जयंती विशेषः अंग्रेजी के महान लेखक आरके नारायण को भी नहीं मिले थे प्रकाशक

यह जानना कम दिलचस्प नहीं कि एक समय ऐसा भी था जब आज के दौर में अंग्रेजी के उत्कृष्ट लेखकों में शुमार आरके नारायण को प्रकाशकों ने भाव नहीं दिया था. बाद में वही लोग लाइन लगाए रहते थे.

Advertisement
aajtak.in
जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 10 October 2019
जयंती विशेषः अंग्रेजी के महान लेखक आरके नारायण को भी नहीं मिले थे प्रकाशक आरके नारायण [ फाइल फोटो]

आरके नारायण, पढ़ने-लिखने और साहित्य से रूचि रखने वाले हर शख्स ने यह नाम जरूर सुना होगा. उत्कृष्ट भारतीय लेखकों में शुमार आरके नारायण अंग्रेज़ी में लिखते थे. उनका पूरा नाम रासीपुरम कृष्णास्वामी नारायणस्वामी था. वह पैदा 10 अक्टूबर, 1906 को चेन्नई, तब के मद्रास में हुए. कहते हैं उन्हें उनकी दादी ने पाला था, जिनकी कहानियों ने बचपन में ही उनमें जिज्ञासा भर दी.

अपने अंग्रेजी लेखन से समूची दुनिया में भारत की धाक जमा देने वाले नारायण के जीवन की एक घटना किसी को भी चौंका देने के साथ ही प्रेरणा भी दे सकती है. अपने दौर का यह महान उपन्यासकार ग्रेजुएशन की परीक्षा में उसी विषय में फेल हो गया था, जिसमें उसने बाद में लिखना शुरू किया. नारायण का पहला उपन्यास ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ 1935 में आया था. उनके इस उपन्यास में स्कूली लड़कों के एक दल के रोमांचक कारनामों का मजेदार ब्योरा है.

कहते हैं दूरदर्शन ने जब नारायण की कहानियों और चरित्रों को लेकर 'मालगुडी डेज' नामक धारावाहिक बनाया, तो उसने उस जमाने में छोटे परदे की दुनिया बदल दी. यह धारावाहिक  हिंदी व अंग्रेज़ी में बना था. दूरदर्शन ने मालगुडी डेज़ के कुल 39 एपिसोड प्रसारित हुए. दरअसल नारायण की सभी कृतियों की पृष्ठभूमि में दक्षिण भारत का काल्पनिक शहर मालगुडी है. नारायण मानवीय संबंधों की विशेषताओं और दैनिक जीवन की विडंबनाओं का चित्रण करते हैं. उनके पात्र छोटे कस्बे के हैं, जिनका आधुनिक शहरी व्यवस्था, स्वार्थ, बदलाव व पुरानी परंपराओं के साथ इतना अटूट नाता है कि टकराहट होती रहती है.

कमाल की बात यह कि नारायण की पहली चार किताबों के लिए प्रकाशक अंग्रेजी के प्रख्यात लेखक ग्राहम ग्रीन ने ढूंढे थे. उन्होंने ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ लिखने के बाद उसे अपने एक दोस्त की मार्फत कई प्रकाशकों को भेजा,  मगर किसी को वह पसंद नहीं आई. आखिरकार तंग आकर नारायण ने अपने दोस्त से कहा कि वह ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ की पांडुलिपी को टेम्स नदी में डुबो दे. पर उस दोस्त ने एक और चांस लिया और ऐसा करने की बजाय पांडुलिपी ग्राहम ग्रीन तक पहुंचा दी. जब ग्राहम ग्रीन ने इस उपन्यास को पढ़ा तो इसकी शैली पर मुग्ध हो गए.

इसके बाद यह उपन्यास न सिर्फ प्रकाशित हुआ बल्कि देश-विदेश में बेहद लोकप्रिय भी हुआ. इस के बाद तो नारायण ने मानवीय संबंधों पर एक से बढ़कर एक रचनाएं दीं. वह चर्चित उपन्यास 'गाइड' के लेखक थे. जिसकी कहानी पर इसी नाम से कालजयी फिल्म बनी. देवानंद और वहीदा रहमान अभिनित इस फिल्म ने उस दौर में अपेक्षाकृत बोल्ड विषय, जिसमें अंध विश्वास और विवाहेतर संबंध शामिल थे, को उठाकर खलबली सी मचा दी थी, गाइड के गाने आज भी गुनगुनाए जाते हैं. तमिल में उनकी कृति ‘मि. संपत लाल’ पर भी फिल्म बनी थी, तो ‘फाइनेंशियल एक्सपर्ट’ पर कन्नड़ में फिल्म बनी.

‘गाइड’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था. भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ और ‘पद्मविभूषण’ से सम्मानित किया था. साल 1989 में साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राज्यसभा का मानद सदस्य बनाया गया था. कई विश्वविद्यालयों, जिनमें मैसूर विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी आफ लीड्स शामिल है, ने नारायण को डॉक्टरेट की मानद उपाधियां प्रदान की थीं. कहते हैं कि नारायण का नाम कई बार साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामित हुआ था; पर वे इसे कभी प्राप्त नहीं कर पाए.

उनकी प्रसिद्ध कृतियों में द इंग्लिश टीचर, वेटिंग फ़ॉर द महात्मा, द गाइड, द मैन ईटर आफ़ मालगुडी, द वेंडर ऑफ़ स्वीट्स, अ टाइगर फ़ॉर मालगुडी शामिल है. उन्होंने लॉली रोड, अ हॉर्स एंड गोट्स एंड अदर स्टोरीज़, अंडर द बैनियन ट्री एंड अदर स्टोरीज़ शामिल हैं. आरके नारायण की लेखन यात्रा लघुकथाओं से शुरू हुई थी. जीवन के विभिन्न पड़ावों से गुजरती हुई यह यात्रा 94 वर्ष की आयु में 13 मई, 2001 को सदा के लिए थम गई.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay