहती है. लेकिन बच्चों की बीमारी की ख़बर पाकर एक दिन जब वह लौटकर गांव आती है तो घांटो उसे रात में ही घर से बाहर निकाल देती है. इसके बाद कमलमखी दोनों बच्चों को लेकर एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ती है जिसका कोई स्थायी ठौर-ठिकाना नहीं है. कुछ है तो सिर्फ़ जीवन का अथाह संघर्ष. इसी जीवन संघर्ष का जुझारूपन से सामना करती एक स्त्री की कहानी है 'गई झुलनी टूट'.

चार व्यक्तियों और तीन अलग-अलग जगहों की कहानी इस उपन्यास को गतिमान बनाए रखती है. एक तरफ़ पटना में दूसरों के घर खाना बनाती और बरतन मांजकर जीवन बसर करती कमलमुखी तो दूसरी ओर सिरीपुर में महत्त्वाकांक्षी घांटो की पंचायत के राजनीति में व्यस्तता. तीसरी ओर मढ़िया में जगत और देवकी का अपराध बोध है, जो कमलमुखी के प्रति दायित्व को निभाने में हुई अपनी चूक को मानते हुए भी अब कुछ कर पाने में ख़ुद को असमर्थ पाते हैं. "जीवन की गति न्यारी है. नदी तल से निकाली मिट्टी की भांति फिर समतल हो जाना प्रवृत्ति है."

लेखिका उषाकिरण खान के लेखन की विशेषता यही है कि उनके पात्र ज़िन्दगी के तमाम कष्टों और विपरीत परिस्थितियों में भी टूटते नहीं, बल्कि जिजीविषा का संदेश देते हैं. किसी एक व्यक्ति के सुख से न तो खेतों में हरियाली छा जाती है, न उसके उसके दुःख के ताप से खेत, नदियां, तालाब सूख जाते हैं. जब मन में पीड़ा का आलोड़न हिलोरें लेने लगता है, तब भी चेहरे पर मुस्कान बनाये रखना पड़ता है, सामने की पौध के लिए.

उषाकिरण खान ने बिहार के दूर-दराज के अंचलों में बसे ग्रामीण परिवेश और वहां के लोक-जीवन का बेहद सहज और स्वाभाविक चित्रण किया है. इस मायने में वह फणीश्वरनाथ रेणु की आंचलिक उपन्यास विधा की प्रतिनिधि सरीखी लगती हैं. उषाकिरण के लेखन की विशिष्टता यह है कि कथानक किसी फिल्म की तरह आपके आगे से गुजरता है और आप स्वयं को उस परिवेश और पात्र के जीवन से घुलमिल जाते है. उनके द्वारा गढ़े गए पात्र बनावटी नहीं लगते. उषाकिरण खान ने आंचलिक जीवन की हर धुन, हर लय, हर सुर और ताल को शब्दों के द्वारा इस उपन्यास में उकेरने की सफल कोशिश की है.

पुस्तकः गई झुलनी टूट

लेखकः डॉ. उषाकिरण खान

विधाः उपन्यास

प्रकाशकः किताबघर प्रकाशन

पृष्ठ संख्याः 136

मूल्यः 270/ रुपए

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