क्या बतलाएं कैसे अनुभव, इस दुर्लभ जीवन के! अस्सी के हुए गीतकार माहेश्वर तिवारी

उत्तर प्रदेश के बस्ती में 22 जुलाई, 1939 को पैदा माहेश्वर तिवारी आज 80 के हो चुके हैं. एक सुदीर्घ यात्रा में उन्होंने जीवन को जैसे गीत-संगीत की तरह साधा है. साहित्य आजतक पर विशेष

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ओम निश्चल नई दिल्ली, 12 September 2019
क्या बतलाएं कैसे अनुभव, इस दुर्लभ जीवन के! अस्सी के हुए गीतकार माहेश्वर तिवारी गीतकार माहेश्वर तिवारी [फाइल फोटो]

क्या बतलाएं कैसे अनुभव, इस दुर्लभ जीवन के!
कैसे गुजर गए मित्रो! ये आठ दशक जीवन के।

कभी जब नई कविता और गीत में फॉंक न थीं, नई कविता के साथ गीत की संगत चलती थी. अनेक नए कवियों ने गीत लिखे, सप्तवक परंपरा के कवि इस बात के प्रमाण हैं कि नई कविता के साथ नए गीतों का कोई वैर था. नवगीतों पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की छंद परंपरा का वरदहस्त रहा तो प्रयोगवादी कविता के प्रवर्तक कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के मन में भी गीतों को लेकर एक सकारात्मक भाव विद्यमान था. लेकिन धीरे-धीरे सप्तक के बाद गीतकारों को लगा कि एक अलग राह हमें चुननी चाहिए. नई कविता में हमारी समाई नहीं है. कभी अज्ञेय ने जिस भाव से कहा था छंद में मेरी समाई नहीं है, कुछ-कुछ उसी भाव बोध से नए गीतकारों ने अपनी राह तलाशी.

जिन दिनों वंशी और मादल के कथ्यों और रूप की चर्चा हो रही थी, आदिवासियों और संथाली लोक से उसके रिश्ते खंगाले जा रहे थे, गीत को अनायास यह राह मिल गयी. इस राह पर आगे बढ़ कर नये प्रयोग करने वाले कवियों में जहां एक तरफ ठाकुर प्रसाद सिंह थे, ओम प्रभाकर और उमाकांत मालवीय थे, वहीं दूसरी तरफ माहेश्वकर तिवारी, नईम, कुमार रवींद्र जैसे कवि आगे आए. गीतांगिनी और पांच जोड़ बांसुरी जैसे संकलनों ने इस दिशा में ऐतिहासिक नींव का काम किया. बाद में नवगीत आंदोलन की कमान शंभुनाथ सिंह जैसे समर्थ कवियों ने संभाली, जिसमें माहेश्वर तिवारी का अपना स्थान है. उन्होंने गीत को नए बिम्बों, नए प्रतीकों और यथार्थवादी आग्रहों के साथ जोड़ा और उसके भीतरी लालित्य की भी रक्षा की.

नवगीत ने अब तक सुदीर्घ यात्रा तय कर ली है, किंतु आज जब उसकी परंपरा की ओर निहारते हैं तो उन कवियों की याद आती है जिन्होंने 'अंजुरी अंजुरी खून दिया है मैंने भी इस ताजमहल में’ के भाव से गीत की ज़मीन तैयार की है. इस उज्ज्वल परंपरा में ठाकुरप्रसाद सिंह, किशन सरोज, माहेश्वर तिवारी, सत्यजनारायण, देवेंद्र कुमार, विजय किशोर मानव से लेकर यश मालवीय और नई पीढ़ी में चित्रांश बाघमारे जैसे कवि शामिल हैं. बरसों पहले जब धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तातन जैसी व्यावसायिक पारिवारिक पत्रिकाओं का स्वर्णयुग था, माहेश्वर तिवारी के गीत छपते तो उसे पढ़ते हुए जैसे मन की आबोहवा बदल जाती. जीवन की ऊब कहीं खो जाती. कहना न होगा कि गीतों को साप्ताहिक हिंदुस्तान एवं धर्मयुग जैसी लोकप्रिय पत्रिकाओं ने शानदार ढंग से छापा. आज के संपादकों की तरह उनकी पसंद जड़ीभूत न थी. धर्मवीर भारती जैसे नई कविता के समर्थ कवि कथाकार ने गीतों की सामर्थ्य पहचानी थी.

माहेश्वार तिवारी के तमाम गीत इन पत्रिकाओं में छपे. 'धूप में जब भी जले हैं पांव घर की याद आई' जैसे संवेदनशील गीत के माध्यम से माहेश्वर तिवारी ने गीत को नए स्थापत्य की संरचना में बांधने का यत्न किया. लखनऊ में रहते हुए मैंने उनका नवगीत संग्रह 'हरसिंगार कोई तो हो' पढ़ा था और उस पर एक सुदीर्घ समीक्षा तब के नवजीवन में लिखी थी, जो संयोग से अब फाइल में नहीं है. 'नदी का अकेलापन' पर नया ज्ञानोदय में लिखा. उसके बाद 'सच की कोई शर्त नहीं' व 'फूल आए हैं कनेरों में' जैसे संग्रह आए जो उनके रचनात्मक सातत्य का परिचायक हैं.

उत्तर प्रदेश के बस्ती में 22 जुलाई, 1939 को पैदा माहेश्वर तिवारी आज 80 के हो चुके हैं. एक सुदीर्घ यात्रा में उन्होंने जीवन को जैसे गीत-संगीत की तरह साधा है. छोटी बहर के गीतों में भी वे जान फूँक देते हैं. उनका एक ऐसा ही गीत अचानक स्मरण हो आया है जो उनके मिजाज की गवाही देता है.

आज गीत
गाने का मन है
अपने को
पाने का मन है

अपनी छाया है
फूलों में
जीना चाह रहा
शूलों में

मौसम पर
छाने का मन है

नदी झील
झरनों सा बहना
चाह रहा
कुछ पल यों रहना

चिड़िया हो
जाने का मन है

लेकिन उनकी सबसे प्रिय रचना जो मुझे भाती है वह है 'याद तुम्हारी'. उसका हर अंतरा जैसे दिल की भीतरी सतहों को छूता हुआ रचा गया है.

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे।
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे.

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे,
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे.

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे.

मुरादाबाद जो सदियों से पीतल के कारण जाना जाता रहा है, अब वह उनके गीतों के लिए भी जाना जाता है. उन गोष्ठियों के लिए पहचाना जाता है जो अक्सर उनकी अध्यलता व सान्निध्य में होती हैं. अक्सर उनका घर गीतकारों के सान्निध्य से परिपूर्ण रहता है. गीत संगीत की रागिनी बजती रहती है. अब तो घर बच्चों के कलरव से भरा भरा सा रहता है. उन्हें जीवन में अनेक पुरस्कार मिले. पर पुरस्कार को उन्होंने कभी मानक नहीं बनाया. उनको चाहने वाले बेशुमार लोग हैं. जीवन की उत्त‍रशती में भी वे रचनात्मक रुप से सक्रिय बने हुए हैं. पिछले एक साल पहले उनसे गंभीर समाचार के लिए कुछ नए गीत मांगे तो उन्होंने बड़े प्रेम से मुझे व्हाटसअप पर भेजा. हाथों से लिखे उनके गीत आज भी मेरे लिए धरोहर हैं.

माहेश्वेर तिवारी उन चंद लोगों में हैं जिनका अध्ययन विपुल है. उनके गीतों की बहर छोटी होती है पर वह जैसे कुमुदिनी के फूल की तरह चटख और शोख लगते हैं. 'लगता जैसे इस पल कोई गीतों भरी सदी सोई है' कहने वाले माहेश्वर तिवारी के गीत पढ़ कर लगता है इनमें उन्होंने बांसुरी की फूँक भर दी है. माहेश्वार तिवारी की पद संरचना बेशक रोमैंटिक हो, उनके यहां बिम्बों की एक नई और अछूती लीक नजर आती है जो उनके अन्य समकालीनों में नहीं दिखती.

आज भी वे जब किसी बात पर विह्वल होते हैं, कोई नई अनूठी चीज पढ़ते हैं, वे लोगों से संवाद करते हैं. उन्हें अपना आशीष प्रदान करते हैं. उनका मन इतना पारदर्शी और रागात्मक है कि वह अपने भीतर जैसे एक वृंदावनता का भावसंसार सँजोये रहता है. तभी तो आज भी उस वृंदावन के लिए प्रतिश्रुत दिखते हैं जिसके लिए वे सदा ऋणी महसूस करते हैं...

मन का वृन्दावन हो जाना
कितना अच्छा है,
तुममें ही मिलकर खो जाना
कितना अच्छा है.

यह कहने में हिचक नहीं कि गीत-नवगीत-जनगीत की दुनिया में कोई दूसरा माहेश्वर तिवारी नहीं है. इन्हीं शब्दों के साथ उन्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं!

# लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित गीतकार, आलोचक एवं भाषाविद हैं. यशस्वी वरिष्ठ गीतकार माहेश्वर तिवारी के जन्मदिन पर साहित्य आजतक के लिए यह लेख उन्होंने विशेष आग्रह पर लिखा है. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर नई दिल्ली- 110059, dromnishchal@gmail.com

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