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प्राचीन एवं नवीन के सेतु नंदकिशोर नवलः ज्ञानेन्द्रपति ने लिखा नमन लेख

नामवरोत्तर हिंदी आलोचना में कृतिकेंद्रित साहित्यिक आलोचना विशेषकर काव्यालोचन के क्षेत्र में नंदकिशोर नवल का नाम निस्संदेह अग्रगण्य है.

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aajtak.in नई दिल्ली, 16 May 2020
प्राचीन एवं नवीन के सेतु नंदकिशोर नवलः ज्ञानेन्द्रपति ने लिखा नमन लेख डॉ नंदकिशोर नवल [ फोटोः विनोद कुमार]

नामवरोत्तर हिंदी आलोचना में कृतिकेंद्रित साहित्यिक आलोचना विशेषकर काव्यालोचन के क्षेत्र में नंदकिशोर नवल का नाम निस्संदेह अग्रगण्य है. एक आलोचक के रूप में उनका दृष्टि-परास बहुत विस्तृत है और इसमें सूर, तुलसी, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, मुक्तिबोध से लेकर अद्यतन उल्लेखनीय कवियों के नाम शामिल हैं. उन्होंने हिंदी आलोचना का विकासेतिहास भी लिखा और आधुनिक हिंदी कविता का मूल्यांकनधर्मी इतिहास भी. निराला काव्य से उनका लगाव बहुत गाढ़ा था और निराला रचनावली का संपादन रचनावलियों के क्षेत्र में एक स्मरणीय कार्य बना रहेगा. बड़े और सुज्ञात नामों के अतिरिक्त उन्होंने अपने समय के महत्त्वपूर्ण गौण कवियों के महत्त्व को भी रेखांकित किया, जिसमें रामजीवन शर्मा 'जीवन' और रामगोपाल शर्मा 'रुद्र' भी शामिल हैं. किसी भी साहित्यिक विधा के विकास में गौण लेखकों की महती भूमिका से नवल बखूबी परिचित थे और उसे समुचित आदर देते थे.

नवल जी ने संपादन के क्षेत्र में भी स्पृहणीय कार्य किया है- उनके आयोजकत्व में, एक सहयोगी संपादक-लेखक के रूप में निकली पहली पत्रिका 'ध्वजभंग' ने मूल्यांकनपरक आलोचना का एक लघु रूप पेश किया था. उसके आगे उन्होंने सत्तर के दशक में एक पत्रिका निकाली: 'सिर्फ' जिसके आवरण पर 'सिर्फ' तो मोटे हर्फों में छपता था और उसके नीचे छपता था: 'युवा लेखन के लिए प्रतिबद्ध'. अनंतर, उन्होंने 'धरातल' नाम की एक पत्रिका का संपादन किया, जिसमें हिंदी के अनेक उल्लेखनीय माने जाने वाले कवियों को रौशन जमीन दी. नामवर जी के प्रधान संपादकत्व में निकलने वाली 'आलोचना' के भी वे संपादक रहे अनेकानेक अंकों तक. उनके संपादन में निकली आखिरी पत्रिका थी: 'कसौटी', जिसने हिंदी की साहित्यिक आलोचना का एक विश्वसनीय रूप उपस्थित करने की कोशिश की. उसके प्रवेशांक में ही घोषित किया था कि इस पत्रिका के 15 अंक निकाले जाएंगे और पंद्रहवां अंक ही उसका अवसान अंक बना. इससे यह भी पता चलता है कि नंदकिशोर नवल एक चिंतनशील आलोचक होने के साथ एक दृढ़निश्चयी व्यक्ति भी थे, जिसका हर कार्य सर्वथा सुचिंतित होता था. 'जनपद' और ' किरणवार्ता' जैसे जनपदीय साहित्यिक प्रकाशन-प्रयत्नों के पीछे भी उनकी प्रेरक-समर्थक भूमिका मौजूद थी.

वे एक सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी थे और उनसे साहित्यिक वार्तालाप करना ज्ञानानंद से भर देता था. लेकिन अनौपचारिक बतकहियों-बहसों के बीच वे अपने उष्णरक्त होने का परिचय देने से गुरेज़ नहीं करते थे. इसके पीछे का कारण प्रायः वही कि नवल जी के मंतव्य सर्वथा सुचिंतित होते थे, पाठाधारित अथवा अनुभव जनित और उनसे डिगना उन्हें मंजूर नहीं होता था. इसके साथ यह भी कि किसी दुर्मुख दबंगई के आगे नतमुख हो जाना या रह लेना उन्हें गवारा नहीं था.

