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जन्मदिन विशेषः उदय प्रकाश, भाषा में संवेदना की एक नई विरासत के वाहक

उदय प्रकाश हिंदी के सर्वाधिक संवेदनशील कवियों में एक हैं. आज उनका जन्मदिन है. वह 1 जनवरी, 1952 को मध्य प्रदेश के सीतापुर के शहडोल में पैदा हुए. उनके 68 वें जन्मदिन पर साहित्य आजतक के लिए लिखा गया कवि आलोचक डॉ ओम निश्चल का आलेख.

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ओम निश्चल नई दिल्ली, 01 January 2020
जन्मदिन विशेषः उदय प्रकाश, भाषा में संवेदना की एक नई विरासत के वाहक साहित्य आजतक के मंच पर उदय प्रकाश

अस्सी का दौर कविता की वापसी का दौर रहा है. अशोक वाजपेयी ने केवल नारा भर नहीं दिया बल्कि कविता की वापसी के द्वार भी खोले. कविता संग्रहों के प्रकाशन से लेकर उनकी खरीद तक की व्यवस्था की ताकि कविता लोगों तक पहुंचे. एक वातावरण निर्मित करे. यह एक हद तक हुआ भी.  यह कविता की वापसी थी या कविता संग्रहों की प्रायोजित आमद और खरीद का परिदृश्य, एक साथ बहुतेरे अच्छे कवि फलक पर सामने आए. इसी दौर में मंगलेश डबराल, विष्णु खरे, ज्ञानेंद्रपति, राजेश जोशी, विष्णु नागर, गिरधर राठी जैसे कद्दावर कवि सामने आए. अशोक वाजपेयी की पहचान सीरीज के अंतर्गत आए अनेक कवियों के पहले-पहले संग्रहों ने कविता की ओर ध्यानाकर्षण किया. जो काम अज्ञेय ने 'तारसप्तक'  के जरिए किया, 'पहचान सीरीज' ने वही काम कुछ कवियों को अग्रसर करने में किया. उदय प्रकाश उसी दौर के उन कवियों में हैं जिनकी एक अच्छी शुरुआत कविता से हुई. 'सुनो कारीगर' इस दिशा में उनका पहला हस्तक्षेप था.
 
उदय प्रकाश बेशक आज कहानी के क्षेत्र में एक स्थापित हस्ताक्षर हैं पर इससे पहले वे आठवें दशक के एक चर्चित कवि हैं. सुनो कारीगर (1981), अबूतर-कबूतर (1984), रात में हारमोनियम (1998),एक भाषा हुआ करती है (2009) तथा हाल ही आए 'अंबर में अबाबील' (2019) संग्रहों के कवि उदय प्रकाश ने जहां बहुत आत्मीय किस्म की कविताएं लिखी हैं वहीं भाषा, देश, स्त्रियों के हालात व रोजमर्रा के जीवन के कठिन अनुभवों को संवेदनासिक्त‍ कविताओं में पिरोया है. अपने तेवर में पर्याप्त राजनीतिक होते हुए भी उनके भीतर एक कवि की मासूम संवेदना नजर आती है. कविता उनके मनोजगत की एक विश्वसनीय स्कैनिंग है. कविता की पवित्र भूमि पर पांव रखते हुए जैसे वे कहानी के टूल्स उतार कर बाहर रख देते हैं. यहां वे कारीगर नहीं, एक रचयिता के रूप में उपस्थित होते हैं. इसीलिए प्रारंभ से लेकर अब तक की उनकी कविताओं में संवेदना का प्रवाह उत्तरोत्तर दृढतर हुआ है.
 
उदय प्रकाश की कविताओं में मानवता के लिए कचोट और पीड़ा दिखती है. यह पीड़ा उनकी तिब्बत, वे यहीं कहीं हैं, एक दिन जलूंगा मैं, औरतें, किसका शव व एक भाषा हुआ करती है जैसी कविताओं में महसूस की जा सकती है. उदय की भाषा बोलचाल की है तथा उसमें संवादों की-सी अदायगी नजर आती है. उनका सूफियाना लहजा हम हैं ताना हम हैं बाना तथा जैसी पद रचना में देखा जा सकता है. एक भाषा हुआ करती है बहुत तीखी रचना है कि कैसे हमारी हिंदी उत्तरोत्तर मसखरों की भाषा बनती गयी है, जिसे बोलते हुए इस देश के पढे-लिखे लोग शर्माते हैं. वे कहते हैं:
 
सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों के
आंसू और पसीने और खून में लिथड़ी एक भाषा
पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बांटता है
सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिटि्ठयां
.........
यह वही भाषा है जिसको इस मुल्क में हर बार कोई शरणार्थी, कोई तिजारती, कोई फिरंग
अटपटे लहजे में बोलता और जिसके व्याकरण को रौंदता
तालियों की गड़गड़ाहट के साथ दाखिल होता है इतिहास में
और बाहर सुनाई देता रहता है वर्षों तक आर्तनाद
.........
लेकिन देखो,
हर पांचवें सेकंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा
और इसी भाषा में भरता है किलकारी

और
कहता है - मां! (एक भाषा हुआ करती है)
 
अपने कथ्य में यह पूरी कविता अंत:करण को हिला कर रख देने वाली है. अपने भाषाई स्वाभिमान से च्युत इस देश की व्यवस्था,  औपनिवेशिक सत्ता के हितों के लिए काम करते हुए अंग्रेजी के पोषण के लिए खाद-पानी देने का काम करती है जबकि अपनी भाषा बोलने वाला नागरिक दर-ब-दर और अपमानित होता रहता है. इसी तरह औरतें कविता स्त्री के दर्दनाक हादसों को जिस रूप में सामने रखती है, वह हमारे समय का विस्फोटक यथार्थ है. उदयप्रकाश की कविता हमारी वेदना में अपना स्वर मिलाती है तथा किसी भी मानवीय चीख को अनसुना नहीं करती.
 
हम कविता में उदय प्रकाश की इतनी गहरी उपस्थिति पर विचार करते हुए यह न भूलें कि यह कवि अपनी कहानियों में लगातार विडंबनाओं पर प्रहार करता आया है. राजनीति से लेकर बौद्धिक तबके तक छाए जातिवाद, सामंतवाद, ब्राह्मणवाद ने जैसे इस समय को ग्रस लिया है. उदय प्रकाश की कहानियों में आए चरित्र इस बात की गवाही देते हैं कि वे कितने सताए हुए हैं. तिरिछ, दत्तात्रेय के दुख, पालगोमरा का स्कूटर, वारेन हेस्टिंग्ज का साड़ व और अंत में प्रार्थना, मैंगोसिल व  मोहनदास जैसी कहानियों से गुजरते हुए हम उदय प्रकाश का एक ऐसा मानवीय चेहरा देख पाते हैं, जो कमजोर और सताए हुए व्यक्ति के साथ नजर आता है तथा कविताओं के उजाले में वह जैसे उनके आंसू पोंछता है.  
 
आठवें दशक में उनके तमाम समकालीनों में, कवियों में एक खास किस्म  की होड़ मची थी. कोई प्रतीकों से खेल रहा था, कोई रूपक बुन रहा था जब कि उदय प्रकाश कहानियों में एक नया और बृहत्तर जीवन-यथार्थ रचने की व्यग्रता में थे. यही कारण है कि भले ही उदयप्रकाश की कहानियों पर कहानियों को रचने-गढ़ने या निर्मित करने का आरोप लगाया जाता रहा हो पर आज के जीवन-यथार्थ और कारपोरेट व राजनीति के गठजोड़ से बनते समय में जहां आम आदमी की कोई सुनवाई नहीं है, उनसे बेहतर समझ के साथ नहीं प्रस्तुत किया जा सकता है. 'मोहनदास' में मोहनदास की नियति, उसकी छटपटाहट, उसकी नौकरी दूसरों द्वारा हथिया लिए जाने की त्रासदी भले ही हमारे समय के एक भयावह रूपक के तौर पर ही सही, पर आज एक आम आदमी का हक किस तरह पूंजीवादी शक्तियों, कारपोरेट घराने के मालिकों के हित में अंतरित किया जा रहा है, यह किसी से छिपा नही है. उदय प्रकाश की कहानियों के जादुई संसार में यथार्थ और अतियथार्थ के बीच एक बारीक-सी रेखा है. अतियथार्थ-सी लगती उनकी कहानियों में भविष्य का समय दिखाई देता है, अपने भयावह और बदलते हुए यथार्थ में. वे इसके लिए जैसी तोड़फोड़ कथानक की संरचना में करते हैं, जिस तरह वे अपने समय को प्रतिबिम्बित करना चाहते हैं, वे कविताओं में भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखते.
 
