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लो उठो, उपहार पूजा का सम्हालो...मालिनी अवस्थी के लिए कवि की प्रणति

विख्यात लोक गायिका, लोक शिक्षिका, विदुषी और पद्मश्री से सम्मानित मालिनी अवस्थी को उनके जन्मदिन पर प्रीतिपूर्वक एक कवि, आलोचक, गीतकार ने यों याद किया.

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ओम निश्चल नई दिल्ली, 11 February 2020
लो उठो, उपहार पूजा का सम्हालो...मालिनी अवस्थी के लिए कवि की प्रणति मालिनी अवस्थी [ फोटोः मनीष द्विवेदी, सौजन्यः लेखक ]

मालिनी अवस्थी का नाम सुना था, गायन सुना था, पर भेंट न थी. यतीन्द्र मिश्र से परिचय के बाद उनकी लिखी पुस्तकों ने कला व संगीत की दुनिया के लोगों से परिचय कराया. गिरिजा, देवप्रिया, सुर की बारादरी इत्यादि पढ़ कर लगा कि कला व संगीत की दुनिया के ये लोग निश्चय ही अनूठे होते होंगे कि एक युवा कवि का मन उसमें रमता है. यतीन्द्र ने गिरिजा लिखी तो वह मुझे सुर संगीत साहित्य की विनय पत्रिका सरीखी लगी. इसी शीर्षक से साक्षात्कार में उसका तआरुफ लिखा.

मालिनी अवस्थी के लोक गायन के मुरीद करोड़ों हैं. उनमें से एक मेरे कवि मित्र ने एक दिन कहा कि ओम निश्चल चलिए मालिनी अवस्थी से मिलने चलते हैं. मैंने कहा बड़ी गायिका हैं. कहां होगा उनके पास समय मिलने का. क्यों समय व्यर्थ करना? वैसे भी सेलिब्रिटीज के पास समय नहीं होता. पर उनकी मनुहार राजाज्ञा की तरह थी. उनके मन का मान रखने के लिए जाना पड़ा. पर मिल कर लगा आत्मीयता के गवाक्ष खुल गए हों. लौट कर उस मुलाकात को कुछ शब्दों में टांका तो मन को आश्वस्ति मिली. वह मुलाकात एक पाक्षिक में प्रकाशित भी हुआ. उस समय उनकी संगीत साधना पर कुछ बातें भी हुईं. वह लगभग पूरा दिन उनके नाम था. उनकी शख्सियत के जितने भी पन्ने खुले- घंटों की वार्ता के दौरान, वे बेशक कहीं दर्ज न हो पाए हों पर उसकी छवियां मन में कोने में रच बस गयीं. उसके बाद एकाधिक बार उनसे मिलना हुआ. दिल्ली, लखनऊ और उनकी कई संगीत सभाओं में भी. बात आई गयी हो गयी.
 
इसी दौरान मालिनी अवस्थी एक बार अपने पारिवारिक यात्रा पर हरिद्वार गयीं और गंगा की जलधार में पांव टिका कर बैठ गयीं और गाने लगीं. यह सब स्वत:स्फूर्त हुआ होगा. न कोई साज न संगीत. बस जल की हिलोरें और सुरों की हिलकोर. इस मुद्रा में उनके कुछ चित्र भी देखने को मिले तो कवि मन में भी कुछ भूगर्भीय हलचल सी हुई. एक गीत बनने लगा. उनके गीत को सुनते-सुनते गीत के सारे अंतरे पूरे हुए, जिसे तुरंत सोशल मीडिया की उनकी वाल पर ही एक पाठकीय प्रतिक्रिया के रूप में दर्ज किया. उसे पढ़ कर मालिनी अवस्थी ने लिखा- किस तरह आभार व्यक्त करूँ आपका! एक छवि में शब्दों से प्राण फूँक दिए आपने ओम निश्चल जी. मैंने कहा आपकी शख्सियत ही ऐसी है कि शब्द चुपके से उमड़ कर गीत में ढलते गए.

उसके बाद लखनऊ में एक बार कहीं किसी जामुनी परिवेश में मालिनी अवस्थी का जाना हुआ. किसी बातचीत के सिलसिले में. कैमरामैन मनीष द्विवेदी का चंचल मन चलायमान था कि वह मालिनी अवस्थी की कुछ विरल मुद्राएं वे कैद करें. ऐसे में किसी परकोटे से सटा एक जामुन का पेड़ दिखा- पके अधपके जामुन से लदा. रसभरे घौद को देख मालिनी अवस्थी का मन भी चंचल हो आया और फिर जो मुद्राएं तस्वीर में कैद हुईं वह भी उनकी वाल पर हैं. वे तस्वीरें देख मेरा गीतकार मन भी चंचल हो उठा और इस दृश्य भाव संवदेना को उकेरता हुआ एक और गीत शब्दों में ढल उठा. वे गीत आज भी जब मालिनी अवस्थी की स्वरमुद्राओं की ओर ध्यान जाता है, मन में बज उठते हैं.

आज मालिनी अवस्थी का जन्मदिन है. पूरा देश उन्हें अपनी शुभकामनाएं दे रहा है. कवि के पास क्या है सिवाय कुछ शब्दों में स्नेह निर्झर से भरे ये शब्दे आज पुन: मालिनी अवस्थी को उनके जन्मादिन पर समर्पित करता हूँ. और यह कामना करता हूँ कि वे लोक के बीच अपने गायन से समाज को आनंदित व शिक्षित करती रहे ताकि लोक की जड़ता टूटे और एक समावेशी समाज का निर्माण हो. मालिनी अवस्थी का वैदुष्य उनके साथ लंबी बतकहियों में रसधार की तरह बहता है. परंपरा के ख्यात गुरुजनों की दीक्षा व संगत में उनकी शख्सियत का निर्माण हुआ है. वे बोलती हैं तो लगता है सरस्वती की वरदपुत्री बोल रही है. गुरुओं के प्रति ऐसा अनुराग ऐसा समर्पण उनके वैशिष्ट्य का अनुगायन विरल ही देखने सुनने को मिलता है.
 
ये गीत उन्हें सपर्मित करते हुए ख्यात गीतकार कवि उमाकांत मालवीय के शब्दों में यही कहूँगा-

लो उठो उपहार पूजा का सम्हालो!

गीत- एक

बहुत दिनों के बाद नदी के जल ने मुझे पुकारा
(हरिद्वार की गंगा में पांव भिगो कर गाती हुई मालिनी )

पांव भिगो कर गा रहीं कैसा अदभुत गान।
जल में करती मालिनी जैसे सुर-स्नान।
      
बहुत दिनों के बाद
नदी के जल ने मुझे पुकारा
बैठी हूँ मैं नदी किनारे बहती जल की धारा.

जग के कोलाहल में डूबा मन
कुछ ऊबा ऊबा
सुबह नदी की उच्छल लहरें
भांप गयीं मंसूबा
पांव भिगोते ही तन मन का ताप मिट गया सारा.
बैठी हूँ मैं नदी किनारे बहती जल की धारा.

कितने दिन के बाद कहीं
फुर्सत मिल पाई है
देख रही गंगा में
वैसी ही तरुणाई है
वही उछाह मिलन की वेला गंगा का जयकारा.
बैठी हूँ मैं नदी किनारे बहती जल की धारा.

गंगा मइया सबको देतीं
खुल कर यही असीसें
भेदभाव को तज कर बहना
निर्भय हवा सरीखे
खेत सींचना उस किसान के जिसका नहीं सहारा.
बैठी हूँ मैं नदी किनारे बहती जल की धारा.

वे कितने बड़भागी होते
जिनको नदी बुलाती
अपनी अंत:सलिला से वह
हृदय सजल कर जाती
बैठ सीढ़ियों पर गंगा को जब मां कह उच्चारा
मेरे गीत हो गए पावन सुर- सुरसरि की धारा.

गीत- दो
 
मुझमें कहीं बहा करती है कोई नदी सुरीली

यह मौसम
जामुन की शाखें
पास अगर लहराएं.
ऐसे वक्त न देखों तुम
मेरी अद्भुत मुद्राएं.

वह बचपन जब पास हुआ करते थे बाग बगीचे
जिसे पिता ने, बाबा ने, पुरखों ने मिल कर सींचे
उनकी याद मचाती हलचल मेरे हिय में अब भी
जब ऐसे मौसम में कोई ये तस्वीरें खींचे

जामुन अभी तोड़ लेने की
बची हुई इच्छाएं.
ऐसे वक्त न देखो तुम
मेरी ये मुख मुद्राएं.

वह अमवा की डार नीम पर पड़ते थे जब झूले
मन होता मेरी अभिलाषा आसमान को छू ले
जब आषाढ़ उतरता था पहले दिन मेरे आंगन
लगता था आया है पाहुन कोई भटके भूले

मेरी कूक कुहुक उठती थी
नभ में देख घटाएं
ऐसे वक्त न देखो तुम
मेरी भोली मुद्राएं.

कुदरत की सौगात मुझे भाती पर्वत मालाएं
मुझे लुभाती हैं बेहद सरगम की सुर मालाएं
मुझमें कहीं बहा करती है कोई नदी सुरीली
मुझमें यात्राएं करती हैं छंदों की धाराएं

तन-मन फिर खो गया कहीं
सब मूक हुई भाषाएं.
ऐसे वक्त न देखो तुम
मेरी नटखट मुद्राएं.

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