Sahitya AajTak
Sahitya AajTak

जन्मदिन विशेषः बुद्धिनाथ मिश्र, उनका मन आज हो गया पुरइन पात है...

गए चार दशकों से मंचों पर जिस एक गीतकार का बोलबाला रहा है, वे बुद्धिनाथ मिश्र हैं. उनके 71वें जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर उनके योगदान को स्मरण कर रहे हैं हिंदी के सुधी कवि, समालोचक एवं भाषा चिंतक डॉ ओम निश्चल

Advertisement
aajtak.in
ओम निश्चल नई दिल्ली, 01 May 2020
जन्मदिन विशेषः बुद्धिनाथ मिश्र, उनका मन आज हो गया पुरइन पात है... हिंदी के लाड़ले गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र [ फोटो सौजन्यः फेसबुक ]

गए चार दशकों से मंचों पर जिस एक गीतकार का बोलबाला रहा है, वे बुद्धिनाथ मिश्र हैं. 71 वर्ष के हो चले बुद्धिनाथ मिश्र जितने सुगठित गीत लिखते आए हैं उतने ही सुरीले गीतकार भी हैं. वे हों, मंच हो, सुनने की अभिलाषा हो तो उनके गीत जादू का काम करते हैं. जिस तरह अपने दौर में नीरज, रमानाथ अवस्थी, भारत भूषण आदि को सुनने का एक सहज चाव लोगों के मन में रहा है, वह चाव बुद्धिनाथ के गीतों के प्रति भी देखा जाता है. उनके 71वें जन्मदिन पर उन्हें और उनके योगदान को स्मरण कर रहे हैं हिंदी के सुधी कवि, समालोचक एवं भाषा चिंतक डॉ ओम निश्चल.

एक बार और जाल फेंक ओ मछेरे
जाने किस मछली में बंधने की चाह हो.

कुंकुम-सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है
बंसी की डोर बहुत काँप रही आज है
यों ही ना तोड़ अभी बीन रे सँपेरे
जाने किस नागिन में प्रीत का उछाह हो!....

आज से कोई 35 साल पहले के लखनऊ के एक कवि सम्मेलन की याद है. वे मंच पर कोई आधी रात के समय अपना यही सुपरिचित गीत पढ़ रहे थे. श्रोतागण मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे. उसके बाद उन्होंने और एक गीत सुनाया:
''नदिया के पार जब दिया टिमटिमाए
अपनी कसम मुझे तुम्हारी याद आए.''

रात की नीरवता में गीत की टेर दूर तक एक सम्मोहन जगा रही थी. वे हिंदी के लाड़ले गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र थे. तब से उनके गीतों के प्रति अनुरक्ति बनी तो आज तक अक्षुण्ण है. वे अन्य कवियों की तरह संग्रहों की ढेरी लगाने वाले कवि नहीं हैं. पहला संग्रह 'जाल फेंक ओ मछेरे'- इसी जाने पहचाने गीत के नाम पर आया था, जिसे बिहार के लोकप्रिय सांसद और लेखक शंकरदयाल सिंह की संस्था पारिजात प्रकाशन ने 1983 में प्रकाशित किया था. तब से अब तक वे इस गीत को सैकड़ों कवि सम्मेलनों और निजी पारिवारिक गोष्ठियों व दोस्तों की सोहबत में कितनी ही बार पढ़ चुके हैं. लोग इस गीत के दीवाने हो चुके हैं. इस गीत की शोहरत ही रही कि जानी मानी लेखिका शिवानी ने झूला कहानी संग्रह की अपनी अंतिम कहानी का अंत उनकी इन्हीं पंक्तियों से किया था. इस संग्रह के बाद उनके तीन और संग्रह 'जाड़े में पहाड़', 'शिखरिणी' एवं 'ऋतुराज एक पल का' शीर्षक से प्रकाशित हुए तथा एक और संग्रह प्रकाशन के लिए लगभग तैयार हो चुका है.

