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पुस्तक समीक्षाः बाबाओं के देश में...क्योंकि हर व्यंग्य कुछ नया कहता है

कैलाश मंडलेकर के इस संकलन में शामिल व्यंग्य पाठक को अपने वर्तमान के प्रति जागरूक और सजग बनाए रखने की दृष्टि प्रदान करते हैं.

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राठौर विचित्रमणि सिंह नई दिल्ली, 29 March 2020
पुस्तक समीक्षाः बाबाओं के देश में...क्योंकि हर व्यंग्य कुछ नया कहता है समीक्ष्य पुस्तक 'बाबाओं के देश में' का कवर

"शहर बंद है. अकसर हो जाता है. कोई भी कर सकता है. बंद का आह्वान करने वाले हरदम तैयार बैठे रहते हैं. शहर गरीब की जोरु हो गया है. दृढ़ इच्छाशक्ति वाले चार छह लोग सोच लें तो किसी भी वक्त बंद करा देते हैं." ये पंक्तियां वरिष्ठ व्यंग्यकार कैलाश मंडलेकर के व्यंग्य संग्रह 'बाबाओं के देश में' में शामिल व्यंग्य 'बंद के दौरान, करम खुदा के बंदों का' की हैं. लेखक ने बहुत सरल शब्दों में बंद का अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र पाठकों को समझा दिया है. इस व्यंग्य में एक जगह वे लिखते हैं, "बंद वालों के लिए सबै भूमि गोपाल की है. उन्हें एक अदद घटना चाहिए. घटना घटी की शहर बंद."

दरअसल, कैलाश मंडलेकर के व्यंग्य मुद्दे की बात को इतनी सहजता से सामने रख देते हैं कि एक पल को दर्शक समझ ही नहीं पाता कि ये तंज है या सच्चाई. इस व्यंग्य संग्रह में कुल 46 व्यंग्य हैं, जिन्हें भोपाल से प्रकाशित एक दैनिक के स्तंभ के लिए लिखा गया. इसीलिए संकलन के बारे में खुद कैलाश मंडलेकर लिखते हैं, "परसाई जी ने एक जगह यह भी कहा है कि व्यंग्य लेखक उत्तर नहीं देता उत्तेजित करता है, दरअसल वह सामाजिक न्याय के लिए लड़ने की समझ पैदा करता है, कि समझो और लड़ो. ये व्यंग्य रचनाएं सामाजिक न्याय के लिए कितना उकसाती या जाग्रत करती हैं इसका दावा अभी नहीं किया जा सकता. हां, यह दावा जरूर किया जा सकता है कि ये हमें अपने वर्तमान के प्रति जागरूक और सजग बनाए रखने की दृष्टि अवश्य प्रदान करती हैं. यह दावा इसलिए कि कॉलम में प्रकाशित होते ही जिस त्वरा से पाठकों के सन्देश अथवा फोन आते रहे हैं उन्होंने मुझे निरंतर लिखने के लिए प्रेरित किया और आश्वस्त भी. मुझे यह भी लगा कि शायद मैं वही लिख रहा हूं जो आम आदमी सोचता है और चाहे या अनचाहे उन हालातों से जूझने को विवश है.

"इन दिनों व्यंग्य में बहुत प्रतिस्पर्धा है. कहीं कहीं यह गलाकाट प्रतिस्पर्धा में भी परिणत हो रही है. इस दौड़ भाग अथवा अतिरेक के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि आदमी व्यवस्था से त्रस्त है तथा सामाजिक और राजनीतिक छद्म बढ़ते जा रहा है. ऐसे में व्यंग्य लेखन कहीं न कहीं उसे आश्वस्त करता है कि विसंगतियों पर उसकी नजर है और एक लेखक के तौर पर वह उनसे लड़ने को तैयार है. 'तिरफेंक' के अंतर्गत लिखे गए इन व्यंग्य लेखों में कुछ व्यंग्य कथात्मक शैली में हैं तथा कुछ निबंधात्मक भी हैं. मकसद यह रहा है कि घटना के पीछे छुपे सत्य, चालाकी अथवा छद्म की तह तक जाने की कोशिश की जाए जो कि व्यंग्य का यथेष्ट भी है."