शुरुआती दौर के उनके कविता संग्रह 'सुनो कारीगर' व 'अबूतर कबूतर' से एक इन्नोसेंट कवि की छवि उभरती थी. जैसे-जैसे यह समय चालाक और क्रूर होता गया, उदयप्रकाश की कविताओं में 'ईंट की नींव हो तुम दीदी' जैसे स्वर ओझल होते गए और 'औरतें' और 'यह किसका शव' जैसी कविता का यथार्थ आच्छादित होता गया. वे अपनी कविताओं में अपना समय बांच रहे थे, कहानियों में भी. 'पीली छतरी वाली लड़की' जैसी लंबी औपन्यासिक कहानी के पीछे एक दलित यथार्थ भी है, जो गए कुछ दशकों में मंडल आयोग के बाद उभरा है तथा राजनीति में जिसे मलाई की तरह भुनाया गया है. ब्राह्मणवाद के प्रतीक के छिलके उतारते हुए कहानी का दलित चरित्र कैसे प्रतिशोध की भूमिका में उतरता है इसका सटीक उदाहरण 'पीली छतरी वाली लडकी' है. 'मोहनदास' एक आम आदमी के शोषण और उसे उसके हक व जीविका से बेदखल किए जाने का एक निर्मम आख्यान है जो अतियथार्थ में निरूपित होकर भी अप्रत्याशित नहीं लगता. ऐसी धोखादेह जिन्दगी को उदय प्रकाश अपनी कविताओं में भी उत्तरोत्तरर जगह देते गए तथा कविता की नैसर्गिक प्रकृति में बदलाव भी लाते गए हैं.
 
पिछले दो-तीन दशक में उदय प्रकाश की एक कहानीकार के तौर पर इतनी दुंदुभि रही कि उनका कवि रूप ओझल ही रहा. पर उन्होंने कविता की लीक नहीं छोड़ी. क्योंकि हैं वे मूलत: कवि ही. 'साक्षात्कार' पत्रिका के लिए किए गए एक इंटरव्यू में मेरे यह पूछने पर कि आप कथाकार व कवि दोनों के रूप में जाने जाते हैं पर आपको भीतर से क्या लगता है, क्या है जो आपके भीतर प्रमुख है? तो उन्होंने कहा था, 'ओम जी, मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मैं मूलत: कवि ही हूँ. इसको मैं भी जानता हूँ और बाकी लोग भी जानते हैं. मैं अक्सर मजाक में कहा करता हूँ कि मैं एक ऐसा कुम्हार हूँ जिसने धोखे से कभी एक कमीज सिल दी और अब उसे सब दर्जी कह रहे हैं. सच यह है कि मैं कुम्हार ही हूँ.'
 
'रात में हारमोनियम' उनका पहला बेजोड़ संग्रह था तथा उनके कवि-जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ भी जो आगे चल कर आए संग्रह एक भाषा हुआ करती है से और सबल व प्रासंगिक सिद्ध होता है. नकली राष्ट्रवाद व राष्ट्र प्रेम से मंडित इस युग में हिंदी की क्या दशा-दुर्दशा है, कितने तरह के छद्म इस भाषा में संपादित हो रहे हैं, इसे बेबाक तरीके से रखने में उदय प्रकाश जिस तरह इस कविता में कामयाब हुए हैं वह उन्हें एक तल्ख कवि के रूप में स्थापित करता है. लेकिन इस कविता को जैसा सुखद और स्वाभिमानी अंत दिया है उन्होंने, वह भी कविता के स्थापत्य में विरल है. तमाम रोने-धोने के बाद, विडंबनाओं पर उंगली धरने के बावजूद हिंदी के पास एक आश्वस्ति यह अवश्य है कि यही वह भाषा है जिसमें हमारे संघर्ष का पसीना और हमारी आत्मीयता की खुशबू है. इसी भाषा में पुकारे जाने पर मातृत्व धन्य होता है.
 
