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लंकेश्वर की नई व्याख्या कर रहा अमीश का उपन्यास Ravan: Enemy of Aryavarta

बिल्कुल नई और आश्चर्यचकित करने वाली शैली में राम कथा लिखने वाले अमीश त्रिपाठी ने नए उपन्यास Ravan: Enemy of Aryavarta में रावण की दास्तां को ऐसे पेश किया है कि आप सिरे से चौंक उठेंगे.

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aajtak.in
राठौर विचित्रमणि सिंह नई दिल्ली, 10 September 2019
लंकेश्वर की नई व्याख्या कर रहा अमीश का उपन्यास Ravan: Enemy of Aryavarta अमीश त्रिपाठी का उपन्यास Ravan: Enemy of Aryavarta का कवर [सौजन्यः Westland]

कहते हैं कि हरि अनंत हरि कथा अनंता. ईश्वर अनंत है और इसलिए उनकी कथाएं अनंत हैं. भारत में भगवान राम को ईश्वर का अवतार माना जाता है. इसीलिए उनकी सारी व्याख्याएं देश, काल और समय के हिसाब से बदलती रही हैं. उस व्याख्या का नतीजा है कि 300 से ज्यादा रामायणों का जिक्र होता है. बल्कि थोड़ा आगे बढ़कर सोचें और देखें तो ऐसी समीक्षाएं और कहानियां इससे आगे बढ़ती हैं. अंग्रेजी में अपनी बिल्कुल नई और आश्चर्यचकित करने वाली शैली में राम कथा लिखने वाले अमीश त्रिपाठी ने रावण की कहानी को जिस तरह से लिखा है, वह एक नई व्याख्या पेश करता है. बल्कि ये कहना चाहिए कि उनके नए उपन्यास Ravan: Enemy of Aryavarta में रावण की दास्तां को ऐसे पेश किया गया है कि आप सिरे से चौंक उठेंगे.
क्या आप सोच सकते हैं कि विभीषण और शुर्पणखा रावण के सगे नहीं बल्कि सौतेले भाई-बहन थे? क्या आपकी कल्पना की उड़ान भूमध्यसागर तक पहुंच सकती है क्योंकि अमीश ने विभीषण और शुर्पणखा को ग्रीक राजकुमारी के बेटा-बेटी के रूप में दर्शाया है? क्या रावण का सगा भाई सिर्फ और सिर्फ कुंभकर्ण ही था? क्या रावण का भाई कुंभकर्ण बेहद तेजतर्रार, चतुर और व्यावासिक बुद्धि का था? और क्या उसने रावण के कारोबारी साम्राज्य को अफ्रीकी देशों तक पहुंचाया था? अगर आप इन सवालों पर चौंक रहे हों तो चौंकिये नहीं बल्कि इनका उत्तर हां में सुनने के लिए अमीश के इस नए उपन्यास Ravan: Enemy of Aryavarta को पढ़िये.
आम तौर पर रावण की पूरी कहानी उसकी सोने की लंका मे शुरु होती है और वहीं खत्म भी. ज्यादा से ज्यादा मिथिला में सीता के स्वयंवर में जाना और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पास कहीं उसकी जन्मभूमि होना उसको भौगोलिक विस्तार देता है. दक्षिण भारत में अपने साम्राज्य की उसकी जद्दोजहद भी बहुत धूमिल दिखती है. लेकिन अमीश ने दशानन रावण को दस सिरों वाले खलनायक की जगह एक ऐसे शख्स के रूप में दिखाया है, जिसमें जितनी बौद्धिक और यौद्धिक क्षमता है, उससे कहीं ज्यादा कुटिलता, घृणा और निम्न स्तर पर उतरा हुआ घिनौना प्रतिक्रियावाद भी, रावण को खलनायक दिखाते हुए भी उपन्यासकार ने उसको परिस्थितियों का मारा हुआ एक ऐसा किरदार दिखाया है जो बचपन में अपने साथ हुई ज्यादतियों को बड़े होने पर दूसरे पर उतारता है,
रावण की आम तौर पर छवि एक बड़े योद्धा और शासक की बनती है लेकिन अमीश ने उसकी एक छवि एक शातिर और धूर्त व्यापारी के रूप में भी पेश की है, रावण की कहानी को उन्होंने एक अनाथ बच्चे की अदम्य इच्छा शक्ति के रूप में दिखाया है, जिसमें वह अपने बल पर अपने पिता के आश्रम से निकलता है और वैद्यनाथ धाम से होते हुए ओडिशा पहुंचता है और वहां से समुद्र के रास्ते लंका तक पहुंचता है. उसके खलनायकत्व को उसकी मां ही चुनौती देती है लेकिन रावण का प्रभुत्व उसको अनुशासनहीन और असंयमित कैसे बनाता है, इसको बड़ी बारीकी से उपन्यास में दिखाया गया है. और हां, रावण का एक और स्वरूप भी खुलकर आता है कि क्या वह संगीत का बेहद मर्मज्ञ था?
राम चंद्र सीरीज में अमीश का यह तीसरा उपन्यास है. इससे पहले वह Ram: Scion of Ikshvaku और Sita: Warrior of Mithila जैसे उपन्यास लिख चुके हैं. अगर आपने पहले के दोनों उपन्यास पढ़े होंगे तो आप देखेंगे कि कैसे तीनों उपन्यासों का ताना-बाना एक दूसरे से बुना हुआ है. लेकिन कहीं आप धार्मिक भावुकता और धर्म को लेकर तार्किकता के साए में इस उपन्यास को पढ़ना चाहेंगे तो आपको निराश होना पड़ेगा. आप इसको एक ऐसे उपन्यास के रूप में पढ़िए जो रावण के व्यक्तित्व को नए दौर से जोड़कर पेश करता है. खास बात यह कि अब यह उपन्यास अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी उपलब्ध है. दोनों को वेस्टलैंड ने ही छापा है.
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पुस्तकः Ravan: Enemy of Aryavarta
लेखकः अमीश त्रिपाठी
विधाः उपन्यास
प्रकाशकः वेस्टलैंड
मूल्यः 399.00
पृष्ठ संख्याः 400

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