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पुस्तक समीक्षाः अरितृका, निर्मल प्यार की अंतहीन कहानी

इंसान की जिंदगी ना जाने कितनी कश्मकश से होकर गुजरती है. वह सफर कई बार लुभाता है, कई बार टीस पैदा करता है, कई बार नई आशाएं जगाता है, तो कई बार अवसाद पैदा करता है. और इन सबके केंद्र में होता है प्यार.

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राठौर विचित्रमणि सिंह नई दिल्ली, 18 February 2020
पुस्तक समीक्षाः अरितृका, निर्मल प्यार की अंतहीन कहानी बचपन के प्यार में डूबी एक लड़की की प्रेम कहानी पर आधारित उपन्यास 'अरितृका' का कवर

इंसान की जिंदगी ना जाने कितनी कश्मकश से होकर गुजरती है. उसमें कई बार जिस रास्ते पर वह चलता है, उस सफर का कोई मुकाम नहीं होता तो कई बार मंजिल से ज्यादा वह सफर ही कर लेता है. वह सफर कई बार लुभाता है, कई बार टीस पैदा करता है, कई बार नई आशाएं जगाता है, तो कई बार अवसाद पैदा करता है. और इन सबके केंद्र में होता है प्यार. वह भावना जो इस दुनिया की सबसे पवित्र भावना है. जहां त्याग ही त्याग है. जहां समर्पण ही समर्पण है. जहां आंसू ही आंसू हैं. जहां कुछ पाने की कल्पना पर प्राप्य को खो देने की आशंका और उसका सच में बदल जाना भारी पड़ने लगता है और जिंदगी इन सारी भावनाओं को समेटकर दौड़ती रहती है. अंतहीन.

अगर आईईएस अधिकारी मौलीश्री के उपन्यास अरितृका को फलसफे में प्रस्तुत करें, तो उपरोक्त बातें ही खुलकर और खिलकर सामने आएंगी, अरितृका एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसकी जिंदगी कई जाने अनजाने मोड़ से होकर गुजरती है. हर मोड़ उसकी जिंदगी को बदलता है. मां-बाप की इकलौती बेटी बल्कि इकलौती संतान होने के कारण उसकी परवरिश पर महत्वाकांक्षाओं का बोझ है, तो स्नेह और प्यार का एक लंबा चौड़ा वितान भी. उपन्यासकार ने एक जगह बहुत सही दर्शन पेश किया है कि पिता अर्थशास्त्र की शिक्षा से जुड़े हैं और मां राजनीति से. फिर इन दोनों का जोड़ ही एक रेनेसां यानी पुनर्जागरण पैदा करता है. एक छोटे से शहर में बचपन और उस बचपन पर एक अच्छी और बेहद करियर पसंद भविष्य का दबाव एक छोटी सी बच्ची को पहले इंग्लिश स्कूल में ले जाता है, फिर वो देसी स्कूल में जाती है. बदलते परिवेश का प्रभाव कैसे बाल मन पर पड़ता है, इसको उपन्यासकार बहुत करीने से उकेरा है.
 
यह कहानी बिहार की पृष्ठभूमि से शुरू होकर दिल्ली और बैंगलुरु तक जाती है. बाल मन जितना निर्दोष होता है, उतना ही वह अनायास किसी के प्यार में बंध भी सकता है, इस तरफ इस उपन्यास में दृष्टि डाली गई है. साथ ही उस सामाजिक परिवेश पर भी जो शहरी समाज की दृष्टि से ओझल होता जाता है. जिनका बचपन गांव या छोटे शहरों में गुजरा है, उनको पता होगा कि कैसे लड़के और लड़कियों में बातचीत को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. उस पर खुसर-पुसर शुरु हो जाती है. अरितृका एक तरफ अपनी स्कूल की एक शिक्षक से बेहद प्रभावित है तो दूसरी तरफ अपने साथ पढ़ने वाले एक लड़के मलय से सम्मोहित. उस पर से मलय का एक गीत गाना कि मैं कोई ऐसा गीत गाऊं, यह अरितृका के मन में एक नयी आरजू जगाता है. लेकिन आरजू की कोई सफल मंजिल हो, यह जरूरी तो नहीं.

अरितृका इकोनॉमिक अफेयर में एक बड़ी अफसर बन जाती है तो दिल में अफेयर का एक दीया मलय के नाम पर जलता है. उसकी आंच में वह खुद झुलसती है लेकिन चेहरे तक उसका भाव नहीं जाता. अरितृका बड़ी अफसर बन जाने के बाद भी, और मलय की अनदेखी और दूर होते जाने के बाद भी उसके साथ अपने रिश्तों की भूलभुलैया से निकल नहीं पाती. बचपन के प्यार की तलाश उसका पीछा करती है.

क्या मलय से अरितृका के रिश्ते बंध पाते हैं? क्या बचपन की जिन खुशियों की तलाश में उसकी आंखें खिड़कियों के पार देखती रहती थीं, उन आंखों में पलने वाले सपने साकार हो पाते हैं? इन सवालों का जवाब जानने के लिए आप मौलीश्री के इस उपन्यास को पढ़ सकते हैं. एक निर्मल प्यार की कशिश को. इस उपन्यास को दिल्ली के मारीगोल्ड पब्लिशर्स ने छापा है. और हां, यह कयास मत लगाइएगा कि कहीं लेखिका ने अपने दिल की बात तो नहीं कह दी है अरितृका के बहाने. जैसे कि बाबा नागार्जुन ने कालिदास से पूछा था- कालिदास सच सच बतलाना...रोया यक्ष कि तुम रोए थे?
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पुस्तकः अरितृका
रचनाकारः मौलीश्री
भाषाः अंग्रेजी
विधाः उपन्यास
मूल्यः 295/ रुपए
प्रकाशकः मारीगोल्ड पब्लिशर्स

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