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जयंती विशेषः राहुल सांकृत्यायन; चिर विद्रोही, महान ज्ञानी, सभ्यता के यायावर की याद

राहुल सांकृत्यायन महान लेखक, इतिहासविद, पुरातत्ववेत्ता, त्रिपिटकाचार्य के साथ-साथ एशियाई नवजागरण के प्रवर्तक-नायक थे. काशी के बौद्धिक समाज ने उन्हें 'महापंडित' के अलंकार से सम्मानित किया था.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 09 April 2019
जयंती विशेषः राहुल सांकृत्यायन; चिर विद्रोही, महान ज्ञानी, सभ्यता के यायावर की याद महापंडित राहुल सांकृत्यायन [ लाइब्रेरी इमेज ]

उनका असली नाम केदार पांडेय था, पर दुनिया उन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम से जानती है. आज उनकी जयंती है. महान घुमक्कड़, प्रकांड पंडित  राहुल सांकृत्यायन का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा ग्राम में 9 अप्रैल, 1893 को हुआ था. बचपन में ही माता कुलवन्ती देवी तथा पिता गोवर्धन पांडेय की असामयिक मृत्यु के चलते वह ननिहाल में पले बढ़े. उनकी शुरुआती शिक्षा उर्दू में हुई. 15 साल की उम्र में उर्दू माध्यम से मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण कर वह आजमगढ़ से काशी आ गए. यहां उन्होंने संस्कृत और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया और वेदान्त के अध्ययन के लिए अयोध्या पहुंच गए. अरबी की पढ़ाई के लिए वह आगरा गए तो फारसी की पढ़ाई के लिए लाहौर की यात्रा की.

उस जमाने में पढ़ाई के लिए इतने शहरों की यात्रा करने वाले वह विरले व्यक्ति थे. अध्ययन और ज्ञान की पिपासा ने उन्हें एक शोधार्थी और घुमक्कड़ स्वभाव का बना दिया. उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की और खूब पढ़ा-लिखा. इस घुमक्कड़ी के चलते महापंडित हिंदी, उर्दू, संस्कृत, तमिल, कन्नड़, पाली, अंग्रेजी, जापानी, रूसी, तिब्बती और फ्रांसीसी भाषाओं के अच्छे जानकार हो गए. कहते हैं इनके अतिरिक्त भी उन्हें 20-25 भाषाओं का ज्ञान था. कुछ आलोचकों के मुताबिक महान यायावर-ज्ञानी राहुल सांकृत्यायन 36 भाषाओँ के ज्ञाता थे. पर अपनी विद्वता के बीच भी मातृभाषा हिंदी के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा थी. इस घुमक्कड़ी से वह आर्य समाज, मार्क्सवाद और बौद्ध मत से प्रभावित हो गए और साल 1917 में रूसी क्रांति के दौर में रूस पहुंच गए. वहां रूसी क्रांति के कारणों का गहन अध्ययन कर उन्होंने एक पुस्तक लिखी.

इसी तरह बौद्ध मत का अध्ययन करने के लिए उन्होंने चीन, जापान, श्रीलंका और तिब्बत आदि की कष्टपूर्ण यात्रा की और लंबे समय तक इन देशों के सुदूर इलाकों में प्रवास किया. कहा जाता है कि इन देशों में उन्हें जो भी प्राचीन पुस्तकें एवं पांडुलिपियां मिलीं, उन्हें वह सहेजते गए, और जब तिब्बत से भारत लौटे तो अपने साथ 22 खच्चरों पर लादकर ये ग्रंथ भी ले आए. इनमें से अधिकांश का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया. इस अध्ययन के दौरान वह बौद्ध धर्म से इतने प्रभावित हुए कि उसेँअ केवल अपनाया, बल्कि अपना नाम भी राहुल सांकृत्यायन रख लिया.

महापंडित राहुल सांकृत्यायन का मानना था कि अंग्रेजों की शह पर पल रहे सामंतवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ को तोड़े बिना किसानों की दशा नहीं सुधरेगी. 1921 में वह महात्मा गांधी के साथ जुड़ गए. इस बीच उन्होंने अपने व्याख्यानों, लेखों और पुस्तकों से पूरी दुनिया को भारत से बाहर बिखरे बौद्ध साहित्य से परिचित कराया. 1927-28 तक श्रीलंका में उन्होंने संस्कृत शिक्षण का कार्य किया. अच्छे लेखक और विचारक होने के बाद भी वे कभी प्रत्यक्ष आंदोलन से विमुख नहीं हुए.  

किसान उन्हें इतने प्रिय थे कि जब भी वह स्वदेश में होते किसान आंदोलन में भाग लेना न भूलते. हालांकि साल 1931 में एक बौद्ध मिशन के साथ वह यूरोप की यात्रा पर चले गए. इसी तरह रूस पर उनके किए गए गहन अध्ययन के चलते साल 1937 में जब उन्हें मॉस्को में प्राचीन साहित्य के अध्ययन के लिए बुलाया गया, तो वह वहां भी गए, पर 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा छेड़े गए 'भारत छोड़ो आंदोलन' में शामिल होने के लिए वह स्वदेश लौट आए और जेल चले गए.

