वामपंथी विचारधारा के समर्थकों के किए धरे का कच्चा-चिट्ठा खोलती एक किताब

वरिष्ठ पत्रकार व संघ समर्थक लेखक अनंत विजय की पुस्तक 'मार्क्सवाद का अर्धसत्य' वामपंथी विचारधारा के समर्थकों के किए धरे का सारा कच्चा-चिट्ठा हमारे सामने खोल कर सामने रखती है

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aajtak.in नई दिल्ली, 02 August 2019
वामपंथी विचारधारा के समर्थकों के किए धरे का कच्चा-चिट्ठा खोलती एक किताब पुस्तक 'मार्क्सवाद का अर्धसत्य'

एक वक्त था गांधी बेनकाब, नेहरू बेनकाब जैसी पुस्तकें आईं जिनका मकसद उनके शीर्षक से ही प्रकट हो जाता था. भारत में सदियों से मत-मतांतर पर शास्त्रार्थ होते रहे हैं; तभी कहा जाता रहा है: मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना:. देखा जाए तो भारत में तमाम भारतीय विचार दर्शनों के होते हुए भी जिस विचारधारा से यहां के बुद्धिजीवी बहुधा आक्रांत और प्रभावित रहे हैं वह है मार्क्सवादी विचारधारा. वह जितना राजनीति में नहीं प्रभावी है, उससे ज्यादा वह लेखन में प्रभावी है. यह मान लिया गया है कि जो मार्क्सवादी नहीं है वह लेखक ही नहीं है. लिहाजा आज मम्मट, भास, भवभूति, कालिदास, पंडितराज जगन्नाद, आचार्य कुंतक, भामह जैसे लेखकों, वैयाकरणों के बदले बात-बात पर फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको सहित मार्क्सवादी विचारकों टेरी इगल्टंन, ग्राम्शी, थियोडोर अडोर्नो, एरिक फ्राम, हर्बर्ट मार्क्यूस, फ्रेडरिक जैम्सन, जैम्सन, डेविड हार्वे आदि के उद्धरण दिए जाते हैं. विचारधारा के इसी रेजीमेंटेशन को लेकर कुंवर नारायण जीवन भर किसी भी विचारधारा के प्रभाव से अपने को बचाए रहे, कैलाश वाजपेयी भारतीय व पाश्चात्य दर्शनों के निष्णात विद्वान व अध्येता थे पर उन्होंने भी किसी एक विचारधारा को अपने ऊपर प्रभावी नहीं होने दिया तथा अपने लेखन में धुर प्रगतिशील वयोवृद्ध लेखक डा. रामदरश मिश्र की वामपंथी बुद्धिजीवी लगातार उपेक्षा करते रहे.

कौन नहीं जानता कि एक अरसे तक हिंदी के सुपरिचित कवि, आलोचक अशोक वाजपेयी मार्क्सवादियों को निंदित करते रहे किन्तु असहिष्णुता को लेकर चली मुहिम में सरकार को घेरने व पुरस्कार लौटा कर सरकार का विरोध करने के उनके व अन्य लेखकों के अभियान की नुमाइंदगी करने के कारण वामपंथी लेखक उनके करीब आ गए. हालांकि उनकी विचारधारा आज भी वामपंथ से कोसों दूर है. वह अपने बुनियादी स्वभाव में कलावादी व मानवीय प्रतिश्रुतियों की समर्थक व बहुवचनीयता के समर्थक रहे हैं.

