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कुर्रतुल ऐन हैदर: ऐनी आपा की याद, कोई इतना बिंदास होता कैसे है

कुर्रतुल ऐन हैदर यानी ऐनी आपा. उर्दू की मशहूर लेखक और बेहद लोकप्रिय किस्सागो. क़ुर्रतुल-एन-हैदर न केवल उर्दू के साहित्य बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य धारा में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं.

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 12 September 2019
कुर्रतुल ऐन हैदर: ऐनी आपा की याद, कोई इतना बिंदास होता कैसे है Qurratulain Hyder

'मिली-जुली संस्कृति किसी अख़बार की सुर्खी नहीं, जो दूसरे ही दिन भुला दी जाए. यह तो दुनिया के इतिहास का शीर्षक है जो अपनी जगह सुरक्षित है और दूसरी संस्कृतियों को अपनी ओर खींचता है.’ कुर्रतुल ऐन हैदर ने कभी यह कहा था. वह आजादी के दौर में बंटवारे का दुख झेलने के साथ बड़ी हुईं. भारत और पाकिस्तान दोनों को देखा. पूरी दुनिया घूमा और फिर यह बात कही. वह पूरे जीवन इसी सोच के साथ. इसी के लिए जीती रहीं, इसी के साथ मरी भीं.

साहित्य आजतक में आज हम आप से बात करेंगे उन्हीं कुर्रतुल ऐन हैदर की. कुर्रतुल ऐन हैदर यानी ऐनी आपा. उर्दू की मशहूर लेखक और बेहद लोकप्रिय किस्सागो. क़ुर्रतुल-एन-हैदर न केवल उर्दू के साहित्य बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य धारा में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं. इनके समृद्ध लेखन में उर्दू साहित्य की आधुनिक धारा को एक दिशा दी है. उर्दू ही क्यों, हिंदी में भी उन्हें कौन नहीं जानता. मंटो, कृष्णचन्दर, बेदी और इस्मत चुगताई के टक्कर की आपा.

क़ुर्रतुल ऐन हैदर उर्दू साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं. उनका पूरा नाम मुसन्निफ़ा क़ुर्रतुल ऐन हैदर था. वह 20 जनवरी, 1927 को अलीगढ़ में पैदा हुईं. उनके प्रशंसक व चाहने वाले उन्हें ऐनी आपा कहकर बुलाते.

ऐनी आपा बचपन से रईस व पाश्चात्य सभ्यता में पली-बढ़ीं थीं. उनके पिता 'सज्जाद हैदर यलदरम' उर्दू के जाने-माने लेखक तो थे ही ब्रिटिश शासन के राजदूत भी. वह अफगानिस्तान, तुर्की आदि देशों में तैनात थे. उनकी मां 'नजर' बिन्ते-बाकिर भी उर्दू की लेखिका थीं.

सो लेखन एक तरह से उन्हें घुट्टी में मिला. उन्होंने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू कर दिया था. उनकी पहली कहानी जब वह केवल छः साल की थीं, तभी लिख दी. नाम था- 'बी चुहिया'.  सन 1945 में जब वह सत्रह-अठारह साल की ही थीं, उनका पहला कहानी संकलन 'शीशे का घर' छप गया था. सन् 1947 में प्रकाशित उनके कहानी-संग्रह 'सितारों से आगे' को उर्दू की नई कहानी का प्रस्थान-बिन्दु समझा जाता है.

कुर्रतुल ऐन हैदर ने एमए तक की पढ़ाई लखनऊ में फिर आगे की एक बड़ी डिग्री लन्दन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल से ली. पिता की मौत और देश के बांटवारे के बाद कुछ समय के लिए वह अपने बड़े भाई मुस्तफा हैदर के साथ पाकिस्तान चली गयीं.

कथा-साहित्य रचने के अलावा आपा ने अंग्रेज़ी में पत्रकारिता की. 1951 में लन्दन जाकर स्वतंत्र लेखक-पत्रकार के रूप में बीबीसी लन्दन से जुड़ीं. द टेलीग्राफ की रिपोर्टर और इम्प्रिंट पत्रिका की प्रबन्ध सम्पादक रहीं. इलेस्ट्रेड वीकली से भी जुड़ीं. खूब घूमना-फिरना किया, और आज के दौर में भी- जब एक हिन्दुस्तानी औरत के लिए अकेले जीना बेहद मुश्किल है- वह न केवल अविवाहित रहीं, बल्कि अकेली भी.

कथाकार कमलेश्वर ने कभी कुर्रतुल ऐन हैदर, इस्मत चुगताई और अमृता प्रीतम की तिकड़ी के बारे में  कहा था, 'अमृता प्रीतम, इस्मत चुगताई और कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी विद्रोहिणियों ने हिन्दुस्तानी अदब को पूरी दुनिया में एक अलग स्थान दिलाया. जो जिया, जो भोगा या जो देखा, उसे लिखना शायद बहुत मुश्किल नहीं, पर जो लिखा वह झकझोर कर रख दे, तो तय है कि बात कुछ ख़ास ही होगी.'

कहते हैं साल 1956 में जब वह भारत आईं तो उनके पिताजी के दोस्त और कांग्रेस नेता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने उनसे पूछा कि क्या वे भारत में बसना चाहेंगी? हामी भरने पर उन्होंने इस दिशा में कोशिश करने की और भारत आ गईं. तब से भारत में ही रहीं.

क़ुर्रतुल ऐन हैदर के लेखन ने आधुनिक उर्दू साहित्य को एक नई दिशा दी. उन्होंने तकरीबन बारह उपन्यास और ढेरों कहानियां लिखीं. उनकी कहानियों में समूचे भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास और संस्कृति झांकती है.

'आग का दरिया' उनका सबसे चर्चित उपन्यास है. 'आग का दरिया' को जो लोकप्रियता मिली, वह किसी दूसरे उर्दू उपन्यास को नसीब नहीं हुई. उनकी दूसरी किताबों में ‘सफ़ीन-ए-ग़मे दिल’, ‘आख़िरे-शब के हमसफ़र’, ‘कारे जहाँ दराज़ है’,, ‘गर्दिशे-रंगे-चमन’, ‘मेरे भी सनम-ख़ाने’ और ‘चांदनी बेगम’ शामिल हैं.

जीवनी-उपन्यासों में दो खंडों में ‘कारे जहां दराज़ है’, ‘चार नावेलेट’, ‘कोहे-दमावंद’, ‘गुलगश्ते जहां’, ‘दकन सा नहीं ठार संसार में’, ‘क़ैदख़ाने में तलातुम है कि हिंद आती है’ शामिल है.

उन्होंने हेनरी जेम्स के उपन्यास ‘पोर्ट्रेट ऑफ़ ए लेडी’ का अनुवाद ‘हमीं चराग़, हमी परवाने’ और ‘मर्डर इन द कैथेड्रल’ का अनुवाद ‘कलीसा में क़त्ल’ के नाम से किया. ‘आदमी का मुक़द्दर’, ‘आल्पस के गीत’, ‘तलाश’ उनकी दूसरी अनूदित कृतियां हैं.

कुर्रतुल ऐन हैदर के लेखन में विद्रोह का भी स्वर था. वह इस मत पर विश्वास रखती थीं कि नारी देह न तो कोई प्रदर्शन की चीज़ है, न मनोरंजन की और न लेन-देन की. वे नारी देह की बजाय उसके दिमाग पर ज़ोर देती थीं. उनका मानना था कि दिमाग़ पर बात आते ही नारी पुरुष के समक्ष खड़ी दिखाई देती है, जो कि पुरुषों को बर्दाश्त नहीं.

क़ुर्रतुल ऐन हैदर आज़ादी के बाद भारतीय फ़िक्शन का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती थीं. वह साहित्य अकादमी में उर्दू सलाहकार बोर्ड की दो बार सदस्य रहीं. विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में वह जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़ीं. वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर भी रहीं.

मानविकी, समाज, इतिहास, दर्शन, राजनीति, अध्यात्म, सभ्यताओं के संघर्ष और सांस्कृतिक परिवर्तनशीलता पर बेबाकी से अपने विचार रखने वाली कुर्रतुल ऐन हैदर ने सदैव से रचनात्मक विविधता में रंग भरे, फिर चाहे वह उपन्यास, कहानी, लेख, समीक्षा, संस्मरण, आत्मकथा, रिपोर्ताज, अनुवाद हो या फिर पेटिंग या फ़ोटोग्राफ़ी.

सन 1967 में ‘आखिरी शब के हमसफर’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया. 1984 में पद्मश्री, गालिब मोदी अवार्ड, 1985 में उनकी कहानी पतझड़ की आवाज के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1987 में इकबाल सम्मान, 1989 में अनुवाद के लिए सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, 1989 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, और 1989 में ही पद्मभूषण से उन्हें सम्मानित किया गया

ऐनी आपा ने जीवन भर लिखा और जमकर लिखा. 21 अगस्त, 2007 की उस तारीख तक भी, जब वह दुनिया को छोड़ चली नहीं गईं.  साहित्य आजतक उर्दू अदब की इस नायाब शख्सियत को शिद्दत से याद करते हुए अपनी श्रद्धांजलि देता है.

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