बुद्धिनाथ का जन्म मिथिला के समस्तीपुर, बिहार के एक गांव देवधा में आज के ही दिन यानी 1 मई 1949 को हुआ था. इस तरह वे उम्र के 71वें बसंत में आ पहुंचे हैं. बसंत इसलिए कि बुद्धिनाथ मूलत: रोमैंटिक मिजाज और सांस्कृतिक भावभूमि के कवि रहे हैं. आज भी उनके गीतों में यथार्थ की बहुत बारीक आमद दिखती है, हालांकि इन गीतों में वे समग्र भारतीयता की एक छवि उकेरते से लगते हैं. बुद्धिनाथ की तालीम में संस्कृत की बुनियादी शिक्षा शामिल है. बाद में उन्होंने अंग्रेजी व हिंदी में एमए तथा पीएचडी की उपाधि हासिल की. हिंदी के साथ-साथ वे मैथिली में भी कविताएं लिखते हैं तथा देश विदेश में गहरी उत्सुकता से सुने और सराहे जाते हैं. अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उन्होंने आज दैनिक में साहित्य और समाचार संपादक के रूप में की तथा बाद में विभिन्न सरकारी उपक्रमों में हिंदी अधिकारी रहे और अंतत: ओएनजीसी से मुख्य प्रबंधक-राजभाषा पद से सेवानिवृत्त हुए. राजभाषा कार्यान्वयन एवं हिंदी के प्रचार-प्रसार से जुड़ कर उन्होंने हिंदी को किसी मृतप्राय और अनुवाद की भाषा के रूप में विकसित करने की बजाय उसे व्यावहारिक धरातल पर उतारने की कोशिश की. जहां भी रहे उस उपक्रम व संस्थान को साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बनाए रखा.

नवगीत की पटकथा और बुद्धिनाथ मिश्र...
बुद्धिनाथ यों तो लोकप्रिय गीतकार हैं किन्तु वाराणसी में जिन दिनों यानी 1980 के आसपास शंभुनाथ सिंह गीत से आगे नवगीत की पटकथा लिख रहे थे और ठाकुरप्रसाद सिंह के सहयोग से शंभुनाथ सिंह के संपादन में नवगीत दशक के प्रकाशन की भूमिका बन रही थी, बुद्धिनाथ मिश्र नवगीत के कवि के रूप में भी प्रतिष्ठित हो चुके थे. शंभुनाथ सिंह ने उनकी लोकप्रियता और नवगीत में निरंतर सक्रियता को देखते हुए 1984 में प्रकाशित नवगीत दशक-3 में राजेंद्र गौतम, डॉ सुरेश, विजय किशोर मानव, जहीर कुरेशी, दिनेश सिंह एवं विनोद निगम के साथ एक नवगीतकार के रूप में शामिल किया. तब 'नवगीत दशक-3' के अपने वक्तव्य में बुद्धिनाथ जी ने कहा था, ''गीतधर्मिता केवल भारतीय लोक जीवन की ही नहीं, मानव मात्र की एक सहजात प्रवृत्ति है. मातृरुपा प्रकृति अपनी संतानों में जिन पोषण रसों का संचार करती है, उनमें एक गीतधर्मिता भी है. यही कारण है कि हम आज नवगीत के छोटे छोटे गमलों में महाकाव्य का अर्थबीज बोने लगे हैं. उन्होंने नवगीत को पल्लव की नवता से जोड़ कर देखते हुए कहा था, पत्ते को पल्लव तभी कहा जाता है जब उसमें रूप, रस, गंध, स्‍पर्श की नवीनता होती है. बुद्धिनाथ का कवि ग्राम और नगर के मध्य पला बढ़ा, बचपन गांव के रम्य प्राकृतिक परिवेश में बीता, तो जीविका की जद्दोजेहद शहर और महानगर ले आई. इसलिए गांव व नगर के बीच का द्वंद्व उनके भीतर हमेशा ही पलता रहा है. यही वजह है कि जहां उनके खजाने में गांव के बेहतरीन गीत हैं, वहीं नगरीय अकेलेपन संत्रास और जद्दोजेहद को व्यक्त करने वाले गीत भी. जैसा कि मैं कह चुका हूं उनके भीतर भारतीय आबोहवा में व्याप्त एक समग्र सांस्कृतिक बोध भी सक्रिय रहा है. इस बात की तसदीक उन्होंने अपने इस वक्तव्य में भी की है . वे कहते हैं, ''मैं गांव और नगर के ताने और बाने से नवगीतों को बुना करता हूं तथा नगर और गांव दोनों की स्थिति उत्तरोत्तर अधिक कष्टप्रद होते जाने के बावजूद आस्था और सांस्कृतिक चेतना को मैं छोड़ नहीं पाता, क्योंकि उनका संबल छोड़ देने पर दम घुटने लगता है.''
बुद्धिनाथ मिश्र के गीतों की भावभूमि जैसी शस्य श्यामला है वैसी भावभूमि कम गीतकारों की है. इसीलिए उनके यहां आर्द्रा, बादल, सावन, बसंत, बारिश, सुबह, सांझ, धान और पान के गीत मिलेंगे. प्रेम की ऐसी मौलिक उपपत्तियां उनके यहां हैं तो दाम्पत्य के जुड़ाव भरे गीत भी. नदियों को लेकर उनके गीतों में एक से एक बेहतरीन बिम्ब मिलते हैं. एक नवारुण भोर उनके गीतों से झांकती है. पहाड़ी हवा उन्हें दुलराती है, पर्वत पर खिला बुरॉंस उन्हें उल्लसित करता है. ग्रामदेवता पर लिख कर वे जैसे अपने गांव की परिक्रमा पूरी कर लेते हैं. यह गंवई मन ही है उनके भीतर जो कोलकता, काशी और अब देहरादून रहते हुए भी मलिन और महानगरीयता से आक्रांत नहीं हुआ बल्कि समय-समय पर गीतों की भागीरथी में नहाते हुए नीम तले, यह धरती, बादल आकर देखे, एक पाती नर्मदा के नाम, दिन फागुन के, जामुन की कोंपले, चैती, सावन बरसे, ऋतुराज एक पल का, चांद उगे चले आना, फूल झरे जोगिन के द्वार जैसे गीत लिखता रहा. मिथिला के जनपदीय अंचल से जुड़े बुद्धिनाथ के भीतर एक लोकगीतकार भी सांस लेता है जो उनके गीतों की धुनों को लोकोन्मुख बनाने में मदद करता है. चांद जरा धीरे से उगना, धनी हो गयी लवंगिया की डार लचक चली फागुन में, दिन फागुन के बौराने लगे, नाच गुजरिया नाच कि आयी कजरारी बरसात री, फिर दोपहर लगी अलसाने नीम तले जैसे गीत इसी लोक-लचक के साथ लिखे गए हैं.

