पुस्तक समीक्षाः मैं हूं खलनायक; बॉलीवुड खलनायकों की विकिपीडिया सरीखी किताब

'मैं हूं खलनायक' हिंदी सिनेमा के खलनायकों पर लिखी गई किताब है. इस किताब में हिंदी सिनेमा के सौ सालों के इतिहास के साथ सौ खलनायकों के बारे में भी जानकारी दी गई है. ऐसे-ऐसे खलनायक जिन्हें परदे पर देखते तो आप पहचान सकते हैं, पर जिन्हें लेकर जानकारी कहीं मिलती नहीं.

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 12 September 2019
पुस्तक समीक्षाः मैं हूं खलनायक; बॉलीवुड खलनायकों की विकिपीडिया सरीखी किताब मैं हूं खलनायक: बॉलीवुड खलनायकों की विकिपीडिया सरीखी किताब

नायक नहीं खलनायक हूं मैं जुल्मी बड़ा दुखदायक हूं मैं... संजय दत्त पर फिल्माया गया 'खलनायक' फिल्म का यह गाना यों तो खलनायकों को महिमामंडित नहीं करता, पर कल्पना कीजिए कि अगर फिल्मों में खलनायक न होते तो क्या होता? बालीवुड में अगर कोई स्टार, सुपर स्टार या मेगा स्टार बना तो इसीलिए कि उसे शानदार खलनायक मिले. जाहिर है खलनायकी का अपना हीरोडम है. पत्रकार फजले गुफरान की किताब 'मैं हूं खलनायक' हिंदी सिनेमा के इन्हीं कलाकारों पर लिखी गई किताब है.

हिंदी सिनेमा के इतिहास से शुरू कर यह किताब खलनायकों के परिचय, उनके पारिश्रमिक, किस्से, संघर्ष आदि के बारे में बताती है. इस किताब में हिंदी सिनेमा के सौ सालों के इतिहास के साथ सौ खलनायकों के बारे में भी जानकारी दी गई है. ऐसे-ऐसे खलनायक जिन्हें परदे पर देखते तो आप पहचान सकते हैं, पर जिन्हें लेकर जानकारी कहीं मिलती नहीं. खास बात यह कि इनमें हीरो को बराबरी की टक्कर देने वाले नामचीन खलनायकों के साथ उन छोटे-मोटे खलनायकों का भी पूरी तफ्सील से जिक्र है, जो अक्सर मुख्य खलनायक के गुर्गे, प्यादे, पिछलग्गू, गैंग मेंबर या वसूलीमैन के रूप में हमें दिखते तो रहे हैं, लेकिन याद नहीं रहे.

यह किताब खलनायकों के बहाने सिनेमा के उस दौर की बात भी करती है, जब परदे पर निभाए गए चरित्र को नकली न मानकर असली माना जाता था, इसीलिए हीरो तो देवतुल्य बनकर पूजा तक पा जाता था. पर खलनायक के हिस्से में परदे पर निभाए गए चरित्र के चलते सिर्फ गालियां ही आती थीं. यह वह दौर था जब लोग नकारात्मक किरदार निभाने वाले कलाकारों को असल जिंदगी में भी बुरा इनसान ही समझते थे. अभिनेता रंजीत और शक्ति कपूर ने तो लंबे समय तक यह दर्द झेला है. शक्ति कपूर की बेटी और बेहतरीन अदाकारा श्रद्धा कपूर को तो अब भी कई टीवी शोज में 'आऊ' कहकर चिढ़ा भी दिया जाता है.

यह किताब कई कलाकारों से की गई एक मुकम्मल बातचीत का यादगार सफर लगती है, जिसमें उनके अंदर से एक ऐसा इनसान बोलता है, जिसे शायद किसी ने सुनने की कभी जहमत ही नहीं उठाई. अभिनेता रजा मुराद की बातें हैरान कर देने वाली हैं, तो सोनू सूद की बातों में उत्साह और उम्मीदें झलकती हैं. दिग्गज अभिनेता प्रेम चोपड़ा अपने और मौजूदा दौर के खलनायकों के बारे में बेबाकी से बातें करते हैं, तो मुकेश ऋषि खलनायकी और चारित्रिक किरदारों के महान अदाकारों में शामिल प्राण और अजीत के बारे में बताते हैं.

