तसलीमा का नया उपन्यास 'बेशरम'; बेगानी आबो-हवा में सांस लेते निर्वासितों की कहानी

'लज्जा' उपन्यास में बांग्लादेश में सांप्रदायिक दंगों के कारण अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हुए अत्याचार तथा वहां से हिन्दुओं के पलायन को कहानी का आधार बनाया गया था, वहीं 'बेशरम' उपन्यास बेगानी आबो-हवा में सांस लेते हुए जीने की नई मुहिम शुरू करने वाले सुरंजन, किरणमयी और माया की कहानी हैं.

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जवाहर लाल नेहरूनई दिल्ली, 17 June 2019
तसलीमा का नया उपन्यास 'बेशरम'; बेगानी आबो-हवा में सांस लेते निर्वासितों की कहानी तसलीमा का नया उपन्यास 'बेशरम'

सुख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन का नया उपन्यास 'बेशरम' आया है. इस उपन्यास में निर्वासन के कारण उपजे सामाजिक हालात और उन परिस्थितियों में संघर्षरत लोगों के सामाजिक-आर्थिक दशा को कहानी के कैनवास पर उकेरा गया है. 'बेशरम' उपन्यास तसलीमा नसरीन के 'लज्जा' उपन्यास की उत्तर कथा है. इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. उपन्यास का बांग्ला भाषा से हिंदी में अनुवाद उत्पल बैनर्जी ने किया है. जहां 'लज्जा' उपन्यास में बांग्लादेश में सांप्रदायिक दंगों के कारण अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हुए अत्याचार तथा वहां से हिन्दुओं के पलायन को कहानी का आधार बनाया गया था, वहीं यह उपन्यास बेगानी आबो-हवा में सांस लेते हुए जीने की नई मुहिम शुरू करने वाले सुरंजन, किरणमयी और माया की कहानी हैं.

'बेशरम' उपन्यास के सभी पात्र निश्चित रूप से उन चेहरों की अक्काशी करते हैं जिन्हें साम्प्रदायिक उन्माद और अत्याचार के कारण अपना मुल्क़ छोड़कर गैर-मुल्क़ में जीवन-बसर करने के लिए संघर्ष करना पड़ा है. 'लज्जा' उपन्यास के कारण ही बांग्लादेश में कट्टरपंथी समूहों द्वारा लेखिका तसलीमा नसरीन पर फतवा जारी किया गया था तथा किताब पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था. लेखिका ने खुद निर्वासन जैसी परिस्थितियों का सामना किया है और आज भी निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहीं हैं.

उपन्यास की शुरुआत लेखिका द्वारा कोलकाता में अचानक 'लज्जा' के एक पात्र सुरंजन से मुलाक़ात से होती है. यह वहीं सुरंजन है जिसको केन्द्र में रखकर लज्जा उपन्यास लिखा गया था. लेखिका इस बात से बेख़बर है कि सुरंजन और उसके परिवार के लोग बांग्लादेश में 1993 के सांप्रदायिक दंगों में बच गए थे और बांग्लादेश से पलायन कर भारत में आकर बस गए है. इस मुलाक़ात में लेखिका को पता चलता है कि सुरंजन के पिता सुधामय का देहांत हो चुका है तथा उसकी बहन और मां किरणमयी जिन्दा हैं. उपन्यास के आखिरी में लेखिका का मुलाक़ात जुलेखा से होता है और उसी के साथ बातचीत करते कहानी ख़त्म हो जाती है.

दरअसल समूचा उपन्यास एक ऐसे कथानक में गुंथा है कि उसके भाव बिना उसके कुछ अंशों को पढ़े बिना स्पष्ट नहीं होते. कुछ उदाहरणः

मैंने जब माया के बारे में पूछा तो किरणमयी रो पड़ीं. वे रोती-रोती बोलीं कि उसकी बात मत पूछो मां, उसका दिमाग ठीक नहीं है. उसका दिमाग खराब हो गया है. अब उससे क्या मिलोगी? उसे देखकर तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा.

मैंने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा- आप लोगों की यह दशा देखकर मुझे क्या अच्छा लग रहा है? मेरा मन कह रहा है कि माया ठीक नहीं है, मैं तभी तो माया को देखना चाहती हूं.