buddhinath_namawar_050120034953.jpgप्रख्यात आलोचक नामवर सिंह के साथ बुद्धिनाथ मिश्र


उनके गीतों का सम्‍मोहन...

एक बार की बात है. मैं बनारस में था, तभी उनका संग्रह 'ऋतुराज एक पल का' वर्ष 2013 में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ था. वे बनारस आए तो अपने एक पारिवारिक रिश्ते में रुके जहां उनसे भेंट हुई तो अपना यह संग्रह मुझे भेंट किया. इस संग्रह को पाकर किताबों के अंबार में घिर रहने के बावजूद जैसे लगा कि यह मुझ जैसे गीत प्रेमी के लिए एक नायाब उपहार है. उलटा पलटा तो उसके कितने ही गीत होठों पर आए, धुनें बनी और मन में बजती रहीं. पर दो गीत होठों से ऐसे हिलगे कि आज तक उसकी गंध नहीं गयी. उन्हें याद करता हूँ तो पोर-पोर गीतों के पराग में नहा उठता है. उनमें एक गीत था, चांद उगे चले आना पिया कोई जाने ना. उस गीत की लोकधुन मेरे होठों पर तिरने लगी. मैं अनुमान लगाने लगा कि बुद्धिनाथ ने अवश्य मिथिला के किसी लोकगीत से इसकी धुन पायी होगी, जिससे इसका असर इतना चुंबकीय हो उठा है. गीत में एक गांव की नायिका अपने प्रेमी से मिलना चाहती है, पर साथ ही यह भी चाहती है कि वह चांद उगने के साथ आए जिससे कि लोग तब तक सो जाएं, पनघट पर ग्रामवधुओं के छागल भी बजने बंद हो जाएं. यानी कोई सहजता से लक्ष्य न कर सके.
यह गीत इतना सुगठित है कि इसका असर एक सुधी कला विदुषी के सम्मुख देखने को मिला जब उनके अनुरोध पर मैंने यह गीत पहली बार खुल कर सुनाया, तो सद्यः शल्यचिकित्सा के बावजूद उनके पैर थिरक उठे और वे फर्श पर नाच उठीं. यह गीत आज भी मेरे होठों पर खेलता है. एक और वाकया है. लेखकों के एक दल के साथ दक्षिण अफ्रीका यात्रा के दौरान मुझे इस गीत को गुनगुनाता देख अशोक च्रक्रधर भी इसकी धुन पर मुग्ध हो उठे थे तथा अपने संचालन में भारतीय दूतावास, जोहांसबर्ग में आयोजित कवि सम्मेलन में उन्होंने उस दिन मुझे अपने काव्यपाठ की शुरुआत बुद्धिनाथ मिश्र के इसी गीत से करने का अनुरोध किया था. वे उस दिन वहां उपस्थित न होकर भी अपने गीत के जरिए उपस्थित थे. इसी संग्रह का एक और गीत:
एक नदी गुजर गयी ताल के बगल से