मैं जब पटना विश्व विद्यालय के बीएन कालेज में इंगलिश आनर्स का छात्र बन कर अध्ययनरत था तब नवल जी वहां हिंदी के प्राध्यापक थे. वैसे तो मैं उनका छात्र था, लेकिन उन्होंने हमेशा मुझे मित्र का दर्जा ही दिया. हमने साथ बहुत आवारगियां कीं, साथ-साथ घूमते-टहलते शहराती जीवन की परतों को उघाड़ कर छिपी हुई वास्तविकता को लखने-परखने का यदि कुछ बौद्धिक कौशल मुझ सरीखे अल्पमति के हाथ लगा हो तो वह बेशक शुरुआती दिनों में उनके सान्निध्य से ही संभव हुआ होगा.

नंदकिशोर नवल बुनियादी रूप से अकादेमिक आलोचना की परंपरा में ही आते दिखते हैं. हम यह भूल नहीं सकते कि हिंदी आलोचना का स्थापत्य खड़ा करने वालों में रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, प्रकाशचंद्र गुप्त , नलिन विलोचन शर्मा, नंद दुलारे वाजपेयी, नामवर सिंह जैसे शिक्षण संस्थानों से संबद्ध आलोचकों ने केंद्रीय भूमिका निभाई है, जिसे बाद में विश्वनाथ त्रिपाठी, मैनेजर पांडेय, शंभूनाथ आदि आलोचकों ने विस्तार दिया है. अकादेमिक आलोचना की एक खासियत यह होती है कि वह निश्चयात्मक स्वर में बात करती है. आलोचक का अभिमत अस्पष्ट नहीं रहता. लेकिन हमने यह भी देखा है कि अध्यापन से संबंधित होने के बावजूद रमेशचंद्र शाह और परमानंद श्रीवास्तव जैसे आलोचक सर्जनात्मक आलोचना के नाम पर ऐसी आलोचना प्रस्तुत करते हैं जिसे अपने समय में रामचंद्र शुक्ल ने प्रभावाभिव्यंजक आलोचना कहा था और जिसके उदाहरण के रूप में शांतिप्रिय द्विवेदी का उल्लेख किया था कि जहां अपनी वाग्मिता के बावजूद आलोचक अस्पष्टता से बच नहीं पाता और आलोचना, सारी भावाकुलता के बावजूद एक भावनृत्य या कि शब्दक्रीड़ा का आयास बन कर रह जाती है.

नवल जी की आलोचना सख्तजान अकादेमिक परंपरा में आने के बावजूद उसकी जड़ता से प्राय: मुक्त है क्योंकि नये का स्वागत करने में वे कभी पीछे नहीं रहे. आलोचना का एक रचनात्मक दायित्व यह भी है कि वह प्राचीन और नवीन के बीच सेतु निर्मित करे. नवल जी की आलोचना ने यह काम बखूबी संपन्न किया है. हम यह भी देख सकते हैं कि किस तरह नामवर जी अपने आलोचकीय जीवन के उत्तरार्ध में, वाचिक आलोचना के दौर में, नागार्जुन का एक शब्द लेकर कहें तो, 'आशीर्वादीलाल' बन गए थे और हाथ आई किताब को कम से कम एक बार भी आद्यंत पढ़ने की जगह उसे सूंघ भर कर उसका गुणधर्म बताने पर उतर आए थे. नवल जी के साथ ऐसा कुछ कभी नहीं हुआ. नामवर जी के साथ अपनी निकटता के बावजूद उन्होंने डॉ रामविलास शर्मा की तरह का लेखकीय जीवन जीना चुना. रामविलास जी की तरह ही नवल जी प्रगतिशील लेखक संघ की शीर्षस्तरीय सक्रियताओं में, और जमीन पर भी सांगठनिक व्यस्तताओं में, मुब्तिला थे. लेकिन वह सब कुछ छोड़ कर रामविलास जी की तरह उनने भी अपने लिए रचनात्मक एकांत चुना. उसके आलोक-वृत्त में बैठकर उन्होंने वह सब लिखा, साहित्य-विवेक विकसित करना चाहने वाले किसी भी पाठक के लिए अनिवार्य पाठ की तरह जो हमारे बीच हमेशा मौजूद रहेगा.
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# ज्ञानेन्द्रपति हिंदी के जाने-माने कवि व गद्यकार हैं. 'शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है', 'गंगातट', 'संशयात्मा', 'कवि ने कहा', 'भिनसार', 'मनु को बनाती मनई', 'गंगाबीती','कविता भविता' कविता संग्रह एवं गद्य संग्रह 'पढ़ते गढ़ते' प्रकाशित. वे शमशेर सम्मान, पहल सम्मान व साहित्य अकादेमी सहित कई सम्मानों से विभूषित हो चुके हैं. संपर्क: ज्ञानेन्द्रपति, बी 3/12 , अन्नपूर्णा नगर कालोनी, विद्यापीठ मार्ग, वाराणसी 221002. 09415389996

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