किरणमयी बोलती रहीं- मैं उसे समझाऊंगी. कहूंगी कि वह तुमसे एक बार ज़रूर मिल ले. उसकी कोई सहेली वगैरह भी नहीं है. वह कोई स्वाभाविक जीवन नहीं जी रही है. बांग्लादेश के लड़कों ने उस पर जिस तरह से अत्याचार किए थे, उसके तो जि़न्दा रहने की बात ही नहीं थी. पता नहीं, ये सारी चीज़ें उसके दिमाग से कैसे निकल पाएंगी! आज भी वे सारी बातें उसके लिए दु:स्वप्न की तरह हैं. उसने ज़बर्दस्ती कामना की थी कि वह एक नॉर्मल लाइफ जिएगी. कामना करने से ही हर चीज़ मिल पाती है क्या! हां, लेकिन, बुरे में अच्छा यह है कि वह अब भी नौकरी कर पा रही है. मुझे डर लगता है, कभी यह नौकरी छूट गई तो? सुना है कि वह दफ्तर में भी चीखती-चिल्लाती है. बांग्लादेश का प्रसंग आते ही वह ऐसा करती है. उस देश का कोई दिख जाए तो वह उस व्यक्ति पर विश्वास नहीं करती. वह उस समूचे देश से नाराज़ है. मैंने उसे बहुत समझाया, उससे कहा कि कुछ अच्छे लोग भी तो थे उस देश में. माया किसी भी हालत में इसे मानने को तैयार नहीं.

मैं चुपचाप सुनती रही. माया के गुस्से की वजह को समझने की कोशिश करती रही. माया के लिए मेरे मन में पहले से कहीं ज़्यादा करुणा उपजने लगी.
- मासीमां, मैं इन सबके बावजूद उससे मिलना चाहती हूं.

मेरे स्वर में आवेग था. लेकिन मैं समझ गई कि मेरा आवेग और माया का आवेग दोनों भिन्न प्रकार के थे. किरणमयी कह नहीं रही थीं, लेकिन मुझे अच्छे से समझ में आ रहा था कि माया मुझसे भयंकर नाराज़ है. ‘लज्जा में मैंने उसे अगवा करके ले जानेवाली बात लिखी थी, सम्भवत: इसलिए. मुझे तो यह जानकारी थी कि उन लोगों ने माया की हत्या कर दी है. लेकिन माया आखिरकार जि़न्दा है. जि़न्दा है शायद इसीलिए उसे मरने की तकलीफ झेलनी पड़ी. अगर उसकी मौत हो जाती तो वह सचमुच बच जाती. लड़कियों को तो मरे बिना मुक्ति नहीं मिलती. माया के लिए मेरी आंखें आंसुओं से भीग उठीं.

***

मैं अपने कामों में व्यस्त रही. सुरंजन पर कुछ नाराज़गी थी. उसने फोन करने को कहकर भी नहीं किया था. उसने एस.एम.एस. का जवाब भी नहीं दिया था. मैंने इतना अच्छा कुर्ता उसे तोहफे में दिया, उसने धन्यवाद तक नहीं कहा और अब पन्द्रह दिन बीत जाने के बाद फोन करके कह रहा है कि उसे मुझसे मिलना है. आह, घर की खेती है! सोचा था, कह दूंगी कि मैं व्यस्त हूं, मुलाकात नहीं हो सकती. बाद में फोन करना. लेकिन नहीं, मैं ऐसा कह नहीं पाई. दरअसल बात यह है कि मैं बनावटीपन बर्दाश्त नहीं कर पाती. मेरी जो इच्छा होती है, वही करती हूं. जितने दिनों तक नाराज़गी रहती है, उतने दिनों तक आवेग की रास खींचकर रखती हूं. लेकिन मेरी नाराज़गी भी कितने दिन टिक पाती है भला!

सुरंजन ने जो आने की इच्छा प्रकट की थी, मुझे लगा कि चार साड़ी और कुर्ते का जो पैकेट मैं उन्हें दे आई थी, शायद वह लौटाने आएगा. उसे वापस लेने के लिए मैं तैयार भी हो चुकी थी. मैंने सोच लिया था कि उन्हें अपने दोस्तों में बांट दूंगी. इसके अलावा और किया भी क्या जा सकता था!
लेकिन जब सुरंजन आया तो उसके हाथ में पैकेट नहीं था. उसके हाथ में टिफिन कैरियर था. क्या है उसमें? खाने की चीज़ें. किरणमयी ने आज ही अपने हाथों से तमाम चीज़ें बनाकर भेजी थीं.