कुछ न कह सका ठहरा जल बहते जल से...अपने आपने कितना मार्मिक बन पड़ा है. एक आदमी सफलता की सीढ़ियां चढता हुआ उस बिन्दु पर पहुंच जाता है, जिसके सामने अपनी ही जगह पर ठहरा व्यक्ति भला क्या कह सकता है. ऊंच-नीच का यह भाव आज भी अमीर और गरीब वर्ग के मध्य दिखता है, तो मन कलप उठता है. यही सरोकार कवि को ऊपर उठाते हैं क्योंकि वही है जो आम आदमी के पक्ष में आवाज उठाता है. यही नहीं, वे उन पेड़ों के पक्ष में भी आवाज उठाते हैं जिन पर आरियां चलने वाली हैं:

''जंगल से आया है समाचार
कट जाएंगे सारे देवदार.''

बुद्धिनाथ मिश्र की एक विशेषता यह भी है कि उन्होंने न केवल नवगीत का परचम देश-विदेश में फहराया बल्कि अनेक ख्यात नवगीतकारों के गीतों के चयन भी संपादित किए. कुछ संस्थाओं के सहयोग से उन्होंने रामचंद्र चंद्रभूषण का 'समय अब सहमत नहीं', सोम ठाकुर का 'एक ऋचा पाटल को', कैलाश गौतम का 'जोड़ा ताल', माहेश्वर तिवारी का 'नदी का अकेलापन' व उदयप्रताप सिंह का 'देखता कौन है' के गीत संग्रह प्रकाशित कराए. उनकी पहल न होती तो शायद सोम ठाकुर को कवि सम्मेलनों से कहां फुरसत मिलती कि वे अपना संग्रह छपाते. उसके बाद अभी उनका दूसरा संग्रह बमुश्किल अनुभव प्रकाशन की पहल पर आ सका है. सीतामढ़ी के रामचंद्र चंद्रभूषण, जिनका जिक्र अक्‍सर ठाकुरप्रसाद सिंह जी किया करते थे, का संग्रह भी कदापि न आ पाता यदि बुद्धिनाथ जी की यह पहल न होती. स्वयं का संग्रह 'जाल फेंक ओ मछेरे' 1984 के बाद लगभग दो दशकों तक अप्राप्य ही रहा, जिसकी कमी इसी कड़ी में शिखरिणी के 2005 में आने के बाद ही पूरी हो सकी जिसमें उस संग्रह के गीत पुन: उपलब्ध हो सके. गीत लिखने लिखाने और मंच पर उसके नाम पर पैसे कमाने वाले कवियों की तादाद तो बहुत है, पर गीत के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान करने वालों के संग्रह सुलभ हो सकें यह काम केवल बुद्धिनाथ मिश्र ने किया.

