तुझे बिन जाने, बिन पहचाने मैंने हृदय से लगाया: मजरूह सुल्तानपुरी और टॉप 5 फिल्मी प्रेम गीत

मजरूह सुल्तानपुरी की जयंती पर साहित्य तक पर प्रेम पर लिखे उनके ये टॉप पांच फिल्मी प्रेम गीत के साथ ही पढ़िए उनके जीवन के कई अनजाने पहलुओं के बारे में 

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 01 October 2019
तुझे बिन जाने, बिन पहचाने मैंने हृदय से लगाया: मजरूह सुल्तानपुरी और टॉप 5 फिल्मी प्रेम गीत मजरूह सुल्तानपुरी [फाइल फोटो- इंडिया टुडे]

मजरूह सुल्तानपुरी अगर जिंदा होते तो आज सौ साल पूरे कर चुके होते. इस मशहूर शायर का जन्म उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर में 1 अक्टूबर, 1919 को हुआ था. फिल्मों के लिए कमाल के गीत लिखने वाले मजरूह यों तो बचपन से ही शेरो-शायरी के शौकीन थे और कम उम्र में ही इलाकाई मुशायरों का अहम हिस्सा बन चुके थे, पर उन्हें फिल्मी दुनिया पसंद नहीं थी. आज हम फिल्म जगत के सुरीले दौर की कल्पना तक मजरूह साहब के बिना कर नहीं सकते. अपनी शेरो-शायरी के लिए मेडिकल की प्रैक्टिस बीच में ही छोड़ दी. मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी के संपर्क में वह परवान चढ़ने लगे और

कहते हैं साल 1945 में सब्बो सिद्धकी इंस्टीट्यूट द्वारा संचालित एक मुशायरे में हिस्सा लेने मजरूह सुल्तानपुरी पहली बार मुंबई आए तो उनकी शायरी सुन मशहूर निर्माता एआर कारदार ने उनसे अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने की पेशकश की. मजरूह सुल्तानपुरी ने कारदार साहब की इस पेशकश को ठुकरा दिया क्योंकि वह किसी शायर के लिए फिल्मों के लिए गीत लिखने को तौहीन समझते थे वे अच्छी बात नहीं समझते थे.

जिगर मुरादाबादी ने मजरूह सुल्तानपुरी को तब सलाह दी कि फिल्मों के लिए गीत लिखना कोई बुरी बात नहीं है. गीत लिखने से मिलने वाली धन राशि में से कुछ पैसे वे अपने परिवार के खर्च के लिए भेज सकते हैं. जिगर मुरादाबादी की सलाह पर मजरूह सुल्तानपुरी फिल्मों में गीत लिखने के लिए राजी हो गए. संगीतकार नौशाद के लिए उन्होंने पहला गीत ‘गेसू बिखराए, बादल आए झूम के’ क्या लिखा, फिल्मी दुनिया में एक अलग ही राह पकड़ ली.

फिल्म ‘शाहजहां’, ‘अंदाज’, 'मेंहदी', ‘साथी’, ‘पाकीजा’, ‘तांगेवाला’, ‘धरमकांटा’ और ‘गुड्डू’, ‘फुटपाथ’, ‘आरपार’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘नौ दो ग्यारह’, ‘सोलवां साल’, ‘काला पानी’, ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘सुजाता’, 'बंबई का बाबू’, ‘बात एक रात की’, ‘तीन देवियां’, ‘ज्वैलथीफ’, ‘पेइंग गेस्ट’  और ‘अभिमान’  ‘फिर तीसरी मंजिल’, ‘बहारों के सपने’, ‘प्यार का मौसम’, ‘कारवां’, ‘यादों की बारात’, ‘हम किसी से कम नहीं’ और ‘जमाने को दिखाना है’ जैसी फिल्मों के सुपरहिट होने में उनके लिखे गीतों की भी बड़ी भूमिका थी.

25 मई, 2000 को इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले मजरूह सुल्तानपुरी ने चार दशक से भी लंबे सिने करियर में तकरीबन 300 फिल्मों के लिए 4000 गीत लिखे. साल 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘दोस्ती’ के ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ गीत के लिए वह सर्वश्रेष्ठ गीतकार के ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार से भी नवाजे गए. फिल्म जगत में अपने महत योगदान के लिए साल 1993 में मजरूह सुल्तानपुरी को भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के’ से नवाजा गया. आज उनकी जयंती पर साहित्य तक पर पढ़िए उनके ये टॉप पांच फिल्मी प्रेम गीत.

1.
होंठों में ऐसी बात मैं दबाके चली आई
खुल जाये वोही बात तो दुहाई है दुहाई
हाँ रे हाँ, बात जिसमें, प्यार तो है, ज़हर भी है, हाय
होंठों में...

हो शालू...
रात काली नागन सी हुई है जवां
हाय दय्या किसको डँसेगा ये समा
जो देखूँ पीछे मुड़के
तो पग में पायल तड़पे
आगे चलूँ तो धड़कती है सारी अंगनाई
होंठों में...

हो शालू...
ऐसे मेरा ज्वाला सा तन लहराये
लट कहीं जाए घूँघट कहीं जाये
अरे अब झुमका टूटे
के मेरी बिंदिया छूटे
अब तो बनके क़यामत लेती हूँ अंगड़ाई
होंठों में...

2.
मेरी भीगी-भीगी सी, पलकों पे रह गए
जैसे मेरे सपने बिखर के
जले मन तेरा भी, किसी के मिलन को
अनामिका, तू भी तरसे
मेरी भीगी ...

तुझे बिन जाने, बिन पहचाने
मैंने हृदय से लगाया
पर मेरे प्यार के बदले में तूने
मुझको ये दिन दिखलाया
जैसे बिरहा की ऋतु मैंने काटी
तड़पके आँहें भर-भर के
जले मन तेरा ...

आग से नाता, नारी से रिश्ता
काहे मन समझ न पाया
मुझे क्या हुआ था, इक बेवफ़ा से
हाय मुझे क्यों प्यार आया
तेरी बेवफ़ाई पे, हँसे जग सारा
गली-गली गुज़रे जिधर से
जले मन तेरा ...

3.
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा
कहा दो दिलों ने, की होंगे न मिल कर, कभी हम जुदा
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा

ये क्या बात है आज की चांदनी में -2
के हम खो गये प्यार की रागिनी में
ये बाहों में बाहें, ये बहकी निगाहें
लो आने लगा ज़िंदगी का मज़ा
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा

सितारों की महफ़िल ने करके इशारा -2
कहा अब तो सारा जहाँ है तुम्हारा
मुहब्बत जवाँ हो, खुला आसमाँ हो
करे कोई दिल आरज़ू और क्या
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा

क़सम है तुम्हें तुम अगर मुझसे रूठे -2
रहे सांस जब तक, ये बंधन न टूटे
तुम्हें दिल दिया है, ये वादा किया है
सनम मैं तुम्हारी रहूँगी सदा
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा
कहा दो दिलों ने, की होंगे न मिल कर,
कभी हम जुदा
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा

4.
लूटे कोई मन का नगर बन के मेरा साथी -2
कौन है वो, अपनों में कभी, ऐसा कहीं होता है,
ये तो बड़ा धोखा है
लूटे कोई ...

यहीं पे कहीं है, मेरे मन का चोर
नज़र पड़े तो बइयाँ दूँ मरोड़ -2
जाने दो, जैसे तुम प्यारे हो,
वो भी मुझे प्यारा है, जीने का सहारा है
देखो जी तुम्हारी यही बतियाँ मुझको हैं तड़पातीं
लूटे कोई ...

रोग मेरे जी का, मेरे दिल का चैन
साँवला सा मुखड़ा, उसपे कारे नैन -2
ऐसे को, रोके अब कौन भला,
दिल से जो प्यारी है, सजनी हमारी है
का करूँ मैं बिन उसके रह भी नहीं पाती
लूटे कोई ..

5.
रहते थे कभी जिनके दिल में
हम जान से भी प्यारों की तरह
बैठे हैं उन्ही के कूचे में
हम आज गुनहगारों की तरह

दावा था जिन्हें हमदर्दी का
खुद आके न पूछा हाल कभी
महफ़िल में बुलाया है हम पे
हँसने को सितमगारों की तरह
रहते थे...

बरसों से सुलगते तन मन पर
अश्कों के तो छींटे दे ना सके
तपते हुए दिल के ज़ख्मों पर
बरसे भी तो अंगारों की तरह
रहते थे...

सौ रुप धरे जीने के लिये
बैठे हैं हज़ारों ज़हर पिये
ठोकर ना लगाना हम खुद हैं
गिरती हुई दीवारों की तरह
रहते थे... 

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