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जन्मदिन विशेषः प्यार इक प्रश्न भी है इक उत्तर भी, क्या खूब लिखा गुलज़ार ने

मेकैनिक संपूर्ण सिंह कालरा से गीतकार बने गुलज़ार साहब आज की तारीख में करोड़ों दिलों पर राज करते हैं. उनके जन्मदिन पर पढ़िए उनके जीवन, चाहने वालों की बातें व पांच चुनिंदा रचनाएं

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 11 September 2019
जन्मदिन विशेषः प्यार इक प्रश्न भी है इक उत्तर भी, क्या खूब लिखा गुलज़ार ने साहित्य के दो दिग्गज, गुलज़ार साहब के साथ लेखक यतींद्र मिश्र

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है...

किसके लिए लिखी होंगी गुलजार ने ये पंक्तियां? अपनी प्रेयसी राखी के लिए या फिर अपनी शायरी के उन दीवानों के लिए जो उनपे दिलोजान छिड़कते हैं.

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते

भला कौन भूल सकता है गुलज़ार को, उनकी रचनाओं को. उमर खय्याम की रूबाइयों सी है उनकी रचनाएं. हिंदी शायरी, ग़ज़ल और गीतों के इस नायाब हीरे की आज जन्मतिथि है. अपनी शायरी और गीतों में शब्दों के साथ संवेदनाओं का कितना अद्भुत प्रयोग किया है गुलजार साहब ने. कितनी लुनाई है, उनमें. एक से बढ़कर एक मिसरे, एक से बढ़कर एक गीत, क्या खूब गज़ल, क्या उम्दा शायरी...

वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत इस की भी आदमी सी है  
***

तुम्हारी ख़ुश्क सी आँखें भली नहीं लगतीं
वो सारी चीज़ें जो तुम को रुलाएँ, भेजी हैं
***

जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
उस ने सदियों की जुदाई दी है
***

कोई यों भी, इतना उम्दा भी क्यों लिखता है भला? मेकैनिक संपूर्ण सिंह कालरा से गीतकार बने गुलजार आज की तारीख में करोड़ों दिलों पर राज करते हैं. 18 अगस्त, 1934 को पंजाब स्थित झेलम जिले के एक छोटे से कस्बे दीना के सिख परिवार में उनका जन्म हुआ. 

यह हिस्सा अब पाकिस्तान में है. गुलजार साहब को स्कूल के दिनों से ही शेरो-शायरी और संगीत शौक था. कॉलेज के दिनों में उन्होंने अपने शौक को हवा दी. बंटवारा हुआ तो परिवार अमृतसर आ गया, और बाद में गुलज़ार साहब ने मुंबई की शरण ली.

गुलज़ार ने सिने करियर की शुरुआत 1961 में विमल राय के सहायक के रूप में की. बाद में उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी और हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर भी काम किया.

गीतकार के रूप में गुलज़ार ने पहला गाना 'मोरा गोरा अंग लेई ले' साल 1963 में प्रदर्शित विमल राय की फिल्म 'बंदिनी' के लिए लिखा. क्या हिट था वह गाना..उस जमाने से लेकर आज तक. उन्होंने जो भी किया, इतिहास बना दिया. साल 1971 में फिल्म 'मेरे अपने' के जरिये निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रखा.

लेखक यतींद्र मिश्र ने गुलजार साहब को बधाई देते हुए लिखा, "बेहतरीन अफसानानिगार, सदाबहार गीतकार और सम्वेदनशील फिल्मकार का उम्र के 85वें वसन्त में प्रवेश के वक़्त, उनके गीतों की सम्वेदना और रवानी के साथ खैरमक़दम है. सौ बरस तक ऐसे ही गीत, संगीत, कविता और नज़्मों की दुनिया आबाद रहे."

