गिरिजाकुमार माथुर शताब्दी स्मरणः मेरे युवा आम में नया बौर आया है, खुशबू बहुत है...

कविताओं और गीतों की गिरिजाकुमार माथुर की दुनिया एक विरल भाषायी सुगंध की दुनिया है. आज गिरिजाकुमार माथुर की सौवीं जयंती पर उनके अवदान को साहित्य आजतक पर याद कर रहे हैं हिंदी के सुपरिचित आलोचक डॉ ओम निश्चल

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aajtak.in
ओम निश्चल नई दिल्ली, 11 September 2019
गिरिजाकुमार माथुर शताब्दी स्मरणः मेरे युवा आम में नया बौर आया है, खुशबू बहुत है... गिरिजाकुमार माथुर [ फाइल फोटो]

कविताओं और गीतों की गिरिजाकुमार माथुर की दुनिया एक विरल भाषायी सुगंध की दुनिया है, जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करती है. एक वक्त 'छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन' तथा 'मेरे युवा आम में नया बौर आया है/ खुशबू बहुत है क्योंकि तुमने लगाया है'...जैसे गीत काव्य रसिकों के बीच बहुत लोकप्रिय रहे. उन्हें  साहित्य अकादमी, व्यास सम्मान व शलाका आदि कई सम्मानों से नवाजा गया. दूरदर्शन में उप महानिदेशक पद पर रहे माथुर अपनी कविताओं में वैज्ञानिकता और वैचारिकता के प्रवाह के कारण पहचाने गए तथा पृथ्वीकल्प व साक्षी रहे वर्तमान को अपने वक्त की बड़ी रचना माना गया.

आज गिरिजाकुमार माथुर की सौवीं जयंती पर उनके अवदान को साहित्य आजतक पर याद कर रहे हैं हिंदी के सुपरिचित आलोचक डॉ ओम निश्चल

जन्मशती: गिरिजाकुमार माथुर (22 अगस्त 1919- 10 जनवरी 1994) मालवा का कवि-मन

जो कविता के गलियारे से कभी गुजरे होंगे उनके कानों में कभी कुछ गीत पंक्तियां सुन पड़ी होंगी. 'छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना मन.' उदासियों से भरी संवेदना का यह गीत कवि की निज अभिव्यक्ति होने के बावजूद उस दौर में हर उदास व्यक्ति का गीत बन गया था. इसी तरह हर उल्लास-उत्सव में गाया जाने वाला गीत: 'हम होंगे कामयाब एक दिन' या आजादी के तुरंत बाद का उनका लिखा गीत: 'आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना' ये गीत गिरिजा कुमार माथुर के हैं जो मालवा के थे.

मालवा के कवियों और लेखकों की अलग ही छवि हिंदी में दिखती है. एक तरफ नरेश मेहता जैसे वैदिक छवि के कवि, दूसरी तरफ राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी जैसे प्रखर गद्य लिखने वाले पत्रकार, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे पंडित प्रवर आलोचक जिनके गद्य में कविता हिलोरें लेती है. मालवा को हम गांधी चिंतन के प्रखर कवि और गीत फरोश व सतपुड़ा के जंगल जैसी मोहक कविताएं लिखने वाले भवानीप्रसाद मिश्र से भी पहचानते हैं. ऐसे साहित्य संस्कृति कला से भीगे मालवा के कवि गिरिजाकुमार माथुर का यह जन्मशती वर्ष है.

गिरिजाकुमार माथुर के पिता देवीचरण माथुर सुशिक्षित तथा वैदिक वांड्.मय के ज्ञाता थे. विवेकानंद के चिंतन से प्रभावित पिता खुद काव्यसंस्कारों के व्यक्ति थे. उनका कवित्त, सवैयों एवं दोहों आदि का एक कविता संग्रह तत्व ज्ञान नाम से प्रकाशित भी हुआ. इससे सहज ही उस वातावरण एवं परिवेश का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिसमें गिरिजाकुमार माथुर जनमे, पले-बढे और साहित्यिक संस्कारों के बीच होने का सौभाग्य हासिल किया. यह उस परिवार की विशेषता ही कही जाएगी कि 1901 में निकलने वाली पत्रिका सरस्वती नियमित रूप से उनके घर आती थी. पिता ने इन्हें हितोपदेश के श्लोक रटवाए थे तथा बचपन में मेले ठेले में मिलने वाली मिट्टी की गाड़ियों से खेलते हुए उसकी आकर्षक खड़खड़ या गड़गड़ ध्वनि से एक खास आकर्षण उनके भीतर पनपा व लय के प्रति एक विशेष खिंचाव पैदा हुआ. वहीं से तुकबंदियां बननी शुरु हुईं जो एक बड़े कवि के निर्माण में सहायक हुईं.

बालक गिरिजाकुमार बहनों के दुलारे रहे तथा बचपन के खेल में बहनों के साथ बहुत आनंद आता. वे जिस गंवई परिवेश में पैदा हुए वह भले ही उनके शब्दों में उन्नीसवीं सदी की धुँधलके भरी दुनिया थी, जहां गायों के गले में बजती घंटियां, चिड़ियों के कलरव, मंदिर से सांझ के धुंधलके में आती झांझ मंजीरे की आवाज के साथ सुन पड़ती कीर्तन की अनुगूंज...यह सब मिलकर एक ऐसे लोक परिवेश को उपस्थित करते थे, जिसमें उनका मन रमा रहता था, यहीं कहीं मन के अवचेतन में लोक और लोक ध्वनियों का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता गया होगा, जो आगे चल कर उनके गीतों और कविताओं के सौंदर्यबोध में परिलक्षित हुआ.

प्रकृति से तादात्म्य   
प्रकृति से कवि के तादात्म्य का बोध भी बहुत सघन है, जिसके पीछे उसके अपने अवलोकन हैं. बचपन में मालवा के परिवेश में बीते दिन भुलाए नहीं भूलते. इसे अपनी स्मृति में दर्ज करते हुए उन्होंने लिखा है: '' मीलों दूर तक विस्तार लाल पठार हैं और उसके साथ ही काली मिट्टी के सांवले खेत आरंभ हो जाते हैं. इमली, सेमल, नीम, खजूरों के झुरमुट, पलाश, खिरनी, जामुन, आम, महुवे, चिरौंची और ताड़ के वृक्षों से छाया हुआ यह प्रदेश है जहां के ढूहों, टौरियों, टीलों के घुमावदार कटावों के बीच से चट्टानी नदियां बहती हैं. अनेक जंगली बरसाती नाले और छोटी-छोटी बलखाती खजूर के झुरमुटों के बीच बहती ये वही अनहोनी रम्य नदियों हैं जो दक्षिण से उत्तर की ओर बह कर जमुना में मिलती हैं.'' कहना न होगा कि जैसे सतपुड़ा के जंगल भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य में रम्य नैरेटिव बन कर सामने आते हैं, वैसे ही बेतवा और सिन्धु नदी के साहचर्य की साक्षी मालवा की इस विंध्य भूमि पर कवि ने दो कविताएं लिखी हैं- ढाकवनी और दियाधरी, जिसके नैरेटिव में एक खास किस्म का आकर्षण है.

घर में ताऊ जी पटवारी व कानूनगो रहे. मामाओं की गिनती बड़े वकीलों में होती. मामा संगीत के भी शौकीन थे सो उनकी गायकी से बालक गिरिजा ने लयकारी सीखी. मां की सुनाई कहानियों का असर भी गिरिजा जी पर पड़ा. इस तरह मालवे का सौंदर्य व संगीत उन्हें बचपन से ही भिगोता रहा और उन्हें भीतर ही भीतर कवि की संवेदना से भरता रहा. लोक चित्त को छूने वाले ऐसे बिम्ब उनके प्रारंभिक संग्रहों 'मंजीर', 'धूप के धान' आदि के गीतों में देखने को मिलते हैं. पिया आया बसंत फूल रस के भरे...गीत की संरचना में जो लोकगंधी लय है वह मालवा के उसी परिवेश की देन है जहां उनका जन्म हुआ. गांव का अनुभव संसार व्यापक होता है. लोग भले ही भौतिक रुप से संपन्न न हों पर विपन्नता के बावजूद उनके भीतर खुशहाली का उजाला होता है. कच्चे खपरैल, छान-छप्पर, कच्चे गलियारे में रहते हुए भी लोग मन से विपन्न न थे. पर किसानी परिवेश में पले-बढ़े होने के कारण गिरिजाकुमार माथुर की प्रकृति भी किसानी जीवन से समरस थी.