हम शुरू से ही उदय प्रकाश के कवि का मिजाज देखें तो वह सत्ता को चुनौती देता आया है. सत्ता- चाहे वह पूंजी हो, शासन हो, बौद्धिक खेमेबंदियां हों, वह एक सतत नाराज कवि के चोले में दिखते हैं. वे सत्तापरस्त ताकतों की दुरभिसंधियों का भी प्रत्याख्यान करते हैं. भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त करने के अवसर पर दिए गए वक्तव्य में वे अकारण ही नहीं कहते हैं, कि ''जब सारी सत्ताएं साथ छोड़ जाती हैं या उनके फैसलों का शोर चारों ओर गूंज रहा होता है, तो यह कविता ही है जहां अपनी आवाज सुनाई देती है. कविता कभी भी पराजय, विध्वंस, आत्महीनता और गहरे दुखों के पल में भी हाथ और साथ नहीं छोड़ती. वह एक ऐसे निरापद दिक्काल का निर्माण करती है, जहां पूंजी से लेकर राजनीति, जाति और तकनीक की तमाम सत्ताओं की हिंसा और अन्याय के विरुद्ध एक गरीब या फकीर कोई सबसे मानवीय, नैतिक और पवित्र फैसला सुनाता है. वे आगे कहते हैं, 'तमाम सारी बाहरी ताकतें जब भाषा पर आक्रमण करती हैं और स्मृतियों का विनाश करने के अपने राजकर्म में संलग्न हो जाती हैं, तो कविता मनुष्य की स्मृतियों को बचाने के प्राणपण संघर्ष में मुब्तिला होती है. विस्मरण के विरुद्ध एक पवित्र और जरूरी संग्राम की शुरुआत कविता ही करती है और सबसे अंत तक वही मोर्चे पर रहती है.'  'तिब्बत' पर उन्हें यह पुरस्कार मिला था. तिब्बतियों की स्थिति राजनीति के फलक पर क्या रही है, यह हम सब जानते हैं. कितने तिब्बती विस्थापन का जीवन जी रहे हैं. एक सम्मानजनक रिहाइश की खोज में वे राजनीतिक शरण लेने को बाध्य हैं. चीन के शिकंजा कसते ही नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन होता गया और तिब्बती जैसे शरणार्थी बनते गए. तिब्बत के लामाओं को घूमते देख कवि जिस परात्पर पीड़ा से भर उठता है वह इस कविता की कारुणिक भूमि है. कविता लामाओं के दैंनदिन व्यवहार का अवलोकन करती हुई जब आखिरी छोर पर पहुंचती है तो जैसे तिब्बतियों की पीड़ा मंत्रवत् उनकी बुदबुदाहट में उमड़ उठती है:
वे मंत्र नहीं पढ़ते
वे फुसफुसाते हैं .....तिब्बत
तिब्बत- तिब्बत
तिब्बत - तिब्बत - तिब्बत
तिब्बत- तिब्बत
तिब्बत
तिब्बत - तिब्बत
तिब्बत...
और रोते रहते हैं
रात- रात भर (उर्वर प्रदेश, पृष्ठ  38 )
यह कविता केवल तिब्बतियों की आत्मपीड़ा का आख्यान भर नहीं; यह कवि की प्रतिबद्धता का परिचायक भी है. असमय मां और पिता को खो देने का संताप भी उसकी कविता में कई रूपों में उतरा है. कई कहानियों की नीरवता इस अवसान की गवाही देती है. उदय प्रकाश अपने बचपन में मां को याद करते हुए संस्कारगीतों से उसके रिश्ते को याद करते हैं. इन्हीं  लोकगीतों का सांगीतिक असर रहा होगा जिसने कवि को अपनी कारुणिकता में डुबोया होगा. स्त्री लोक गीतों में कुछ संस्कार गीतों को छोड़ कर एक अटूट कारुणिकता भरी होती है, यह अवधी, बघेली, भोजपुरी गीतों को पढ़ते सुनते हुए महसूस होता है. यही कारण है कि उदय प्रकाश की शुरुआती कविताओं में एक मासूम किस्म की भावुकता दिखती है. उसके लिए हर तरह की अनैतिकता से लड़ने के लिए कविता एक नैतिक आयुध लगती रही है. वह इसी तरह कविता को बरतता है. कारीगर पर लिखते हुए उदय प्रकाश कहते हैं- ''सुनो यहीं था मैं/ अपनी थकान, निराशा, क्रोध, आंसुओं, अकेलेपन और एकाध छोटी मोटी खुशियों के साथ/ यहीं नींद मेरी टूटी थी/ कोई दुख था शायद/ जो सिर्फ अब मेरा नहीं था.'' यही वह संवेदना है जो कवि को प्रांरभ से ही उन लोगों से जोड़ती है जो कहीं न कहीं वंचित दुखी और असहाय हैं. इन कविताओं में वे पिता को याद करते हैं, काम करते कारीगरों से बतियाते हैं, जीवनदास जैसे लोगों से उनका हाल-चाल पूछते हैं. सुअर जैसी प्रतीकात्मक कविता सीरीज लिख कर मनुष्य के सुअरपने की कहानी बयान करते हैं जो अंतत: संस्कृति, कला व साहित्यिक संस्थानों में घुसते हैं और उस पर काबू पाकर धन्य हो उठते हैं.
 
मां के न होने पर दीदी से मिला स्नेह जब उनकी कविता में उतरता है तो वह बहुत ही आत्मीय संस्पंर्श के साथ आता है. 'नींव की ईंट हो तुम दीदी' में लोकगीत की-सी आत्मी‍यता और उछाह है. वह कहते हैं, ''तुम्हारी उजली सांस के स्पर्श में/ जलती रहीं तुम/ तुम्हारा धुआं सोखती रहीं/ घर की गूंगी दीवारें/ छप्पर के तिनके-तिनके/ धुंधले होते गए/ और तुम्हारी थोड़ी सी कठिन रोशनी में हम बड़े होते गए. (कवि ने कहा, पृष्ठ 48) ऐसी आत्मीय कविताओं के साथ उदय प्रकाश की कविताएं राजनीतिक आशयों की कविताएं भी हैं. 'राज्येसत्ता' पर लिखते हुए उनकी तल्खी अपने खास अंदाजेबयां के साथ प्रकट हुई हैं, जब वे कहते हैं, ''राज्यसत्ता तिहाड़ की दीवाल है/ भागलपुर की तेजाब है/ अंतुले की नैतिकता और जगन भाई का लोकतंत्र है.'' ''राज्य सत्ता अस्सी प्रतिशत लोगों की आंख में/ बूट और बारूद की सत्ता है, पांच प्रतिशत लोगों के हाथ में मनमाना राज्य/ और बाकी हम जैसों के दिमाग में राज्य सत्ता.'' राज्यसत्ता के साथ सरकार को उन्होंने अपनी तमाम कविताओं में निशाना बनाया है. 'सरकारी कोयल' ऐसी ही एक कविता है, जो सरकारी गुलामों की कसीदेकारी पर लानत भेजती है. वह सरकारी कोयलों का उपहास उड़ाती हुई सरकारी दरबारियों का एक मेटाफर रचती है. उनके यहां 'बचाओ' जैसी कविता भी है. जब हर जगह बचाओ बचाओ का कोलाहल था, उदय प्रकाश ने इस जरूरत पर अपने तईं सोचा. आज गए कुछ सालों से बेटी बचाओ, बचपन बचाओ आदि के नारे उछाले तो गए किन्तु हुआ कुछ नहीं. न बेटियां बचीं, न बचपन. 'बचाओ' कविता कवि की अपनी प्राथमिकताओं का इजहार है:
बचाना ही हो तो बचाए जाने चाहिए
गांव में खेत, जंगल में पेड़, शहर में हवा
पेडों में घोंसले, अखबारों में सच्चाई, राजनीति में नैतिकता
प्रशासन में मनुष्यता, दाल में हल्दी. (कवि ने कहा, पृष्ठ 93)
 
