बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरेः प्रख्यात लेखक रामदरश मिश्र के काव्यमय जीवन के 96 वर्ष

रामदरश मिश्र की गजलों में प्रेम, प्रकृति, शहर, गांव, मनुष्य, घर परिवार, एवं निजी अनुभवों की तमाम यात्राएं शामिल हैं. सामाजिक राजनीतिक जीवन की विडंबनाएं भी. धार्मिकता के स्याह चेहरे भी. पर आम आदमी के पक्ष में उनकी आवाज में करुणा नजर आती है.

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aajtak.in
ओम निश्चल नई दिल्ली, 11 September 2019
बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरेः प्रख्यात लेखक रामदरश मिश्र के काव्यमय जीवन के 96 वर्ष प्रख्यात हिंदी लेखक रामदरश मिश्र

कविताएं रामदरश जी की रचनात्मकता का पुराना ठीहा हैं तो ग़ज़लें उनके कवित्व का नया विस्तार. हिंदी ग़ज़लों की जो दिशा कभी दुष्यंत कुमार जैसे गजल गो न रखी, हिंदी के अनेक समर्थ गजलकारों ने उसे आगे बढ़ाया है. राम दरश मिश्र उनमें एक हैं, जिनके अब तक कई गजल संग्रह आ चुके हैं. बाज़ार को निकले हैं लोग- उनका पहला संग्रह था जो गजल की दुनिया में उनका पहला कदम था. उसके बाद जैसे-जैसे उनकी गजलों को लोकप्रियता मिलती गयी, वे गीतों की दुनिया से गजलों में शिफ्ट होते गए. गजल उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति का एक नया विस्तार सिद्ध हुईं. आज वे भले एक जाने माने कथाकार उपन्यास व कवि के रूप में पहचाने जाते हों पर उनकी गजलगोई उनके कवित्व के सम्मुख कम महत्त्वपूर्ण नहीं. तभी तो उनकी एक गजल इतनी मकबूल हुई कि उनकी वह पहचान बन गयी. वे आज भी जहां जाते हैं वह गजल फरमाइश पर सुनाते हैं. उसमें जीवन का जो फलसफा है वह लोगों को बहुत भाता है और बोलचाल की लय में वह गजल आज लोगों की जबान पर चढ़ चुकी है. वह गजल है: बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे/ खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे.

उनकी गजलों के अन्य संग्रह- हँसी ओठ पर आँखें नम हैं, तू ही बता ऐ ज़िन्दगी, आने के साथ-साथ वे गजल में पहचाने जाने लगे थे. यहां तक कि गजल के उस्ताद शायर मुनव्वर राणा अपनी निजी बातचीत में रामदरश जी की गजलगोई की तारीफ करते हैं. इसके बाद उनकी 51 ग़ज़लें प्रकाशित हुईं. हम सब जानते हैं कि पिछले दो दशक में गजल को ऐसी लोकप्रियता मिली कि अन्य काव्य विधाएं गौण हो गयीं. यूट्यूब पर ग़ज़ल गायकी का ऐसा बोलबाला रहा कि हर कवि गजलगोई की ओर आकृष्ट हुआ. आज हिंदी में कितने ही गजलगो हैं जिनकी अपनी पहचान है. ऐसे में रामदरश मिश्र जैसे सिद्ध रचनाकार ने गजलगोई में भी अपनी संभावनाएं तलाश कीं और सफलता पाई. दो साल पहले उनकी गजलों का संग्रह सपना सदा पलता रहा आया है. तिरासी गजलों के इस संग्रह में सामाजिक जीवन के विविध आयाम दृष्टिगत होते हैं. गजल काफिये और रदीफ में कसी हुई विधा है जिसका एक-एक शेर मौजूं होता है.

