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पुस्तक समीक्षाः आजाद हिंद फौज के अफसरों पर चले अभियोग की तहरीरें

हिंदी के तेजस्वी कवि धूमिल के गांव खेवली से वास्ता रखने वाले डॉ राहुल हिंदी की लिखी पुस्तक 'आजाद हिंद फौज: अफसरों पर अभियोग' पर साहित्य आजतक के लिए रोशनी डाल रहे हैं चर्चित आलोचक व कवि डॉ ओम निश्चल

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aajtak.in
ओम निश्चल नई दिल्ली, 11 March 2020
पुस्तक समीक्षाः आजाद हिंद फौज के अफसरों पर चले अभियोग की तहरीरें डॉ राहुल की पुस्तक आजाद हिंद फौज: अफसरों पर अभियोग का कवर

हिंदी के तेजस्वी कवि धूमिल के गांव खेवली से वास्ता रखने वाले डॉ राहुल हिंदी के सुधी समालोचक हैं. इनके पिता द्वारा स्थापित पुस्तकालय में कभी धूमिल भी पढ़ा करते थे. डॉ राहुल ने उन पर शोध किया है. इसके अलावा अपने पुस्तकालय में रखी फाइलों के सहयोग से उन्होंने आजाद हिंद फौज के मुकदमों की कार्रवाई की तहरीरों को एक आख्यान की शक्ल दी है. साहित्य आजतक के लिए इस पुस्तक पर रोशनी डाल रहे हैं चर्चित आलोचक व कवि डॉ ओम निश्चल

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस को लेकर अरसे से विमर्श होता रहा है. उनकी बनाई आजाद हिंद फौज से लेकर उनकी खुद की गुमशुदगी पर तरह -तरह की किंवदन्तियां प्रचलित रही हैं. इसलिए उसी अनुपात में उनके प्रति लोगों की जिज्ञासाएं भी बनी रही हैं. बहुतेरे राष्ट्रवादी मानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस अपनी युवावस्था में ही यदि नियति या षडयंत्रों का शिकार होकर अकाल कवलित या लापता न हुए होते तो आजाद भारत का नक्शा कुछ और होता. तब नेहरूवियन माडल का यह देश कुछ और होता. खैर जो अतीत है, और अपने हाथ में नहीं है, उस पर कहने को तो कुछ भी कहा जा सकता है, लेकिन आजाद हिंदी फौज के अफसरों पर जो अभियोग अंग्रेजों द्वारा चलाए गए, उसके क्या बिंदु थे, आजादी की लड़ाई में आजाद हिंद फौज की क्या भूमिका थी, यह ऐसे विचारणीय विषय हैं, जिनपर हमेशा देशवासियों की दृष्टि लगी रहती है. डॉ राहुल की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'आजाद हिंद फौज: अफसरों पर अभियोग' इस विषय पर पर्याप्त रोशनी डालती है.

हमारे बीच भले ही यह धारणा प्रचलित हो कि आजादी अहिंसा से मिल गयी, पर यह गौरतलब है कि गांधी की अहिंसानीति के साथ-साथ सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों ने जो बिगुल देशवासियों में फूंका, जिस तरह उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया तथा देश में जो क्रांति की मशाल जलाई, उसने अंग्रेजों को यह तो जता ही दिया था कि यह देश अब ज्यादा दिन गुलाम नहीं रहने वाला है. लोगों में जिस तरह से आजादी के प्रति लालसा जाग उठी थी तथा जिस तरह वे जुनून की हद तक क्रांति व हिंसा की किसी सीमा तक जा सकते थे, उसने भी अंग्रेजों को अपने फैसलों के लिए विवश किया. तभी अंग्रेजों ने गांधी-नेहरू के साथ धीरे-धीरे बातचीत कर एक रास्ता तैयार किया जो आजादी के मोड़ तक पहुंचा.

तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा- कहने वाले सुभाष कोई मामूली इंसान नहीं थे. उनसे गांधी व नेहरू दोनों के वैचारिक मतभेद थे, पर न तो नेता जी को इसकी परवाह थी, न ही नेहरू ने उसे कभी अपने मन में आने दिया. वह दौर ही अलग था, और उस दौर के हमारे नेता सही मायनों में जननायक थे. यही वजह है कि मतभेदों के बावजूद पंडित नेहरू आजाद हिंद फौज के सैनिकों पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा लगाए गए अभियोग की पैरवी करते रहे. उनके साथ सर तेज बहादुर सप्रू, कैलाश नाथ काटजू, भूला भाई देसाई, आसिफ अली भी थे. इस तरह भारत के ख्यात कानून विशेषज्ञ आजाद हिंद फौज के पक्ष में अभियोग का प्रतिवाद करने के लिए प्रस्तुत थे.