माथुर ने इंटरमीडिएट की शिक्षा झांसी से हासिल की तो बीए ग्वालियर से किया. इस उम्र तक वे कवित्त, सवैये और छंद में प्रवीण हो चुके थे, मैथिलीशरण गुप्त तब उनकी कविता के रोल मॉडल थे. माखनलाल चतुर्वेदी, निराला, महादेवी का सम्मिलित प्रभाव उन पर पड़ा. पहली कविता माखन लाल चतुर्वेदी संपादित कर्मवीर में छपी. स्वाधीनता संघर्ष के दौर की पत्रिकाओं में कर्मवीर की अपनी प्रतिष्ठा थी. 1936 साहित्य की दृष्टि से ऐतिहासिक समय है. गोदान इसी वर्ष प्रकाशित हुआ तो प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन लखनऊ में आयोजित हुआ. सन 36 में ही कर्मवीर में प्रकाशित गिरिजाकुमार माथुर की पहली कविता मंजीर में शामिल हुई, जो 1941 में छपा, जिसकी भूमिका निराला जैसे क्रांतिकारी कवि ने लिखी. यह भूमिका किसी नए कवि के संग्रह पर सराहनापरक भूमिका लिखने की परंपरा का अनुगमन भर न था. निराला ने मन से पहली बार कविताओं की अंतर्वस्तु में प्रवेश करते हुए गिरिजाकुमार माथुर के काव्यतत्व की सराहना की थी. गिरिजाकुमार माथुर लखनऊ में एमए करते हुए रामविलास शर्मा के संपर्क में आए, जिन्होंने उन्हें निराला से मिलवाया था.

यह संयोग ही है कि उनका विवाह शकुंत माथुर से हुआ जिन्हें तारसप्तक परंपरा में अज्ञेय जी ने शामिल किया. वे ऐसे अकेले दम्पति हैं जो सप्तक परंपरा में शामिल हैं. माथुर का कवितारंभ 1936 तक हो चुका था तथा 1943 तक आकर उन्हें कवियों के बीच पहचाना जाने लगा था. 1941 में आए उनके संग्रह मंजीर और उस पर निराला जी की भूमिका ने उनके कवित्व में चार चांद लगा दिए. '43 में तारसप्तक में शामिल होने के पहले ही वे कुछ चुनिंदा कवियों में शुमार किए जाने लगे थे. उनमें प्रगति और प्रयोगवादी धारा दोनों का समावेश था. उनकी कविता अपने रूप के प्रति सचेत होती हुई भी कथ्य के प्रति अनुदार नहीं दिखती.

यह अवश्य है कि तारसप्तक के सभी कवि जीवन के प्रति आस्थावान रहे हैं. प्रगति और प्रयोग को अलगाने का काम दूसरा सप्तक के आने के बाद हुआ. सप्तक के अनेक कवि खासा प्रगतिशील थे; चाहे रामविलास शर्मा हों, गिरिजाकुमार माथुर हों, मुक्तिबोध हों... खुद अज्ञेय भी अपने चाकचिक्य के बावजूद प्रगतिशील जीवन मूल्यों के कवि थे. गिरिजाकुमार माथुर ने अपने वक्तव्यों में मार्क्सवाद व मार्क्सवादी सिद्धांतों के प्रति बहुधा आस्था प्रकट की है. वे कहते हैं, ''मार्क्सवाद के स्फू‍र्तिदायक और प्रेरणा भरे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और द्वंद्वात्मक आधार पर इतिहास के विकास और परिवर्तन के सिद्धांतों का मेरे मन में मानवीय संवेदना और अपने संस्कृति मूल्यों से जुड़ कर हुआ. वस्तुत: मार्क्सवाद को मैंने अपने देश की जन परंपरा और सांस्कृतिक उत्स की मिट्टी में रोप कर आत्मसात कर लिया और एक नई जीवन दृष्टि् मुझे प्राप्‍त हुई. मुक्ति के वही मूल्य मेरी कविता को झंकृत और उद्दीप्त करते रहे हैं.'' मंजीर और नाश और निर्माण की कविताओं में तो यह प्रभाव है ही, आगे के संग्रहों, धूप के धान, शिलापंख चमकीले, साक्षी रहे वर्तमान, मैं वक्त के हूँ सामने की कविताओं में भी यह पल्ल्वित और विकसित होता रहा. उनमें एक तरफ लोक चेतना थी, तो दूसरी तरफ वैज्ञानिक चेतना भी.