हाल ही में उनकी ग़ज़लों का नया संग्रह स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. नाम रखा है: 'दूर घर नहीं हुआ'.  एक बार मिलने पर वे इस संग्रह का यह गजल पढ़ने लगे-

चाहे  जहां  रहा मैं,  दूर घर नहीं हुआ.
होने को तो हो जाता जुदा, पर नहीं हुआ.

यह उनकी ग़जलों का चौथा संग्रह है. मैंने कहा, ''डाक्टर साब, इधर लिखी ग़ज़लों में से आपकी सबसे प्रिय ग़ज़ल कौन सी है?" तो इसी नई पांडुलिपि से हाथ से लिखी एक ग़ज़ल पढ़ कर सुनाने लगे. सुन कर लगा, यह ग़ज़ल तो जैसे मानवता के नाम कवि का जरूरी संदेश हो-

मनुष्य है मनुष्यता के हक में तू विचार कर
मनुष्य, पशु-पखेरुओं लता द्रुमों से प्यार कर

है प्यार से बड़ी नहीं- जहां में कोई संपदा
तू मिल किसी से भी तो मिल सदा अहम् उतार कर

वतन है दे रहा तुझे न जाने क्या-क्या बाखुशी
खुशी के वास्ते वतन की तू भी कुछ निसार कर

मनुज-मनुज के बीच धर्म भीत है तो तोड़ दे
अगर है ये गुनाह तो गुनाह बार-बार कर.  

ग़ज़ल में सादाबयानी
सच है कि कवि मानवता का संदेशवाहक होता है. वही है जो अनीति के सामने नहीं झुकता. आज अभिव्यक्ति के माध्यमों के सिकुड़ते जाते युग में कविता की सचाई आज भी असंदिग्ध बनी हुई है. उनकी गजलों में एक सादा बयानी है. गो कि वह उर्दू गजलों की रवायत का अनुसरण नहीं करती तो भी उसमें कथ्य की सफाई है. एक गजल में वे लिखते हैं:
एक नन्हा ख्वाब मेरा खो गया जाने कहां
गांव देखा, शहर देखा, राजधानी देख ली.

फूल से बचपन के सिर देखा बुढ़ापे का पहाड़
आंसुओं की आंच में गलती जवानी देख ली.

जैसा कि मैंने कहा वे मार्क्सवादी भले न हो पर प्रगतिशीलता उनमें कूट कूट कर भरी है. वह गहरी मनुष्यता से परिचालित हैं. तभी तो वे एक शेर में कहते हैं:

हो गई तेज मंदिरों में अगर की खुशबू
गांव का गांव अछूतों का फिर फुंका होगा.

गजल इधर रोमान का रास्ता तज कर जीवन की दुश्वारियों से रू-ब-रू हुई है. वह सत्तावानों की कारगुजारियों पर कांटे की तरह चुभती है. तभी वे एक गजल में कहते हैं:
जी हां जी हां वहां एक चौपाल थी
देखिए अब वहां कारखाना हुआ.
और जब सियासत के अहेरी गांवों में सफेदपोश बन कर दाखिल होते हैं तो जनता के भीतर से क्या भय उठता है, रामदरश जी एक गजल में इसे यों कहते हैं:
दादा जी इन दिनों गांव में कुछ शरीफ जन आए हैं
ना जाने क्यों इन्हें देख कर लोग बहुत घबराए हैं.
उनकी गजलों की व्याख्या में न जाकर कुछ अशआर उद्धृत कर रहा हूँ जिससे उनके कथ्य की संजीदगी का अहसास पुख्ता होता है-

घर में लगा के आग वे मंदिर में छिप गए
मुद्दत से चल रहा है यों उनका धरम करम.

एक कविता बन गयी दूजी सियासत की जबान
देवता की प्रार्थना उसने भी की, उसने भी की.

सहम सहम के बह रहा है नदी का पानी
हवा बहार की कैसी डरी डरी सी है.

जिस जिंदगी में एक धड़कता सा दर्द था
वह जिन्दगी बाजार का सामान हो गयी.