डॉ राहुल ने अभियोगों की फाइल खेवली वाराणसी से प्राप्त की, जिसे जतन से उनके पिता राजाराम लाल श्रीवास्तव ने श्री शंकर वाचनालय में सहेज कर रखा था. वहां से सुरक्षित दस्तावेजों के आधार पर डॉ राहुल ने आजाद हिंद फौज के अभियोगों पर लिखने का मन बनाया तथा इसके लिए उन्होंने दिल्ली के कैप्टन साथी से कुछ दुर्लभ जानकारियां एकत्र कीं तथा कानपुर निवासी श्रीमती मानवती आर्या, जो सैनिक की पत्नी थीं, उनसे चर्चा कर अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां लीं. उन्होंने नेताजी के निकट सहयोगी कैप्टन मोहन सिंह व कैप्टन सहगल, जो आजाद हिंद फौज के कर्मठ सेनानी थे, से भी बातें कीं. इस तरह इतिहास और कुछ उपलब्ध लोगों के हवाले से आजाद हिंद फौज के अभियोगों के सिलसिले में लिखी यह पुस्तक एक ऐतिहासिक उद्घाटन है.

डॉ राहुल द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार आजाद हिंद फौज के तीन सैनिकों पर अभियोग लगाए गए थे, जिन पर मुकदमे चले. मुकदमे की तारीखें निर्धारित होती थीं. पर इनके बारे में बहुत विस्तार से कहीं जानकारी नहीं है. डॉ राहुल ने केवल अभियोगों, अभियोजन पक्ष के साथ हुए सवाल-जवाब हीं नहीं, आजाद हिंद फौज की स्थापना, उसके उद्देश्य, नेताजी के विचारों की रोशनी में उसके ऐतिहासिक महत्त्व को रेखांकित करने का यत्न किया है. आजाद हिंद फौज का गठन, आजाद हिंद सरकार का घोषणापत्र, फौजी न्यायालय की कार्य पद्धति, मुकदमे की कार्यवाही, सबूत पक्ष की गवाहियां, तमाम गवाहों से जिरह के रोमांचक संवाद भी उन्होंने इस पुस्तक में दिए हैं, जो उस दौर के पूरे हालात को उद्घाटित करते हैं. आजादी के इतिहास के ये वे स्वर्णिम पृष्ठ हैं जिन पर ऐसे वीर सेनानियों के बलिदान की कहानियां दर्ज है. समर्पित पैरवीकार वकीलों की टोली ने जिस तरह नेताजी के आजाद हिंद फौज के सेनानियों पर लगे अभियोगों की पैरवी की है, वह यह जाहिर करता है कि देश प्रेम का जज्बा व पेशे का आदर्श उस समय किस उच्च स्तर पर था.

आज नेता जी के बारे में अनेक किंवदन्तियां प्रचलित हैं. अरसे तक यह कहा जाता रहा कि वे जीवित हैं या वे इस जगह पर देखे गए थे. वेश बदल कर रहते हैं आदि आदि. पर उनकी गुमशुदगी व मृत्यु के बारे में सुनिश्चित कुछ भी ज्ञात नहीं है. ऐसे वीर पुरुष जो वीरता के लिए जाने जाते हैं, वे निश्चय ही वेश बदल कर नहीं रह सकते. आजादी का फल देश ने भले ही 1947 में चखा पर इस परिणाम के पीछे आजाद हिंद फौज की भी अपनी भूमिका है जिसे विस्मृत नहीं किया जा सकता. डॉ राहुल की यह कृति इतिहास को एक रोचक अंदाज में प्रस्तुत करती है और जिस अंदाजेबयां के साथ गवाहियां व गवाहों से जिरह का पाठ निर्मित किया गया है, वह उनकी लेखकीय कुशलता का परिचायक है. पुस्तक 'आजाद हिंद फौज: अफसरों पर अभियोग' निश्चय ही एक महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसके लिए लेखक साधुवाद का पात्र है.
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पुस्तकः आजाद हिंद फौज: अफसरों पर अभियोग
लेखक: डॉ राहुल
विधाः इतिहास/ दस्तावेज
भाषाः हिंदी
प्रकाशक: हर्ष पब्लिकेशंस
मूल्यः 595/-

#समीक्षक हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. कई पुस्तकों के लेखक व कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं. संपर्कः डॉ ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059. मेल dromnishchal@gmail.com

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