राहुल सांकृत्यायन महान लेखक, इतिहासविद, पुरातत्ववेत्ता, त्रिपिटकाचार्य के साथ-साथ एशियाई नवजागरण के प्रवर्तक-नायक थे. काशी के बौद्धिक समाज ने उन्हें 'महापंडित' के अलंकार से सम्मानित किया था. उन्होंने कहानी, उपन्यास, यात्रा वर्णन, जीवनी, संस्मरण, विज्ञान, इतिहास, राजनीति, दर्शन जैसे विषयों पर विभिन्न भाषाओं में लगभग 155 ग्रंथ लिखे. हिंदी के प्रति अपनी निष्ठा के कारण उन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी से त्यागपत्र दे दिया. साल 1947 में मुंबई  ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ में उन्हें निर्विरोध सभापति चुना गया. 'वोल्गा से गंगा तक' उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति है, जिसे वैश्विक ख्याति मिली. उनकी पुस्तकों के अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं.

अपने जीवनकाल में 50 हजार से अधिक पन्ने लिखने वाले राहुल सांकृत्यायन ने अपने घुमक्कड़ी जीवन में कितने लाख किलोमीटर की यात्रा की, कितने हजार किलोमीटर वे पैदल ही चले, इसका किसी को पता नहीं है. प्रसिद्ध पुस्तक 'मध्य एशिया का इतिहास' की रचना के लिए राहुल सांकृत्यायन किस तरह से 200 से अधिक किलो वजन की किताबें सोवियत संघ से साथ ढोकर भारत लाए उससे उनकी रचनाप्रक्रिया के पीछे की अदम्य साधना को भी समझना होगा.

वोल्गा से गंगा लिखने से पहले राहुल सांकृत्यायन ने भारत के 8 हजार वर्षों के इतिहास को अपनी आंखों से देखा, फिर दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया. प्रभाकर माचवे के अनुसार, 'वोल्गा से गंगा' प्रागैतिहासिक और एतिहासिक ललित कथा संग्रह की अनोखी कृति है. हिंदी साहित्य में विशाल आयाम के साथ लिखी गई यह पहली कृति है. महाप्राण निराला के शब्दों में- 'हिंदी के हित का अभिमान वह, दान वह.'

विश्व के कई सम्मानित भाषाविद मानते हैं कि राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी के साथ-साथ भारत की सबसे प्राचीन भाषा पाली और संस्कृत को दुनिया में इस तरह प्रतिष्ठित कराया कि आज पाली और संस्कृत के सबसे बड़े अध्येता भारत की बजाय, यूरोपीय देशों के निवासी हैं. जर्मनी के प्रसिद्ध अध्येता अर्नस्ट स्टेनकेलेनर ने राहुल सांकृत्यायन के प्रभाव में पालि, संस्कृत और तिब्बती पर अपनी दक्षता कायम की. स्टेनकेलेनर ने तिब्बती पाण्डुलिपियों पर गहन शोध किया है, जिसे नीदरलैंड रॉयल अकेडमी ऑफ़ आर्ट्स एंड साइंस ने 2004 में प्रकशित किया है. स्टेनकेलेनर के अनुसार भारत से बाहर के शोध संस्थानों में राहुल सांकृत्यायन को जो स्थान प्राप्त है, वह किसी भारतीय राजनेता के लिए भी मुमकिन नहीं है.

राहुल सांकृत्यायन का हृदय बहुत बड़ा था. वे व्यक्ति में दोष की बजाय गुण देखने पर बल देते थे. उनका मत था कि कोई भी व्यक्ति दूध का धुला नहीं होता. यदि किसी भी व्यक्ति में पांच प्रतिशत भी अच्छाई है, तो उसे महत्त्व देना चाहिए. घुमक्कड़ पंथ के महान समर्थक सांकृत्यायन 1959 में दर्शनशास्त्र के महाचार्य के नाते एक बार फिर श्रीलंका गए; पर 1961 में उनकी स्मृति खो गई. इसी दशा में 14 अप्रैल, 1963 को उनका देहांत हो गया.

यह बेहद दुखद है कि केदार पाण्डेय को जिस बिहार के खेत-खलिहानों, किसानों के संघर्ष और जेलों ने सभ्यता का महान यायावर, ज्ञानी महापंडित राहुल सांकृत्यायन बनाया, और जिन्होंने प्रतिदान स्वरूप उस धरती को अपनी यायावरी से अर्जित सबसे बड़ी थाती हजारों तिब्बती पांडुलिपी, पुरातत्व और थंका चित्र प्रदान कर दिया, उसने उसे वह मान नहीं दिया, जिसका वे हकदार थे. बिहार सरकार और पटना संग्रहालय आज भी उसके संपूर्ण अध्ययन में अक्षम साबित हुआ है.

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