न केवल बचाओ बल्कि शरीर, औरतें, पंचनामें में जो दर्ज नहीं है, किसका शव, तीली, हत्या, मैं लौट जाऊंगा, जैसी कविताएं उदय प्रकाश की मार्मिक कविताओं में शुमार की जा सकती हैं. वे मानवीय विडंबनाओं से भरी इस दुनिया के हर उस कोने-अँतरे को तलाशते हैं जहां से चीख, हत्या, उदासी, निराशा और सताए जाने की वेदना घनीभूत होती है. उदय प्रकाश की प्रारंभिक कविताएं, यों तो जैसा कहा, वे मासूमियत और संवेदना की उपज हैं; पर धीरे-धीरे जैसे-जैसे वे जीवन यथार्थ की चालाकियों से रुबरु होते गए, मनुष्य, संस्थान, अधिकारीवर्ग, सत्ताधीश, न्यायाधीश, पूंजीपति व कारपोरेट जीवन के अंतस्सत्यों के निकट आते गए, उनकी कविता में इनके प्रति एक तल्खी स्वाभाविक रूप से उग्र होकर प्रकट होती गयी. कहना न होगा इस तल्खी का चरम रूप मोहनदास जैसी लंबी कहानी में दिखता है, जहां मोहनदास नियति और दुरभिसंधियों का मारा अपनी जीविका खो बैठता है. यही उन दुरभिसंधियों से भी रूबरू हुए, जिनसे होकर वे कला, संस्कृति व साहित्य के क्षेत्र में व्याटा बेईमानियों से होकर गुजरे तथा ऐसी कविता लिखने पर बाध्य‍ हुए-

पानी अगर सिर पर से गुज़रा, आलोचको
तो मैं किसी दिन आज़िज़ आकर अपने शरीर को
परात में गूँथ कर मैदे की लोई बना डालूंगा
और पिछले तमाम वर्षों की रचनाओं को मसाले में लपेट कर
बनाऊंगा दो दर्ज़न समोसे
और सारे समोसे आपकी थाली में परोस दूंगा
तृप्त हो जाएंगे आप और निश्चिंत
कि आपके अखाड़े से चला गया
एक अवांछित कवि-कथाकार
नमस्कार ! (-नमस्कार, रात में हारमोनियम)
यह तल्खी केवल रात में हारमोनियम में ही नहीं,  एक भाषा हुआ करती है तक में बरकरार है जब वे आंकड़े जैसी कविता में लिखते हैं-
पचास साल तक समाज के आख़िरी आदमी की सारी हत्याओं का
आंकड़ा कौन छुपा रहा है ?
कौन है जो कविता में रोक रहा है उसका वृत्तांत ?

समकालीन संस्कृति में कहां छुपा है अपराधियों का वह एजेंट? (आंकड़े, एक भाषा हुआ करती है)
 
वे राजधानी में बैल सीरीज की कविताएं लिखते हैं तो ज्ञानेंद्रपति की सांड़ पर लिखी वह कविता याद आती है जहां उच्च-ककुद सांड़ काशी की गलियों में विभिन्न मुद्राओं में विचरते दिखते हैं. 'राजधानी में बैल' कुछ-कुछ वैसी ही अनुभूतियों का अहसास कराते हैं. 'उस दिन गिर रही थी नीम की पत्ती' ऐसी ही एक महीन कविता है-  प्रकृति के अवलोकनों से उपजी. प्रकृति के प्रकृत अहसास से भरी यह कविता कवि के सामर्थ्य का परिचायक है. नीम की पत्ती कवियों को सदैव एक आत्मोपचार की तरह भाती रही है. इसे कुंवर नारायण, नरेश सक्सेना तथा नए कवि गीत चतुर्वेदी तक ने काव्यसंवेदना का माध्यम बनाया है और इस पर कविताएं लिखी हैं.
 
मुझे प्यार चाहिए, मैं जीना चाहता हूँ, भाग्यरेखाएं, उनका उनके पास, छह दिसंबर उन्नीस सौ बानवे, रेख्ते में कविता, भाषा बहती वैतरणी के साथ पुन: पुरानी तिब्बत कविता के साथ तिब्बत पर कुछ और बातें और बचपन में प्रवेश करते हुए संस्मरणों की श्रृंखला जैसी कवि ने यहां जिस आत्मीयता से सहेजी है वह उदय प्रकाश के काव्यसंसार को परखने, समझने के लिए जरूरी है. 'तिब्बत' लिखे जाने के चार दशकों बाद जिस उत्तर औद्योगिक, उत्तर आधुनिक समय में हम रह रहे हैं, लोकतंत्र के पतन की ढलान पर अग्रसर इस सदी का जो रोजनामचा हम आए दिन देखने के अभ्यस्त हो चले हैं, जिस तरह आम आदमी के सुख-दुख, उसकी समस्याएं, सत्ता, पूंजी, कारपोरेट व बिके हुए चैनलों की आवाजों के कोलाहल में तिरस्कृत व ओझल हैं, उनकी गहरी शिनाख्त उदय प्रकाश ने अपनी उत्तरवर्ती कविताओं में की है. तिब्बत से उदयप्रकाश का कवि कर्म शुरू हुआ था. अपने इलाके अनूपपुर में लामाओं से मिलना, उनमें बुद्ध की स्मिति की झलक पाना, उन्हें लेकर जादुई आकर्षणों से घिरे रहना, उनकी अनभिहित व्यथा का निरूपण करते हुए जिस हालात में तिब्बत जैसी सहज कविता लिखी गयी, उसके पीछे कवि के चेतन अवचेतन में कितना कुछ जमा है, अंत: में सहेजे गए कवि के संस्मरण, तिब्बत के प्रति, लामाओं के प्रति उनके आकर्षण को शब्द देते हैं. लालटेनें, ढिबरियां तथा ऐसी बहुत सी छोटी मोटी चीजें बचपन का हिस्सा बनते हुए कवि के अवचेतन में समा गयी हैं.  
यह बचपन उनकी कहानियों, अरेबा परेबा, डिबिया डिबिया व तिरिछ कहानियों में देखा जा सकता है. बचपन में देखे गए रेडियो, ग्रामोफोन रिकार्ड, गैसबत्ती और गांव की अनेक चीजों से गुजरते हुए किसी को भी अपना बचपन याद आ सकता है. उसमें भी अपने गांव में पहली बार लामाओं को देख कर मन में कैसा कुतूहल जन्मे लेता रहा होगा, इसकी यादगार बानगी कवि ने दी है. पिता ने ही बताया कि तिब्बत पर चीन ने आक्रमण कर दिया है, सो वे वहां से भाग कर भारत आए हैं तथा यहीं सरगुजा पहाड़ पर रहेंगे. वे निकट के अनूपपुर रेलवे स्टेशन पर उतरते व नदी की रेत में चलते हुए गांव पहुंच जाया करते. यही कोई वजह है कि लामाओं के प्रति कवि में अपरिमित सहानुभूति है कि वह यह कहना नहीं चूकता कि ''‘तिब्बत’ कविता, जिसे 1980 का ‘भारत भूषण अग्रवाल’ पुरस्कार मिला और जिस पर दिल्ली और देश की राजधानियों के चर्चित और संगठित कवियों ने राजनीतिक विवाद पैदा किया, वह 'तिब्बत' कविता ही मेरा घर है.''  कहना न होगा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जैसा कहा था कि जैसे-जैसे सभ्यता विकसित होती जाएगी कवि कर्म कठिन होता जाएगा, इस कठिनतर कवि-समय में भी उदयप्रकाश ने हमारे समय के दारुण यथार्थ को कविता की सबसे विश्वसनीय इकाई में व्यक्त किया है.  
***
# ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि आलोचक एवं गीतकार हैं. वे शब्दे सक्रिय हैं, शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई सहित दर्जनों पुस्तकों के रचयिता हैं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, शाने हिंदी खिताब व प्रो. कल्याचणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से विभूषित हैं.

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