किताब में शामिल व्यंग्य के कुछ विषयों में तात्कालिकता का भाव अवश्य है, फिर भी वे रुचिकर हैं. कुछ व्यंग्य के विषय ऐसे हैं, जिन्हें पढ़ते हुए एक तरफ नयापन महसूस होता है, तो दूसरी तरफ लगता है कि हमने कभी इस तरह क्यों नहीं सोचा. 'खरबूजों का लोकतंत्र' की कुछ पंक्तियों को देखें, "खरबूजों के बारे में अकसर यह सुनने में आता है कि वे चाकू पर गिरें या चाकू उन पर गिरे कटना अंतत: उन्हीं को है. खरबूजों की इस दुर्निवार नियति पर प्राय: अफसोस होता है. होना तो यह चाहिए कि यदि खरबूजा चाकू पर गिरे तो कभी चाकू का भी नुकसान हो. खरबूजों के इलाके में यदि लोकतंत्र जैसी कोई चीज होती तो यह सवाल जरुर उठाया जाता. लेकिन दुर्भाग्य है कि इस दुनिया में खरबूजे पूरी तरह निहत्थे हैं."

इसी तरह 'महानता की दिशा में बढ़ते कदम' नामक व्यंग्य में वे खुद पर कटाक्ष करते हुए लिखते हैं, "हालांकि, पैदाइशी तौर पर अपने महान होने का मुझे ठीक ठीक पता नहीं था. उन दिनों ऐसी मान्यता थी कि जो पैदाइशी तौर पर महान होते हैं, वे ऐसे सपूत होते हैं जिनके पांव पालने में ही दिख जाते हैं. लेकिन जहां तक मुझे याद है, मेरे घर ठीक तरीके का पालना भी नहीं था. पांव अलबत्ता जरुर थे लेकिन पालना न होने की वजह से लोगों ने मेरे पांवों की तरफ ध्यान नहीं दिया और एक तकनीकी दिक्कत की वजह से मेरे महान होने की संभावनाओं पर पलीता लग गया."

व्यंग्य पाठकों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि व्यंग्य की शैली क्या है. पाठकों को इस बात से मतलब होता है कि व्यंग्य रुचिकर हैं या नहीं, और क्या लेखक व्यंग्य के जरिए उन सच्चाइयों को देख पा रहा है, जो सामने होते हुए भी अकसर दिखायी नहीं देती. इस कसौटी पर कैलाश मंडलेकर खरे साबित होते दिखते हैं. एक-दो व्यंग्य सीधे सपाट भी हैं, लेकिन अधिकांश व्यंग्य विसंगतियों पर करारी मार करते हैं.

'सरकार के कदमों की सख्ती और झोला छाप डॉक्टर' नामक व्यंग्य में एक जगह वो लिखते हैं, "जबकि झोलाछाप डॉक्टरों का मानना है कि देश में प्रजातंत्र है, इसलिए सभी को जन स्वास्थ्य से खिलवाड़ का अधिकार होना चाहिए. देखा जाए तो सरकार और झोलाछाप डॉक्टरों के बीच यह मगजमारी वर्षों से चल रही है, और आजतक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची."

दरअसल, किसी भी व्यंग्य का एक उद्देश्य होता है, और किताब में शामिल लगभग सभी व्यंग्य इस कसौटी पर खरे उतरते हैं. किताब की इकलौती कमी है, कुछ जगहों पर सही तरीके से प्रूफ रीडिंग न होना. लेकिन, ये कमी इतनी बड़ी नहीं कि किताब को नजरअंदाज किया जाए. वैसे भी, व्यंग्य की दुनिया में कैलाश मंडलेकर का अपना नाम है. धर्मयुग से लेकर हंस तक और कथादेश से लेकर अहा जिंदगी तक कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वो बरसों से लिख रहे हैं. व्यंग्य की उनकी चार किताबें आ चुकी हैं, और उनका यह व्यंग्य संग्रह भी साहित्य के व्यंग्य संसार में अपने हिस्से का योगदान देता है.
***
पुस्तक: बाबाओं के देश में
लेखक: कैलाश मंडलेकर
विधाः व्यंग्य
भाषाः हिंदी
प्रकाशकः बोधि प्रकाशन
मूल्यः 150 रुपए
पृष्ठ संख्याः 120

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