पुस्तक समीक्षाः आखिरी झूठ; इस संकलन की हर कहानी कुछ कहती है

साहित्य समाज का आईना है और समाज साहित्य के बिना अधूरा है. इस बात का प्रतिपादन कथाकार हरीलाल 'मिलन' द्वारा लिखे गए कहानी संग्रह 'आखिरी झूठ' की हर कहानी करती है.

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aajtak.in नई दिल्ली, 12 September 2019
पुस्तक समीक्षाः आखिरी झूठ; इस संकलन की हर कहानी कुछ कहती है कहानी संग्रह 'आखिरी झूठ' का कवर

साहित्य और समाज के बीच अटूट रिश्ता है, साहित्य समाज का आईना है और समाज साहित्य के बिना अधूरा है. इस बात का प्रतिपादन कथाकार हरीलाल 'मिलन' द्वारा लिखे गए कहानी संग्रह 'आखिरी झूठ' की हर कहानी करती है. उत्तर प्रदेश सरकार में श्रम प्रवर्तन अधिकारी रहे हरीलाल 'मिलन' के जीवन अनुभव उनकी सभी कहानियों में दिखते हैं. खास बात यह कि उन्होंने गीत, ग़ज़ल और उपन्यास से भी अपनी प्रभावी छाप छोड़ी है. 'आखिरी झूठ' उनका ताजा कहानी संकलन है.

हरीलाल 'मिलन' की कहानियों का कोई भी पात्र हमें यह अहसास करा देता है कि अरे, 'यह पात्र तो हमारे पड़ोस में ही रहता है. अरे, इसके साथ भी तो बिल्कुल ऐसा ही हुआ है, जैसा हमारे साथ होता रहता है.' समाज के विभिन्न पहलुओं पर लिखी गई इस संकलन में शामिल उनकी कहानियां दिल को छू जाती हैं.

इस कथा संग्रह की पहली कहानी 'समर्थन', जिसमें अपर्णा का प्रभावशाली किरदार आपको अपना सा लगेगा. सामाजिक यथार्थ से टकराती अपर्णा आखिरकार अपने वजूद को पहचानती है और अपने पति से डाइवोर्स लेने का निर्णय लेती है. अपर्णा के इस फैसले में उसके पिता भी पूर्ण समर्थन करते हैं. अपर्णा का निर्णय नारी शक्ति एवं स्वाभिमान का प्रतीक है.

'आखिरी झुठ' कहानी जिस पर कथाकार ने अपने कहानी का नामकरण किया है कि कहानी एक गरीब की मजबूरी, लाचारी की कथा है. कहानी के पात्र कुसुमा और पुन्नू गरीबी के मारे एक दूसरे में भाई-बहन के रूप में अपना सहारा ढूंढ लेते हैं. किन्तु कुसुमा को पता चल जाता है कि पुन्नू इतने दिनों से अंधे होने का नाटक कर रहा होता है. इसके बाद वह उसे घर से निकल जाने का आदेश देती है. कहानी का समूचा परिदृश्य बड़ा मार्मिक है.

कुसुमा जब उसे निकल जाने का आदेश देती है तो पुन्नू अपनी विवशता समझाते हुए उससे कहता है, '... ईमानदार बनने से भीख नहीं मिलती थी. आखिर मैं अंधे का नाटक कर भीख मांगने लगा. लोगों को मुझपर दया आने लगी...' पुन्नू की मजबूर गरीबी और अंधे होने की झूठी लाचारी भी कुसुमा को डिगा नहीं पाती. कुसुमा अपने दिल पर पत्थर रख कर इस आखिरी झूठ की सजा पुन्नू को अपने से जुदा कर देती है.

हिन्दू-मुस्लिम एकता पर रची कहानी 'भीतर का इंसान' मानवता, प्रेम और भाई-चारे का संदेश देती है. कहानी में व्योम कहता है, 'हम सब एक ही के बन्दे हैं- चाहे अल्लाह कहो या भगवान.' लेखक की इस कहानी से मन भर आता है. यह कहानी यह सिखाने में सफल रहती है कि सभी धर्मों से बड़ा एवं महत्त्वपूर्ण धर्म इंसानियत का होता है.

'हम भारत के लोग' कहानी लेखक के अंदर का देशप्रेम दिखाती है. दिव्या और उसका पति भरत अमेरिका की चकाचौंध से प्रभावित हो उसमें खो जाते हैं, लेकिन अपने वतन भारत की पुकार उनके कानों में गूंजती रहती है. लेखक बड़ी ही सहजता और संवेदना से बताता है कि भारतीय कहीं भी चले जाएं पर भारत उसके दिल में सदैव बसता है.

भ्रूण- हत्या जैसे संवेदनशील और सामाजिक मुद्दे पर लिखी कहानी 'भ्रूण' संग्रह की एक उत्तम कहानी है. और ये मात्र एक कहानी नहीं बल्कि एक ऐसा सच है जिसको हम अनदेखा नहीं कर सकते. जिस कन्या भ्रूण को पति शिवदयाल नष्ट करना चाहता था वहीं भ्रूण आगे चल कर अपने पिता को नया जीवन प्रदान करती है. ये कहानी आपकी आंखे नम कर देंगी.

संवेदना जगाने में सक्षम हरीलाल 'मिलन' का कहानी संग्रह 'आखिरी झूठ' कौतूहल के साथ-साथ संदेश भी प्रदान करती है. इस कहानी संग्रह में चौदह कहानियां हैं. इन कहानियों को पढ़ने में अधिक समय नहीं लगता. इस कहानी संग्रह में समाज के छुए- अनछुए पहलुओं पर बड़ी ही गंभीरता और अपनेपन के साथ लिखा गया है. भाषा बेहद सहज और प्रभावी है. पात्रों के नाम भी उनकी पृष्ठभूमि के साथ न्याय करते हैं.

यही वजह है कि कहानीकार हरभजन सिंह मेहरोत्रा ने इस संकलन के बारे में इसके भीतरी आवरण पर लिखा कि 'किस्सागोई' की शैली लिखी इन कहानियों में भाषा की आंचलिकता और रोचकता अपनी पूरी लय और रिद्म के साथ सामने आयी है. इन कहानियों में कथाकार हरीलाल 'मिलन' की निपुणता, कला-कौशल और अभिव्यक्ति का सामर्थ्य पूर्ण-रूपेण परिलक्षित हो रहा है.

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पुस्तकः आखिरी झूठ
लेखक: हरीलाल 'मिलन'
विधाः कहानी संग्रह
प्रकाशकः ज्ञानोदय प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 119
मूल्यः 350/ रुपए 

# इस पुस्तक की समीक्षा ईशी कानोडिया ने की है.

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