इधर हाल में आई वरिष्ठ पत्रकार व संघ समर्थक लेखक अनंत विजय की पुस्तक 'मार्क्सवाद का अर्धसत्य' वामपंथी विचारधारा के समर्थकों के किए धरे का सारा कच्चा-चिट्ठा हमारे सामने खोल कर सामने रखती है तथा बताती है कि वामपंथी विचारधारा की सारी लड़ाई किसी नैतिकता की लड़ाई नहीं बल्कि मुहिमबद्ध होकर की गयी निहित स्वार्थपरता की लड़ाई है. कहना न होगा कि जिस तरह 90 के दशक के बाद से भारतीय राजनीति में धर्म और राष्ट्रवाद आदि का बोलबाला हुआ है, कांग्रेस ने निरंतर अपना जनाधार खोया है तथा तमाम कथित घोटालों व परिवारवादी राजनीति के चलते उसे जनता ने उत्तरोत्तर नकारा है. क्षेत्रीय पाटियों का वर्चस्व शुद्ध स्थानीयतावादी राजनीति से प्रेरित प्रभावित रहा है तथा राष्ट्रीय राजनीति व जनतांत्रिकता को लेकर उसकी कोई उदारवादी और उत्तरदायी रणनीति नहीं रही है. लेखन में प्रतिपक्ष की भूमिका का निर्वाह करने वाली वामपंथी राजनीति भी धीरे-धीरे उजाड़ की ओर अग्रसर रही है. लिहाजा एकाध राज्यों में वामपंथ की पहचान बेशक बची हो, हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल में दशकों से सत्तारूढ़ रहे वामपंथ का कोई नामलेवा तक नहीं है. हाल के चुनावों में खुद वामपंथी इकाइयों ने तृणमूल पार्टी के भय से अपना समर्थन जिस तरह नेपथ्य से भाजपा के हवाले किया है वह इस बात का सबूत है कि मार्क्सवादी विचारधारा की चूलें हिल चुकी हैं तथा इसे निरंतर कमजोर करने में संघी रणनीति का कम, खुद वामपंथी राजनीतिज्ञों का ज्यादा हाथ रहा है.  

जब स्वयं में वामपंथी व मार्क्सवादी विचारधारा अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजेहद में है, अनंत विजय ने पिछले कुछ वर्षों में विचाराधारा के मोर्चे पर भारतीय मार्क्सवादियों की हताशा के अनेक उदाहरणों से यह जताने की चेष्टा की है कि वामपंथी बुद्धिजीवियों की असली हकीकत क्या है, उनके इस्लाम प्रेम की वजह क्या है। रचनाओं को मजहबी आईने से देखने के पीछे की क्या वजह रही है तथा समूची हिंदी आलोचना विचारधारा की संकीर्णताओं की बंदी क्यों है? उन्होंने बुद्धिजीवी, वामपंथ और इस्लाम, विचारधारा की लड़ाई या यथार्थ की अनदेखी, विचारधारा की जकड़न में आलोचना, साहित्यिक बाजार मेला और लेखकीय छद्म, प्रगतिशीलता की ओट में राजनीतिक आखेट, बौद्धिक छलात्कार के मुजरिम, जब छीज रहा था वामपंथ...आदि छोटे बड़े आलेखों के माध्यम से यह सिद्ध करने का यत्न किया है कि वामपंथ जनता में अपनी पहचान खो चुका है तथा वामपंथी विचारक स्वभाव से ही विवादप्रिय हैं, उन्हें सत्ता का आस्वाद मेज कुर्सी पर बैठे बिठाए चाहिए. हर वाजिब बात पर हंगामा खड़ा करना उनका मकसद बन चुका है.

हालांकि वाम बुद्धिजीवियों में जीवन व कर्म में यह फाँक कोई नई बात नहीं है और यह किस विचारधारा के लोगों में नहीं है पर बरसों पहले दस्तावेज के अपने संपादकीयों में साहित्य अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने रामविलास शर्मा को लेकर नामवर जी के लेख 'इतिहास की शवसाधना' का तीखा प्रत्याख्यान करते हुए बताया था कि यह वही जड़ी सौंदर्याभिरुचि है जिसकी तीखी आलोचना कभी मुक्तिबोध ने किया तथा उसके जरिए उन्होंने नई कविता में छाई इस प्रवृत्ति की आलोचना की है. एक अन्य लंबे लेख में तिवारी जी ने वामपंथ के भीतर की तानाशाही की पूरी शल्य क्रिया की, जहां न तो अभिव्यक्ति की आजादी का कोई मतलब रहा है न लेखकीय स्वतंत्रता की. उन्होंने कथित वामपंथी लेखक राजेंद्र यादव के छलात्कारों की भी धज्जियां उड़ाईं, जिनका कोई समुचित उत्तर अपने रहते न नामवर जी ने दिया न राजेंद्र यादव ने. शायद तिवारी जी अपनी आगामी प्रकाश्य डायरी में पुरस्कार वापसी को लेकर रची गयी व्यू्ह-रचना की असली पटकथा की वजहें बताएं जिसके कारण सरकार को आरोपों के घेरे में लेने की मुहिम चलाई गयी.

इसमें कोई संदेह नहीं कि हाल के वर्षों में प्रतिपक्ष के अनेक बुद्धिजीवियों दाभोलकर व पानसारे आदि की हत्याएं हुईं और यह किसी भी सरकार के लिए अच्छी बात नहीं है जहां सैद्धांतिक विरोधों को लेकर लेखकों व कवियों की हत्याएं की जाएं या गाय या गोमांस के नाम पर मॉबलिंचिंग की जाए, धर्म व जाति के नाम पर लोगों को प्रताड़ित किया जाए पर ऐसी घटनाओं को पिक एंड चूज की तर्ज पर उठाने व उन्हें तूल देने की रणनीति का अनंत विजय ने अनेक लेखों में जबर्दस्त विरोध किया है.

अपनी भूमिका में सबसे पहले तो उन्होंने मार्क्स व मार्क्सवाद के बौद्धिक प्रत्ययों का निर्वचन किया है. मार्क्स के अनुयायियों माओत्सेतुंग व फिदेल कास्त्रो के नायकत्व को विवस्त्र किया है. खुद विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने मार्क्सवादी तानाशाही के मामले में स्टालिन आदि के कई उदाहरण आलोचना के हाशिए पर पुस्तक के अपने लेख में दिए हैं।.

अनंत विजय ने आपातकाल का समर्थन करने के लिए प्रगतिशील लेखक संघ के फैसले को आड़े हाथो लिया है तथा माना है कि शायद यही वजह है कि आपातकाल के समर्थन के एवज में ही कांग्रेस ने वामपंथियों को सदैव सिर माथे बिठाए रखा. उनका तर्क है कि सिखों का संहार हुआ, मुजफ्फरपुर के दंगे हुए, ऐसे अनेक हादसे हुए पर तब लेखकों ने पुरस्कार नहीं लौटाए, सपा सरकार ने हजारों की रकम लेखकों को बांटी तथा उसकी एवज में लेखकों ने मुंह बंद रखे पर भाजपा सरकार का विरोध करने के लिए मुद्दे तलाशे गए. उन्होंने यहां अशोक वाजपेयी की अगुआई में चले पुरस्कार विरोधी मुहिम की भी बारीक पड़ताल की है.

अनंत विजय का कहना है कि यह पुस्तक मार्क्सवाद की सैद्धांतिकी पर नहीं, उसके अनुयायियों के कार्यकलापों और उनकी सुनियोजित रणनीतियों का खुलासा है. जिस लहजे में कभी अपने इंटरव्यूज में अशोक वाजपेयी वामपंथियों को अचूक अवसरवादी इत्यादि विशेषणों से नवाजते रहे हैं लगभग उसी लहजे में आज के वामपंथियों के विचलनों की पग-पग पर खबर लेने में अनंत विजय ने कोई रियायत नहीं बरती है.  

अनंत विजय का नाता पत्रकारिता के साथ-साथ चूंकि साहित्य से भी है लिहाजा वे बातबात पर साहित्यिक मुद्दों को अपनी बहस में उद्धृत करते हैं. वे कहते हैं प्रेमचंद ने जब प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में यह बात कही थी कि साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे चलने वाली मशाल है, तो शायद उन्हें यह भान नहीं था कि ये लेखक एक दिन अपनी अपनी पार्टी के पिछलगुवा बन कर उसकी मशाल थाम कर चलेंगे. अशोक वाजपेयी कहा करते हैं कि कम्युनिस्ट या कोई भी पार्टी अपने अनुयायी लेखकों को कोई तरजीह नहीं देती, उनकी बातों का नोटिस तक नहीं लेती जबकि लेखक स्वयं उनके पैरोकार बने रहते हैं.

इस पुस्तक का लेखक उस सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म के खतरे से आगाह करता है जहां याकूब की फांसी की सजा को मजहब से जोड़ कर देखा जाता है तथा किसी एक कट्टरपंथी की किसी लेखक को दी गयी धमकी से वामपंथियों को फासीवाद की आहट सुनाई देने लगती है. लेखक इस बात पर अचरज व्यक्त करता है कि एक तरफ अरुंधती राय खून से हाथ रंगने वाले माओवादियों के आंदोलन को जनांदोलन साबित करने की कोशिश करती हैं दूसरी तरफ फांसिस इंदुवर, दिवाकर भट्टाचार्य और जयराम हासदा व लक्ष्मीदास की बर्बर हत्या के खिलाफ न तो एक शब्द बोला जाता है न लिखा. यह पुस्तक उन तमाम चुनी हुई चुप्पियों के खिलाफ दस्तावेज़ का पुलिंदा है जिसे लेकर अक्सर वाद-विवाद और आरोप प्रत्यारोप लगाए जाते रहते हैं.

यों तो शीर्षक से यह पुस्तक चौंकाती है जैसे यह मार्क्सवाद की वैचारिकी की अस्तित्वहीनता का दस्तावेज़ हो और यह भी कि विश्वस्तर पर मार्क्सवाद के दिन लद चुके हैं. हालांकि कमोवेश हो यही रहा है. पर साथ ही हकीकत यह भी है कि वामपंथी नेताओं या दलों की विफलता विचारधारा की विफलता नहीं कही जा सकती. यदि इसे किसानों मजदूरों के आत्यंतिक हितों की विचारधारा के रुप में भारतीय परिवेश में लागू किया जाता, तो ऐसी कोई वजह नहीं थी कि यह विफल होती. किन्तु न तो यह हिंसक माओवादियों के विरोध में रही, न किसानों मजदूरों के हकों की लड़ाई लड़ सकी. तभी एक प्रगतिशील जनगीतकार यश मालवीय को लिखना पड़ा: ''कमरों में कामरेड बैठे हैं/ सड़कों पर खून बह रहा है.''  इसलिए यह पुस्तक मार्क्सवाद का अर्धसत्य‍ हो न हो, हमारे आज के ढुलमुलयकीनी, स्वार्थपरता के वशीभूत, पद-पुरस्कार-लोलुप, आत्मोमुग्ध व सत्ता की कृपा के आकांक्षी मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों के छद्म पर क्षोभ का इज़हार अवश्य है जो 'अपनी अपनी ढपली अपने अपने राग' में निमग्न हैं. जिस तरह से मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों के विचलनों को एक-एक कर उठाया गया है, उससे लगता है लेखक पहले से इस बद्धमूल पूर्वग्रह का हामी है कि सारे मार्क्सवादी बुद्धिजीवी असत्य या फिर अर्धसत्य के पोषक हैं.

***
पुस्तक: मार्क्सवाद का अर्धसत्य
लेखकः अनंत विजय
विधाः आलोचना/विमर्श
प्रकाशकः वाणी प्रकाशन
मूल्यः 695 रुपये
पृष्ठ संख्याः  295

# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि-गीतकार, आलोचक एवं भाषाविद हैं. उनसे जी-1/506 ए, उत्तम नगर नई दिल्ली- 110059, dromnishchal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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