वाकई सोशल मीडिया पेज पर आज गुलजार साहब को बधाई देने वालों का तांता लगा है. प्रशांत द्विवेदी ने अपनी भावनाएं कुछ इन शब्दों में बयान की हैं, "ये जो शहद से अशआ'र हैं, इन्हीं का नाम तो गुलज़ार है...गुलज़ार साहेब का नाम सुनते ही होंठ जैसे किसी चाशनी में डूब जाते हैं. उनके लफ्ज़ और अशआ'र रेत के कणों में भी शहद सी मिठास भर देते हैं. वो उस जमात के शायर ठहरे जिनके कुदरती इश्क़ के लफ़्ज़ों के ज़रिए इंसान की हर कैफ़ियत बयां की जा सकती है.

"साहित्य और सिनेमा दोनों में ही वो उम्दा हैं. उनके लिखे का फ़लक तो देखिए- 'हमने देखी है उन आंखों की महकती ख़ुशबू, हाथ से छूकर इसे रिश्तों के इल्ज़ाम न दो' से लेकर 'दिल तो बच्चा है जी' तक.

"हर एहसास लिखने का उनका लहज़ा बेहद नर्म और मखमली है, पूरे अदब और तहजीब के साथ. उनके यौमे पैदाइश पर कुछ रोब ग़ालिब करना तो बनता ही है. कुछ ऐसे कि, जैसे मोहब्बत को लिखने से ही उनकी क़लम को मंज़िल मिलती हो, और वो स्याही रोशनाई बनती हो. आज बस इतनी सी दुआ है कि हमारा और उनका साथ लंबा रहे. एक और साल. साल-दर-साल तक ऐसे ही....
और...

जो लिखने में उनकी उमर गुज़री,
वो पढ़ने में मेरी उमर गुज़रे..."

वाकई गुलज़ार ने हिंदी को, हिंदी सिनेमा को कितना कुछ नवाजा. उन्होंने केवल लिखा भर नहीं, बल्कि'कोशिश', 'परिचय',  'मेरे अपने', 'अचानक', 'खूशबू', 'आंधी', 'मौसम', 'किनारा', 'मीरा', 'किताब', 'नमकीन', 'अंगूर', 'इजाजत', 'लिबास', 'लेकिन', 'माचिस' और 'हू तू तू' जैसी कई फिल्मों के निर्देशन से भी उन्होंने हिंदी सिनेमा को गुलजार किया.

गुलज़ार साहब की प्रमुख प्रकाशित कृतियों में पुखराज, एक बूंद चाँद, चौरस रात, रवि पार, कुछ और नज़्में, यार जुलाहे, त्रिवेणी , छैंया-छैंया, मेरा कुछ सामान शामिल है.

गुलजार ने काव्य की एक नई शैली विकसित की, जिसे 'त्रिवेणी' कहा जाता है. 'हम को मन की शक्ति देना दाता, मन विजय करें' और 'जंगल-जंगल बात चली पता चला है, चड्ढी पहन के फूल खिला है फूल खिला है' जैसे गीतों से उन्होंने हर जमाने के बच्चों को प्रेरणा देने या फिर थिरका देने की जैसे ठान सी ली है. बाल गीत में गुलज़ार की उपस्थिति बहुमुखी प्रतिभा को बताने के लिए काफी हैं.

गुलज़ार की काबिलीयत यों किसी अवॉर्ड की मुहताज नहीं, पर उन्होंने बीस बार फिल्मफेयर और पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है. साल 2010 में उन्हें 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के 'जय हो' गीत के लिए ग्रैमी अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है.  

भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए साल 2004 में उन्हें देश के तीसरे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से अलंकृत किया गया, तो सिनेमा जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए गुलजार साहब को फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के से भी सम्मानित किया गया है. उर्दू भाषा में गुलजार को उनके लघु कहानी संग्रह 'धुआं' के लिए साल 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है.

आज गुलज़ार साहब के जन्मदिन पर पढ़िए उनकी पांच चुनिंदा रचनाएंः

1.
रिश्ते बस रिश्ते होते हैं


रिश्ते बस रिश्ते होते हैं
कुछ इक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं
बरसों के तले चलते-चलते
भारी-भरकम हो जाते हैं

कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से
बरसों के तले गलते-गलते
हलके-फुलके हो जाते हैं

नाम होते हैं रिश्तों के
कुछ रिश्ते नाम के होते हैं
रिश्ता वह अगर मर जाये भी
बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है
रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

2.