अब यह सब क्या भेजा है? खाने की चीज़ें भेजने की क्या ज़रूरत थी? मेरा फ्रि़ज खाने की चीज़ों से ठसा-ठस भरा हुआ है. मैं उन्हें खाकर खत्म नहीं कर पाती, चीज़ें फेंकनी पड़ती हैं. इस पर खाने की और चीज़ें? उफ़! यह सब बड़बड़ाती हुई मैंने रसोईघर में ले जाकर टिफिन कैरियर खोला और मिनती से कहा- यह सब खाली करके डिब्बे धोकर वापस दे दो. यह कहकर मैं देखने लगी कि उन्होंने क्या पकाया है तो मुझे दिखाई दी पंचफोड़न वाली मसूर की दाल, मछली का सिर डालकर बनी हुई अरबी के तने की सब्ज़ी, मुड़ीघंटो, लटे मछली की शुटकी, कद्दू के पत्ते में लपेटकर तली हुई मछली. मैं बहुत देर तक टिफिन के उन डिब्बों को निहारती रही. आंखें आंसुओं से भर उठीं. आंखें आंसुओं के प्रवाह में बह गईं.

टिफिन कैरियर के डिब्बे के ऊपर एक छोटी-सी पर्ची फंसाकर रखी हुई थी. मैंने उसे पढ़ा.

मां तसलीमा, मेरा प्यार स्वीकार करना. भेजी हुई चीज़ें ज़रूर खाना. मैंने तुम्हारे लिए अपने हाथों से बनाकर कुछ मामूली-सी चीज़ें भेजी हैं. ये चीज़ें बनाकर यहां तुम्हें कौन खिलाएगा भला! तुम्हारे बारे में सोच-सोचकर मैं अकेले में रोती हूं. तुम सावधान रहना मां! हौसला रखना.

मैं उस कागज़ को पकड़े रही. लिखे हुए पर टप-टप करते आंसू गिरने लगे और वह लिखावट धुंधली होती गई. ठीक उसी वक्त ड्रॉइंगरूम में मेरा सुरंजन के सामने जाना सम्भव नहीं हो सका. मुझे आंसू पोंछने के लिए वहां थोड़ी देर और रुकना पड़ा, और थोड़ी देर गले के स्वर को सुखाने के लिए भी.

****

मैं जिस माया को जानती थी, जुलेखा ने बताया कि वह माया भी पूरी तरह से बदल गई है. लेकिन अगर मैं यह सोचूं कि माया ने ढाका के उन मुस्लिम साम्प्रदायिक दुष्कर्मियों को माफ़ कर दिया है, तो वह मेरी भूल होगी. वह हर दुष्कर्मी के ख़िलाफ़ है, फिर वह जिस भी धर्म का हो. वह स्त्रियों से विद्वेष करनेवाले हरेक के ख़िलाफ़ है, फिर वह जिस भी धर्म का हो.

लेकिन, जुलेखा ने हंसते हुए कहा कि माया यह भी कहती है कि सारे पुरुष एक-जैसै ही हैं, फिर वह जिस भी धर्म का हों.

-उसमें इतनी जल्दी यह रियलाइज़ेशन आया कैसे? शादी करने के लिए अभी कुछ दिनों पहले तक तो वह पागल थी!

जुलेखा बोली- जो लोग ज़्यादा पागल होते हैं, उन्हें ही सबसे पहले होश आता है.

 -ऐसा है क्या?

- ऐसा ही है.

-मुझे ऐसा नहीं लगता. धर्मान्ध लोगों को आसानी से होश नहीं आता. किसी चीज़ को लेकर अन्धा होने का मतलब ही है कि उसे पूरा नहीं दिखाई दे रहा.

तसलीमा नसरीन की यह किताब कट्टरपंथी व दक़ियानुसी व्यवस्था की बेशर्मी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर उसमें हर स्तर पर समानता के विकल्प की संभावनाओं को टटोलती हैं. यह कोई राजनीतिक कहानी नहीं बल्कि एक सामाजिक कहानी है, जो लोगों के जिंदगी, परिवार और उनके बीच पनपे संबंधों के बारे में है. चार पात्रों सुरंजन, किरणमयी, माया और जुलेखा तथा लेखिका का उन पात्रों से मिलकर संवाद स्थापित करना इस उपन्यास को गतिमान बनाए रखता है. तसलीमा नसरीन के लेखन की खासियत यह है कि  कथानक किसी फिल्मी दृश्य की तरह आपके आगे से गुजरते हैं और आप स्वयं को उस परिवेश और पात्र के जीवन से घुलमिल जाते हैं.

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पुस्तकः बेशरम
लेखिकाः तसलीमा नसरीन
अनुवादः उत्पल बैनर्जी  
विधाः उपन्यास
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 258
मूल्यः 695/ रुपए 

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