नए काव्य का प्रस्तावन
प्रणय की अनूठी रागिनी उनके गीतों व कविताओं में बजती है तो इतिहास और यथार्थ से भी उनकी कविताओं का सघन रिश्ता रहा है. वे उस दौर के कवि रहे हैं जब विश्व दो-दो विश्वयुद्धों से गुजर कर घायल अवस्था में था. हिरोशिमा व नागासाकी भयानक अणुसंहार में ज़मीदोज़ हुए जिसने मनुष्य के अस्तित्व और मानवाधिकारों की चूलें हिला दीं. देश साठ के दौर के मोहभंग से गुजरा, आपातकाल देखा उन्होंने, आजादी की व्यर्थता भी. पर वे अपने प्रगतिशील जीवन मूल्यों से बंधे रहे. उनके सामने कविता में अनेक आंदोलन आए-गए.

प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता, नवगीत तथा किसिम-किसिम की कविता के आंदोलन, जिसकी एक लंबी सूची जगदीश गुप्ता ने अपने अध्यायन में गिनाई है, पर गिरिजाकुमार माथुर अकविता के भुलावे में नहीं आए, न मोहभंग में उनकी कविता नैराश्य का बानक बनी. वे मस्ती और रोमानी गीत लिखते और गाते रहे, तो जीवन और विचारधारा का आंदोलित करने वाली समस्याओं से भी जूझते रहे. उनकी कविता में प्रयोगवादी आधुनिकता भी है तो प्रगतिकामी चेतना भी. नई कविता के उन्मेष के साथ उनके यहां अपूर्व ताजगी भी दिखती है तो बहुत बाद में उभरे नवगीत आंदोलन के बहुत पहले से उनके गीत नए काव्य का प्रस्तावन कहे जा सकते हैं.

गिरिजाकुमार माथुर ने प्रभूत मात्रा में लिखा है. पर प्राय: उनके गीतों में व्याप्त रोमैंटिक छवि व मांसलता से उन्हें ज्यादा पहचाना जाता रहा है. दूसरे, उनकी कविता में बिम्ब-बहुलता का बोलबाला रहा है जिसे आलोचकों ने लक्ष्य किया है. शायद इसीलिए उन्हें रूपवादी फ्रेम का कवि भी कहा समझा जाता रहा है. पर इस बात का स्वयं माथुर जी ने खंडन किया है. वे कहते हैं कि ''मेरे बिम्ब ऊपरी सजावट या अलंकरण भी नहीं हैं...बल्कि मेरी अपनी वास्तविकता से उपजे हैं. वह मेरी अनुभव की दुनिया का यथार्थ है.'' वे कहते हैं, ''मैं उस प्रदेश का हूँ जहां कालिदास जैसे कवि हुए हैं जिन्होंने मेघदूत लिखा, विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञान शाकुंतल लिखा तो ऐतिहासिक काव्य रघुवंश भी. लिहाजा जैसे कालिदास को केवल प्रेम व श्रृंगार का कवि नहीं कहा जा सकता, उसी तरह मेरे प्रयोगों में गीतों कविताओं में मालवी कमनीयता होते हुए भी मुझे केवल श्रृंगारिक कवि कह कर नहीं समझा जा सकता. मैंने जीवन की आसक्ति और जीवन का उजास पूरा मुक्त जिया है.''

गिरिजाकुमार माथुर की कविताओं में विन्ध्य के मोहक पठारों और चट्टानी नदियों के हरहराते प्रवाह की सी कल-कल कविताओं में सुन पड़ती है. वहां का फाग, वहां की मस्ती, वहां का लोक, वहां की फसलें, काम करती स्त्रियां, गांव के तरह तरह की पशु-पक्षियों की आवाजें कवि के भीतर जो निनाद पैदा करती हैं वही निनाद माथुर की कविता में गूंजता है, कहना न होगा कि जितनी मानवीय परिवेशगत ध्वनियां माथुर के काव्य में हैं वैसी उनके समकालीनों में नहीं. माथुर के गीत प्राय: नई कविता व प्रगतिवादी दौर में लिखे गए हैं...वहां मौसम है, ऋतुएं हैं, खेत-खलिहानों के बिंब हैं, और एक ऐसी खनक है जो कवि-चित्त से होता हुआ पाठकों के आस्वादन में खनकता और धड़कता है. वे दुःख से भीगा हुआ गीत लिखते हैं तो उसमें भी भविष्य की उजास ओझल नहीं होने देते. 'छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना मन'....इस उदास भावभूमि से होता हुआ गीत जब अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचता है तो कवि कहता है-

द्विविधाहत साहस है दिखता है पंथ नहीं
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं
दुख है न चांद खिला शरद रात आने पर
क्या हुआ जो खिला फूल रस-वसंत जाने पर
जो न मिला भूल उसे
कर तू भविष्य वरण.  (छाया मत छूना मन, पृष्ठ 12)

रचना यात्रा: मंजीर से पृथ्वीकल्प तक
उनका पहला संग्रह मंजीर सरस रचनाओं का संग्रह है, इसलिए पहली ही निगाह में निराला को भा गया. कहना न होगा की मंजीर के प्रकाशन के साथ ही कवियों में गिरिजाकुमार माथुर की अपनी पहचान बनने लगी थी. बोलचाल की लय के गीत इसमें अधिकतर हैं. थोड़ी दूर और चलना है, तुम इन गीतों में बस जाना, रुठ गए वरदान सभी, मैं जीवन से हार गया, तुमने प्यार नहीं पहचाना, विदा समय क्यों भरे नयन हैं, प्यार बड़ा निष्ठुर था मेरा ऐसे गीत इसमें शामिल हैं. माथुर में महादेवी की-सी वेदना भी है. उनके गीतों में इस वेदना की बड़ी महीन-सी छाया है. नाश और निर्माण की कविताएं अंधेरे और उजाले की हैं. धूप के धान नामक उनका तीसरा संग्रह 1955 में आया. इस संग्रह में वे ओज के कवि के रुप में सामने आते हैं. एक गांधीवादी देशभक्त की तरह उनके मन में धर्म, संप्रदाय, आदि को लेकर गांधी जैसी चिंता थी.

कालिदास के इलाके के इस प्रकृति प्रेमी कवि में जो प्रकृति का राग-विस्तार है, उसे देखते हुए कृष्णदत्त पालीवाल जैसे आलोचक का कहना है कि उनके कवि कर्म में देह के रस राग के साथ ही आत्मा का संगीत भी बजता सुनाई देता है. ढाकबनी में तो सतपुड़ा के जंगल जैसा सादृश्य मिलता है, तो एशिया का जागरण अज्ञेय की असाध्यवीणा के समकक्ष रखे जाने योग्य है, इस संग्रह में फिर एक बार उनकी बिम्बमयता का जादू सर चढ़ कर बोलता है. 1961 में आया शिलापंख चमकीले युगीन विसंगतियों का काव्य है. यही वह दौर है जब आत्मजयी और अंधायुग जैसी रचनाएं लिखी गयीं. आजादी का मोहभंग अपने चरम पर था. कवियों में एक नए युग का आवाहन बोलता था. दियाधरी व ढाकवनी जैसी कविताओं में मालवा के बचपन के लैंडस्केप मिलते हैं जिसमें लोकरंगों का प्राधान्य है.

अपने अगले काव्य भीतरी नदी की यात्रा में वे और संवरे और निथरे कवि के रुप में सामने आते हैं. '75 में आए इस संग्रह में फिर उनका रोमैंटिक और उदात्त रूप उभरता है. यह माथुर की सुपरिचित छवि का पुनरवतण भी था. इस संग्रह का पहला ही गीत इस बात की गवाही देता है: फिर घुमड़े वही मेघ, फिर आया याद प्यार/ फिर खिलने लगे पहिले पहिले के हरसिंगार. पर इस संग्रह में निराला की 'वह तोड़ती पत्थर' की तर्ज पर माथुर ने एक मजदूरनी के संघर्ष को 'ईंट पर सांवली' कविता में व्यक्त किया है जिसे देख कवि की अपनी आधुनिकता का शीशा चटख जाता है.

वर्तमान से सरोकार और कवि-चिंता
भीतरी नदी की यात्रा के बाद उनके दो महत्वपूर्ण संग्रह आए. साक्षी रहे वर्तमान और मैं वक्त के हूँ सामने. यह वह समय था जब वे यथार्थ से आंखें मिलाकर लिख रहे थे. दोनों संग्रहों में उनके सामाजिक सरोकार प्रबल होकर उभरते हैं. हालांकि इन संग्रहों से पहले कल्पांतर में ही वे अपने वक्त की त्रासदी को देख चुके थे. यह काव्य महाशक्तियों के वर्चस्व और सैन्य शक्तियों के प्रदर्शन के फलस्वरूप सामूहिक विनाश की ओर बढ़ती मनुष्यता के प्रति कवि की प्रार्थना है. हम पीछे रूस-चेकोस्लोवाकिया, अमरीका-वियतनाम, जर्मनी नाजी हिंसा, अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड टावर का ध्वंस, भारत-पाक की हर वक्त की तनातनी, अमरीका-अफगानिस्तान व अमरीका-इराक संघर्ष का हश्र देख चुके हैं.

जाहिर है वैभव, विलास, पतनोन्मु‍ख सभ्यता, युद्ध, अशांति, फासिस्ट शक्तियों व अस्त्रों की होड़ का वातावरण है. कल्पांतर इन्हीं व्याधियों के प्रति कवि-चिंता का काव्य है. लगभग इसी भावभूमि पर उनका काव्यनाटक पृथ्वी़कल्‍प 1994 में आया. यह पृथ्वी के कल्प-कल्पांतरों की उद्भवगाथा है. इस काव्य से गिरिजाकुमार माथुर की बहुज्ञता का आभास होता है. इसकी अंतर्वस्तु में वैज्ञानिक, दार्शनिक, शब्दावलियों के लिए अनेक नए शब्द उन्होंने दिए हैं जो कि कोशकारों के लिए भी शायद नूतन पारिभाषिकी हो. यह मनुष्य के सृजन की गाथा तो है ही, फंतासी और रुपकों से निर्मित एक ऐसी दुनिया है जो कि तमाम प्रश्नों के हल के लिए प्रतीक्षित है.

मैं वक्त के हूँ सामने जब आया तो वे उस युगीन मोड़ पर थे जब भूमंडलीकरण की आहट आने लगी थी. उदारतावाद और विश्व-बाजारवाद का दौर शुरु ही होने वाला था. भारत में आर्थिक सुधारों का माहौल बन ही रहा था. ऐसे समय वे कह रहे थे, 'मेरे पास सिर्फ शब्द हैं जो समय के अस्त्र हैं.' जनवरी '94 में अपने निधन के पूर्व वे शब्दों के दर्पण में अपने वक्त का चेहरा पढ़ रहे थे. हिंदी कविता में जब-जब मनुष्य के राग, उसके सौंदर्य व दुनियावी यथार्थ और युद्धों की आशंकाओं से जूझती हुई पृथ्वी की बात होगी, माथुर का काव्य एक दर्पण की तरह हमारे सम्मु्ख होगा.

उनकी कविताओं से मनुष्यता की, मातृभाषा की सुगंध आती है.
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# लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि, गीतकार, आलोचक एवं भाषाविद हैं. शब्द सक्रिय हैं (कविता संग्रह), शब्दों से गपशप (आलोचना), भाषा की खादी (निबंध), कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई एवं बैंकिंग वाड्.मय सीरीज के रचयिता हैं. अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, मलय, अशोक वाजपेयी व लीलाधर मंडलोई आदि कवियों के कविता चयन संपादित किए हैं. कुंवर नारायण पर दो खंडों में संपादित आलोचनात्मक कृतियां 'अन्वय' एवं 'अन्विति' विशेष चर्चित. उनसे- जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059 फोन: 8447289976 पर संपर्क किया जा सकता है.

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