माँ उपले थापा करती थी

छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँथा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला -
तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे

हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!

3.
एक नदी की बात सुनी...


एक नदी की बात सुनी...
इक शायर से पूछ रही थी
रोज़ किनारे दोनों हाथ पकड़ कर मेरे
सीधी राह चलाते हैं
रोज़ ही तो मैं
नाव भर कर, पीठ पे लेकर
कितने लोग हैं पार उतार कर आती हूँ ।

रोज़ मेरे सीने पे लहरें
नाबालिग़ बच्चों के जैसे
कुछ-कुछ लिखी रहती हैं।

क्या ऐसा हो सकता है जब
कुछ भी न हो
कुछ भी नहीं...
और मैं अपनी तह से पीठ लगा के इक शब रुकी रहूँ
बस ठहरी रहूँ
और कुछ भी न हो !
जैसे कविता कह लेने के बाद पड़ी रह जाती है,
मैं पड़ी रहूँ...!

4.
नज़्म उलझी हुई है सीने में


नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं

कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

5.
प्यार वो बीज है


प्यार कभी इकतरफ़ा होता है; न होगा
दो रूहों के मिलन की जुड़वां पैदाईश है ये
प्यार अकेला नहीं जी सकता
जीता है तो दो लोगों में
मरता है तो दो मरते हैं

प्यार इक बहता दरिया है
झील नहीं कि जिसको किनारे बाँध के बैठे रहते हैं
सागर भी नहीं कि जिसका किनारा नहीं होता
बस दरिया है और बह जाता है.

दरिया जैसे चढ़ जाता है ढल जाता है
चढ़ना ढलना प्यार में वो सब होता है
पानी की आदत है उपर से नीचे की जानिब बहना
नीचे से फिर भाग के सूरत उपर उठना
बादल बन आकाश में बहना
कांपने लगता है जब तेज़ हवाएँ छेड़े
बूँद-बूँद बरस जाता है.

प्यार एक ज़िस्म के साज़ पर बजती गूँज नहीं है
न मन्दिर की आरती है न पूजा है
प्यार नफा है न लालच है
न कोई लाभ न हानि कोई
प्यार हेलान हैं न एहसान है.

न कोई जंग की जीत है ये
न ये हुनर है न ये इनाम है
न रिवाज कोई न रीत है ये
ये रहम नहीं ये दान नहीं
न बीज नहीं कोई जो बेच सकें.

खुशबू है मगर ये खुशबू की पहचान नहीं
दर्द, दिलासे, शक़, विश्वास, जुनूं,
और होशो हवास के इक अहसास के कोख से पैदा हुआ
इक रिश्ता है ये
यह सम्बन्ध है दुनियारों का,
दुरमाओं का, पहचानों का
पैदा होता है, बढ़ता है ये, बूढा होता नहीं
मिटटी में पले इक दर्द की ठंढी धूप तले
जड़ और तल की एक फसल
कटती है मगर ये फटती नहीं.

मट्टी और पानी और हवा कुछ रौशनी
और तारीकी को छोड़
जब बीज की आँख में झांकते हैं
तब पौधा गर्दन ऊँची करके
मुंह नाक नज़र दिखलाता है.

पौधे के पत्ते-पत्ते पर
कुछ प्रश्न भी है कुछ उत्तर भी
किस मिट्टी की कोख़ से हो तुम
किस मौसम ने पाला पोसा
औ' सूरज का छिड़काव किया.

किस सिम्त गयी साखें उसकी
कुछ पत्तों के चेहरे उपर हैं
आकाश के ज़ानिब तकते हैं
कुछ लटके हुए ग़मगीन मगर
शाखों के रगों से बहते हुए
पानी से जुड़े मट्टी के तले
एक बीज से आकर पूछते हैं.

हम तुम तो नहीं
पर पूछना है तुम हमसे हो या हम तुमसे
प्यार अगर वो बीज है तो
इक प्रश्न भी है इक उत्तर भी.

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