दुनिया में हम आते हैं तो होती है एक जाति
आकर के यहां हिंदू-मुसलमान हो गयी. (सपना सदा पलता रहा)

उनकी गजलों में प्रेम, प्रकृति, शहर, गांव, मनुष्य, घर परिवार, एवं निजी अनुभवों की तमाम यात्राएं शामिल हैं. सामाजिक राजनीतिक जीवन की विडंबनाएं भी. धार्मिकता के स्याह चेहरे भी. पर आम आदमी के पक्ष में उनकी आवाज में करुणा नजर आती है. इन गजलों में उनका अपना जीवन भी छन कर आता है:
जाने कब से हूँ पड़ा हुआ प्रोफेसर बन कर दिल्ली में
पर भीतर जो है बसी हुई व ठेठ किसानी याद आई.
कुल मिला कर रामदरश जी की गजलों में उम्दा कथ्य है तो उसे पापुलर रिद्म में ढालने की कोशिश भी. उनके इस कौल करार में उनकी जिन्दगी ही नहीं, गजलों का भी फलसफा छिपा है:

महलों के आंगन में घुट जाता है दम मेरा
मुझकों अपने घर का कोना अच्छा लगता है.

बस गया हूं दोस्तो, दिल्ली शिर के बीच यों तो
घर मेरा अब भी वही हां वही, गोरखपुर जिला है.

मिट्टी से नाता
जीवन के आठ दशक लिखने पढ़ने में गुजार देने के बावजूद यह रामदरश मिश्र ही हैं जो अपनी मिट्टी से अपना नाता नहीं तोड़ते. पहचान वही गोरखपुर जिला. जैसे केदारनाथ सिंह एक कविता में कहते हैं: हिंदी मेरा देश है, भोजपुरी मेरा घर. रामदरश मिश्र भी भोजपुरी भाषी हैं पर हिंदी की विभिन्न विधाओं के स्थापत्य को अपनी अभिव्यक्ति की पैनी धार से नुकीला बनाया है. उनकी उम्र बताती है कि वे जैसे इस और उस सदी के सहयात्री रहे हों. उन्हें पढ़ते हुए एक बार मेरी निगाह इस शेर पर गई-

इक नदी बहने लगी गाती हुई भीतर मेरे,
यह महीना जेठ का मेरे लिए सावन हुआ.

कभी नीरज ने लिखा था, ''मैंने तो सोचा था अपनी सारी उमर तुम्हें दे दूँगा. इतनी दूर मगर थी मंजिल चलते-चलते शाम हो गयी.'' नीरज का यह सोचा कितना सार्थक हुआ वे जानें पर रामदरश मिश्र ने इसे सच कर दिखाया. उम्र हो गयी उन्हें लिखते पढ़ते हुए. हर साल कुछ किताबें. हर साल कुछ नए मसौदे. हर वक्त किसी न किसी परियोजना में डूबे रहना और राइटिंग पैड पर कुछ न कुछ लिखते रहना उनकी आदत में शुमार है. हिंदी जगत को उन्होंने सारी उम्र दे दी. मैं जब-जब जाता हूँ, वे अपनी ताज़ा गजलें सुनाते हैं. कभी वाणी विहार में कई लेखक रहते थे, कुछ बाहर चले गए, कुछ इहलोक से विदा हो गए. सरस्वती के वरदपुत्रों में अब केवल वे और रमाकांत शुक्ल हैं जिनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली है. हिंदी में रामदरश मिश्र, संस्कृत में रमाकांत शुक्ल. लोग आए दिन अपने ऊपर लिखी जा रही पीएचडी से हुलसित हो उठते हैं, उसे चर्चा का विषय बनाते हैं. रामदरश मिश्र के ऊपर जहां तक मैं समझता हूँ, हिंदी के लेखकों में प्रेमचंद के बाद सबसे ज्यादा शोध प्रबंध लिखे गए हैं. मैंने एक दिन सहसा पूछा तो बोले, ''हां होंगे कोई पौने चार सौ के लगभग'' और उनकी खुद की अस्सी  से ज्यादा किताबें विभिन्न विधाओं में.

एक बार उनका फोन आया तो कहने लगे, ग़ज़लों की नई किताब आई है: दूर घर नहीं हुआ. तुम्हें देनी है. जनवरी से इंतजार कर रहे थे कि प्रकाशक प्रतियां भेजें तो वे अपने प्रियजनों को दें. वह मौका अब आया. उनकी दी हुई अनेक पुस्तकें मेरे संग्रह में हैं. उनकी कविताओं पर बहुधा लिखा है, कहानियों और एकाधिक उपन्यासों पर भी. पर मानता उन्हें मूलत: कवि ही हूँ. उनका स्वभाव भी कवि का ही है. कोई आया तो उसकी आवभगत में खो गए. पत्नी  सरस्व‍ती जी झट से चाट बिस्कुट लिए हाजिर. मेरे लिए तो विशेष ही. अभी हाल ही में दोनों ने अपनी 71वीं वैवाहिक वर्षगांठ मनाई है. यों तो सभी बच्चे अपने अपने फन के माहिर हैं. पर नाती पोतों से भरे इस परिवार में रामदरश जी के उत्तराधिकार की सच्ची साहित्यिक नुमाइंदगी स्मिता करती हैं. उनकी छोटी बेटी. फिर चर्चा आरंभ होती है तो थमने का नाम नहीं लेती. सरस्वती जी भी आवभगत कर बगल में बैठ जाती हैं. वे बोलते हैं तो लगता है साहित्य की एक सदी बोल रही है. कभी अपने संस्मरणों को उन्होंने 'सहचर है समय' नाम दिया था. सच ही है. वे समय के सहचर हैं. विगत और इस सदी के कंधे पर हाथ रख कर साथ-साथ चलते हुए. कई लोग इस बात की बड़ी नोटिस लेते हैं कि फलां ने मेरे ऊपर नहीं लिखा. रामदरश जी ने इसकी परवाह नहीं की. अपने समय के बड़े से बड़े आलोचकों के साथ रहे. आचार्य द्विवेदी जी के शिष्य रहे पर लिखने के लिए कभी याचना या जोडतोड़ नहीं की. छोटे-बड़े सबको अपनी किताबें भेंट करते पर किसी प्रत्याशा से नहीं. एक दिन मैंने पूछा, "डाक्टर साब, नामवर जी ने आपके बारे में कुछ लिखा है क्या?" बोले, "नहीं तो." "फिर आपने तो उन पर कई कई लेख लिखे हैं." 'बहुवचन' के नामवर सिंह केंद्रित अंक में तभी ताजा-ताजा उनका आलेख आया था. वे बोले, "नामवर हमारे समय के एक बड़े सुपठित आलोचक हैं, वे लिखें न लिखें, यह उनका मामला है. पर मुझसे किसी ने आग्रहवश कहा तो मैंने कहा जरूर लिखूंगा. और देखिए! वे नहीं रहे तो उस दिन बहुत उदास हो गए. मिलने पर उसकी छाया उनके चेहरे पर देखी जा सकती थी. सामने अखबार पड़ा था और नामवर जी पर बहुत प्यारा मार्मिक वक्तव्य हिंदुस्तान में छपा था. मुझे एक शेर याद हो आया:
उनका जो काम वो अहले सियासत जाने
अपना पैगाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे.

वे शामें, वे ग़ज़लें
इस बार जब उनका गजल संग्रह दूर घर नहीं हुआ- उलट पलट रहा था तो वे बहुत सारी शामें अचानक याद हो आईं जो उनके सान्निध्य में बीती हैं. पास ही घर होने से यह सुविधा है कि जब याद किया, पहुंच गए. उन्होंने इस पुस्तक की कई गजलें सुनाई हैं. आज उन गजलों से गुजर रहा हूँ तो लगता है बीता हुआ समय सामने ठिठक कर खड़ा हो गया है और वे गजल सुना रहे हैं-
पास तुम आए तो कीचड़ में कमल सा मन हुआ
लग रहा है आज सारा जग मेरा दर्पण  हुआ.

इक नदी बहने लगी गाती हुए भीतर मेरे
यह महीना जेठ का मेरे लिए सावन हुआ.

मुझे निराला याद हो आए. आज मन पावन हुआ है. जेठ में सावन हुआ है. आतिथ्य के लिए सदैव समुत्सुक रहने वाले रामदरश मिश्र 96 की इस वय में भी वक्त के मिजाज को शब्दों. में उकेरते रहते हैं. बड़े उपन्यास या कहानियां तो अब करघे पर नहीं छेड़े जा सकते, पर कविताएं और गजलें तो लिखी ही जा सकती हैं. सो गजल, गीत और कविताओं का करघा कभी बंद नहीं होता. वे अक्सर किसी न किसी काफिए रदीफ की खोज में व्यग्र होते हैं. कोई गजल पूरी हो चुकी होती है. कोई अधूरी अपने काफिए रदीफ के इंतजार में. किसी न किसी गीत की टेर उन्हें गुहारती रहती है कि मुझे पूरा करो. किसी गीत का स्थायी उन्हें एकाग्र किए रहता है कि इसे पूरा करो. अभी कल ही कह रहे थे, एक गीतों की किताब भी बन रही है. बहुत से नए गीत इकट्ठे हो गए हैं. आज जहां नई कविता के नशे में लोग अपनी छंद परंपरा को भुला बैठे हैं, वे गाहे ब गाहे छंद का आवाहन करते रहते हैं. नई कविता ने कभी गीत का दामन नहीं छोड़ा पर आलोचकों ने ही गीत को नई कविता के नक्शे से काट कर कविता का आंगन छोटा कर दिया. पर किसी सच्चे कवि के लिए क्या गीत क्या नई कविता- सब रूप और अंतर्वस्तु का मामला है. छंद लिख कर तुलसी, सूर, कबीर, निराला, त्रिलोचन, नागार्जुन अमर हो गए, लोगों के कंठ में उनके लिखे की स्मृति है, नए कवियों को खुद ही अपनी कविता याद नहीं होती. किसी सभा समारोह में अपनी एक भी पूरी कविता वे सुना नहीं पाते. पर रामदरश जी को छेड़ भर दीजिए उनकी स्मृति लहलहा उठती है. गीतों-गजलों के लच्छे के लच्छे खुलते जाते हैं.

अपनी ग़ज़लों के बारे में संकोचपूर्वक वे कहते हैं ''अच्छी गजलों की भीड़ में इनकी जगह कहां है, है कि नहीं, मैं नहीं कह सकता, किन्तु़ ये मेरी अपनी हैं, इनका अपनापन है, यह बोध तो मुझे सुख देता ही है.'' एक से एक अच्छी गजलें इनमें हैं. उनके उत्तार जीवन की संवेदना भी इनमें समाई है. इनसे गुजरते हुए लगता है कि जीवन के सभी रस इनमें समाहित हैं. अब उनकी गजलों में उनकी उम्र बोलती है. देखिए ये दो शेर --
था गांव में तो देखता था शहर का सपना
लगा पुकारने सा गांव जब शहर आया.

मेरी अजीज जिन्दगी मुझे दे अब आराम
मुझे दिए थे काम जो-जो वे मैं कर आया.

गजलों में उनके मन की भी बहुत सारी बातें हैं. कितने मित्र, दोस्त थे, सब एक-एक कर चले गए. जो बचे हैं उनसे अक्सर मिलना-जुलना नहीं होता. उम्र इजाजत नहीं देती. इसलिए कुछ अकेलापन सा लगता है. एक गीत में वे कह चुके हैं: एक एक जा रहे सभी मन बड़ा अकेला लगता है. और इस ग़ज़ल में भी वैसी ही अनुभूति समाई हुई है-
नहीं कोई साथी नहीं कोई चेला
चला जा रहा वह अकेला अकेला.

मुहब्बत मिली तो गया भींग उसमें
उदासीनता को भी हँस हँस के झेला.

वो है चाहता- मैं रहूँ न रहूँ पर
रहे जगमगाता जमाने में मेला.  

अब भी लोग आते हैं, युवकों का नए लेखकों का आना जाना होता रहता है. पर बड़े साहित्यकार जो कभी हुलस कर मिलते थे, वे नहीं आते. मुझे किसी शायर का कहा याद आता है. जो भी मिलता है न मिलने की तरह मिलता है/ कोई तो आ के कभी मिलने मिलाने आए. रामदरश जी इस भाव को कुछ इस तरह उठाते हैं-
कल तलक था अब रहा नाता नहीं
अब कोई आता नहीं, जाता नहीं.

आऊँगा आऊँगा इक दिन ले खुशी
वक्ता है कहता रहा, आता नहीं.

बढ़ती उम्र के साथ बेशक अकेलापन बढ़ रहा है. पर अभी भी उनकी दुनिया बोलती बतियाती हुई दुनिया है. घर बच्चों की आवाजाही से भरा सा रहता है. कभी मन हुआ तो छोटी सी गोष्ठी घर में ही जमा ली. कवयित्री कथाकार अलका सिन्हा के खनकदार संचालन के स्वर मैंने यहीं सुने हैं. कुछ लिखते हैं तो उसकी शायद प्रथम श्रोता सरस्वती जी ही हुआ करती हैं. अब तो कुछ लोग उन्हें यूट्यूब के लिए भी रिकार्ड कर लेते हैं.

इस सदी के सबसे वयस्श्रेष्ठ कवि की आवाज आसानी से हासिल नहीं होती. साथ बैठ कर उनसे सरस्वती जी बोलती बतियाती रहती हैं पर लेखक तो अंतत: अकेला ही होता है. इसका वे इन दिनों इज़हार भी करते हैं. कभी उन्हें प्रतीत होता है:
आज मैं घर में अकेला हो गया हूँ
जग रहा हूँ किन्तु़ लगता सो गया हूँ.

ग़ज़ल के साथ यायावरी
उनकी गजल का संसार अब कोई छोटा संसार नहीं है. लगभग चार सौ ग़ज़लों की यह दुनिया अब अजानी नहीं है. इन्हें जो भी पढ़ता है, अपने मन की बात पाता है. उनकी ग़ज़लें शायरी के इतिहास में कहां मुकाम बनाएंगी यह बता पाना मुश्किल है पर हिंदी ग़ज़लों की वह परंपरा जिसकी बुनियाद दुष्यंत कुमार ने रखी, अदम ने उसे एक नई आबोहवा में सींचा, अनेक छोटे-बड़े सैकड़ों हजारों शायर इसे जिन्दादिली से सींच रहे हैं. रामदरश मिश्र जैसे गजलों के साथ निरंतर एक सहयात्रा में हैं. यह उनकी ग़ज़लों के साथ यायावरी के दिन हैं. इनमें मनुष्यता का एक नैतिक प्रतिकथन समाया हुआ है. एक ऐसी ही गजल उन्होंने पिछली एक मुलाकात में सुनाई थी, वह मुझे भूलती नहीं. जैसे वह कवि की जनता के नाम एक वसीयत हो-
मनुज-मनुज के बीच धर्म भीत है तो तोड़ दे
अगर है ये गुनाह तो गुनाह बार-बार कर.

कहना न होगा कि गजल कितनी भी अच्छी हो, उसका कद मनुष्यता से ऊँचा तो हो नहीं सकता. इसीलिए कभी कुंवर नारायण ने कहा था, ''अब की लौटा तो मनुष्यतर लौटूँगा, कृतज्ञतर लौटूँगा.'' ये ग़ज़लें, सच कहें तो आदमी को मनुष्य बनने की सीख देती हैं. रामदरश मिश्र ने वक्त को बहुत करीब से देखा है. आधुनिकता को सत्वर गति से आते हुए देखा है और अब बाजार को घरों में घुसते देख रहे हैं. पर उनकी सादगी बाजार के प्रलोभन से विचलित नहीं होती. उनके जीने का ढंग निराला है. सबके साथ हँसी लुटाने की यह आदत शायद उन्होंने पंडितजी से पाई है. शिरीष के फूल की तरह सुगंध बॉंटते रहना. मुझे सहसा बशीर बद्र याद हो आए हैं- यों तो हम देने के काबिल ही कहां हैं लेकिन. हॉं कोई चाहे तो जीन की अदा ले जाए. उनसे मिल कर वास्तव में जीने की अदा सीखी जा सकती है.
 
रामदरश जी को सेवा से विरत हुए तीस साल से ऊपर हुए. फुरसत ही फुरसत. पर इस फुर्सतिया समय को उन्होंने कैसे रचनात्मकता के पर्व में ढाल दिया है इसे उनकी रचनाओं से गुजरते हुए ही जाना जा सकता है. अपने इन रोजमर्रा के अनुभवों को किस खूबी से वे टॉंक देते हैं:
पूछते वे इन दिनों फुरसत में क्या करता हूँ मैं
वक्त का अपने फटा दामन सिया करता हूँ मैं.

व्याप जाती है घुटन जब जिन्दगी की सॉंस में
अपनी कविताओं के पंखों से हवा करता हूँ मैं

-अदब में अपनी पहचान रामदरश मिश्र ने धीरे धीरे पाई है. उन्हें बहुतेरे पुरस्कार मिले. साहित्य अकादेमी, व्यास सम्मान, भारत भारती, दयावती मोदी कवि शिखर व शलाका आदि अनेक. आज वे अपनी उम्र की 96वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. गुलाम भारत में आज के ही दिन यानी 15 अगस्त, 1924 में जन्मे रामदरश जी आज आजादी की आबोहवा में हैं उनका कवि-जीवन यह सीख देता है कि दुनिया धीरे-धीरे बनती है,  पेड़ धीरे-धीरे बड़े होते हैं, सफर धीरे-धीरे कटता है, जिन्दगी धीरे-धीरे अनुभवसिद्ध होती है. उनकी ग़ज़लें इस दिशा में एक मिसाल की तरह हैं. आज जितना बड़ा उनका कवि कद है, उससे छोटी उनके शायर की शख्सियत नहीं है. आज के ही दिन उनकी ग़ज़लों का एक चुनिंदा चयन प्रकाशित हो रहा है- बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे. इन दिनों उनसे मिलिए तो वे किसी ग़ज़ल के काफिये-रदीफ की खोज में मशरूफ मिलेंगे या कोई यादगार क्षण अपनी डायरी में दर्ज कर रहे होंगे. आज के दिन उन्हें शतायु होने की शुभकामनाएं.

# लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि, गीतकार, आलोचक एवं भाषाविद हैं.शब्द सक्रिय हैं (कविता संग्रह), शब्दों से गपशप (आलोचना), भाषा की खादी (निबंध), कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई एवं बैंकिंग वाड्.मय सीरीज के रचयिता हैं. अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, मलय, अशोक वाजपेयी व लीलाधर मंडलोई आदि कवियों के कविता चयन संपादित किए हैं. कुंवर नारायण पर दो खंडों में संपादित आलोचनात्मक कृतियां 'अन्वय' एवं 'अन्विति' विशेष चर्चित. उनसे जी-1/506 ए, उत्ताम नगर, नई दिल्ली- 110059 फोन: 8447289976 पर संपर्क किया जा सकता है.

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