बुद्धिनाथ मिश्र केवल गीतकार ही नहीं, गीतों के विश्लेषक और समालोचक भी हैं. वे गीत के साथ ललित निबंध, रिपोर्ताज व सांस्कृतिक विषयों पर अग्रलेख भी लिखते रहे हैं. उन्हें उनके कवित्व के लिए पुश्किन सम्मान, दुष्यंत कुमार अलंकरण, साहित्य भूषण, परिवार सम्मान, डॉ शंभुनाथ सिंह नवगीत पुरस्कार सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं पर यह काफी नहीं है. उन्हें और बड़े पुरस्कार मिलने चाहिए. विडंबना यह कि नई कविता के समानांतर नवगीत की जो यात्रा उत्साह से शुरू हुई थी, वह कुछ मंद भी पड़ी है और धीरे-धीरे दोनों शैलियों के बीच फॉंक भी पैदा हुई है. जबकि नए कथ्य‍, बिम्ब व नए शिल्प़ की पायदान पर दोनों को नए अर्थ संवहन के लिए साथ-साथ चलना चाहिए था क्योंकि दोनों काव्य के वृहत्तर परिसर के ही अंग हैं. फलत:, नई कविता के कवि तो समादृत होते रहे, अकादमियों के पुरस्कार भी प्राय: नई काव्य धारा के ऐसे ही कवियों को मिले, पर छंद के साधक कवि उपेक्षित रहे.

गीत की वैचारिकी और रचना प्रक्रिया...
गीत की वैचारिकी निर्मित करने में जो काम कभी चंद्रदेव सिंह ने 'पॉंच जोड़ बांसुरी' के माध्यम से किया, उसमें शामिल पांच लेख आज भी मार्गदर्शी व प्रतिमान निरूपक हैं. पर उसके बाद कहने को नवगीत दशक व नवगीत अर्धशती की भूमिका रही व कन्हैयालाल नंदन संपादित 'श्रेष्ठ गीत संचयन' की भी, पर गीत की वैचारिकी उस ढंग से सुगठित रूप से सामने नहीं आई जिसकी जरूरत थी. प्राय: गीतकार नई कविता के कवियों से चिढ़ते रहे व अध्यवसायिता में पिछड़ते गए. नई संवेदना व बारीक जीवन कथ्य के मामले मे गीत का हाथ उत्तरोत्तर तंग होता गया. उधर नई कविता के कवियों ने भी गीत संवेदना से अपने को काट लिया जिसे कभी सप्तक परंपरा में आदर के साथ अज्ञेय ने स्थान दिया था.

बात जब बुद्धिनाथ जी की चली है तो समय-समय पर उन्होंने बहुत सी ध्यातव्य बातें कहीं हैं, उन्हें देखना चाहिए. वे कहते हैं, ''गीत काव्याभिव्यक्ति का चरम उत्कर्ष है. यह शौक से नहीं लिखा जा सकता. नैसर्गिक प्रतिभा, व्यापक अध्ययन, गहन अनुभूति और दीर्घकालिक व्‍यवधानरहित साधना से रचनाकार उस अवस्था में पहुंचता है जब शब्द एक विराट चेतना चक्र से निकलकर अवतरित होते हैं. प्रत्येक गीत की नाभि में एक सघन भाव होता है जो प्रथम पंक्ति से अंतिम पंक्ति तक कायम रहता है.'' वे गीत और नवगीत में वही अंतर मानते हैं जो हरे पात व तांबई पल्लव में है. कभी गीत रचना के लिए ठाकुर प्रसाद सिंह ने मघई पान के पनवाड़ी का उदाहरण दिया था कि वह पान को पकाने की प्रक्रिया में कितनी लंबी साधना से गुजरता है. बुद्धिनाथ गीत की रचना प्रक्रिया या उसके परिष्करण की प्रक्रिया को ताम्र निर्माण प्रक्रिया से जोड़ कर देखते हैं. उन्होंने इस संस्थान से जुड़ कर ताम्र परिष्करण को निकट से देखा था कि कैसे उसे रासायनिक प्रक्रिया द्वारा मथकर मक्खन की तरह सांद्र को बिलगाया जाता है. धमन भट्ठी में पिघलाया व पिघलित तेजोमय धारा को सांचों में प्रवाहित किया जाता है. सांचे में ढली धातु की शुद्धता के लिए कुछ दिन तेजाब में भी रखा जाता है. वे कहते हैं इसी तरह कविता के अयस्क को गलाकर अच्छे गीत तैयार किए जाते हैं. अध्ययन अनुभव और संस्कार से प्रोद्भुत शब्द हवा मिठाई की तरह शून्य से आकार ग्रहण करते हैं तथा शब्द स्वत: छंद के सांचे में ढलकर बाहर निकलते हैं. वे कहते हैं छंद में ढलने के बाद भी कविता को अपनी प्राणवत्ता सिद्ध करने के लिए लंबे अरसे तक वक्त के तेजाब से गुजरना होता है.

'शिखरिणी' की उनकी लंबी भूमिका नवगीत के प्रतिमानों का समुच्चय है. वे गीत को वनौषधि मानते हैं पर वहीं यह भी शिकायत करते हैं कि उसके हक़ की सारी धूप मुक्त छंद कविता की लैंटाना झाड़ियां ले जा रही हैं. यह कहना जरा धृष्टता होगी कि मुक्तछंद में पिछले चार दशकों में बहुत अच्छा लिखा गया है. विचार, संवेदना और कथ्य के धरातल पर समकालीन श्रेष्ठ कवियों ने कविता को नए और सर्वथा मौलिक उदभावनाओं से संपन्न बनाया है, गीत को अभी उस धरातल पर ले जाना बाकी है.

गीत के सुधी सहचर...

हम गीत की परंपरा पर गौर करें तो एक स्वर्णयुग गीतों का रहा है जिसमें नई कविता धारा के साथ गीतकारों का योगदान रहा है पर आज बाब्ड हेयर गीतों के नाम पर नवता का जो उपस्थापन किया जा रहा है, उसके विपरीत शंभुनाथ सिंह, रमानाथ अवस्थी, वीरेन्द्र मिश्र, किशन सरोज, भारत भूषण, कैलाश गौतम व उमाकांत मालवीय के गीत पूर्ण संवेदना का वहन करने वाले गीत रहे हैं. नए गीतों में नवीनता के उन्मेष की पहली बड़ी लकीर भले ही उमाकांत मालवीय, रमेश रंजक और नईम जैसे कवियों ने खींची हो और जिसे यश मालवीय ने अभी तक अपने रचना संकल्पों से जोड़े रखा हो, बुद्धिनाथ मिश्र ने कृत्रिम यथार्थबोध को कभी अपने गीतों में जगह नहीं दी. बल्कि आज भी संवेदना को अहमियत देते हुए वे जब भी किसी नए गीत के साथ सामने आते हैं, संवेदना के तंत्र को हौले से छू लेते हैं. रूप, रस, गंध और ऐंद्रिय संवेदन से भरे उनके गीत सुनने के बाद कविता और कवियों के प्रति प्रीति और रसवत्‍ता जगाती है.

आज बुद्धिनाथ मिश्र जीवन की उत्तरशती में हैं तथापि उनके गीतों की उम्र आज भी जैसे बहुत कम लगती है, वह उतनी ही संजीदा और संस्कृतिचेता लगती है जितनी युवा. आज भी गीत रचना के शिखर पर पहुंच जाने के बाद भी उनसे युवा जीवन के उस गीत की मांग होती है, जिसे उन्होंने सदैव अपनी संवेदना के भाल पर अक्षत और रोली की तरह सजाया है. अभिधा की कसौटी पर इस गीत को कसते हुए इसके औचित्‍यसम्मत न होने की बात कही जाती है पर बुद्धिनाथ की इस कविता में न मछली का अर्थ मछली है; न जाल का जाल; न बिंधने का अर्थ कालकवलित होने के लिए प्रस्तुत करना है. इससे उलट संघर्ष, जिजीविषा और लक्ष्य संधान के लिए हिम्मत न हारने की प्रेरणा देने वाला यह गीत आज भी लोकप्रियता की ऊंची पायदान पर है जो बुद्धिनाथ जी का 'सिग्नेचर लिरिक' बन चुका है. न इस गीत का सम्मोहन खत्म होने वाला है, न इस गीतकार की पहचान. बुद्धिनाथ मिश्र गीतों के ऐसे ही सुधी सहचर हैं.
***

# लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. उनकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. वे हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, फोन 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay