कहानियों में स्वप्न की एक धीमी लौ राजेंद्र राव, आज जिनका जन्मदिन है

लेखक कथाकार राजेंद्र राव पेशे से इंजीनियर रहे किन्तु मन किस्सागोई में रमता रहा. मशीनों के बीच रहते हुए उनके दिमाग में कहानियों के प्लाट घूमते...उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर साहित्य आजतक की विशेष प्रस्तुति

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aajtak.in नई दिल्ली, 09 July 2019
कहानियों में स्वप्न की एक धीमी लौ राजेंद्र राव, आज जिनका जन्मदिन है मानवीय और मशीनी दुनिया के अदभुत चितेरे राजेंद्र राव [ फोटो सौजन्यः लेखक ]

राजेंद्र राव पेशे से इंजीनियर रहे किन्तु मन किस्सागोई में रमता रहा. मशीनों के बीच रहते हुए उनके दिमाग में कहानियों के प्लाट घूमते. सातवें दशक के दौर में उन्होंने कहानियॉं लिखनी शुरु कीं तो साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका, कहानी, रविवार आदि पत्रिकाओं के पन्नों पर वे एक कथाकार के रुप में छा गए. साहित्यकारों की सोहबत का मन हुआ तो पास में बिंदकी पहुंच जाते सोहनलाल द्विवेदी के पास. आखिरी दिनों में उन पर लिखा उनके संस्मरण बहुत बेधक हैं. मन हुआ तो कथाकार शिवमूर्ति के आग्रह पर उनके गांव हो आए. अवध की माटी की खुशबू का आनंद लेते हुए उस पर गहन शब्दकचित्र लिख दिया. कोलकाता की खुशबू उन्हें उन वर्जित गलियों में भी ले गयी, जहां पहुंच कर उन्होंने उस वर्जित जीवन की अनेक मार्मिक कहानियां लिखीं और वहीं से उनका यश परवान चढ़ा.

अब तक उनके दर्जनों कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें असत्य के प्रयोग, नौसिखिया, शेष यात्रा, दूध के दांत, सूली ऊपर सेज पिया की, कोयला भई ना राख, पाप पुण्य से परे, कितने शीरीं हैं तेरे लब कि प्रमुख हैं. उस रहगुजर की तलाश है के रिपोर्ताजों में दृश्यों और संबंधों को पकड़ने की उनकी बारीकी देखी जा सकती है, तो उनके उपन्यासों में अलग सी खुशबू आती है. 'ना घर मेरा ना घर तेरा' उपन्यास से उन्होंने औपन्यासिक दुनिया में भी दस्तक दी पर कुल मिलाकर उनका किस्सागो इन सब पर भारी रहा. हाल में एक नाटक 'सेंट आफ मनी' का ड्राफ्ट भी पूरा किया है. अब वह रंग निर्देशकों के हवाले है. इधर दो-तीन साल से वे लैपटाप पर लिखने लगे हैं पर आज भी वे हाथ से लिखे को सबसे बेहतर मानते हैं. वे कहते हैं, ''लाख सुविधा जनक हो लैपटॉप मगर कलम-दवात से मोह अभी बाकी है. कभी जब मन नहीं मानता तो ढूंढ लेता हूं.'' एक समय था कि कोयला भई ना राख की कथासीरीज की लोग राह देखा करते थे.

कोयला भई ना राख: कथा श्रृंखला
कोयला भई न राख की कथा श्रृंखलाओं के बारे में राजेंद्र राव बताते हैं: ''लेखकों का जीवन विडंबना से मुक्त नहीं होता. कैशोर्य से लेकर युवावस्था तक मेरा मन आस-पास के ऐसे लोगों को देख कर पिघलता रहा जिन्होंने अपने जीवन को सजाने-संवारने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पहाड़ खोदने को भी तैयार रहे मगर रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला. ख्वाब कांच के खिलोनों की तरह टूटते-बिखरते रहे और उम्मीद भी नहीं बची. मैंने लिखना शुरू किया तो इनको कथा चरित्रों के रूप में ढालता गया और उनकी दुखांत गाथाएं लिख कर सोचा कि चलो अंततोगत्वा मैंने उनका दुख बांट लिया.

"यह कथा श्रृंखला 'कोयला भई न राख' के नाम से साप्ताहिक हिंदुस्तान में धारावाहिक छपी और पाठकों का ध्यान खींचने में सफल रही. प्रकाशकों का भी. यह तो था औरों के दुखों को अनुभूति के स्तर पर महसूस करके रचनात्मकता की दिशा ग्रहण करना. लेकिन, जब बाद में, बहुत बाद में मेरे पर दुख का पहाड़ टूटा तो मुझे ठीक से पता चला कि वह सब, कोयला भई न राख के पात्र कैसे असह्य पीड़ा को झेलते हुए जिंदगी बिताते होंगे.''

इस किताब के प्रकाशित होने का भी दिलचस्प किस्सा है. राव बताते हैं, ''उन दिनों मैं एक नया लेखक था. मेरी एक कहानी को पढ़ कर साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक मनोहर श्याम जोशी जी ने कहा कि हमें ऐसी दस कहानियां दीजिये जिन्हें हम धारावाहिक रूप से छापेंगे. 'कोयला भई न राख की कहानियां राजपाल प्रकाशन के स्वामी विश्वनाथ जी को इतनी पसंद आईं कि उन्होंने उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का प्रस्ताव भेजा. राजपाल उन दिनों बड़े प्रकाशक थे. एक नए लेखक के लिये यह अपने आप में एक बड़ा प्रोत्साहन था. किताब छपी और बहुत अच्छी रायल्टी भी मिली. यह सन 1975 की बात है. तब के संपादक और प्रकाशक किस तरह युवा लेखकों को प्रोत्साहित और प्रेरित करते थे." काफी दिनों तक अप्रकाशित रहने के बाद अब यह किताब पुन: राजपाल एंड संस से प्रकाशित होकर आ गई है.

कुछ लोगों के लिए कहानी लिखना एक घंटे या दो घंटे का खेल होता है. अक्सर आए दिन छपने वाले कथाकारों को देख कर यह अनुमान लगाना कठिन न होगा. पर मई 2019 में नया ज्ञानोदय में आई कहानी 'बैठ जाओ' को लिखने में उन्हें काफी समय लगा. वे कहते हैं, ''पिछले चार दशकों में, किसी कहानी को लिखने में इतनी कठिनाई कभी नहीं हुई जितनी सावित्री-सत्यवान की इस दारुण गाथा को कागज पर उतारने में अनुभव हुई. इसके लिए पत्थर का कलेजा होना चाहिए.'' अभी हाल ही में उनकी चर्चित कहानी 'चोखेर बाली' का मंचन दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में हुआ जिसका निर्देशन टीकम जोशी ने किया.
 
राजेंद्र राव के शौक
राजेंद्र राव के शौक निराले हैं. अपने घर के अंजीर व शरीफे को वे बहुत याद करते हुए कहते हैं, वे कहते हैं शराफत का नूर, हमारे बगीचे में.  जैसे शरीफे की शराफत इस लेखक के चरित्र का भी एक हिस्सा हो. वे अक्सर पढ़ने-लिखने में मशगूल रहते हैं. पहले पत्नी थीं तो हर वक्त की बोलचाल की साथी. जब से वे नहीं हैं, वे शब्दों से ही गपशप में लगे रहते हैं. कभी-कभी इस अकेलेपन का मार्मिक इजहार भी वे करते हैं. नाटकों में उनकी दिलचस्पी बहुत है. वे गालिब को पसंद करते हैं. समय समय पर आई फिल्मों में जो पसंद आती हैं उन पर संक्षिप्त टिप्पणियां लिखते हैं. फिल्मी गाने व शेरो-शायरी में भी उनकी खासी दिलचस्पी है. कभी कोई किताब पसंद आई तो वह उनके पठन-पाठन में रही. बहुत अच्छी लगी तो लगे हाथ उस पर एक टिप्पाणी लिख कर फेसबुक पर टांक दी.

कभी विजय किशोर मानव ने कादंबिनी के लिए उनसे कानपुर के संस्मरण लिखवाए तो उन्होंने बड़े प्यार से लिखा. मुरादनगर की स्मृतियों को करीने से टांका. कानपुर में अब से पहले आर्मापुर में रहा करते थे. उसे छोड़ना पड़ा तो बाद में उधर से गुजरते हुए उन्हें उसकी याद हो आई. वह घर भले ही छूटा पर यादें विस्मृत नहीं हुईं. उन्हें वहां पहुंच कर सब कुछ जैसे याद हो आया, ''क्या हम लौट कर कभी जाते हैं, उस बसेरे तक जिसे बरसों पहले छोड़ कर चले आए थे- भारी मन से. जहां बीते रूमान और रचनात्मकता में डूबे हुए कुछ अविस्मरणीय बरस. मित्रों यही है- ई-51, सब स्टेशन के पास, आर्मापुर, कानपुर-10. बहुत गुलजार और भरापूरा आशियाना था यह उन दिनों. महानगर की आपाधापी से दूर और अछूता आर्मापुर, हराभरा, सुरम्य और शांत ही नहीं सुव्यवस्थित भी था. द्वितीय विश्व युद्ध के समय अंग्रेजों द्वारा आयुध निर्माण के लिये बनाई गई यह एस्टेट आज भी रमणीक है. कल पनकी मंदिर से लौटते हुए अनायास ही गाड़ी आर्मापुर में मुड़वा दी. ई-51 गए, सूना पड़ा था.

"एक पुराने बंगले में बने उस नर्सरी स्कूल गए जहां शुक्ति पहले पहल विद्यारंभ के लिए गया. वह स्कूल जाता तो हमारा परम विश्वस्त शेरू भी साथ जाता था और उसके लौटने तक स्कूल के बाहर ही बैठा रहता था. उन दोनों की फोटो के साथ एक दिलचस्प आलेख साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपा था. आर्मापुर के साफ-सुथरे और अत्यंत अनुशासित बाजार में भी गए जहां सब कुछ मिलता है. ताजी सब्जियां, परचून, कपड़े, बिसाती का सामान, भट्टी पर कढ़ाई में भूंजे जाते सभी तरह के चबैने, सेनेटरी इंस्पेक्टर द्वारा मोहर लगा कर पास किए गए बकरे का गोश्त और चिकन. उस बाजार का दृष्य अद्भुत लगा. ऊंचे-ऊंचे माल तो पानी भरते से लगे उसके सामने. वहां से लिए गर्मागर्म भुने चिवड़े और मूंगफली चबाते वापिस लौटे क्योंकि अब पता बदल जो गया था.''


राजेंद्र राव सुख दुख के हर लम्हे को एक भोक्ता और द्रष्टा दोनों भाव से दर्ज करते हैं. उनके भीतर सारे मानवीय रस मौजूद हैं. हर लम्हा कहानी की संभावना लिए हैं, जैसे अशोक वाजपेयी के लिए शहर अब भी एक संभावना है. पर जैसा कि कहा है, वे भले ही तमाम विधाओं के पठन पाठन व लेखन में दिलचस्पी रखते हों पर हैं वे खांटी कथाकार ही. इसलिए कहानी की दुनिया में आज भी उनकी अपनी पहचान है. उनके पाठकों और संपादकों को आज भी उनसे कहानियों की मांग बनी रहती है.

राजेंद्र राव की कहानियां
देखने में सहज, संजीदा किन्तु- बातों से साहित्य में गहरे पगे लेखक का अहसास दिलाने वाले राजेंद्र राव ने कानपुर जैसे श्रमिकों के महानगर के एक कोने में बैठ कर साहित्य के मानचित्र पर अपनी जगह दर्ज कराई है. उनकी कहानियों, रिपोर्ताजों की एक वक्त धूम रही है. कलम मॉंजने के लिए कोलकाता तक की गलियों के चक्कर लगाने के उनके पास बहुतेरे अनुभव हैं तथा इंजीनियरिंग की शुष्क दुनिया से संबद्ध रहते हुए भी मानवीयता के स्वप्न की सुलगती धीमी लौ की रोशनी में उन्होंने अनेक पात्रों चरित्रों और स्थितियों को सिरजा है तथा यह सिद्ध किया है कि जिस तरह जिन्दगी हर जगह मौजूद है, कहानियां भी वैसे ही हर जगह बिखरी हुई हैं, बस उन्हें सहेजने और पकड़ने की जरूरत है. उनकी किसी एक भी कहानी से आपका गुजरना हो तो आप राजेन्द्र राव के लेखकीय मिजाज़ को शिद्दत से समझ सकते हैं.

