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दारा शिकोह के कत्ल से जुड़े खुलासे करता है 'औरंगजेब नायक या खलनायक' का दूसरा खंड

दारा शिकोह के बारे में तो यह कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने उसकी गर्दन ही कटवा दी थी. इस बारे में लेखक ने तथ्यों की गहरी पड़ताल कर कई सनीसनीखेज खुलासे किए हैं. लेखक के मुताबिक इतिहास को हमेशा से दो तरीके से लिखा गया है.

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राहुल विश्वकर्मा नई दिल्ली, 07 March 2020
दारा शिकोह के कत्ल से जुड़े खुलासे करता है 'औरंगजेब नायक या खलनायक' का दूसरा खंड ‘औरंगज़ेब नायक या खलनायक’ का दूसरा खंड सत्ता संघर्ष

औरंगजेब, इतिहास का यह नाम सामने आते ही ज़ेहन में एक साथ कई तस्वीरें घूमने लगती हैं. नाफरमान बेटा, भाइयों का कत्ल करने वाला, उन्मादी, क्रूर बादशाह और मंदिरों का सबसे बड़ा दुश्मन. लेकिन जिस तरह से हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, ठीक उसी तरह से एक तस्वीर को देखने के कई नज़रिए होते हैं. एक किताब की शक्ल में औरंगज़ेब की कई तस्वीरों को दिखाने का नाम ही है ‘औरंगज़ेब नायक या खलनायक’. इस किताब को लिखा है एक लेखक और पत्रकार अफसर अहमद ने.

दारा के कत्ल के सच की पड़ताल

अफसर अहमद ने औरंगज़ेब के किरदार को समझाने के लिए 6 खंड में ‘औरंगज़ेब नायक या खलनायक’ लिखने की कोशिश की है. ‘सत्ता संघर्ष’ के नाम से दूसरा खंड बाज़ार में आ चुका है. वैसे तो औरंगज़ेब पर लगे आरोपों की फेहरिस्त कोई छोटी नहीं है. लेकिन सबसे बड़े आरोपों में से एक यह भी है कि औरंगज़ेब ने बादशाहत के लिए अपने सगे भाइयों का ही कत्ल करा दिया था. भाइयों में जो सबसे चर्चित नाम है वो दारा शिकोह का है.

क्या गर्दन काटी गई?

दारा शिकोह के बारे में तो यह कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने उसकी गर्दन ही कटवा दी थी. इस बारे में लेखक ने तथ्यों की गहरी पड़ताल कर कई सनीसनीखेज खुलासे किए हैं. लेखक के मुताबिक इतिहास को हमेशा से दो तरीके से लिखा गया है. एक वो लोग जो भरोसेमंद थे और उनके लिखे पर भरोसा किया गया. दूसरे वो लोग जो यहां-वहां सुने-सुनाए किस्सों को लिखते रहे.

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फारसी के फरमान

औरंगज़ेब के बारे में लिखते हुए लेखक ने कुछ इसी तरह की एहतियात बरतते हुए किताब में उन फारसी फरमान (पत्रों) का भी इस्तेमाल किया है जो औरंगज़ेब-शाहजहां और उसके भाइयों के बीच लिखे गए. कई खास फरमान तो किताब में छापे भी गए हैं. इतना ही नहीं किताब की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए लेखक ने एक दर्जन से ज़्यादा मूल संदर्भ की मदद ली है.

शाहजहां का अंधा प्यार

लेखक ने दारा-औरंगजेब की दुश्मनी के कारणों की भी विवेचना की है. शाहजहां का दारा को हद से ज़्यादा चाहना और उसे कई खास हक और हुकूक देना कई विवादों की जड़ बना. किताब में उस दौर के प्रमुख लेखक खफी खान, मुत्सईद खान, निकोलो मनुच्ची और फ्रांसिस बर्नियर के बयानों के आधार पर औरंगजेब पर लगने वाले आरोपों की हकीकत का एक तरह से फैक्ट चेक किया गया है.

शाहजहां-औरंगजेब के बनते-बिगड़ते रिश्ते

ऐसा नहीं था कि शाहजहां और औरंगज़ेब के बीच सिर्फ तल्खियां ही थीं. तल्खी थी, लेकिन वो किस हद तक थी और दोनों ही लोग उसे वक्त-वक्त पर मिटाने के लिए किस तरह से और क्या कोशिशें करते थे, इसे साफ करते हुए लेखक ने शाहजहां के फरमान और औरंगज़ेब की ओर से दिए गए जवाबों का जिक्र किया है. बताने की कोशिश की गई है कि कैसे शाहजहां औरंगज़ेब को मनाने के लिए कभी महंगे तोहफे भेजता तो कभी प्यारी भरी बातें करता था. दोनों ही लोग मिलने के लिए अपने दिल के उस हाल को भी बयां करते थे. किताब में ऐसे सभी किस्से पूरे प्रमाण के साथ रखे गए हैं.

यह किताब इतिहास पढ़ने वाले छात्रों के लिए तो फायदेमंद साबित होगी ही साथ में उनके लिए भी अहम है जो इतिहास के इस सबसे अहम किरदार के बारे में सुनी-सुनाई बातों से परे मय सबूतों के जानना चाहते हैं. और हां, उनके लिए भी जो मीडिया-सोशल मीडिया में अपने को इतिहासकार के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं.

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