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पुस्तक समीक्षाः स्वस्थ अस्वस्थ लोग; लोक-संस्कृति के आख्यान के बीच सेहत की चर्चा

हृदयेश का पूरा नाम हृदय नारायण मेहरोत्रा है. उनके उपन्यास 'स्वस्थ अस्वस्थ लोग' को आर्य प्रकाशन मंडल ने छापा है. कस्बे के परिवेश पर बुनी गयी इस रचना में लोक-संस्कृति के विविध रंग-रुप दिखाई देते हैं.

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जवाहर लाल नेहरू नई दिल्ली, 10 September 2019
पुस्तक समीक्षाः स्वस्थ अस्वस्थ लोग; लोक-संस्कृति के आख्यान के बीच सेहत की चर्चा पुस्तक कवरः स्वस्थ अस्वस्थ लोग

साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित हृदयेश के नए उपन्यास 'स्वस्थ अस्वस्थ लोग' को आर्य प्रकाशन मंडल ने छापा है. इस उपन्यास में न केवल स्वस्थ्य जीवन शैली के नुस्खे के बारे में बताया गया है अपितु सामाजिक ताने-बाने के विविध अयामों को गहराई में समेटते हुए जमीन-जायदाद के विवाद, रजिस्ट्रार दफ्तर, विद्यालय, और सरकारी महकमें में व्याप्त भ्रष्टाचार, की जमीनी हक़ीक़त को भी बखूबी प्रस्तुत किया गया है.

यह हृदयेश का 12वां उपन्यास है. हृदयेश का पूरा नाम हृदय नारायण मेहरोत्रा है. वह हृदयेश के नाम से लिखते रहे और जीवन की अंतिम समय तक उनकी लेखनी चलती रही. 31 अक्टूबर, 2016 को 86 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. उनके अब तक 20 कहानी संग्रह और 13 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. उनके उपन्यास ‘सांड़’ और ‘सफेद घोड़ा काला सवार’ को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से पुरस्कृत किया गया. साहित्यकार हृदयेश को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने वर्ष 2005 का साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया.

कस्बे के परिवेश पर बुनी गयी इस रचना में लोक-संस्कृति के विविध रंग-रुप दिखाई देते हैं. लोक जुड़ाव लेखक की शक्ति है. दरअसल यह सामाजिक जद्दोजेहद और उसमें अपनी हैसियत बनाये रखने की मंशा रखने वाले चतुर्भुज शर्मा, बैकुंठ मित्तल, अशोक कुमार रायजादा, दीनदयाल वर्मा और जगदंबा प्रसाद गर्ग की कहानी है. यह एक व्यक्तिपरक उपन्यास है. क्योंकि व्यक्तियों के माध्यम से लेखक समाज के चित्र को प्रस्तुत करना चाहता है.

इस उपन्यास के केंद्र में उनका अपना कस्बानुमा शहर शाहजहांपुर है, जो उनका धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र रहा है. वह अपने कथानक को अपने सुपरिचित परिवेश से उठाते ही नहीं हैं उसी के ताने-बाने से उसको बुनते, गूंथते और रचते हैं. उपन्यास की शुरुआत लेखक द्वारा शहर की एक बस्ती के परिवेश के वर्णन से होती है. इसके इर्द-गिर्द कैरेक्टर जुड़ते चले जाते हैं और कथानक का विस्तार होता जाता है. उदाहरण के तौर पर देखें-

उस ऐसे शहर की ऐसी बस्ती की ऐसी गली के मुहाने वाले उस आयाताकार मकान के पूर्वी कोने में नीम का एक ऊंचा छतनार पेड़ था. मैदान में यहां-वहां धूप की चमक व तपिश थी जबकि पेड़ के नीचे का हिस्सा खुशगवार हवा सहेजे हुए पसरा था. वहां चार कुरसियां पड़ी थी. मैदान के पश्चिमी सिरे पर बने मकान में से धोती- कुर्ता पहने भरे-पूरे जिस्म का एक व्यक्ति निकलकर एक कुर्सी पर बैठ जाते है. इनका नाम चतुर्भुज शर्मा है. शर्मा जी सेवानिवृत प्रिंसिपल है.
 
पांच मिनट बाद शर्मा जी के पड़ोसी बैकुंठनाथ मित्तल दूसरी कुर्सी पर बैठ जाते हैं. वे स्वतंत्रता सेनानी हैं. चंद मिनट बाद वहां एक व्यक्ति और आकर बैठ जाते हैं. इनका नाम अशोक कुमार रायजादा है. ये रजिस्ट्रार ऑफिस में जमीन-जायदाद के खरीद-बिक्री का प्रलेख तैयार करते हैं. इस पेशे में उनका छोटा बेटा भी उनके साथ जुड़ जाता है. ये अपने बेटे को सरकारी महकमें के सारे गुर सिखाते हैं. मसलन रजिस्ट्रेशन की सरकारी फीस के अलावा अलग से बंधी हुई देनदारी और समय-समय पर स्टाफ के लिए चाय-पानी का इंतजाम बराबर होते रहना चाहिए. चौथी कुर्सी खाली थी. शर्मा जी तीन का अंक अशुभ मानते हैं. इसलिए वे कुर्सियों की संख्या तीन के बजाय चार रखते हैं. ये चौथी कुर्सी भी जब-तब भर भी जाती थी. इस चौथी कुर्सी पर विराजमान होते थे दीनदयाल वर्मा. वर्मा जी फूड इंस्पेक्टर हैं. बैठकों का दौर बदस्तूर जारी रहता है. बैठक की चर्चा के केन्द्र में स्वास्थ्य अपनी जगह बना ही लेता है. और इसके साथ-साथ हास्य-परिहास और काव्य संगम की गोष्ठी का आयोजन भी उस मैदान में होता है.

उपन्यास में कथानक को गतिमान बनाय रखने का लिए एक मजेदार कैरेक्टर जगदंबा प्रसाद गर्ग की एंट्री होती है. ये महाशय लड़कियों का एक स्कूल चलाते हैं. स्कूल में काम करने वाली अध्यापिकाओं को वेतन देते हैं 350 रुपए और रसीद पर हस्ताक्षर करवाते हैं पूरे 800 रुपए का. इनके बारे में यह चर्चा सरेआम है कि इनका दिल पत्थर जैसा है. इनका दिल तभी पसीजता है, जब ये अपनी पत्थर वाली बाई आंख पर हाथ फेरते हैं.

उपन्यास की विशिष्टता इसमें है कि वह क्या स्वस्थ है और क्या अस्वस्थ इसको विभिन्न कोणों व तमाम संभव रंगों व शेड्स के परिप्रेक्ष्य में देखता व परिभाषित करता हुआ मूल कथ्य के स्वर और संदेश का सफर दूर तक करता-कराता है, अपने देशकाल से भी परे जाकर. इस उपन्यास में सामाजिक तानेबाने को इतनी गहराई से कहानी के कैनवास पर उकेरा गया है कि यह लोगों दिल में रच-बस जाता है. और इसके साथ-साथ पाठक बड़ी बारीकी से स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य के बारे में पूरे विस्तार से जानकारी भी प्राप्त कर लेता है.
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पुस्तकः स्वस्थ अस्वस्थ लोग
लेखकः हृदयेश
विधाः उपन्यास
प्रकाशकः आर्य प्रकाशन मंडल
मूल्य: 300 रुपए
पृष्ठ संख्याः 154

# समीक्षक जवाहर लाल नेहरू इंडिया टुडे मीडिया इंस्टीट्यूट के छात्र हैं और साहित्य तक में प्रशिक्षु हैं.


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