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पुण्यतिथि विशेषः कैफ़ी आज़मी; एक विद्रोही शायर जिसने लिखा- मैं ढूंढता हूं जिसे वो जहां नहीं मिलता

कैफ़ी आज़मी 10 मई, 2002 को जब इस दुनिया से रुखसत हुए तो चमन जैसे उदास हो गया. वह मुल्क में बेबस व मजलूमों की इंकलाबी आवाज थे. उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन व शायरी को समेटता यह लेख पढ़िए साहित्य आजतक पर...

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 12 September 2019
पुण्यतिथि विशेषः कैफ़ी आज़मी; एक विद्रोही शायर जिसने लिखा- मैं ढूंढता हूं जिसे वो जहां नहीं मिलता कैफी आज़मी [ फाइल फोटो ]

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

कैफ़ी आज़मी का एक शेर है यह. 10 मई, 2002 को जब वे इस दुनिया से रुखसत हुए तो चमन जैसे उदास हो गया. वह मुल्क में बेबस व मजलूमों की इंकलाबी आवाज थे. शायद ही कोई ऐसी घटना हो जिस पर उनके शायर मन ने कुछ न लिखा हो. इसकी वजह थी. कैफी ने यों तो हर तरह की नज्में लिखीं पर उनकी बागी नज्मों को ज्यादा पसंद किया गया. इसीलिए वह उर्दू के प्रगतिवादी शायरों में शुमार हुए.

कैफ़ी आज़मी का जन्म 14 जनवरी, 1919 को मौज़ा मजवाँ ज़िला आज़मगढ़ में हुआ. उनका असली नाम सैयद अतहर हुसैन रिज़वी था और कैफ़ी तख़ल्लुस. कैफ़ी का ख़ानदान एक ख़ुशहाल ज़मींदार ख़ानदान था. घर में शिक्षा व साहित्य और शे’र-ओ-शायरी का माहौल था. ऐसे में शे’र-ओ-अदब में उनकी दिलचस्पी स्वाभाविक थी. रिवाज के मुताबिक उन्होंने अरबी, फ़ारसी में तालीम हासिल की और शे’र कहने लगे. शुरुआत उन्होंने धार्मिक शायरी से की और इश्क-मुहब्बत की जज्बाती शायरी में चले गए. उनकी रुमानी शायरी के क्या कहने -

वक्त ने किया क्या हंसी सितम
तुम रहे न तुम, हम रहे न हम...

***

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं...

***
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो...

***

आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए

एक से बढ़ कर एक नज़्म व शायरी, उम्दा ग़ज़लें. इसी दौर में शायद उन्होंने यह भी लिखा-

मेरे दिल में तू ही तू है दिल की दवा क्या करूँ
दिल भी तू है जाँ भी तू है तुझपे फ़िदा क्या करूँ...

पर प्यार के जज़्बात जल्द ही सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए. समय के साथ उनकी शायरी आवाम के दुःख-दर्द का प्रामाणिक दस्तावेज बन गई. अपनी पहली बागी नज्म उन्होंने छात्र जीवन में उस समय लिखी थी, जब वे एक शिया मदरसे में मजहबी तालीम हासिल करने गए. हुआ यह कि कैफ़ी के पिता ने उन्हें लखनऊ में सुल्तान-उल-मदारिस में दाख़िल कराया था, लेकिन कैफ़ी की इन्क़लाबी और प्रतिरोध स्वभाव की मंज़िलें ही कुछ और थीं.

छात्रों की दुर्दशा पर उन्होंने छात्र यूनियन बनाई और नज्म लिखने और सुनाने लगे. कैफ़ी ने मदरसे की स्थूल और दक़ियानूसी व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज उठाई और उनकी विद्रोही नज्म 'कौमी जंग' में छद्म नाम से प्रकाशित भी हो गई. पर इस सियासी, साहित्यिक चेतना का पुरस्कार यह मिला कि उनकी माँगें तो मान ली गईं पर उन्हें हॉस्टल से निकाल दिया गया. पर तब तक वह जान चुके थे कि उन्हें किसके हक में खड़ा रहना है.

ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है?
तेरी हर लहर से बारूद की बू आती है!
खून कहाँ बहता है इन्सान का पानी की तरह
जिस से तू रोज़ यहाँ करके वजू आती है...

प्रगतिशील साहित्यकारों के संपर्क ने उनके लेखन को और व्यक्तित्व को खूब मांजा. तब तक वह एस.एफ.आई. के सदस्य बन चुके थे और प्राईवेट रूप से पढ़ाई जारी रखने लगे. 1921 में कैफ़ी लखनऊ छोड़ कर कानपुर आ गए. यहाँ उस वक़्त मज़दूरों का आन्दोलन ज़ोरों पर था, कैफ़ी उस आंदोलन से जुड़ गए. कैफ़ी को कानपुर की फ़िज़ा बहुत रास आई. यहाँ रहकर उन्होंने मार्क्सवादी साहित्य का गहराई से अध्ययन किया. 1923 में कैफ़ी सरदार जाफ़री और सज्जाद ज़हीर के कहने पर मुंबई- तब बम्बई- आ गए और विधिवत रूप से कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर सदस्य बन गए.