कहानी और कविता में कथ्य का भी अपना फैशन और अपना दौर होता है. कभी-कभी लगता है तमाम कवि प्रेम कविताएं लिख रहे हैं तो ज्यादातर कथाकार प्रेम कहानियां. प्रेम कविताओं और कहानियों का वसंत हर वक्तर सरसब्ज होता है. पर कुछ कथाकार ऐसे होते हैं, जो जितनी अच्छी प्रेम कहानियां लिखते हैं, जीवन में दूसरे बुनियादी पहलुओं पर भी उतनी ही मजबूत पकड़ रखते हैं, राजेंद्र राव ऐसे ही कथाकारों में हैं. अपनी हर कहानी से चौंका देने वाले. दुनिया मशीनी पर भीतर का माहौल निहायत मानवीय.

अभी कुछ ही बरस पहले ही एक लंबी खामोशी के बाद राजेंद्र राव कहानियों की दुनिया में लौटे तो फिर एकाएक उन दिनों की याद दिला दी जब अस्सी के दशक के दौर की चुनिंदा पत्रिकाओं के चंद चर्चित कहानीकारों में वे हुआ करते थे. 71 में कहानी पत्रिका में शिफ्ट कहानी के प्रकाशन के बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और एक से बढ़ कर एक कहानियों की झड़ी लगा दी. नौसिखिया, शिफ्ट, कोयला भई न राख, असत्य के प्रयोग, दूध के दांत और प्रेम कहानियों की सीरीज सूली ऊपर सेज पिया की आदि. इस बीच उनके दो उपन्यास भी आए पर कहानियों में उनकी गति बनी रही. गए चार पांच साल में उन्होंने अपनी दूसरी पारी में पंद्रह से ज्यादा कहानियां लिखी हैं.

जैसा कि पहले भी लिख चुका हूं, राजेंद्र राव की एक दुनिया मेकेनिकल इंजीनियरिंग से जुड़ी दुनिया भी रही है जहां उन्होंने मशीनों के बीच काम किया, रोजी रोटी कमाई और दुनिया जहान के अनुभव हासिल किए. उनका मन बेशक उन मशीनों के बीच न लगता रहा हो पर अनेक कहानियां उन्होंने उस मशीनी जिंदगी के बीच से उठाईं तथा कहानी में ऐसे विरल माहौल की सृष्टि की जहां कोई साधारण कहानीकार नहीं पहुंच सकता था.

राजेंद्र राव ने प्रेम की भी तमाम कहानियॉं लिखीं. अगले जनम में, मौत के बाद, सुधा और सुरेश, मुड़ कर नहीं देखा, प्यार की परछाइयां, प्या‍र देंगे दिल का दर्द लेंगे, पाप पुण्य से परे ऐसी ही कहानियां हैं. इनमें प्रेम की विकलता भी है, कैशोर्य का छलकता प्यार भी, प्रेम में लिखे गए लंबे लंबे पत्र भी, आहें भी और आंसू भी. असल बात यह कि उनके पात्र आदर्शवाद की चौखट पर दम नहीं तोड़ते बल्कि वर्जनाओं की सीमाओं का अतिक्रमण करते नजर आते हैं. किन्तु् जहां अपनी कहानियों में उन्होंने प्रेमियों के दिलों की सूक्ष्म स्कैनिंग की है, वहीं मशीनी दिनचर्या के बीच से जीवन के अनेक मूल्यवान लम्हे भी उठाए हैं.

विज्ञान और इंजीनियरिंग की पढ़ाई नीरस बेशक हो पर इस दुनिया में पले-बढे व्यक्ति के भीतर भी विपुल मानवीय संवेदना होती है. बल्कि  आज के दौर में तमाम कवि कथाकार, विज्ञान तकनीकी और प्रबधन की दुनिया से ही आ रहे हैं जो अभिव्यक्ति की नई जमीन तोड़ रहे हैं. राजेंद्र राव ने बतौर इंजीनियर कारखाने में काम किया, चौबीस घंटे शिफ्ट इंचार्ज रहे तो मशीनी कोलाहल और उत्पादन के लाभ हानि के गणित में उलझते हुए उनके संवेदनशील मन का छटपटाना स्वाहभाविक ही है.

राजेंद्र राव के इस कथासंचयन की ज्यादातर कहानियां भी उनके इन्हीं अनुभवों की उपज है. पर वे कहते हैं, मशीनी दुनिया में होने का अर्थ यह नही कि वहां अंतर्वैयक्तिक संबंधों के रंग चटख नहीं हैं या उस दुनिया में प्रेम नहीं है, संवेदना नहीं है, जीवन नहीं है. बल्कि इस तथ्य को हम शिफ्ट, नौसिखिया, बाकी इतिहास, घुसपैठ और लौकी का तेल आदि कहानियों में पूरे वैभव के साथ देख पाते हैं.

किस्सागोई सबके बस की नहीं होती. घटना के वर्णन के साथ साथ पात्रों के मनोभावों को भी हूबहू अंदाज में रखते जाना कि जिसमें कहानीकार की अपनी दृष्टि भी मुहावरे की भाषा में दिखती चले, ऐसा कम होता है. जहां होता है, वहीं कहानी हमें अपने पाठ के साथ-साथ विमुग्ध करती चलती है. उदाहरण के लिए उत्तराधिकार में पिता परोपकारी स्वभाव के हैं. वे बेटे के जरिए नियमित तौर पर एक अपाहिज को कुछ खाने का सामान भिजवाते हैं जो शहर में हो रहे सड़क निर्माण के साथ दरबदर होती रहती है और जरूरत से ज्यादा लेती नहीं. बेटे ने जब पिताजी का रिफरेंस दिया तभी चीजें लीं. पर अंत में पिता जी की मृत्यु् के बाद उसे कुछ देने के लिए आता है और तब जो संवाद उनके बीच होता है वह आंखें सजल कर देता है. जैसे परोपकार की भावना पुत्र को उत्तराधिकार में मिली हो. इसमें पदोन्नीति पर कहा गया वाक्य ध्यातव्य है: "किसी भी नौकरी पेशा के जीवन में यह आत्मोंत्‍कर्ष का चिरप्रतीक्षित पल होता है."

लौकी का तेल में एक मजदूर अपने तकिया कलाम जो है सो वाली अदा में बोलता हुआ कितना सहज लगता है: बाबू आप शहरी आदमी नहीं जानते, कि लौकी का तेल कितना फायदेमंद होता है. ...हां हां तेल इनका असली है, पैसा भले ही ज्यादा, जो है सो ऐंठते हों. वैदिकी हिंसा में दारू और मुर्गे के चोली दामन के रिश्तें की चर्चा करते हुए कहानी का नायक कहता है, एकाध बार मांसाहारी होने की कोशिश की मगर जब खलबलाकर अंतड़ियां बाहर आने लगीं तो तोबा कर ली मैंने मांसाहार से और दोस्तों ने हितोपदेश से. एक चाट की दुकान का पत्ता पकड़ते हुए अनुभव कैसा होता है सुनियेः खाने से पहले ही भेजा तर हो जाता है. एक अजीब सी लालसा जाग उठती है, जिसकी तुलना सिर्फ विशुद्ध वासना से की जा सकती है.

पूरी की पूरी वैदिकी हिंसा कहानी ऐसी चुस्त मुहाबरेदारी से भरी है. ठेंगा, लंडूरे, लभेड़, नौटंकीबाज, खलास, सुप्तन पौरुष ऐसी शब्दावली कि पढ़ कर कहानीकार की प्रतिभा की दाद देनी पड़ती है. एक जगह इसी कहानी में आता है, ‘इसमें संदेह नही कि ऊपरी तौर पर उसका आग्रह विशुद्ध रूप से अहिंसक था, लेकिन उसमें गांधीजी के सत्याग्रह जैसी पवित्रता नहीं थी.' बाकी इतिहास में जिसमें डायरेक्टर के विजिट और जीएम के करप्शन की चर्चा है, उसमें विजिट की तैयारियों में चार चांद लगाने वाले कथा नायक का उवाच देखिए- "रातोरात मेरे मन से विफल प्रेम से उपजी हताशा और निर्वीयता की कलौंछ पुछ गयी और अंत:पटल स्टील की थाली की तरह जगमगा उठा." शिफ्ट में कहानी का नायक कहता है, "मैं भी शरीर को प्लांट की तरह खोल देना चाहता था."

राजेंद्र राव की कहानियां साधारण कहानियां नहीं, जीवन समय और समाज से जुडी कहानियॉं हैं. ये मिलों की, कारखानों की कहानियां हैं तो रिश्तों की, प्रेम की, जद्दोजेहद की, परोपकार की, संस्कारों के ऊहापोह की, भारतीय यात्राओं की, मेकेनिकल लाइफ की, रातपाली की रंगीनियों और स्वामिभक्तो में कुत्तों सी हरकत पर उतर आते मनुष्यों  की कहानियां हैं. हर कहानी किसी न किसी मकसद से लिखी गयी है. उसका हर वाक्य अनुभव की लंबी तपस्या से निकला है. कहानी के कथोपकथन और अंदाजेबयां की जितनी तारीफ की जाय कम है.

राजेंद्र राव व्यंग्यकार तो नहीं किन्तु उनके नैरेशन में कहीं कहीं श्रीलाल शुक्ला जैसे चुस्त और फुर्तीले वाक्य चमकते हैं. जैसे कभी श्रीलाल जी ने विस्रामपुर का संत में कहा है: सरकारी मुर्दे बहुत खर्च कराते हैं. राजेंद्र राव की कहानियों में भी ऐसे वाक्य दूर से ही चमकते दीखते हैं. वैदिकी हिंसा में कहानीकार कहता है, "बेहूदेपन की इंतिहा शराब हो, साथ में चिकन हो उड़ाने को, बस हो गया ग्रैंड सेलीब्रेशन, इस खटकर्म में सबसे पहले सूली चढ़ता है सौंदर्यबोध." कहने की बात नहीं कि राजेंद्र राव ने अपनी किस्सागोई में इस सौंदर्यबोध को कायम रखने का भरसक प्रयत्न किया है ताकि न तो ऊब का सृजन हो, न सौंदर्यबोध का क्षय. किसी भी घटना या प्रसंग के चप्पेर चप्पे पर निगाह डालने वाले राव की कहानियां इसीलिए पढ़ने वालों को विमुग्ध कर देती हैं.

कहानियों में प्रथमपुरुष
प्राय: उनकी कहानियां प्रथम पुरुष में लिखी गयी हैं, जिनमें खुद कथाकार की शख्सियत बोलती है. वह कहीं आज्ञाकारी पुत्र के रूप में कर्तव्य निर्वाह से प्रेरित है (उत्तराधिकार) तो कहीं ट्रेन में वेटिंग टिकट पर झूठ बोल कर अवैध यात्रा और असत्य का प्रयोग करते हुए एक यात्री के रूप में (असत्य के प्रयोग), कहीं शिफ्ट में डयूटी पर तैनात तो कहीं कारखाने में एक नौसिखिया. कहीं जीवन की छोटी से छोटी सफलता को सेलीब्रेट करने की मंशा रखने वाले शख्सह के रूप में (वैदिकी हिंसा) तो कहीं निम्न मध्य वर्गीय जीवन में खटते हुए युवक के रूप में (लौकी का तेल), कहीं अपनी कॉरपोरेट की नौकरी से आजिज आकर प्रेमिका के पिता के साथ कोचिंग का धंधा आजमाने की कोशिश में लगे रवि जैसे (अमर नही यह प्यार), तो कहीं नौकरी के लिए संघर्ष करते छिन्नोमस्ता के सतीश के रूप में. पर स्त्री पात्र भी मानवीय गुणों से भरे हैं चाहे उत्तराधिकार की अपाहिजा हो, लौकी का तेल की मां हों, छिन्नमस्ता की मां हों, या अमर नहीं यह प्यार की मेधा.

अनादर्श स्थितियों में भी उनके पात्र याद रह जाने वाले, धीरज न खोने वाले पात्र हैं. बुराइयों से घिरे समाज में भी इनके भीतर एक स्व‍प्न है जिसे राजेंद्र राव ने हर कहानी में एक धीमी लौ के रूप में जिंदा रखा है. यही राजेंद्र राव की कहानियों की विशेषता है कि वे मशीनी दुनिया से अनुभव उगाहते अवश्य हैं किंतु उसके भीतर के मानवीय पहलू को नजरंदाज नहीं करते, सदैव उसे कहानियों के केंद्र में रखते हैं.
 
# लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित गीतकार, आलोचक एवं भाषाविद हैं. राजेंद्र राव के जन्मदिन पर साहित्य आजतक के लिए यह लेख उन्होंने विशेष आग्रह पर लिखा है. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर नई दिल्ली- 110059, dromnishchal@gmail.com

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