किताब में नई पीढ़ी के खलनायकों की निजी और व्यावसायिक दोनों बातों की चर्चा है. प्राण साहब, प्रेम चोपड़ा, अजीत, जीवन, प्रेम नाथ, मदन पुरी, अमरीश पुरी, अमजद खान, डैनी, अनुपम खेर, गुलशन ग्रोवर, शक्ति कपूर, कबीर बेदी, गोगा कपूर, सोनू सूद, राहुल देव, आशुतोष राणा और प्रकाश राज आदि के बारे में रोचक जानकारियां हैं, तो दूसरी ओर के. एन. सिंह, कन्हैयालाल, बीएम व्यास, कमल कपूर, शेख मुख्तयार, देव कुमार, अनवर हुसैन, राम नरायण तिवारी, चंद्र मोहन आदि के दिलचस्प ब्यौरे शामिल हैं.

इस किताब में बाब क्रिस्टो से लेकर मोहन आगाशे, शैरी मोहन, सुधीर, मैक मोहन, महेश आनंद, जोगिंदर, तेज सप्रू, जानकी दास, रमेश देओ सहित ढेरों खलनायकों का जिक्र है. इनके अलावा किताब में ऐसे बड़े कलाकारों का भी जिक्र है, जिन्होंने बड़े परदे पर खलनायक की भूमिका निभाई. ऐसे लोगों में शाहरुख खान, जॉन अब्राहम, आमिर खान, सोनू सूद, विवेक ओबेरॉय, अजय देवगन, अक्षय कुमार, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, रणवीर सिंह सहित कई और कलाकार भी शामिल हैं.

पर यह किताब खलनायिकाओं को लेकर कंजूसी बरतती है. फजले गुफरान की किताब में बमुश्किल से 10 खलनायिकाओं का जिक्र है, जिनमें नादिरा, शशिकला, ललिता पंवार, हेलन और बिंदु जैसी खलनायिकाओं के अनजाने किस्सों के साथ 1940 के दौर की खलनायिका कुलदीप कौर का वह किस्सा भी इसमें शामिल है कि बंटवारे के समय वह किस तरह अकेले कार चलाकर दिल्ली होते हुए लाहौर से बंबई आ गई थीं.

बावजूद इसके किताब खलनायिकाओं के साथ न्याय करती नहीं दिखती. जबकि कोई दौर ऐसा भी था कि बॉलीवुड की कोई फिल्म इनकी अदाकारी के बिना पूरी नहीं हो सकती थी. सिनेमा में महिला खलनायिकाओं की नकारात्मक भूमिकाओं की अहमियत को ऐसे भी समझा जा सकता है कि पुराने से लेकर आधुनिक दौर तक की नामी हीरोइनें भी ऐसे रोल को निभाती रही हैं. हेमामालिनी, जीनत अमान, परवीन बाबी, माही गिल, कल्कि कोचलिन, प्रियंका चोपड़ा, विद्या बालन, काजोल, ऋचा चड्ढा तक इनमें शामिल हैं.

हर किताब की तरह इस किताब में भी कुछ अच्छाई तो कुछ खामियां भी हैं. शुरुआत अच्छी है. जब तक पुराने दौर के खलनायकों प्राण, अमरीश पुरी, अमजद खान की बात करती है, सब कुछ ठीक-ठाक चलता है मगर उसके बाद चीजें बहुत तेजी से सिमटती जाती है. फजले बहुत कुछ देने के चक्कर में काफी कुछ छोड़ने लगते हैं. किस्सागोई और रोचक जानकारियां कम होते शब्दों के साथ धीरे-धीरे तारीखों और घटनाओं से भरे आंकड़ों में सिमटने लगती है.

लगता है समकालीन दौर के सभी खलनायकों और उनसे जुड़ी बातों, जानकारियों को समेटने के चक्कर में फजले गुफरान इसे विकिपीडिया सा बना देते हैं. उन्होंने जिस ढंग से इसकी शुरुआत की वह चाहते तो इसे दो खंडों में बांट सकते थे. पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. लेखक और प्रकाशक इस किताब को सिने प्रेमियों के साथ-साथ सिनेमा के छात्रों के लिए टेक्स्टबुक सरीखा बताते हैं. इस प्रयास में वे सफल भी हुए हैं. तथ्यों और जानकारी के लिहाज एक दस्तावेज के रूप में इस किताब की अपनी अहमियत है.

पुस्तकः मैं हूं खलनायक

लेखक: फजले गुफरान

प्रकाशक: यश पब्लिकेशंस

मूल्यः 399 रु

पृष्ठ संख्याः 352

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