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पुस्तक समीक्षा: 'अलू' जिसके परों पर बैठकर देख सकते हैं बच्चों का नया संसार

आज के हाइटेक युग में जब बच्चे कंप्यूटर गेम और कार्टून कैरेक्टर के ज्यादा दीवाने हैं, ऐसे में 'अलू' शीर्षक से आया कहानियों का ये संग्रह बहुत खास है. इसमें मैना, तोता, गौरैइया, कौवा, कबूतर, उल्लू  की कहानी बच्चों को मानवीय सहजता की तरफ ले जाती है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 03 February 2020
पुस्तक समीक्षा: 'अलू' जिसके परों पर बैठकर देख सकते हैं बच्चों का नया संसार अलू किताब से (कार्टून: इरशाद कप्तान)

'अलू' बच्चों के जज्बात को सहलाता कहानी संग्रह साल 2019 में आया है. इसे कार्टून चित्रों के साथ करीब 20 कहानियों में ऐसे संजोया गया है कि कहानी संग्रह से ज्यादा एक किताब में सिमटा चलचित्र लगता है. बच्चे कहानी के साथ उसके पात्रों को भी कार्टून के जरिये महसूस कर पाते हैं. आज के हाइटेक युग में जब बच्चे कंप्यूटर गेम और कार्टून कैरेक्टर के ज्यादा दीवाने हैं, ऐसे में मैना, तोता, गौरैइया, कौवा, कबूतर, उल्लू की कहानी उन्हें मानवीय सहजता की तरफ भी ले जाती है.

बता दें कि दरअसल अलू शीर्षक से छपी इस किताब में 10 कहानियां हैं जिसका मुख्य किरदार अलू एक उल्लू है. अलू एक जीव न होकर इसमें एक चरित्र हीरो है जो बेहद सरलता से बच्चों से वो बातें कह देता है जो हम आप उन्हें आसानी से नहीं समझा पाएंगे. हर कहानी चाहे वो चांद और अलू हो या अलू और रात के फूल हों लेख‍िका त्र‍िपुरारी शर्मा ने सभी कहानियों के जरिये जज्बात की एक जमीन तैयार की है.आप अलू के परों पर बैठकर बच्चों का नया संसार देख सकते हैं.

इस किताब की हर कहानी बच्चों के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ती है. इस कहानी का किरदार अलू इतना प्यारा है कि किसी को भी उससे प्यार हो जाए. किताब को पढ़ते हुए हम जिंदगी के उस बीते हुए लम्हे में पहुंच जाते हैं जो बालपन के साथ हम कहीं छोड़ चुके हैं. कहानी को कार्टून के साथ कहने का अभ‍िनव प्रयोग बच्चों को काफी पसंद आने वाला है. कहानी में चिड़‍ियों की आवाज, कथानक का अलग ढंग से वर्णन, प्रकृति की मिठास लिए कहानी का हर पात्र अपने अंदाज में बोलता है. किताब में छोटे-छोटे वाक्यों में कही जा रही हर कहानी समतल जमीन पर पानी की तरह बहती हुई लगती है. यकीन मानिए किसी भी कहानी को पढ़ते हुए आपको निराश नहीं होना पड़ेगा.

अलू किताब का एक अंश

किताब की एक कहानी अलू और रात के फूल का एक अंश हम यहां दे रहे हैं, पढ़ें- रात हुई. अलू जागा. अंगड़ाई ली और उड़ने के लिए तैयार हुआ. फिर उड़ने लगा. उड़ते-उड़ते हुए दूर निकल गया. फिर रुक गया. उसे लगा कि वह नई जगह आ गया है. वहां आसपास प्यारी-सी, मीठी-सी खुशबू थी. उसने खुशबू को सांस में भरा और उसी की सीध में नाक को चलाते हुए, खुशबू के और, और, और पास पहुंच गया. आगे देखा कि डाली पर खूब सारे छोटे-छोटे सफेद फूल ख‍िले हुए हैं. अलू चकरा गया. कहीं सपना तो नहीं देख ? उसे पता था कि दिन में फूल ख‍िलते हैं. पर रात में फूल....? डाली पर जैसे खूब सारे छोटे-छोटे चांद लटक रहे हों. और हर फूल की पत्ती ऐसी थी, जैसे छोटा चांद... आधा चांद... चांद का कोई न कोई रूप. अलू फूल के पास एक झाड़ी पर बैठ गया. उसने धीरे से पूछा, फूल क्या तुम सचमुच फूल ही हो.

जानें- अलू की परिकल्पना के पीछे कौन है

अलू की लेख‍िका त्रिपुरारी शर्मा (1956) दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में अभ‍िनय की प्राध्यापक हैं. साल 1978 में उनके लिखे गए नाटक 'बहु' के मंचन से उनकी सृजनात्मक यात्रा शुरू हुई थी. उनके लिखे 50 से ज्यादा नाटकों का कई प्रतिष्ठ‍ित मंचों पर मंचन हो चुका है. उनकी कई पुस्तकें प्रकाश‍ित हो चुकी हैं. त्रिपुरारी शर्मा को संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, संस्कृति सम्मान, भारतीय नाट्य संघ पुरस्कार सहित देश के कई बड़े पुरस्कार मिल चुके हैं.

इरशाद कप्तान ने किया अलू को साकार

त्रिपुरारी शर्मा के 'अलू' को कागज पर साकार रूप देने का काम जाने-माने कार्टूनिस्ट इरशाद कप्तान ने दिया है. पूरी किताब में शब्दों के साथ साथ अलू की कहानी जिस तरह चित्रों में भी साथ साथ चलती है, वो मानो अलू को पूरी तरह जीवंत कर देती है. इरशाद कप्तान ने ललित कला संस्थान इंदौर से चित्रकला में एमए किया था और बीते डेढ़ दशक से कई समाचार पत्रों के लिए कार्टून बना रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के लिए कई पुस्तकों का चित्रांकन किया है. साल 2018 में कार्टून वाच पत्र‍िका द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में उनके पर्यावरण जागरुकता के कार्टून को प्रथम स्थान मिला है.

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