बम्बई में वह ट्रेड यूनियन मजदूरों के बीच काम करते रहे और शायरी भी करते रहे. यहीं इन्होंने 'इप्टा' नाट्य संगठन की नींव डाली और उसके लिये नाटक, नारे, शायरी व गीत भी लिखे. ब्रिटिश शासन के खिलाफ देश के माहौल और रूसी क्रांति ने उनके विचारों को गहराई से प्रभावित किया. भारत को मिली कथित आजादी से असंतुष्ट होकर उन्होंने इंकलाब का आह्वान करते हुए लिखा था-

कोई तो हाथ बढ़ाये
कोई तो जिम्मा ले
उस इंकलाब का
जो आज तक हुआ ही नहीं.

सज्जाद ज़हीर ने कैफ़ी के पहले ही संग्रह की शायरी के बारे में लिखा था, 'आधुनिक उर्दू शायरी के बाग़ में नया फूल खिला है' एक सुर्ख़ फूल." कैफ़ी की शायरी में वैचारिक आवेग पूरी कलात्मकता, रागात्मक और गीतात्मकता के साथ मौजूद है. उनकी शायरी जन-जन की भावनाओं विचारों और संवेगों को वाणी देती है. उनकी शायरी आवाम की शायरी है, सर्वहारा मजदूरों की शायरी है, उम्मीदों की, सुख-दुख की शायरी है. यह कैफ़ी ही लिख सकते हैं.

आज की रात बड़ी गर्म हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी
सब उठें मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी.

प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े एक शायर की तरह 'इंकलाब' कैफ़ी का हथियार था, तो स्वतंत्रता, समानता उनकी मंजिल. एक नई सुबह का सपना, एक नए विश्व समाजवाद की परिकल्पना का सपना, पर जब यह टूटा तो उन्होंने लिखा-

बस्ती में अपनी हिन्दू-मुसलमां जो बस गये
इंसा की शक्ल देखने को हम तरस गये.

इससे बहुत पहले आजादी के तुरंत बाद हुए दंगों की पृष्ठभूमि में उन्होंने 'खानाजंगी' नामक नज्म की यह पंक्तियां लिखीं-'

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नजर नहीं आती
सूखती है पड़ोसियों से जान, दोस्तों पर है कातिलों का गुमान
लोग घर से निकलते डरते हैं, रास्ते सायं सांय करते हैं...

बावजूद इन हालातों के इनसानियत पर उनका भरोसा मिटा नहीं. उन्होंने पूरे विश्वास से लिखा-

'फूट की आग हम बुझा देंगे
कत्लो गारतगरी मिटा देंगे..

दुनिया की आधी आबादी के लिए भी उन्होंने खूब लिखा. आर्थिक परेशानियों के कारण कैफ़ी ने फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे. सबसे पहले कैफ़ी को शाहिद लतीफ़ की फ़िल्म ‘बुज़दिल’ में दो गाने लिखने का मौक़ा मिला. धीरे-धीरे कैफ़ी की फ़िल्मों से सम्बद्धता बढ़ती गई. उन्होंने गानों के अलावा कहानी, संवाद और स्क्रिप्ट भी लिखे. फिल्म और बाजार की दुनिया में भी वह अपने मूल्यों पर टिके रहे. ‘काग़ज़ के फूल’, ‘गर्म हवा’, ‘हक़ीक़त’, ‘हीर राँझा’, जैसी फ़िल्मों के नाम आज भी कैफ़ी के नाम के साथ लिए जाते हैं.

फ़िल्मी दुनिया ने कैफ़ी साहब को बहुत से सम्मानों से नवाज़ा भी. वजह थी उनकी कलम. उनके गीतों की क्या रेंज थी. वह राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से भी नवाजे गए. उनके लिखे गीतों को सुनें तो आज भी कुछ हो सा जाता है -

तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है के जहाँ मिल गया
एक भटके हुए राही को कारवाँ मिल गया

***
ज़रा-सी आहट होती है तो दिल सोचता है
कहीं ये वो तो नहीं, कहीं ये वो तो नहीं

***

चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था, सरे राह चलते-चलते
वहीं थम के रह गई है, मेरी रात ढलते-ढलते

***

धीरे धीरे मचल ऐ दिल-ए-बेक़रार
कोई आता है
यूँ तड़प के न तड़पा मुझे बालमा
कोई आता है
धीरे धीरे ...

उनके काव्य संग्रह- ‘झंकार’, ‘आख़िर-ए-शब’, ‘आवारा सजदे’, ‘मेरी आवाज़ सुनो’, ‘इबलीस की मजलिसे शूरा’ नाम से छपे.

उनके सामाजिक सरोकारों का आलम यह था कि जीवन के आखिरी दिनों में, आखिरी सांस तक वह अपने पैतृक गाँव मिजवां को आधुनिक रूप से सुविधापूर्ण बनाने के प्रयासों में लगे रहे. ब्रेनट्यूमर व पक्षाघात जैसी बीमारियों से ग्रस्त होने के बावजूद भी वह टूटे नहीं. देश के बदलते हालात पर वह इतने अंदर तक आहत थे कि उनका गम इस अंदाज में छलका था-

मैं ढूंढता हूं जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई जमीन नया आसमां नहीं मिलता
नई जमीन नया आसमां भी मिल जाये
नये बशर का कहीं कुछ निशां नहीं मिलता... नमन कैफ़ी साहब!

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